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Fifa World Cup History: जाने पेले के बिना भी ब्राज़ील कैसे बना विश्व विजेता?
Fifa World Cup History 1962: फीफा विश्वकप 1962 की कहानी में जानिए कैसे पेले के चोटिल होने के बावजूद गारिंशा, अमरिल्डो और ब्राज़ील ने चिली में लगातार दूसरा विश्वकप जीता।
Fifa World Cup History Chile 1962
Fifa World Cup History 1962: 1958 के स्वीडन विश्वकप ने फुटबॉल की दुनिया को एक नया सम्राट दिया था। सत्रह वर्षीय पेले अब केवल ब्राज़ील के खिलाड़ी नहीं रहे थे। वे विश्व फुटबॉल का चेहरा बन चुके थे। उनके गोल, उनकी मुस्कान, उनकी विनम्रता और उनकी असाधारण प्रतिभा ने उन्हें दुनिया का सबसे लोकप्रिय खिलाड़ी बना दिया था। जिस ब्राज़ील ने 1950 में माराकाना की त्रासदी झेली थी, वही अब विश्व फुटबॉल का नया केंद्र बन चुका था।लेकिन खेल इतिहास का एक नियम है। शिखर पर पहुंचना कठिन होता है, लेकिन वहां बने रहना उससे भी कठिन होता है।
1962 का विश्वकप इसी परीक्षा की कहानी है।चार वर्षों के दौरान दुनिया बदल रही थी। शीत युद्ध अपने चरम पर पहुंच रहा था। अमेरिका और सोवियत संघ के बीच अंतरिक्ष, विज्ञान, सैन्य शक्ति और विचारधारा की प्रतिस्पर्धा चल रही थी। अफ्रीका और एशिया के अनेक देश स्वतंत्र हो रहे थे। टेलीविजन तेजी से दुनिया को जोड़ रहा था। और इसी बीच फुटबॉल भी पहले से कहीं अधिक लोकप्रिय हो चुका था।
1962 विश्वकप की मेजबानी चिली को मिली। यह निर्णय केवल खेल उपलब्धि नहीं था। 1960 में चिली में इतिहास के सबसे शक्तिशाली भूकंपों में से एक आया था। लाखों लोग प्रभावित हुए थे। भारी तबाही हुई थी। ऐसे में कई लोगों ने सुझाव दिया कि विश्वकप किसी अन्य देश को दे दिया जाए। लेकिन चिली ने हार नहीं मानी। इस भूकंप को 'वाल्डिविया भूकंप' (Valdivia Earthquake) कहा जाता है। रिक्टर स्केल पर इसकी तीव्रता 9.5 मापी गई थी। खेल के बुनियादी ढांचे पूरी तरह तबाह हो चुके थे। फिर भी चिली की सरकार ने रिकॉर्ड समय में स्टेडियमों का पुनर्निर्माण किया।
आयोजन समिति के प्रमुख कार्लोस डिटबोर्न ने एक वाक्य कहा, जो बाद में विश्वकप इतिहास का हिस्सा बन गया — “क्योंकि हमारे पास कुछ नहीं है, इसलिए हमें सब कुछ करना होगा।”
यह केवल नारा नहीं था। यह पूरे राष्ट्र की जिजीविषा का प्रतीक था। दुख की बात यह थी कि कार्लोस डिटबोर्न खुद इस विश्वकप की शुरुआत नहीं देख सके। टूर्नामेंट शुरू होने से ठीक एक महीने पहले दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया था। सीमित संसाधनों, आर्थिक कठिनाइयों और प्राकृतिक आपदा के बावजूद चिली ने विश्वकप आयोजित किया। इसीलिए 1962 का विश्वकप केवल खेल आयोजन नहीं। बल्कि मानवीय साहस की कहानी भी माना जाता है।
टूर्नामेंट शुरू होने से पहले सबसे बड़ा प्रश्न यही था कि क्या कोई टीम ब्राज़ील को रोक सकती है।ब्राज़ील के पास पेले थे। गारिंशा थे। वावा थे। डिडी थे। निल्टन सैंटोस थे। लगभग वही टीम थी, जिसने 1958 में दुनिया को चकित कर दिया था। अधिकांश विशेषज्ञ मानते थे कि यदि खिलाड़ी फिट रहे तो ब्राज़ील को रोकना लगभग असंभव होगा।
शुरुआत भी वैसी ही हुई।ब्राज़ील ने मेक्सिको के खिलाफ अपना पहला मैच जीता। पेले ने शानदार प्रदर्शन किया और निर्णायक गोल भी किया। ऐसा लगा कि 1958 की कहानी दोबारा लिखी जाने वाली है।लेकिन दूसरे ही मैच में सब कुछ बदल गया।
चेकोस्लोवाकिया के विरुद्ध मुकाबले में पेले को मांसपेशियों में गंभीर चोट लग गई। उस समय खिलाड़ियों के लिए आज जैसी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। जांच के बाद स्पष्ट हो गया कि पेले आगे के मैच नहीं खेल पाएंगे। इस मैच में चेकोस्लोवाकिया के कप्तान जोसेफ मासोपुस्ट (Josef Masopust) ने अद्भुत खेल भावना दिखाई थी। जब उन्होंने देखा कि पेले लंगड़ा रहे हैं, तो उन्होंने अपने खिलाड़ियों को पेले पर टैकल करने से मना कर दिया था। वे घायल पेले का फायदा नहीं उठाना चाहते थे।
पूरे ब्राज़ील में चिंता फैल गई।दुनिया का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बाहर हो चुका था।कई विशेषज्ञों ने भविष्यवाणी कर दी कि अब ब्राज़ील का सफर लंबा नहीं चलेगा।लेकिन महान टीमों की पहचान यही होती है कि वे केवल एक खिलाड़ी पर निर्भर नहीं रहतीं। कोच एआईमोर मोरेरा ने पेले की जगह युवा फॉरवर्ड अमरिल्डो (Amarildo) को टीम में शामिल किया। अमरिल्डो ने इस बड़ी जिम्मेदारी को बखूबी संभाला। पेले के बाहर होने के बाद एक अन्य खिलाड़ी सामने आया — गारिंशा। यदि पेले ब्राज़ील के राजा थे, तो गारिंशा उसके जादूगर थे।
उनका वास्तविक नाम मैनुएल फ्रांसिस्को डॉस सांतोस था, लेकिन दुनिया उन्हें गारिंशा के नाम से जानती थी। उनका बचपन अत्यंत गरीबी में बीता था। उनके पैरों की संरचना सामान्य नहीं थी। एक पैर दूसरे से छोटा था। चिकित्सकों का मानना था कि वे शायद सामान्य खेल भी न खेल सकें। गारिंशा का दाहिना पैर अंदर की तरफ मुड़ा हुआ था और बायां पैर छह सेंटीमीटर छोटा था। उनकी रीढ़ की हड्डी भी जन्म से विकृत थी। इस शारीरिक बनावट के बावजूद उनकी ड्रिब्लिंग की गति अकल्पनीय थी।
गारिंशा गेंद के साथ कुछ ऐसा करते थे जिसे समझाना कठिन है। वे डिफेंडरों को बार-बार छकाते थे। कई बार वही चाल दोहराते थे और फिर भी विरोधी खिलाड़ी उन्हें रोक नहीं पाते थे। दर्शक उनके खेल को देखकर हंसते, चकित होते और मंत्रमुग्ध हो जाते थे। इस टूर्नामेंट में फुटबॉल का एक हिंसक रूप भी सामने आया था। इटली और चिली के बीच मैच इतना हिंसक था कि उसे 'बैटल ऑफ सैंटियागो' (Battle of Santiago) कहा गया। मैच में पुलिस को कई बार हस्तक्षेप करना पड़ा था। फुटबॉल इतिहास का यह सबसे बदनाम मैच माना जाता है। पेले की अनुपस्थिति में गारिंशा ने पूरे टूर्नामेंट का भार अपने कंधों पर उठा लिया।
क्वार्टर फाइनल में ब्राज़ील का सामना इंग्लैंड से हुआ। यह मुकाबला अत्यंत कठिन माना जा रहा था। लेकिन गारिंशा ने दो शानदार गोल किए। वावा ने भी गोल किया और ब्राज़ील 3-1 से जीत गया। मैच के दौरान मैदान पर एक कुत्ता भी घुस आया था। इंग्लैंड के खिलाड़ी जिमी ग्रीव्स ने उसे गोद में उठाकर बाहर निकाला था। उस कुत्ते ने ग्रीव्स की जर्सी पर पेशाब कर दिया था। गारिंशा को यह घटना इतनी मजेदार लगी कि उन्होंने बाद में उस कुत्ते को पाल लिया था।
सेमीफाइनल में मेजबान चिली सामने था। पूरा स्टेडियम चिली के समर्थन में था। लेकिन गारिंशा फिर चमके। उन्होंने दो गोल दागे और ब्राज़ील 4-2 से जीतकर फाइनल में पहुंच गया। मैच के अंत में चिली के खिलाड़ियों की आक्रामकता के कारण गारिंशा को रेड कार्ड दिखा दिया गया था। लेकिन फीफा ने चिली के प्रशंसकों के दबाव के बावजूद गारिंशा के रेड कार्ड को रद्द कर दिया ताकि वे फाइनल खेल सकें।
अब ब्राज़ील लगातार दूसरी बार विश्व चैंपियन बनने से केवल एक कदम दूर था। फाइनल में उसका सामना चेकोस्लोवाकिया से हुआ। दिलचस्प बात यह थी कि यही वह टीम थी जिसके खिलाफ पेले घायल हुए थे। 17 जून, 1962 को सैंटियागो में फाइनल खेला गया। चेकोस्लोवाकिया ने पहला गोल करके बढ़त हासिल कर ली। कुछ क्षणों के लिए ब्राज़ीलियाई समर्थकों की धड़कनें तेज हो गईं। यह शुरुआती गोल चेकोस्लोवाकिया के उसी महान कप्तान जोसेफ मासोपुस्ट ने किया था, जिन्होंने पेले के प्रति खेल भावना दिखाई थी।
लेकिन 1950 का ब्राज़ील और 1962 का ब्राज़ील अलग था।यह टीम दबाव में टूटती नहीं थी।अमरिल्डो ने बराबरी का गोल किया। फिर ज़िटो ने बढ़त दिलाई। अंत में वावा ने तीसरा गोल करके जीत सुनिश्चित कर दी। वावा विश्वकप के दो अलग-अलग फाइनल मैचों में गोल करने वाले दुनिया के पहले खिलाड़ी बने। उन्होंने 1958 और 1962 दोनों के फाइनल में गोल दागे थे।
स्कोर था — ब्राज़ील 3, चेकोस्लोवाकिया 1। ब्राज़ील लगातार दूसरी बार विश्व चैंपियन बन चुका था।
यह उपलब्धि असाधारण थी। 1934 और 1938 में इटली ने लगातार दो विश्वकप जीते थे। लेकिन वह युद्ध-पूर्व युग था। आधुनिक फुटबॉल में यह पहली बार था कि किसी टीम ने अपने खिताब की सफल रक्षा की थी।और सबसे बड़ी बात यह थी कि ब्राज़ील ने यह सफलता अपने सबसे बड़े खिलाड़ी के बिना हासिल की।
1962 का विश्वकप इसलिए विशेष है क्योंकि इसने सिद्ध किया कि महानता केवल व्यक्तियों की नहीं होती, संस्थाओं की भी होती है। पेले महान थे। लेकिन ब्राज़ील केवल पेले नहीं था। उसके पास प्रतिभा की ऐसी गहराई थी कि दुनिया का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बाहर होने के बाद भी टीम विश्व चैंपियन बन सकती थी।
इस विश्वकप ने गारिंशा को अमर बना दिया।आज भी अनेक ब्राज़ीलियाई प्रशंसक मानते हैं कि 1962 विश्वकप वास्तव में गारिंशा का विश्वकप था। पेले ने 1958 में दुनिया जीती थी। 1962 में गारिंशा ने उसे बचाया। चिली के एक प्रमुख अखबार ने हेडलाइन लिखी थी - "गारिंशा किस ग्रह से आए हैं?" वे इस टूर्नामेंट के संयुक्त शीर्ष स्कोरर भी रहे।
लेकिन इस विजय के पीछे एक विडंबना भी छिपी थी।यह ब्राज़ील की स्वर्णिम पीढ़ी का शिखर था। डिडी, वावा, निल्टन सैंटोस और कई अन्य खिलाड़ी अपने करियर के अंतिम चरण में पहुंच रहे थे। दुनिया की अन्य टीमें भी तेजी से मजबूत हो रही थीं।
विशेष रूप से यूरोप में एक नई शक्ति उभर रही थी।
वह शक्ति थी — इंग्लैंड।
फुटबॉल का जन्मदाता देश।
वह देश जिसने खेल को दुनिया को दिया था, लेकिन अभी तक विश्वकप नहीं जीता था।1966 में विश्वकप पहली बार इंग्लैंड में आयोजित होने वाला था।ब्राज़ील अपने तीसरे लगातार खिताब के सपने के साथ वहां पहुंचेगा।पेले फिर लौटेंगे।
लेकिन इस बार कहानी उनकी नहीं होगी।
कहानी होगी उस राष्ट्र की, जिसने फुटबॉल को जन्म दिया था और जो पहली बार विश्व विजेता बनने जा रहा था।


