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Pele Biography: जूते पॉलिश करने वाला बच्चा कैसे बना फुटबॉल का बादशाह? पढ़िए पेले की अद्भुत कहानी
Pele Biography in Hindi: गरीबी में जूते पॉलिश करने वाले बच्चे से फुटबॉल का बादशाह बनने तक। जानिए तीन विश्वकप जीतने वाले महान ब्राज़ीलियाई खिलाड़ी के रिकॉर्ड, संघर्ष, करियर और विरासत।
Fifa World Cup 2026 Pele Biography
Pele Biography in Hindi: खेल इतिहास में कुछ नाम अपने खेल से बड़े हो जाते हैं। वे सिर्फ खिलाड़ी नहीं रहते। वे एक युग बन जाते हैं, एक प्रतीक बन जाते हैं। फुटबॉल में यह नाम है पेले। क्रिकेट में जो जगह डॉन ब्रैडमैन की है, मुक्केबाज़ी में मुहम्मद अली की, फुटबॉल में वह जगह लंबे समय तक पेले की रही। आज भी जब बहस होती है कि इतिहास का सबसे महान फुटबॉलर कौन है तो पेले का नाम सबसे पहले आता है। पर उनकी कहानी सिर्फ गोलों और ट्रॉफियों की नहीं है। यह उस लड़के की कहानी है जो गरीबी और अभाव में पैदा हुआ और खुद को फुटबॉल का सम्राट बना लिया।
ट्रेस कोरासोएस का छोटा 'दीको'
पेले का जन्म 23 अक्टूबर 1940 को हुआ। जगह थी ब्राज़ील का एक छोटा कस्बा, ट्रेस कोरासोएस। असली नाम था एडसन अरांटिस दो नासिमेंटो। कहते हैं यह नाम वैज्ञानिक थॉमस एडिसन के सम्मान में रखा गया था। बाद में उच्चारण बदलते-बदलते एडसन बन गया। पिता डोंदिन्हो खुद फुटबॉलर थे। हुनर तो था पर चोटों और मौके की कमी ने उन्हें बड़ा नाम बनने से रोक दिया। मां सेलेस्टे घर संभालती थीं। वे चाहती थीं कि बेटा पढ़ाई करे और स्थिर ज़िंदगी जिए। परिवार बहुत गरीब था और कई बार घर में नई गेंद खरीदने तक के पैसे नहीं होते थे। छोटा एडसन और उसके दोस्त पुराने कपड़ों और मोजों को बांधकर गेंद बनाते और उसी से घंटों खेलते। घरवाले उन्हें प्यार से 'दीको' बुलाते थे। सात साल की उम्र में वे रेलवे स्टेशन पर जूते पॉलिश करके परिवार की मदद करने लगे।
1950 में ब्राज़ील अपने ही घर में विश्वकप फाइनल हार गया था। पिता डोंदिन्हो फूट-फूटकर रोए थे। नौ साल के पेले ने पिता के आंसू पोंछते हुए वादा किया कि एक दिन वे ब्राज़ील के लिए विश्वकप जीतकर लाएंगे।
एक स्काउट जिसने भविष्य पढ़ लिया
किशोरावस्था में ही उनका नाम स्थानीय फुटबॉल में गूंजने लगा था। पूर्व खिलाड़ी वाल्देमार डी ब्रिटो ने उन्हें खेलते देखा और तुरंत समझ गए कि यह कोई आम बच्चा नहीं है। ब्रिटो उन्हें सैंटोस क्लब ले गए और अधिकारियों से कहा, यह लड़का एक दिन दुनिया का सबसे बड़ा फुटबॉलर बनेगा। उस वक्त शायद ही किसी ने यह बात गंभीरता से ली हो पर कुछ ही साल बाद यह सच साबित हो गई। सिर्फ पंद्रह साल की उम्र में पेले ने सैंटोस के लिए पेशेवर फुटबॉल खेलना शुरू कर दिया। अगले साल राष्ट्रीय टीम का बुलावा आ गया। इतनी कम उम्र में यह बहुत बड़ी बात थी।
1958: सत्रह साल का लड़का, और दुनिया रो पड़ी
असली धमाका हुआ 1958 के विश्वकप में। स्वीडन में खेले गए उस टूर्नामेंट में पेले सिर्फ सत्रह साल के थे। चोट के कारण शुरुआती मैच नहीं खेल पाए पर जैसे ही मैदान पर उतरे, दुनिया को समझ आ गया कि फुटबॉल को नया बादशाह मिल चुका है। उन्होंने वेल्स के खिलाफ निर्णायक गोल किया, फ्रांस के खिलाफ हैट्रिक लगाई और फाइनल में स्वीडन के विरुद्ध दो गोल ठोंके।
इन्हीं प्रदर्शनों ने उन्हें रातोंरात दुनिया का नायक बना दिया। मैच के बाद मैदान पर उस सत्रह साल के लड़के का रो पड़ना आज भी विश्वकप इतिहास की सबसे भावुक तस्वीरों में गिना जाता है।
एक संपूर्ण कलाकार
पेले को सिर्फ आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। वे सिर्फ स्ट्राइकर नहीं थे। वे प्लेमेकर भी थे और मौके बनाने वाले भी। पेले का संतुलन गज़ब का था, वे दोनों पैरों से खेल सकते थे। हेडर शानदार था। गति ऐसी कि रक्षक पीछे छूट जाते। और सबसे बड़ी बात ये कि वे खेल को सबसे पहले पढ़ लेते थे। उन्हें सिर्फ गोल मशीन कहना नाइंसाफी होगी। वे मैदान पर एक पूरे कलाकार थे। उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई थी कि ब्राज़ील सरकार भी सतर्क हो गई। यूरोपीय क्लब उन्हें खरीद न लें, इस डर से 1961 में राष्ट्रपति ने उन्हें आधिकारिक रूप से 'राष्ट्रीय धरोहर' घोषित कर दिया।
तीन विश्वकप, एक अकेला रिकॉर्ड
1958 के बाद 1962 और फिर 1970 में उन्होंने विश्वकप जीता। आज भी वे तीन विश्वकप जीतने वाले इकलौते खिलाड़ी हैं। यह रिकॉर्ड उनकी महानता का सबसे बड़ा सबूत माना जाता है। 1970 का विश्वकप उनकी परिपक्वता का शिखर था। मेक्सिको में खेली गई ब्राज़ील की टीम आज भी इतिहास की सर्वश्रेष्ठ टीमों में गिनी जाती है।
उस टीम में पेले सिर्फ गोल करने वाले नहीं थे बल्कि वे पूरे खेल की धुरी थे। फाइनल में इटली के खिलाफ उनका हेडर और कार्लोस अल्बर्टो के गोल तक पहुंचाने वाला उनका पास, फुटबॉल कला के सबसे सुंदर नमूनों में गिने जाते हैं।
नो-लुक पास और चिलेना
पेले के सबसे चर्चित हुनर में एक था नो-लुक पास। वे गेंद को एक दिशा देखते हुए दूसरी दिशा में भेज देते। विरोधी और गोलकीपर दोनों भ्रमित रह जाते। शरीर का संतुलन इतना अच्छा था कि सबसे तंग जगहों से भी निकल जाते। अगर माराडोना को ड्रिब्लिंग का जादूगर कहा जाता है, तो पेले को संपूर्णता का प्रतीक कहा जाता है। उनकी 'बायसिकल किक' या 'चिलेना', हवा में पीठ के बल उछलकर उल्टी दिशा में गोल मारने की यह कला, उन्होंने ही दुनिया भर में मशहूर की।
मैदान के बाहर भी एक सम्राट
1960 और 70 के दशक में स्पोर्ट्स मार्केटिंग आज जैसा विकसित नहीं था। फिर भी पेले का नाम दुनिया के सबसे बड़े व्यावसायिक चेहरों में था। प्यूमा के साथ उनका रिश्ता मशहूर रहा। पेय पदार्थ, घड़ियां, बैंकिंग, कई ब्रांडों के विज्ञापनों में वे दिखे। सैंटोस के साथ उनके करियर ने क्लब को वैश्विक पहचान दी। बाद में अमेरिकी क्लब New York Cosmos से जुड़कर उन्होंने अमेरिका में फुटबॉल को लोकप्रिय बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।
1969 में नाइजीरिया में उनकी लोकप्रियता का एक हैरतअंगेज़ उदाहरण देखने को मिला। वहां गृहयुद्ध चल रहा था। दोनों गुटों ने सिर्फ इसलिए 48 घंटे का युद्धविराम घोषित किया ताकि पेले का मैच देख सकें।
निजी जिंदगी, जहां सब आसान नहीं था
ज़िंदगी सिर्फ सफलता की कहानी नहीं थी। विवाह और रिश्तों को लेकर मीडिया में कई बार चर्चा हुई। कई बच्चों का ज़िक्र सार्वजनिक तौर पर हुआ। कुछ पारिवारिक विवाद भी सामने आए। खुद पेले ने माना कि लगातार यात्रा और शोहरत के बीच परिवार को पूरा समय देना हमेशा मुमकिन नहीं रहा।
उम्र बढ़ने के साथ किडनी और कूल्हों जैसी सेहत की समस्याएं भी आईं। अंतिम सालों में सार्वजनिक उपस्थिति कम होती गई। पर उन्होंने उम्मीद कभी नहीं छोड़ी। वे हमेशा कहते थे, ज़िंदगी में सबसे ज़रूरी चीज़ आशा बनाए रखना है।
अनुशासन जो आज भी मिसाल है
खान-पान में पेले बहुत अनुशासित थे। करियर के दौरान संतुलित भोजन लेते थे। ब्राज़ीलियाई पारंपरिक खाना, ताज़े फल, सब्ज़ियां, सीमित प्रोटीन, पर्याप्त पानी, यही उनकी दिनचर्या थी। शराब और बेढंगी जीवनशैली से दूर रहते थे। उस दौर में खेल विज्ञान आज जैसा नहीं था फिर भी पेले फिटनेस को बहुत गंभीरता से लेते थे। शायद इसीलिए वे लंबे समय तक शिखर पर बने रहे।
हज़ारवां गोल, और रुका हुआ स्टेडियम
नवंबर 1969 में मारकाना स्टेडियम में वास्को डी गामा के खिलाफ पेनाल्टी पर पेले ने अपना ऐतिहासिक 1000वां गोल किया। पूरा मैदान दर्शकों से भर गया और मैच को करीब आधे घंटे रोकना पड़ा। उनकी विरासत सिर्फ इन 1000 से ज़्यादा गोलों में नहीं है। उनकी विरासत यह है कि उन्होंने फुटबॉल को दुनिया की भाषा बना दिया। अफ्रीका के गांवों से एशिया के कस्बों तक, लाखों बच्चों ने पहली बार फुटबॉल को पेले के ज़रिए जाना। यह वह दौर था जब इंटरनेट नहीं था, सोशल मीडिया नहीं था। फिर भी उनका नाम दुनिया के हर कोने में पहुंच गया था।
आख़िरी विदाई, और एक विरासत जो कभी नहीं मिटती
29 दिसंबर 2022 को जब पेले का निधन हुआ तो दुनिया ने सिर्फ एक महान खिलाड़ी नहीं खोया। एक ऐसे इंसान को विदा किया जिसने फुटबॉल को उसकी सबसे सुंदर पहचान दी थी। कई देशों में श्रद्धांजलि सभाएं हुईं। खिलाड़ी, राष्ट्राध्यक्ष, आम लोग, सबने उन्हें याद किया।
पेले की कहानी एक बात सिखाती है। महानता सिर्फ प्रतिभा से नहीं बनती। उसके लिए मौका चाहिए, अनुशासन चाहिए, विनम्रता चाहिए, और लगातार मेहनत चाहिए। ट्रेस कोरासोएस की गरीबी से निकलकर फुटबॉल का सम्राट बनने वाला वह बालक आज भी करोड़ों लोगों की प्रेरणा है। शायद इसीलिए, जब भी कोई बच्चा पहली बार पैर से गेंद छूता है, कहीं न कहीं पेले की विरासत उसके साथ चलती है।
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