Fifa World Cup 2026: जाने भारत में क्यों क्रिकेट नहीं, फुटबॉल था पहला जुनून?

Fifa World Cup 2026: फीफा वर्ल्ड कप स्पेशल में जानिए भारतीय फुटबॉल का गौरवशाली इतिहास—1911 मोहन बागान की जीत, स्वर्णिम दौर, 1950 विश्वकप का छूटा मौका, सुनील छेत्री और भविष्य की नई उम्मीदें।

Yogesh Mishra
Published on: 26 Jun 2026 3:20 PM IST
India FIFA World Cup 2026
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India FIFA World Cup 2026 

FIFA World Cup Special: भारत में खेल की बात हो तो दिमाग़ में पहला और आखिरी नाम क्रिकेट आता है। पिछले कई दशकों में क्रिकेट ने जो शोहरत और पैसा कमाया उसने बाकी खेलों को पीछे छोड़ दिया। पर भारतीय खेल इतिहास को ध्यान से देखें तो एक दिलचस्प सच सामने आता है। वो ये कि, एक दौर था जब फुटबॉल भारत का सबसे लोकप्रिय खेल बनने की राह पर था। कोलकाता, गोवा, केरल, हैदराबाद, पूर्वोत्तर भारत, यहां फुटबॉल सिर्फ खेल नहीं था बल्कि सामाजिक ज़िंदगी का हिस्सा था।

भारतीय फुटबॉल की कहानी सिर्फ खेल की नहीं है। यह अंग्रेज़ी राज, राष्ट्रीय जागरूकता और आधुनिक भारत बनने की कहानी से भी जुड़ी है।

जब अंग्रेज़ों का खेल भारत का जुनून बन गया

भारत में आधुनिक फुटबॉल अंग्रेज़ी शासन के साथ आया। 19वीं सदी के आख़िर में अंग्रेज़ सैनिकों और अफसरों ने इसे लोकप्रिय बनाना शुरू किया। शुरुआत में यह सिर्फ अंग्रेज़ों का खेल था। पर धीरे-धीरे भारतीय युवाओं ने भी इसे अपना लिया, खासकर बंगाल में।


इस खेल को भारत लाने का श्रेय जाता है नागेंद्र प्रसाद सर्वाधिकारी को, जिन्हें भारतीय फुटबॉल का जनक कहा जाता है। 1877 में एक बालक के तौर पर उन्होंने कलकत्ता के मैदान पर अंग्रेज़ सैनिकों को खेलते देखा। प्रभावित होकर उन्होंने अपने स्कूल के दोस्तों के साथ भारत का पहला स्वदेशी क्लब, 'बॉयज क्लब', बना दिया।

1911: नंगे पैर वाली टीम ने इतिहास रच दिया

19वीं सदी के आख़िरी सालों में भारत में राष्ट्रीय चेतना उभर रही थी। अंग्रेज़ी राज के खिलाफ गुस्सा बढ़ रहा था। ऐसे में मैदान भी राष्ट्रीय गर्व दिखाने की जगह बन गए। भारतीय टीमों की जीत सिर्फ खेल जीत नहीं मानी जाती थी, अंग्रेज़ों पर मनोवैज्ञानिक जीत मानी जाती थी।


1911 का साल भारतीय खेल इतिहास में खास जगह रखता है। उस साल Mohun Bagan AC ने मशहूर IFA शील्ड जीती। फाइनल में टीम ने अंग्रेज़ी सेना की टीम को हराया। ज़्यादातर भारतीय खिलाड़ी नंगे पैर खेल रहे थे, सामने वाली टीम के पास जूते और बेहतर सुविधाएं थीं। जीत के बाद कोलकाता की सड़कों पर जश्न का सैलाब आ गया। कई नेताओं ने इसे सिर्फ खेल नहीं, भारतीय आत्मविश्वास की मिसाल बताया।

29 जुलाई 1911 को मोहन बागान ने ब्रिटिश सेना की 'ईस्ट यॉर्कशायर रेजिमेंट' को 2-1 से हराया। कप्तान शिबदास भादुड़ी और अभिलाष घोष के गोलों से मिली इस जीत को बंग-भंग आंदोलन के बाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी सांस्कृतिक जीत माना गया।

कोलकाता: जहां फुटबॉल धर्म जैसा था

1911 की उस जीत ने भारतीय फुटबॉल को नई दिशा दी। हज़ारों युवा मैदान में उतर गए। बंगाल में फुटबॉल राष्ट्रीय गर्व का प्रतीक बन गया। कोलकाता धीरे-धीरे भारतीय फुटबॉल की राजधानी बन गया। चाय की दुकानों से कॉलेज परिसरों तक, हर जगह फुटबॉल की बात होती।

Mohun Bagan, East Bengal और बाद में Mohammedan Sporting Club ने भारतीय फुटबॉल को आकार दिया। मोहन बागान और ईस्ट बंगाल की प्रतिद्वंद्विता भारतीय खेल इतिहास की सबसे मशहूर प्रतिद्वंद्विता बन गई। ईस्ट बंगाल का उदय बंगाल विभाजन और पूर्वी बंगाल से आए लोगों की पहचान से जुड़ा था। मोहन बागान को बंगाली अभिजात वर्ग का प्रतिनिधि माना जाता था।

कोलकाता डर्बी या 'बड़ा मैच', दुनिया की सबसे उग्र प्रतिद्वंद्विताओं में गिना जाता है। मोहन बागान के समर्थकों को 'घोटी' और ईस्ट बंगाल के समर्थकों को 'बांगाल' कहा जाता है। यह जंग सिर्फ फुटबॉल की नहीं, चिंगड़ी मछली और हिल्सा मछली के पाक-सांस्कृतिक गर्व की भी जंग बन जाती है।

1948-1962: भारत का स्वर्ण युग

आज़ादी के बाद भारतीय फुटबॉल ने नया अध्याय शुरू किया। 1948 से 1962 तक का दौर भारतीय फुटबॉल का स्वर्ण युग कहलाता है। इस दौरान भारत एशिया में सम्मानित फुटबॉल शक्ति माना जाता था।


1948 के लंदन ओलंपिक में भारतीय टीम का खेल दुनिया का ध्यान खींच गया। कई खिलाड़ी अब भी नंगे पैर खेल रहे थे, पर खेल ज़बरदस्त था। फ्रांस के खिलाफ भारत का पहला अंतरराष्ट्रीय मैच सिर्फ 2-1 से हारा गया। मैच के बाद जब ब्रिटिश मीडिया ने कप्तान तैलमरेन आओ से नंगे पैर खेलने की वजह पूछी, उनका जवाब आज भी याद किया जाता है, हम भारत में फुटबॉल खेलते हैं, बूटबॉल नहीं।

इस स्वर्ण युग की बात कोच सईद अब्दुल रहीम के बिना अधूरी है। उन्हें भारतीय फुटबॉल का वास्तुकार कहा जाता है। उनके मार्गदर्शन में भारत ने 1951 (दिल्ली) और 1962 (जकार्ता) एशियाई खेलों में सोना जीता, और 1956 के मेलबर्न ओलंपिक में सेमीफाइनल तक पहुंचा, किसी भी एशियाई देश के लिए ओलंपिक फुटबॉल की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक।

इस दौर में चुन्नी गोस्वामी, पीके बनर्जी और तुलसीदास बलराम जैसे नाम सामने आए। इन तीनों की फॉरवर्ड लाइन को 'होली ट्रिनिटी' कहा जाता था और पूरे एशिया में इनका खौफ था।

1950 विश्वकप: जो हाथ से निकल गया

भारतीय फुटबॉल के इतिहास की सबसे चर्चित घटना 1950 विश्वकप से जुड़ी है। भारत खेलने का मौका पाकर भी हिस्सा नहीं ले सका। लोकप्रिय कहानी यह रही कि भारतीय खिलाड़ी नंगे पैर खेलना चाहते थे और फीफा ने मना कर दिया। पर असली वजह कहीं ज़्यादा उलझी हुई थी। यात्रा का खर्च, सीमित संसाधन, और उस वक्त ओलंपिक को विश्वकप से ज़्यादा अहमियत देना, इन सबने मिलकर भारत की भागीदारी रोक दी। अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ ने मुख्य रूप से लंबी और महंगी समुद्री यात्रा और अभ्यास की कमी की वजह से हाथ पीछे खींचे थे। यह घटना आज भी 'क्या होता अगर' वाली सबसे बड़ी बहसों में शामिल है।

जब क्रिकेट ने जगह ले ली

1951 और 1962 में सोना जीतने के बाद उम्मीद थी कि भारत और आगे बढ़ेगा। हुआ इसका उलटा। जापान, दक्षिण कोरिया, सऊदी अरब, ईरान, यह सब देश फुटबॉल को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाते गए। अकादमियां बनाईं, कोचिंग ढांचा बनाया, लीगें बढ़ाई। भारत इस दौड़ में पिछड़ गया।

इस पतन की एक बड़ी वजह प्रशासनिक अव्यवस्था थी। प्रतिभा हो, पर मज़बूत संस्थाएं न हों, तो खेल आगे नहीं बढ़ता। भारत में यही हुआ। प्रतिभाशाली खिलाड़ी आते रहे, पर उन्हें तराशने का ढांचा नहीं बना।

इसी बीच 1983 में भारत ने क्रिकेट वर्ल्ड कप जीता। यह जीत भारतीय खेल संस्कृति बदल गई। क्रिकेट राष्ट्रीय जुनून बन गया। टीवी, प्रायोजक, मीडिया, सब क्रिकेट की तरफ झुक गए। फुटबॉल, हॉकी, बाकी खेल पीछे छूटते गए। क्रिकेट टीवी के लिए सटीक खेल साबित हुआ, और इसी वजह से दोनों खेलों के बीच आर्थिक खाई बढ़ती गई।

जहां जुनून आज भी ज़िंदा है

पर यह कहना गलत होगा कि फुटबॉल पूरी तरह खत्म हो गया। कोलकाता की फुटबॉल संस्कृति बची रही। गोवा ने इसे अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाए रखा। केरल का जुनून कभी कम नहीं हुआ। पूर्वोत्तर भारत, खासकर मणिपुर, मिज़ोरम और मेघालय, ने नई प्रतिभाएं दी।


इस दौर में 'आई लीग' और उससे पहले 'राष्ट्रीय फुटबॉल लीग' शुरू हुई। शिलॉन्ग लाजोंग और आइज़ोल एफसी जैसे क्लबों के उभार ने दिखाया कि पहाड़ी राज्यों में फुटबॉल की जड़ें कितनी गहरी हैं।

सुनील छेत्री: एक चेहरा जो पूरे युग का प्रतीक बना

भारतीय फुटबॉल के आधुनिक इतिहास का सबसे ज़रूरी नाम है सुनील छेत्री जब भारतीय फुटबॉल को प्रेरणा और पहचान की ज़रूरत थी, छेत्री ने राष्ट्रीय टीम का चेहरा बनकर यह काम किया। उनकी उपलब्धि सिर्फ गोलों में नहीं नापी जा सकती। उन्होंने पूरी पीढ़ी को विश्वास दिया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला मुमकिन है।

छेत्री अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल में 94 गोलों के साथ रोनाल्डो और मेसी जैसे दिग्गजों की कतार में खड़े होने वाले भारत के इकलौते नायक हैं। जून 2024 में कुवैत के खिलाफ मैच के बाद उन्होंने अपने 19 साल लंबे करियर को विदा कह दिया।

आईएसएल: नई चमक, पर पुराना सवाल बाकी

2014 में इंडियन सुपर लीग की शुरुआत भारतीय फुटबॉल के लिए बड़ा मोड़ था। फुटबॉल को नई दृश्यता मिली। बड़े शहरों में नए क्लब बने। विदेशी खिलाड़ी और कोच आए। प्रसारण की गुणवत्ता सुधरी। कुछ लोगों ने आलोचना की कि ज़मीनी ढांचे को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है, सिर्फ टॉप लीग पर ध्यान है। पर यह मानना होगा कि आईएसएल ने फुटबॉल को राष्ट्रीय बातचीत का हिस्सा बना दिया। बाद में मोहन बागान और ईस्ट बंगाल भी इस लीग का हिस्सा बने, जिससे भारतीय क्लब फुटबॉल को नया आधुनिक रंग मिला।

अभी भी बहुत लंबा रास्ता बाकी है


भारतीय फुटबॉल की सबसे बड़ी चुनौती आज भी ज़मीनी ढांचा है। दुनिया के कामयाब फुटबॉल देश बच्चों और किशोरों के विकास पर भारी ध्यान देते हैं। भारत में इस दिशा में कुछ प्रगति हुई है, पर रास्ता अभी लंबा है। एक और चुनौती है, सोच। भारत में ज़्यादातर परिवार फुटबॉल को करियर के तौर पर उतनी आसानी से नहीं अपनाते जितना दूसरे देशों में होता है। आर्थिक सुरक्षा और शिक्षा से जुड़े सवाल खिलाड़ियों के सामने रहते हैं। जब तक फुटबॉल ज़्यादा स्थिर पेशेवर मौके नहीं देगा, प्रतिभाशाली युवाओं को इस खेल में रोकना मुश्किल रहेगा।

उम्मीद अभी बाकी है

फिर भी तस्वीर पूरी तरह उदास नहीं है। पिछले दो दशकों में दर्शक बढ़े हैं। यूरोपीय लीगों के प्रसारण ने युवाओं में दिलचस्पी बढ़ाई है। सोशल मीडिया ने नए दर्शक दिए हैं। पूर्वोत्तर भारत, केरल, गोवा, बंगाल, यहां प्रतिभा का बहाव जारी है। महिला फुटबॉल में भी धीरे-धीरे तरक्की हो रही है। भारतीय महिला टीम, जिन्हें "ब्लू टाइग्रेस" कहा जाता है, ने हाल के सालों में अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी मज़बूत मौजूदगी दिखाई है। बाला देवी जैसी खिलाड़ी का स्कॉटलैंड के रेंजर्स क्लब के लिए खेलना दिखाता है कि महिला फुटबॉल का दायरा तेज़ी से बढ़ रहा है।

एक सपना जो आज भी ज़िंदा है

भारतीय फुटबॉल की कहानी इसलिए दिलचस्प है क्योंकि इसमें शानदार अतीत भी है, लंबा संघर्ष भी, और आगे की उम्मीद भी। यह कहानी अभी अधूरी है। सवाल यह नहीं कि भारत ने क्या खोया। बड़ा सवाल यह है कि भारत आगे क्या हासिल कर सकता है।

विशाल आबादी, बढ़ती अर्थव्यवस्था, युवा पीढ़ी, बेहतर अकादमियां, और फुटबॉल के लिए बढ़ती दिलचस्पी, इन सबको अगर एक सही राष्ट्रीय रणनीति से जोड़ दिया जाए, भारत आने वाले दशकों में एशियाई फुटबॉल की बड़ी ताक़त बन सकता है। यह आसान नहीं है, पर नामुमकिन भी नहीं।

शायद भारतीय फुटबॉल की सबसे बड़ी ताक़त यही है, उसके पास अब भी एक सपना है। वह सपना जो 1911 के मोहन बागान से शुरू हुआ था, 1951 और 1962 के स्वर्ण पदकों में दिखा था, और आज भी देश के हज़ारों मैदानों में गेंद के पीछे दौड़ते बच्चों की आंखों में ज़िंदा है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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