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Fifa World Cup History: फीफा विश्वकप की कहानी, उरुग्वे 1930 से शुरुआत
Fifa World Cup History Wikipedia: फुटबॉल उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में तेजी से लोकप्रिय हो रहा था। इंग्लैंड से शुरू हुआ यह खेल यूरोप, दक्षिण अमेरिका और दुनिया के अनेक हिस्सों में फैल चुका था।
Fifa World Cup History 1930 Story Football Match
Fifa World Cup History Wiki in Hindi: जब आज हम फीफा विश्वकप को देखते हैं, तो हमारे सामने एक ऐसा आयोजन खड़ा दिखाई देता है जिसे दुनिया का सबसे बड़ा खेल महाकुंभ कहा जाता है। अरबों दर्शक, हजारों करोड़ डॉलर का कारोबार, विश्व के सबसे बड़े खिलाड़ी, विशाल स्टेडियम और महीनों तक चलने वाला वैश्विक उत्साह। लेकिन यह कहानी हमेशा ऐसी नहीं थी। एक समय ऐसा भी था जब फुटबॉल का विश्वकप केवल एक साहसिक विचार था। एक ऐसा विचार, जिस पर बहुत से लोग विश्वास नहीं करते थे। अनेक देशों को लगता था कि अलग-अलग महाद्वीपों की टीमें कभी एक साथ नहीं खेल पाएंगी। समुद्रों को पार करके प्रतियोगिता आयोजित करना लगभग असंभव माना जाता था। फिर भी कुछ लोगों ने सपना देखा कि फुटबॉल को सचमुच विश्व का खेल बनाया जाए। उसी सपने का नाम आज ‘फीफा विश्वकप’ है। यह वह दौर था, जब दुनिया प्रथम विश्वयुद्ध के जख्मों से उबर रही थी। खेल ही एकमात्र ऐसा माध्यम था, जो देशों को करीब ला सकता था। फीफा ने इसी विचार को आगे बढ़ाया।
फुटबॉल उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में तेजी से लोकप्रिय हो रहा था। इंग्लैंड से शुरू हुआ यह खेल यूरोप, दक्षिण अमेरिका और दुनिया के अनेक हिस्सों में फैल चुका था। विभिन्न देशों में राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं आयोजित होने लगी थीं। अंतरराष्ट्रीय मुकाबले भी खेले जा रहे थे। लेकिन कोई ऐसी प्रतियोगिता नहीं थी, जो यह तय कर सके कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ फुटबॉल टीम कौन है। वर्ष 1904 में पेरिस में ‘फेडरेशन इंटरनेशनेल डी फुटबॉल एसोसिएशन’ अर्थात ‘फीफा’ की स्थापना हुई। फीफा का उद्देश्य फुटबॉल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित करना था। शुरुआत में संगठन छोटा था, संसाधन सीमित थे और प्रभाव भी बहुत व्यापक नहीं था। फिर भी उसके संस्थापकों के मन में एक बड़ा लक्ष्य था — फुटबॉल का विश्वस्तरीय आयोजन। फ्रांस के रॉबर्ट गुएरिन फीफा के पहले अध्यक्ष बने थे। उन्होंने ही सबसे पहले विश्वकप का खाका खींचा था। लेकिन तब वित्तीय अभाव के कारण योजना जमीन पर नहीं उतर सकी।
बीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में ओलंपिक खेलों में फुटबॉल प्रतियोगिता आयोजित होने लगी थी। 1908 और 1912 के ओलंपिक में फुटबॉल को लोकप्रियता मिली। इसके बाद 1920, 1924 और 1928 के ओलंपिक खेलों में फुटबॉल ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। विशेष रूप से दक्षिण अमेरिकी देश उरुग्वे ने 1924 और 1928 दोनों ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर पूरी दुनिया को चौंका दिया। उरुग्वे की टीम तेज, तकनीकी रूप से दक्ष और अत्यंत अनुशासित मानी जाती थी। यूरोप के दर्शकों ने पहली बार महसूस किया कि फुटबॉल केवल यूरोप का खेल नहीं रह गया है। यूरोपीय देश उरुग्वे की इस जादुई सफलता से हैरान थे। वे उनकी पासिंग गेम तकनीक को समझ नहीं पा रहे थे। यहीं से महाद्वीपों के बीच फुटबॉल की असली जंग शुरू हुई।
इसी समय फीफा के भीतर यह विचार मजबूत होने लगा कि ओलंपिक से अलग एक स्वतंत्र विश्वकप प्रतियोगिता आयोजित की जानी चाहिए। इस विचार के सबसे बड़े समर्थक थे फीफा के तीसरे अध्यक्ष ‘जूल्स रिमे’। फ्रांस के इस दूरदर्शी प्रशासक का विश्वास था कि फुटबॉल विभिन्न देशों के बीच मित्रता और संवाद का माध्यम बन सकता है। वे चाहते थे कि विश्व के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी केवल शौकिया नहीं। बल्कि पेशेवर स्तर पर भी प्रतिस्पर्धा कर सकें। उस समय ओलंपिक प्रतियोगिताओं में अनेक प्रतिबंध थे। पेशेवर खिलाड़ियों की भागीदारी को लेकर विवाद रहते थे। इसलिए एक स्वतंत्र टूर्नामेंट की आवश्यकता महसूस की जाने लगी। जूल्स रिमे ने इसके लिए वर्षों तक कूटनीतिक प्रयास किए। उन्होंने फुटबॉल को राजनीति से अलग रखने की वकालत की। अंततः उनका अटूट विश्वास रंग लाया।
1928 में एम्स्टर्डम में आयोजित फीफा कांग्रेस में ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। फीफा ने विश्व फुटबॉल प्रतियोगिता आयोजित करने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। अब प्रश्न था कि पहला विश्वकप किस देश में आयोजित किया जाए। कई देशों ने रुचि दिखाई। लेकिन अंततः उरुग्वे को मेजबानी मिली। इसके पीछे कई कारण थे। पहला, उरुग्वे उस समय विश्व की सबसे मजबूत फुटबॉल शक्ति था। दूसरा, उसने लगातार दो ओलंपिक स्वर्ण पदक जीते थे। तीसरा, वर्ष 1930 उरुग्वे की स्वतंत्रता की शताब्दी का वर्ष था और सरकार इस अवसर को भव्य रूप से मनाना चाहती थी। उरुग्वे ने सभी भाग लेने वाली टीमों के यात्रा और आवास का खर्च उठाने की पेशकश भी की। उस समय यह प्रस्ताव अत्यंत आकर्षक माना गया। हंगरी, इटली, नीदरलैंड, स्पेन और स्वीडन ने भी मेजबानी का दावा ठोका था। लेकिन उरुग्वे के वित्तीय वादों के आगे सबने अपने नाम वापस ले लिए।
लेकिन विश्वकप का आयोजन तय हो जाने के बाद भी समस्याएं समाप्त नहीं हुईं। यूरोप उस समय आर्थिक संकट से गुजर रहा था। समुद्री यात्रा लंबी और महंगी थी। विमानन सेवाएं विकसित नहीं हुई थीं। यूरोप से दक्षिण अमेरिका तक पहुंचने में कई सप्ताह लग जाते थे। अनेक यूरोपीय फुटबॉल संघों ने इतनी लंबी यात्रा करने से इनकार कर दिया। कुछ देशों को अपने खिलाड़ियों की नौकरी और व्यवसाय की चिंता थी। कुछ को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। परिणामस्वरूप अंतिम समय तक यह आशंका बनी रही कि पहला विश्वकप कहीं असफल न हो जाए। यूरोप की बड़ी फुटबॉल शक्तियों जैसे इंग्लैंड, जर्मनी और इटली ने इस टूर्नामेंट का पूरी तरह बहिष्कार कर दिया था। जूल्स रिमे के निजी हस्तक्षेप के बाद ही चार यूरोपीय टीमें तैयार हुईं।
अंततः केवल तेरह देशों ने भाग लेने का निर्णय लिया। इनमें सात दक्षिण अमेरिका देश, चार यूरोपीय देश और दो उत्तर अमेरिकी देश शामिल थे। आज के मानकों से यह संख्या बहुत छोटी लग सकती है। लेकिन उस समय यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। फ्रांस, बेल्जियम, रोमानिया और यूगोस्लाविया यूरोप से समुद्री जहाज द्वारा उरुग्वे पहुंचे। कहा जाता है कि खिलाड़ियों की यात्रा स्वयं किसी रोमांचक अभियान से कम नहीं थी। कई सप्ताह तक समुद्र में रहने के बाद वे मोंटेवीडियो पहुंचे और इतिहास रचने के लिए तैयार हुए। यूरोपीय टीमों ने 'एसएस कोंटे वेर्डे' नामक समुद्री जहाज से यात्रा की थी। इसी जहाज पर फीफा अध्यक्ष जूल्स रिमे और विश्वकप की कीमती ट्रॉफी भी मौजूद थी। खिलाड़ी जहाज के डेक पर ही अभ्यास किया करते थे।
13 जुलाई, 1930 को पहला फीफा विश्वकप आरंभ हुआ। उसी दिन विश्वकप इतिहास के पहले दो मैच खेले गए। फ्रांस ने मेक्सिको को हराया और अमेरिका ने बेल्जियम को पराजित किया। फ्रांस के ‘लुसिएन लॉरेंट’ ने विश्वकप इतिहास का पहला गोल किया। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह गोल आगे चलकर खेल इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाएगा। लॉरेंट ने मैच के 19वें मिनट में वॉली के जरिए यह ऐतिहासिक गोल दागा था। बर्फीले मौसम में खेले गए इस मैच को देखने केवल चार हजार दर्शक आए थे।
पूरे टूर्नामेंट का केंद्र था मोंटेवीडियो का ‘एस्टादियो सेंटेनारियो’ स्टेडियम। यह स्टेडियम विशेष रूप से विश्वकप के लिए बनाया गया था। हालांकि निर्माण कार्य समय पर पूरा नहीं हो पाया और शुरुआती मैच अन्य मैदानों पर आयोजित करने पड़े। बाद में जब सेंटेनारियो तैयार हुआ तो उसने विश्व फुटबॉल का पहला महान रंगमंच बनने का गौरव प्राप्त किया। आज भी उसे फुटबॉल इतिहास के सबसे प्रतिष्ठित स्टेडियमों में गिना जाता है। भारी बारिश और मजदूरों की कमी के कारण स्टेडियम उद्घाटन के पांच दिन बाद तक तैयार नहीं हो सका था। यह स्टेडियम उरुग्वे के संविधान के 100 वर्ष पूरे होने का प्रतीक भी था।
टूर्नामेंट में उरुग्वे और अर्जेंटीना सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे थे। दोनों देशों के बीच फुटबॉल प्रतिद्वंद्विता पहले से ही प्रसिद्ध थी। दूसरी ओर अमेरिका और यूगोस्लाविया ने भी शानदार प्रदर्शन करते हुए सेमीफाइनल में जगह बनाई। लेकिन अंततः वही हुआ जिसकी सबसे अधिक संभावना थी। फाइनल में उरुग्वे और अर्जेंटीना आमने-सामने थे। पूरा दक्षिण अमेरिका इस मुकाबले को सांस रोककर देख रहा था। दोनों टीमों ने सेमीफाइनल मैचों में एकतरफा प्रदर्शन किया था। उरुग्वे ने यूगोस्लाविया को और अर्जेंटीना ने अमेरिका को समान अंतर 6-1 से करारी शिकस्त दी थी।
30 जुलाई, 1930 को खेला गया फाइनल विश्व फुटबॉल इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण मैचों में गिना जाता है। स्टेडियम दर्शकों से खचाखच भरा हुआ था। वातावरण में उत्साह के साथ तनाव भी था। अर्जेंटीना ने पहले हाफ में बढ़त बना ली और ऐसा लगने लगा कि वह विश्व का पहला चैंपियन बनने जा रहा है। लेकिन दूसरे हाफ में उरुग्वे ने शानदार वापसी की। उसके खिलाड़ियों ने आक्रामक खेल दिखाया और अंततः 4-2 से जीत दर्ज कर ली। अंतिम सीटी बजते ही पूरा मोंटेवीडियो उत्सव में डूब गया। उरुग्वे विश्व का पहला फीफा विश्वकप विजेता बन चुका था। इस मैच में गेंद को लेकर अजीब विवाद हुआ था। दोनों टीमें अपनी-अपनी गेंद से खेलना चाहती थीं। अंततः फीफा ने फैसला किया कि पहले हाफ में अर्जेंटीना की गेंद और दूसरे हाफ में उरुग्वे की गेंद का इस्तेमाल होगा। उरुग्वे ने अपनी गेंद से खेलते हुए दूसरे हाफ में तीन गोल दागे।
इस जीत का महत्व केवल खेल तक सीमित नहीं था। उरुग्वे एक छोटा देश था जिसकी आबादी अनेक यूरोपीय देशों से भी कम थी। फिर भी उसने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि प्रतिभा और संगठन किसी देश के आकार पर निर्भर नहीं करते। विश्वकप की पहली ट्रॉफी प्राप्त करके उसने अपने राष्ट्रीय इतिहास में स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया। इस ट्रॉफी का मूल नाम 'विक्ट्री' था, जिसे बाद में जूल्स रिमे के सम्मान में उनके नाम पर रख दिया गया। जीत के अगले दिन पूरे उरुग्वे में राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया गया था।
पहले विश्वकप की सफलता ने फीफा के सपने को वास्तविकता में बदल दिया। अब यह सिद्ध हो चुका था कि विश्वस्तरीय फुटबॉल प्रतियोगिता संभव है। हालांकि भाग लेने वाले देशों की संख्या सीमित थी, प्रसारण तकनीक प्रारंभिक अवस्था में थी और दर्शकों तक सूचना पहुंचाने के साधन भी कम थे, फिर भी इस आयोजन ने भविष्य की दिशा तय कर दी। दुनिया ने महसूस किया कि फुटबॉल में राष्ट्रों को जोड़ने की अद्भुत शक्ति है।
1930 के विश्वकप ने अनेक परंपराओं की नींव रखी। राष्ट्रीय गौरव, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, फुटबॉल नायकों का उदय, दर्शकों का जुनून और विश्वकप की प्रतिष्ठा — इन सबकी शुरुआत यहीं से हुई। आगे चलकर ब्राजील, इटली, जर्मनी, अर्जेंटीना और अन्य देशों ने इस प्रतियोगिता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। पेले, माराडोना, क्रूयफ, बेकेनबाउर, जिदान और मेसी जैसे महान खिलाड़ियों ने विश्वकप को अमर बनाया। लेकिन यदि 1930 में उरुग्वे ने वह जोखिम न उठाया होता, यदि जूल्स रिमे ने वह सपना न देखा होता और यदि तेरह देशों ने समुद्र पार करने का साहस न किया होता, तो शायद आज का विश्वकप कभी अस्तित्व में ही नहीं आता।
आज जब विश्वकप में 48 टीमें भाग लेने जा रही हैं, जब अरबों लोग मोबाइल और टेलीविजन पर हर मैच देखते हैं, जब किसी एक गोल पर पूरी दुनिया की प्रतिक्रियाएं कुछ सेकंड में सामने आ जाती हैं, तब यह याद रखना आवश्यक है कि इस विराट वृक्ष का बीज मोंटेवीडियो की धरती पर बोया गया था। 1930 का विश्वकप केवल एक टूर्नामेंट नहीं था। वह एक विचार की विजय थी। वह विश्वास की विजय थी। वह इस तथ्य का प्रमाण था कि खेल सीमाओं से बड़ा हो सकता है।
फीफा विश्वकप की महान गाथा की शुरुआत वहीं से हुई थी — उरुग्वे 1930 से। और वही शुरुआत आज भी विश्व फुटबॉल की सबसे प्रेरणादायक कहानी बनी हुई है।


