FIFA World Cup History: फ्रांस 1938, जब युद्ध के साये में खेला गया विश्वकप

Fifa World Cup 2026 History: 1938 फीफा विश्वकप की कहानी, जब फ्रांस में युद्ध के बढ़ते खतरे के बीच फुटबॉल खेला गया...

Yogesh Mishra
Published on: 18 Jun 2026 12:18 PM IST
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Fifa World Cup History 1938 (Photo - Newstrack AI)

Fifa World Cup History Wikipedia Hindi: 1934 के इटली विश्वकप ने फुटबॉल को वैश्विक पहचान दिलाने के साथ-साथ यह भी स्पष्ट कर दिया था कि खेल और राजनीति को पूरी तरह अलग-अलग खांचों में नहीं रखा जा सकता। इटली की जीत, मुसोलिनी का प्रचार तंत्र और यूरोप में बढ़ता राष्ट्रवाद इस बात के संकेत थे कि आने वाले वर्ष केवल खेल के नहीं। बल्कि बड़े राजनीतिक परिवर्तनों के भी होने वाले हैं। दुनिया तेजी से अशांत हो रही थी। एक ओर आर्थिक महामंदी के घाव पूरी तरह भरे नहीं थे, दूसरी ओर यूरोप में नई राजनीतिक शक्तियां उभर रही थीं। जर्मनी में ‘एडॉल्फ हिटलर’ सत्ता में आ चुके थे। इटली में मुसोलिनी पहले से स्थापित थे। स्पेन गृहयुद्ध की आग में जल रहा था। राष्ट्रों के बीच अविश्वास बढ़ रहा था। ऐसे वातावरण में जब तीसरे फीफा विश्वकप की तैयारी शुरू हुई, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह प्रतियोगिता लंबे समय तक होने वाला अंतिम विश्वकप सिद्ध होगी। यह वह समय था, जब यूरोप बारूद के ढेर पर बैठा था। युद्ध की आहट साफ सुनी जा सकती थी। फीफा कांग्रेस भी आंतरिक मतभेदों से जूझ रही थी।

फीफा ने 1938 विश्वकप की मेजबानी फ्रांस को सौंप दी। यह निर्णय स्वयं में विवाद का कारण बन गया। उस समय तक एक अनौपचारिक धारणा बन चुकी थी कि विश्वकप की मेजबानी यूरोप और दक्षिण अमेरिका के बीच बारी-बारी से होगी। पहला विश्वकप उरुग्वे में और दूसरा इटली में हुआ था। इसलिए दक्षिण अमेरिकी देशों को उम्मीद थी कि तीसरा आयोजन उनके महाद्वीप में होगा। लेकिन फीफा ने लगातार दूसरी बार यूरोप को मेजबानी दे दी। इससे दक्षिण अमेरिका में व्यापक असंतोष फैल गया। फीफा के इस फैसले के पीछे जूल्स रिमे का गृह राज्य फ्रांस होना भी एक बड़ा कारण था। वे अपने देश में इस महाकुंभ को देखना चाहते थे। दक्षिण अमेरिकी देशों ने इसे पक्षपात माना।



सबसे अधिक नाराजगी अर्जेंटीना में दिखाई दी। अर्जेंटीना स्वयं मेजबानी का इच्छुक था और उसे विश्वास था कि फीफा उसके पक्ष में निर्णय लेगा। जब ऐसा नहीं हुआ तो वहां के फुटबॉल संघ ने विश्वकप के बहिष्कार का निर्णय ले लिया। उरुग्वे ने भी भाग लेने से इनकार कर दिया। इस प्रकार विश्व फुटबॉल की दो प्रमुख दक्षिण अमेरिकी शक्तियां प्रतियोगिता से बाहर रहीं। यह विश्वकप के इतिहास की पहली बड़ी राजनीतिक प्रतिक्रिया थी, जिसमें मेजबानी के प्रश्न ने सीधे भागीदारी को प्रभावित किया। इस बहिष्कार के कारण ब्राजील दक्षिण अमेरिका का एकमात्र प्रतिनिधि देश रह गया। उसने यूरोप जाकर खेलने का फैसला किया।

फ्रांस में आयोजित होने वाले इस विश्वकप की तैयारी के दौरान यूरोप का राजनीतिक वातावरण लगातार खराब हो रहा था। जर्मनी ने ऑस्ट्रिया का विलय कर लिया था। यह घटना इतिहास में ‘आनशलुस’ के नाम से जानी जाती है। ऑस्ट्रिया उस समय विश्व की सबसे मजबूत फुटबॉल टीमों में से एक था। उसने विश्वकप के लिए क्वालीफाई भी कर लिया था। लेकिन विलय के बाद स्वतंत्र ऑस्ट्रियाई टीम अस्तित्व में नहीं रही। उसके कुछ खिलाड़ियों को जर्मनी की टीम में शामिल किया गया, जबकि कुछ ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। परिणामस्वरूप विश्वकप शुरू होने से पहले ही एक मजबूत दावेदार प्रतियोगिता से गायब हो गया। ऑस्ट्रिया के महान खिलाड़ी मथियास सिंडेलार ने हिटलर की नाजी टीम के लिए खेलने से साफ मना कर दिया था। इसके कुछ समय बाद ही संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई थी।

स्पेन भी अनुपस्थित था। वहां गृहयुद्ध चल रहा था। देश की प्राथमिकताएं फुटबॉल से कहीं अधिक गंभीर थीं। इस प्रकार 1938 का विश्वकप शुरू होने से पहले ही राजनीतिक घटनाएं उसके स्वरूप को प्रभावित कर चुकी थीं। मैदान पर उतरने से पहले ही इतिहास अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका था। एशिया से भी इस टूर्नामेंट में एक ऐतिहासिक घटना घटी। डच ईस्ट इंडीज (जो आज इंडोनेशिया है) भाग लेने वाला पहला एशियाई देश बना। वह बिना कोई क्वालीफाइंग मैच खेले ही मुख्य ड्रॉ में शामिल हो गया था।


टूर्नामेंट में कुल पंद्रह टीमों ने भाग लिया। ऑस्ट्रिया के हटने के कारण संख्या विषम हो गई। स्वीडन को बिना खेले अगले दौर में प्रवेश मिल गया। आज के विशाल विश्वकपों की तुलना में यह प्रतियोगिता छोटी थी। लेकिन उस समय इसका महत्व बहुत बड़ा था। यूरोप और लैटिन अमेरिका की सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध टीमें इसमें भाग ले रही थीं।

1938 का विश्वकप कई दृष्टियों से परिवर्तनकारी था। पहली बार गत विजेता और मेजबान को सीधे प्रवेश दिया गया। यह परंपरा बाद के कई दशकों तक जारी रही। इटली, जो 1934 का विजेता था, बिना क्वालीफाइंग खेले विश्वकप में पहुंच गया। फ्रांस को मेजबान होने के कारण सीधा प्रवेश मिला। मैचों के सीधे प्रसारण के लिए पहली बार रेडियो कमेंट्री का व्यापक स्तर पर उपयोग किया गया था। दुनिया भर के लोगों ने रेडियो के जरिए मैचों का रोमांच सुना था।

इटली की टीम इस बार भी अत्यंत मजबूत थी। उसके पास अनुभवी खिलाड़ी थे और वह अपने खिताब की रक्षा करने के लिए पूरी तरह तैयार थी। दूसरी ओर ब्राजील एक नई शक्ति के रूप में उभर रहा था। उसकी आक्रामक शैली और तकनीकी कौशल ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित करना शुरू कर दिया था। कई विशेषज्ञ मानते थे कि भविष्य फुटबॉल का हो सकता है। लेकिन वर्तमान अभी भी इटली के पास था। ब्राजील की टीम में ल्यूनिडास दा सिल्वा जैसे जादूगर खिलाड़ी थे। उन्हें 'ब्लैक डायमंड' कहा जाता था। वे बाइसिकल किक लगाने में माहिर थे।

टूर्नामेंट के शुरुआती मैचों में ही यह स्पष्ट हो गया कि प्रतियोगिता का स्तर पहले की तुलना में काफी ऊंचा हो चुका है। कई मुकाबले अत्यंत रोमांचक रहे। ब्राजील ने अपनी तेज और रचनात्मक फुटबॉल से दर्शकों को प्रभावित किया। हंगरी ने भी शानदार प्रदर्शन किया और फाइनल की ओर बढ़ने लगा। इटली लगातार जीत दर्ज करता हुआ आगे बढ़ रहा था। इटली के मैच फ्रांस के दर्शकों के बीच भारी तनाव पैदा कर रहे थे। फ्रांस के दर्शक मुसोलिनी की फासीवादी सरकार के सख्त खिलाफ थे। फ्रांस के खिलाफ मैच में इतालवी खिलाड़ियों ने मैदान पर फासीवादी सलाम (Fascist Salute) किया था। इसके अलावा वे मुसोलिनी के आदेश पर नीली जर्सी के बजाय काली जर्सी पहनकर मैदान पर उतरे थे। पूरा स्टेडियम विरोध में हूटिंग कर रहा था।

सेमीफाइनल में ब्राजील और इटली का मुकाबला हुआ। यह मैच विश्वकप इतिहास के सबसे चर्चित मुकाबलों में गिना जाता है। ब्राजील के पास उस समय ‘लेओनिदास’ जैसा महान खिलाड़ी था, जिसे टूर्नामेंट का सर्वश्रेष्ठ आक्रमणकारी माना जाता था। लेकिन रणनीतिक कारणों से उसे सेमीफाइनल में नहीं खिलाया गया। इस निर्णय की आज भी चर्चा होती है। इटली ने अवसर का लाभ उठाया और ब्राजील को पराजित कर फाइनल में पहुंच गया। ब्राजील के कोच को इतना अति-आत्मविश्वास था कि उन्होंने लेओनिदास को फाइनल के लिए आराम दे दिया। वे मान चुके थे कि वे इटली को आसानी से हरा देंगे। इटली ने इस घमंड को तोड़ते हुए मैच 2-1 से जीत लिया।


दूसरे सेमीफाइनल में हंगरी ने स्वीडन को हराकर फाइनल का टिकट प्राप्त किया। अब निर्णायक मुकाबला इटली और हंगरी के बीच होना था। 19 जून, 1938 को पेरिस में फाइनल खेला गया। दोनों टीमें आक्रामक फुटबॉल के लिए प्रसिद्ध थीं। दर्शकों को एक रोमांचक मुकाबले की उम्मीद थी और मैच ने उन्हें निराश नहीं किया।

हंगरी ने शुरुआत में ही आक्रामक रुख अपनाया।लेकिन इटली का अनुभव और संतुलन भारी पड़ा। इटली ने शानदार समन्वय का प्रदर्शन किया और अंततः 4-2 से जीत हासिल कर ली। इसके साथ ही वह लगातार दो विश्वकप जीतने वाली पहली टीम बन गई। यह उपलब्धि इतनी बड़ी थी कि अगले कई दशकों तक कोई अन्य देश इसे दोहरा नहीं सका। इतालवी कोच विटोरियो पोजो लगातार दो विश्वकप जीतने वाले दुनिया के एकमात्र कोच बने। इटली के स्टार खिलाड़ी जीनो कोलाउसी और सिल्विओ पियोला ने फाइनल में दो-दो गोल दागे थे।

फाइनल के बाद इटली के खिलाड़ियों को विश्व चैंपियन घोषित किया गया। लेकिन विश्वकप की चमक के पीछे यूरोप के क्षितिज पर युद्ध के बादल और अधिक गहरे हो चुके थे। उसी वर्ष जर्मनी ने चेकोस्लोवाकिया पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया। अंतरराष्ट्रीय तनाव लगातार बढ़ रहा था। कुछ ही महीनों बाद दुनिया ऐसे घटनाक्रमों की ओर बढ़ने लगी जिनका अंत द्वितीय विश्वयुद्ध में हुआ। युद्ध के दौरान इस कीमती विश्वकप ट्रॉफी को बचाने के लिए एक अनोखी कहानी सामने आई। फीफा के इतालवी उपाध्यक्ष ओटोरिनो बार्सी ने रोम के एक बैंक से चुपके से ट्रॉफी निकाली। उन्होंने इसे नाजी सैनिकों से बचाने के लिए अपने घर में एक जूते के डिब्बे में रखकर बिस्तर के नीचे छिपा दिया था।

1938 का विश्वकप समाप्त हुआ। लेकिन इसके बाद फुटबॉल की दुनिया लगभग ठहर गई। 1942 का विश्वकप आयोजित नहीं हो सका। 1946 का विश्वकप भी रद्द कर दिया गया। लाखों लोग युद्ध में मारे गए। अनेक स्टेडियम नष्ट हो गए। खिलाड़ी सैनिक बन गए। कई फुटबॉलरों ने युद्धभूमि पर अपने प्राण गंवाए। दुनिया की प्राथमिकताएं बदल गईं। फुटबॉल पीछे छूट गया।


यही कारण है कि 1938 का विश्वकप इतिहास में एक विशेष स्थान रखता है। यह केवल तीसरा विश्वकप नहीं था। यह उस पुराने यूरोप का अंतिम विश्वकप था, जो युद्ध से पहले अस्तित्व में था। इसके बाद दुनिया बदल गई। सीमाएं बदलीं। सरकारें बदलीं। साम्राज्य टूटे। नई शक्तियां उभरीं। और जब बारह वर्ष बाद विश्वकप दोबारा लौटा, तब उसका स्वरूप भी पहले जैसा नहीं रहा।

फ्रांस में 1938 इसलिए याद किया जाता है क्योंकि यह खेल और इतिहास के संगम का अद्भुत उदाहरण है। मैदान पर गोल हो रहे थे, दर्शक उत्साहित थे, खिलाड़ी ट्रॉफी के लिए संघर्ष कर रहे थे।लेकिन उसी समय महाद्वीप के राजनीतिक गलियारों में ऐसी घटनाएं घट रही थीं जो पूरी मानव सभ्यता का भविष्य बदलने वाली थीं।

यदि उरुग्वे 1930 विश्वकप का जन्म था और इटली 1934 उसका राजनीतिक यौवन, तो फ्रांस 1938 उसका वह क्षण था, जब फुटबॉल ने पहली बार इतिहास की भयावहता को अपने बहुत निकट महसूस किया। यह विश्वकप समाप्त तो हुआ, लेकिन इसके बाद पूरी दुनिया एक ऐसे अंधकार में प्रवेश करने वाली थी, जहां अगले बारह वर्षों तक विश्वकप का सपना स्थगित रह गया।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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