Ronaldo Nazario Biography: चोटों से लड़कर फुटबॉल के सबसे खतरनाक स्ट्राइकर बने R9 की प्रेरक कहानी

Ronaldo Nazario Biography Hindi: जानिए ब्राज़ील के महान स्ट्राइकर R9 की प्रेरक कहानी, जिन्होंने गंभीर चोटों के बाद शानदार वापसी कर 2002 FIFA World Cup जिताया और फुटबॉल इतिहास के सबसे महान खिलाड़ियों में जगह बनाई।

Yogesh Mishra
Published on: 25 Jun 2026 2:46 PM IST (Updated on: 25 Jun 2026 4:51 PM IST)
Fifa World Cup 2026 Ronaldo Nazario Biography
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Fifa World Cup 2026 Ronaldo Nazario Biography 

Ronaldo Nazario Biography Hindi: फुटबॉल के इतिहास में जब महान स्ट्राइकरों की चर्चा होती है, तो कई नाम सामने आते हैं। किसी को गोल मशीन कहा जाता है, किसी को बॉक्स का शिकारी, किसी को अवसरों का विशेषज्ञ। लेकिन अगर यह पूछा जाए कि गेंद पैरों में आते ही किस खिलाड़ी से डिफेंडर सबसे ज्यादा डरते थे तो बहुत से विशेषज्ञों का पहला जवाब होगा - रोनाल्डो नाज़ारियो। आधुनिक पीढ़ी उन्हें अक्सर 'आर-9' के नाम से जानती है, ताकि उनका अंतर क्रिस्टियानो रोनाल्डो से स्पष्ट किया जा सके। लेकिन एक समय ऐसा था जब दुनिया में सिर्फ एक ही रोनाल्डो था, और वह इतना प्रभावशाली था कि उसके नाम के आगे किसी उपनाम की जरूरत नहीं पड़ती थी। स्पीड, पावर, बैलेंस, ड्रिब्लिंग, फिनिशिंग और आत्मविश्वास। इन सभी गुणों का ऐसा कॉम्बिनेशन फुटबॉल इतिहास में बहुत कम खिलाड़ियों में दिखाई देता है। अगर चोटों ने उनका रास्ता न रोका होता तो संभव है कि फुटबॉल के महानतम खिलाड़ी की बहस में उनका नाम और भी मजबूती से लिया जाता।

रियो की गलियों से शुरू हुआ सफर



रोनाल्डो लुइज़ नाज़ारियो दा लीमा का जन्म 18 सितंबर 1976 को ब्राज़ील के रियो डी जेनेरो में हुआ। उनका परिवार साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि से था। पिता नेलियो नाज़ारियो और मां सोनिया दोस सांतोस के लिए जीवन संघर्षों से भरा था। रियो के अनेक गरीब इलाकों की तरह वहां भी आर्थिक असमानता, अपराध और सीमित अवसरों की चुनौतियां मौजूद थीं। फुटबॉल ब्राज़ील के लाखों बच्चों की तरह रोनाल्डो के लिए भी केवल खेल नहीं था; वह बेहतर जीवन की संभावना थी। बचपन से ही उनका अधिकांश समय सड़कों, खुले मैदानों और स्थानीय फुटबॉल प्रतियोगिताओं में बीतता था। रोनाल्डो का जन्म वैसे तो 18 सितंबर को हुआ था, लेकिन उनके माता-पिता ने पैसों की तंगी और प्रशासनिक देरी के कारण उनका आधिकारिक पंजीकरण 22 सितंबर को कराया था। उनके बचपन का उपनाम 'दादद्दो' (Dadado) था, क्योंकि बचपन में वे अपना खुद का नाम ठीक से नहीं पुकार पाते थे।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय विद्यालयों में हुई, लेकिन आर्थिक परिस्थितियों और फुटबॉल के प्रति बढ़ती प्रतिबद्धता के कारण पढ़ाई धीरे-धीरे पीछे छूटने लगी। किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते यह स्पष्ट हो गया था कि उनका भविष्य कक्षा में नहीं, मैदान पर लिखा जाना है। हालांकि बाद के वर्षों में उन्होंने कई बार कहा कि वे चाहते हैं कि युवा खिलाड़ी शिक्षा को पूरी तरह न छोड़ें, क्योंकि खेल करियर हमेशा लंबा नहीं होता।

क्रूज़ेइरो से शुरू हुआ विस्फोटक उदय

रोनाल्डो की प्रतिभा बहुत जल्दी पहचान ली गई। वे स्थानीय क्लबों में खेलते हुए लगातार गोल कर रहे थे। उनकी गति सामान्य खिलाड़ियों से कहीं अधिक थी। लेकिन केवल गति ही उनकी विशेषता नहीं थी। वे गेंद के साथ भी उतने ही खतरनाक थे। सामान्यतः बहुत तेज खिलाड़ी गेंद पर नियंत्रण खो देते हैं, लेकिन रोनाल्डो पूरी रफ्तार में भी गेंद को अपने पास रखते थे। यही गुण उन्हें विशिष्ट बनाता था। जल्द ही वे Cruzeiro Esporte Clube से जुड़ गए और वहां उनका विस्फोटक उदय शुरू हुआ। क्रूज़ेइरो क्लब के लिए खेलते हुए इस १७ वर्षीय किशोर ने महज़ 47 मैचों में 44 गोल दागकर पूरे ब्राज़ील को हैरान कर दिया था। इसी असाधारण प्रदर्शन के कारण उन्हें 1994 के विश्वकप के लिए ब्राज़ील की राष्ट्रीय टीम में चुन लिया गया था, जहाँ वे पेले की तरह सबसे युवा बेंच खिलाड़ी के रूप में चैंपियन दल का हिस्सा बने थे।

यूरोप में "फिनोमेनो" का जन्म


सिर्फ किशोर अवस्था में ही उन्होंने ब्राज़ीलियाई फुटबॉल में सनसनी मचा दी। उनके गोलों की संख्या लगातार बढ़ रही थी और यूरोप के बड़े क्लबों की नजर उन पर पड़ चुकी थी। बहुत कम उम्र में वे नीदरलैंड्स के क्लब PSV Eindhoven पहुंचे। यह यूरोप में उनका पहला बड़ा पड़ाव था। वहां उन्होंने दिखा दिया कि उनकी प्रतिभा केवल दक्षिण अमेरिकी परिस्थितियों तक सीमित नहीं है। यूरोपीय फुटबॉल की शारीरिक और सामरिक चुनौतियों के बीच भी वे उतने ही प्रभावी रहे।

इसके बाद उनका सफर तेज़ी से आगे बढ़ा। वे FC Barcelona पहुंचे और वहीं दुनिया ने पहली बार उनके खेल का पूर्ण रूप देखा। 1996-97 का उनका सत्र आज भी फुटबॉल इतिहास के महान व्यक्तिगत सत्रों में गिना जाता है। उस समय वे केवल बीस वर्ष के थे, लेकिन ऐसा लगता था जैसे वे वर्षों से शीर्ष स्तर पर खेल रहे हों। विरोधी रक्षक उनके सामने असहाय दिखाई देते थे। वे आधे मैदान से गेंद लेकर दौड़ते और पूरी रक्षा पंक्ति को पीछे छोड़ देते। कई विशेषज्ञों का मानना है कि उस दौर का रोनाल्डो शुद्ध आक्रमणकारी प्रतिभा का सबसे विस्फोटक रूप था।

करियर का एक प्रसिद्ध गोल आज भी बार-बार दिखाया जाता है। बार्सिलोना की ओर से खेलते हुए उन्होंने कई रक्षकों को पीछे छोड़ते हुए गोल किया, जिसे कई लोग उनकी क्षमताओं का आदर्श उदाहरण मानते हैं। उस गोल में गति थी, शक्ति थी, संतुलन था और तकनीक भी। यही कारण है कि उस समय उन्हें "फिनोमेनो" अर्थात "अद्भुत घटना" कहा जाने लगा। अक्टूबर 1996 में कम्पोस्टेला क्लब के खिलाफ बार्सिलोना के लिए खेलते हुए रोनाल्डो ने आधे मैदान से गज़ब की ड्रिब्लिंग करते हुए पाँच डिफेंडरों को छकाकर वो ऐतिहासिक गोल दागा था। उस गोल को देखकर मैदान के साइडलाइन पर खड़े बार्सिलोना के महान कोच बॉबी रॉबसन ने अविश्वास में अपना सिर पकड़ लिया था।

इंटर मिलान और सबसे युवा बैलन डी'ओर

बार्सिलोना के बाद वे इटली के दिग्गज क्लब इंटर मिलान पहुंचे। इटली उस समय दुनिया की सबसे कठिन लीग माना जाता था। वहां रक्षात्मक खेल का स्तर अत्यंत ऊंचा था। लेकिन रोनाल्डो ने वहां भी अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की। वे 1997 में विश्व फुटबॉल के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुने गए। उस समय उनकी उम्र केवल इक्कीस वर्ष थी। बहुत से लोगों को लगने लगा था कि वे पेले और माराडोना की श्रेणी में पहुंच सकते हैं। मात्र 21 वर्ष की आयु में वर्ष 1997 का दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित 'बैलन डी'ओर' (Ballon d'Or) पुरस्कार जीतकर वे इतिहास के सबसे युवा बैलॉन डी'ओर विजेता बने। उनका यह रिकॉर्ड आज लगभग तीन दशकों बाद भी अटूट है।

लेकिन यहीं से उनकी कहानी का सबसे कठिन अध्याय शुरू हुआ।

घुटनों की चोट: करियर पर मंडराता खतरा

1999 और 2000 के बीच उन्हें घुटनों की गंभीर चोटों का सामना करना पड़ा। एक चोट से उबरने के बाद दूसरी चोट आया। एक मैच में जब उनका घुटना बुरी तरह मुड़ा, तो पूरा स्टेडियम स्तब्ध रह गया। फुटबॉल जगत को लगा कि शायद उनका करियर समाप्त हो जाएगा। वे लंबे समय तक मैदान से दूर रहे। सर्जरी हुई। पुनर्वास हुआ। दर्द था। निराशा थी। और सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि क्या वे कभी पहले जैसे लौट पाएंगे? अप्रैल 2000 में लाज़ियो के खिलाफ कप फाइनल में वापसी के महज़ सात मिनट बाद ही उनके दाहिने घुटने का टेंडन पूरी तरह फट गया था। उनके घुटने की कोंग कोंग आवाज़ और उनकी चीख सुनकर मैदान पर मौजूद विरोधी खिलाड़ी भी रो पड़े थे।

2002: वापसी का महाकाव्य

यहीं रोनाल्डो का वास्तविक चरित्र सामने आया। उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने धीरे-धीरे स्वयं को फिर तैयार किया। उन्होंने पुनर्वास को अपना नया प्रशिक्षण बना लिया। उन्होंने अपने शरीर को फिर से मजबूत किया। और फिर 2002 का विश्वकप आया। यह विश्वकप उनके जीवन का महाकाव्य है।

चार वर्ष पहले 1998 के फाइनल में वे रहस्यमयी स्वास्थ्य समस्या के कारण प्रभावी नहीं रह पाए थे। ब्राज़ील हार गया था। आलोचनाएं हुई थीं। चोटों ने उनका करियर लगभग रोक दिया था। लेकिन 2002 में वे लौटे। और कैसे लौटे।

उन्होंने पूरे टूर्नामेंट में आठ गोल किए। तुर्की, चीन, कोस्टा रिका, बेल्जियम और अन्य टीमों के खिलाफ वे लगातार गोल करते रहे। फाइनल में जर्मनी के विरुद्ध उन्होंने दो गोल दागे और ब्राज़ील को पांचवां विश्वकप दिलाया। विश्व फुटबॉल ने शायद ही कभी इतनी शानदार वापसी देखी हो। जो खिलाड़ी दो वर्ष पहले चलने तक के लिए संघर्ष कर रहा था, वही अब विश्व चैंपियन था।

वह जादू जिसने गोलकीपरों को ज़मीन पर गिराया

उनकी खेल शैली अद्वितीय थी। वे केवल तेज नहीं थे। वे केवल शक्तिशाली नहीं थे। वे केवल तकनीकी रूप से कुशल भी नहीं थे। वे इन सभी गुणों का दुर्लभ मिश्रण थे। एक-के-बनाम-एक स्थिति में वे लगभग अजेय थे। गोलकीपर के सामने पहुंचते ही वे शांत रहते थे। वे दोनों पैरों से गोल कर सकते थे। उनका संतुलन इतना अच्छा था कि टक्कर के बाद भी वे गेंद पर नियंत्रण बनाए रखते थे। बहुत से विशेषज्ञ उन्हें इतिहास का सबसे संपूर्ण स्ट्राइकर मानते हैं। रोनाल्डो की सबसे बड़ी जादुई कला उनका 'स्टेप-ओवर' (Step-over) मूव था। वे इतनी तीव्र गति से गेंद के ऊपर से अपने पैर घुमाते थे कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर भी जमीन पर गिर जाते थे और रोनाल्डो खाली पोस्ट में आसानी से गोल कर देते थे।

मैदान से बाहर: ब्रांड बन चुका एक नाम


आर्थिक दृष्टि से भी वे अपने दौर के सबसे बड़े खेल सितारों में थे। उनका संबंध लंबे समय तक Nike से रहा। उनके विज्ञापन अभियानों ने खेल विपणन की दुनिया में नए मानक स्थापित किए। वे पेय पदार्थ, खेल उपकरण, दूरसंचार और उपभोक्ता उत्पादों से जुड़े अनेक वैश्विक अभियानों का चेहरा बने। 1990 और 2000 के दशक में वे दुनिया के सबसे पहचान योग्य खिलाड़ियों में शामिल थे। उनकी कमाई केवल क्लब अनुबंधों तक सीमित नहीं थी; वे वैश्विक ब्रांड बन चुके थे। नाइकी (Nike) कंपनी ने रोनाल्डो की असाधारण गति और प्रभाव को देखकर उनके लिए विशेष रूप से 'मर्क्यूरियल वैपर' (Mercurial Vapor) बूट्स की सीरीज़ लॉन्च की थी, जो आगे चलकर फुटबॉल इतिहास के सबसे प्रसिद्ध और बिकने वाले जूते बने।

निजी संघर्ष और शरीर से लड़ाई

उनका निजी जीवन अपेक्षाकृत जटिल रहा। विवाह, संबंधों और सार्वजनिक जीवन से जुड़ी अनेक प्रसंग मीडिया में चर्चा का विषय बने। कई बार उनका वजन भी चर्चा में रहा। चोटों के बाद उनके शरीर में परिवर्तन आया और आलोचकों ने प्रश्न उठाए। लेकिन यह भी सच है कि लगातार शारीरिक समस्याओं के बावजूद उन्होंने शीर्ष स्तर पर वापसी की, जो अपने आप में असाधारण उपलब्धि है।

खान-पान और फिटनेस के मामले में उनके करियर के दो अलग-अलग चरण दिखाई देते हैं। युवा अवस्था में वे स्वाभाविक रूप से अत्यंत फिट थे। लेकिन गंभीर चोटों के बाद उन्हें अपने शरीर को नियंत्रित रखने के लिए अधिक प्रयास करने पड़े। पुनर्वास, विशेष व्यायाम और चिकित्सकीय निगरानी उनके जीवन का हिस्सा बन गए। यही कारण है कि वे अक्सर कहते थे कि लोग केवल गोल देखते हैं, लेकिन उन गोलों के पीछे हजारों घंटे का दर्द और परिश्रम छिपा होता है। करियर के अंतिम दौर में रोनाल्डो 'हाइपोथायरायडिज्म' नामक बीमारी से ग्रसित हो गए थे, जिसके कारण उनका मेटाबॉलिज्म धीमा हो गया और उनका वजन तेजी से बढ़ने लगा था। इसी शारीरिक लाचारी के कारण उन्हें चाहकर भी फुटबॉल को अलविदा कहना पड़ा था।

संन्यास के बाद: प्रशासन और व्यवसाय की दुनिया में


संन्यास के बाद उन्होंने फुटबॉल प्रशासन और व्यवसाय में भी रुचि दिखाई। वे क्लब स्वामित्व और खेल प्रबंधन से जुड़े। विभिन्न परियोजनाओं में निवेश किया और फुटबॉल के विकास पर सार्वजनिक रूप से विचार व्यक्त करते रहे। आज भी उनकी राय को खेल जगत में गंभीरता से सुना जाता है।

रोनाल्डो की सबसे बड़ी विरासत क्या है?

सिर्फ गोल नहीं।सिर्फ विश्वकप नहीं।सिर्फ रिकॉर्ड नहीं।

उनकी सबसे बड़ी विरासत यह है कि उन्होंने दुनिया को दिखाया कि प्रतिभा और संघर्ष एक साथ चल सकते हैं। वे उस दुर्लभ श्रेणी के खिलाड़ी हैं जिनके करियर को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है - चोटों से पहले और चोटों के बाद। और आश्चर्य की बात यह है कि दोनों ही हिस्से महान हैं।

यदि फुटबॉल केवल कौशल की कहानी होती, तो रोनाल्डो महान होते। लेकिन क्योंकि फुटबॉल संघर्ष की कहानी भी है, इसलिए वे किंवदंती बन गए।

आज भी जब पुराने फुटबॉल प्रेमी कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन का सबसे खतरनाक स्ट्राइकर देखा है, तो अक्सर उनकी स्मृति में एक मुस्कुराता हुआ ब्राज़ीलियाई खिलाड़ी दौड़ता दिखाई देता है, जिसके पैरों में गेंद होती थी और जिसके सामने पूरी रक्षा पंक्ति भी असुरक्षित महसूस करती थी।

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Yogesh Mishra

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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