Fifa World Cup History: उरुग्वे बनाम ब्राज़ील, माराकाना में खामोश हुए 2 लाख दर्शक

Fifa World Cup History Wikipedia: ब्राज़ील 1950 फीफा विश्वकप की पूरी कहानी.....

Yogesh Mishra
Published on: 18 Jun 2026 1:18 PM IST
Fifa World Cup History 1950 Uruguay vs Brazil Football Match
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Fifa World Cup History 1950 (Photo - Newstrack AI)

Fifa World Cup History Wikipedia: 1938 में फ्रांस विश्वकप के समापन के बाद किसी ने नहीं सोचा था कि अगला विश्वकप देखने के लिए दुनिया को पूरे बारह वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। फुटबॉल का सबसे बड़ा उत्सव अपने उत्कर्ष की ओर बढ़ रहा था। लेकिन इतिहास ने दूसरी ही दिशा चुन रखी थी। सितंबर 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हो गया। देखते ही देखते यूरोप, एशिया और अफ्रीका का बड़ा हिस्सा युद्ध की आग में घिर गया। करोड़ों लोग प्रभावित हुए। लाखों सैनिक और नागरिक मारे गए। अनेक शहर खंडहर बन गए। स्टेडियम सैन्य अड्डों में बदल गए। खिलाड़ियों ने जर्सी उतारकर सैनिकों की वर्दी पहन ली। यह खेल इतिहास का सबसे अंधकारमय दौर था। इस दौरान फीफा के अध्यक्ष जूल्स रिमे ने संगठन को बिखरने से बचाए रखा। उन्होंने विभिन्न देशों के फुटबॉल संघों से संपर्क बनाए रखा।

1942 और 1946 के लिए प्रस्तावित विश्वकप आयोजित नहीं हो सके। फीफा स्वयं अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहा था। कई देशों के फुटबॉल संघ निष्क्रिय हो चुके थे। अंतरराष्ट्रीय खेल गतिविधियां लगभग समाप्त हो गई थीं। ऐसा लगने लगा था कि शायद विश्वकप का सपना इतिहास बन जाएगा। लेकिन युद्ध समाप्त होने के बाद जब दुनिया धीरे-धीरे सामान्य जीवन की ओर लौटने लगी। तब खेलों ने भी पुनर्जन्म लेना शुरू किया। लोगों को निराशा, विनाश और रक्तपात के बीच आशा की आवश्यकता थी। फुटबॉल उस आशा का माध्यम बना। जुलाई 1946 में लक्ज़मबर्ग में फीफा की पहली पोस्ट-वॉर कांग्रेस आयोजित हुई। इसी बैठक में अधिकारिक रूप से विश्वकप को दोबारा शुरू करने का ऐतिहासिक फैसला लिया गया। इस प्रतियोगिता की सिल्वर ट्रॉफी का नाम बदलकर 'जूल्स रिमे ट्रॉफी' रखा गया था।


1946 में फीफा ने निर्णय लिया कि अगला विश्वकप 1950 में आयोजित किया जाएगा। मेजबानी ब्राज़ील को सौंपी गई। यह चयन केवल खेल संबंधी निर्णय नहीं था। यूरोप अभी भी युद्ध के घावों से जूझ रहा था। अनेक देशों की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित थी। इसके विपरीत ब्राज़ील अपेक्षाकृत स्थिर स्थिति में था और वह विश्वकप के आयोजन के लिए आवश्यक संसाधन जुटा सकता था। ब्राज़ील एकमात्र ऐसा देश था, जिसने युद्ध के तुरंत बाद इस विशाल आयोजन की जिम्मेदारी लेने का साहस दिखाया था। फीफा ने बिना किसी संकोच के उनके इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

ब्राज़ील उस समय तेजी से उभरता हुआ राष्ट्र था। वहां फुटबॉल केवल खेल नहीं। बल्कि राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा बन चुका था। सड़कों से लेकर समुद्र तटों तक हर जगह फुटबॉल दिखाई देता था। ब्राज़ीलियाई जनता को विश्वास था कि विश्वकप की मेजबानी के साथ-साथ उनकी टीम पहली बार विश्व चैंपियन भी बनेगी। पूरे देश में एक अभूतपूर्व उत्साह था।

विश्वकप की तैयारी के लिए रियो डी जेनेरो में एक विशाल स्टेडियम का निर्माण शुरू हुआ। इसका नाम रखा गया — ‘माराकाना’। उस समय यह दुनिया का सबसे बड़ा फुटबॉल स्टेडियम माना जाता था। इसकी क्षमता लगभग दो लाख दर्शकों तक बताई जाती थी। ब्राज़ील के नेताओं का मानना था कि यह स्टेडियम केवल खेल मैदान नहीं। बल्कि आधुनिक ब्राज़ील का प्रतीक बनेगा। निर्माण कार्य तेजी से चला। विश्वकप से पहले इसे तैयार कर लिया गया। इस स्टेडियम को बनाने में हजारों मजदूरों ने दिन-रात काम किया था। हालांकि टूर्नामेंट के पहले मैच तक स्टेडियम का कुछ हिस्सा पूरी तरह तैयार नहीं हो पाया था। फिर भी इसका विशाल आकार देखकर पूरी दुनिया दंग रह गई थी।


1950 का विश्वकप कई कारणों से असामान्य था। युद्ध के बाद भी दुनिया पूरी तरह सामान्य नहीं हुई थी। कुछ देशों ने आर्थिक कठिनाइयों के कारण भाग नहीं लिया। कुछ क्वालीफाई करने के बावजूद नहीं पहुंचे। परिणामस्वरूप केवल तेरह टीमें प्रतियोगिता में शामिल हुईं। भारत को भी विश्वकप में भाग लेने का अवसर मिला था। लेकिन विभिन्न कारणों से भारतीय टीम ब्राज़ील नहीं पहुंच सकी। यह भारतीय फुटबॉल इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में गिनी जाती है। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि भारतीय टीम जूते पहनकर खेलने की अनिवार्यता के कारण नहीं गई। लेकिन असल कारण लंबी समुद्री यात्रा का खर्च और एआईएफएफ (AIFF) द्वारा ओलंपिक को अधिक महत्व देना था। इसके अलावा फुटबॉल के जनक इंग्लैंड ने पहली बार इस विश्वकप में भाग लिया था। लेकिन उसे अमेरिका जैसी कमजोर टीम से 1-0 की शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा।

एक और विशेष बात यह थी कि इस विश्वकप में पारंपरिक फाइनल मैच नहीं रखा गया। अंतिम चरण में चार टीमों का समूह बनाया गया, जिसमें सबसे अधिक अंक प्राप्त करने वाली टीम विश्व चैंपियन बनती। ब्राज़ील, उरुग्वे, स्पेन और स्वीडन इस अंतिम समूह में पहुंचे।

ब्राज़ील ने अंतिम चरण में ऐसा प्रदर्शन किया कि पूरा देश जीत के उत्सव की तैयारी करने लगा। उसने स्वीडन को 7-1 और स्पेन को 6-1 से हराया। इन जीतों ने लोगों का विश्वास लगभग अटूट बना दिया। अखबारों ने ब्राज़ील को भावी विश्व चैंपियन घोषित करना शुरू कर दिया। स्मारक डाक टिकट छापे जाने लगे। विजय गीत लिखे गए। खिलाड़ियों के सम्मान में कार्यक्रमों की योजनाएं बनने लगीं। मैच से एक दिन पहले रियो के मेयर ने सार्वजनिक रूप से ब्राज़ीलियाई खिलाड़ियों को 'विश्व विजेता' कहकर संबोधित कर दिया था। पूरा शहर सोने के पदकों की तैयारी में व्यस्त था।


दूसरी ओर उरुग्वे अपेक्षाकृत शांत और संयमित दिखाई दे रहा था। 1930 का पहला विश्वकप जीतने वाला यह छोटा देश अभी भी अपनी परंपरा और आत्मविश्वास पर भरोसा करता था। उसकी टीम में कई अनुभवी खिलाड़ी थे। उनमें सबसे प्रमुख थे कप्तान ओबदूलियो वरेला। वे केवल खिलाड़ी नहीं। बल्कि असाधारण नेतृत्व क्षमता वाले व्यक्ति माने जाते थे। मैच की सुबह वरेला ने अपने खिलाड़ियों से कहा था कि अखबारों और दर्शकों के शोर से डरने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा था कि मैदान पर ग्यारह खिलाड़ियों के सामने ग्यारह खिलाड़ी ही होते हैं।

16 जुलाई, 1950 का दिन आ गया। रियो डी जेनेरो का माराकाना स्टेडियम मानव समुद्र में बदल चुका था। अनुमान है कि लगभग दो लाख दर्शक वहां उपस्थित थे। विश्व फुटबॉल के इतिहास में इतनी बड़ी भीड़ पहले कभी नहीं देखी गई थी। पूरे ब्राज़ील को विश्वास था कि आज उनकी टीम विश्व चैंपियन बनने जा रही है। वास्तव में ब्राज़ील को खिताब जीतने के लिए केवल ड्रॉ की आवश्यकता थी। उरुग्वे को जीतना अनिवार्य था। आधिकारिक रूप से टिकट खरीदने वाले दर्शकों की संख्या 1,73,850 थी। लेकिन बिना टिकट और पास वाले लोगों को मिलाकर यह संख्या दो लाख को पार कर गई थी।

मैच शुरू हुआ तो वातावरण उत्सव जैसा था। दर्शक गा रहे थे। झंडे लहरा रहे थे। हर कोई जीत का इंतजार कर रहा था। पहले हाफ में कोई गोल नहीं हुआ। लेकिन दूसरे हाफ की शुरुआत में ब्राज़ील ने गोल कर दिया। स्टेडियम खुशी से फट पड़ा। लाखों लोगों ने समझ लिया कि अब विश्वकप उनके हाथ में है। यह गोल मैच के 47वें मिनट में फ्रियाका ने दागा था। इस गोल के बाद माराकाना का शोर कई किलोमीटर दूर तक सुना गया था।

लेकिन फुटबॉल का इतिहास अक्सर सबसे अप्रत्याशित क्षणों में लिखा जाता है।

उरुग्वे ने हार नहीं मानी। उसने धैर्य बनाए रखा। कुछ ही देर बाद जुआन स्कियाफिनो ने बराबरी का गोल कर दिया। अब भी ब्राज़ील चैंपियन था, क्योंकि बराबरी उसके लिए पर्याप्त थी। लेकिन उरुग्वे का आत्मविश्वास बढ़ चुका था।


फिर मैच के 79वें मिनट में वह क्षण आया जिसे फुटबॉल इतिहास कभी नहीं भूल सकता।उरुग्वे के अल्सिडेस घिग्गिया गेंद लेकर दाहिने किनारे से आगे बढ़े। सभी को लगा कि वे क्रॉस करेंगे। लेकिन उन्होंने सीधे शॉट लगा दिया। गेंद गोलकीपर को चकमा देती हुई जाल में समा गई।

उरुग्वे 2-1 से आगे था।

कुछ सेकंड के लिए पूरा स्टेडियम स्तब्ध रह गया। जिस स्थान पर कुछ देर पहले उत्सव का शोर था, वहां अब सन्नाटा था। लगभग दो लाख लोग मौन हो गए। घिग्गिया ने बाद में कहा था, “माराकाना में जितनी शांति उस दिन थी, उतनी केवल तीन लोगों ने पैदा की थी — पोप, फ्रैंक सिनात्रा और मैं।”

अंतिम सीटी बजते ही उरुग्वे विश्व चैंपियन बन गया। इस हार के बाद स्टेडियम के भीतर ही दो दर्शकों ने दिल का दौरा पड़ने से अपनी जान गंवा दी थी। फीफा अध्यक्ष जूल्स रिमे खुद हैरान थे। वे ब्राज़ील की जीत का भाषण तैयार करके लाए थे। उन्हें बिना किसी औपचारिक समारोह के चुपके से वरेला को ट्रॉफी सौंपनी पड़ी थी।

दुनिया के खेल इतिहास में शायद ही कोई हार इतनी गहराई से किसी राष्ट्र की सामूहिक चेतना को प्रभावित कर पाई हो। ब्राज़ील में इसे केवल पराजय नहीं माना गया। यह राष्ट्रीय त्रासदी बन गई। अनेक दर्शक रो पड़े। कुछ लोग बेहोश हो गए। कई अखबारों ने अगले दिन शोक जैसी भाषा का प्रयोग किया। खिलाड़ियों को वर्षों तक इस हार का बोझ उठाना पड़ा। इतिहास में इस घटना को 'माराकानाज़ो' (Maracanazo) यानी 'माराकाना का झटका' के नाम से दर्ज किया गया। ब्राज़ील के महान लेखक नेल्सन रोड्रिगेज ने इसे ब्राज़ील का 'हिरोशिमा' तक कह दिया था।

विशेष रूप से गोलकीपर मोआसिर बारबोसा का जीवन इस हार से बदल गया। दशकों तक उन्हें उस गोल के लिए दोषी ठहराया जाता रहा। उन्होंने एक बार कहा था, “ब्राज़ील में हत्या की सजा तीस वर्ष है। लेकिन मैं पचास वर्षों से अपनी गलती की सजा भुगत रहा हूं।” यह कथन बताता है कि खेल कभी-कभी खिलाड़ियों पर कितना भारी पड़ सकता है।

इस हार के बाद ब्राज़ील ने कई बदलाव किए। उसकी पारंपरिक सफेद जर्सी को अशुभ माना गया। उसे बदलकर पीली जर्सी अपनाई गई। वही पीली जर्सी आगे चलकर विश्व फुटबॉल की सबसे पहचान योग्य पोशाक बन गई। ब्राज़ील ने अपनी फुटबॉल संरचना का पुनर्निर्माण शुरू किया। आने वाले वर्षों में वह दुनिया की सबसे सफल टीम बन गया। इस नई पीली और हरी जर्सी को एक 19 वर्षीय युवक अल्डिर गार्सिया श्ली ने डिज़ाइन किया था। उन्होंने देश के झंडे के रंगों का उपयोग करके इसे तैयार किया था।


उधर उरुग्वे ने दूसरी बार विश्वकप जीतकर इतिहास रच दिया। उसकी आबादी उस समय भी बहुत कम थी। लेकिन उसने फिर सिद्ध कर दिया कि फुटबॉल केवल संसाधनों का खेल नहीं है। साहस, अनुशासन और आत्मविश्वास भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

1950 का विश्वकप केवल इसलिए याद नहीं किया जाता कि उरुग्वे चैंपियन बना। यह इसलिए याद किया जाता है क्योंकि उसने खेल की अनिश्चितता को अमर कर दिया। इसने साबित किया कि जीत कभी पहले से तय नहीं होती। सबसे बड़ी भीड़, सबसे बड़ा स्टेडियम, सबसे बड़ा उत्सव और सबसे बड़ी उम्मीदें भी अंतिम परिणाम की गारंटी नहीं दे सकतीं।

यदि 1930 विश्वकप का जन्म था, 1934 राजनीति का प्रवेश था और 1938 युद्ध की छाया, तो 1950 वह क्षण था जब विश्वकप ने दुनिया को खेल की सबसे बड़ी सीख दी — अंतिम सीटी बजने तक कुछ भी निश्चित नहीं होता।

और अब विश्व फुटबॉल एक नए युग की ओर बढ़ रहा था। एक ऐसा युग जिसमें ब्राज़ील नामक देश दुनिया के सबसे महान फुटबॉल कलाकार को जन्म देने वाला था। एक ऐसा खिलाड़ी, जिसका नाम आगे चलकर फुटबॉल का पर्याय बन गया।

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Yogesh Mishra

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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