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Fifa World Cup History: फीफा विश्वकप 1958, जब 17 साल के पेले ने दुनिया को चौंका दिया
Fifa World Cup History: 1958 के स्वीडन विश्वकप में 17 वर्षीय पेले ने दुनिया को चौंका दिया और ब्राज़ील को पहला फीफा विश्वकप दिलाया। जानिए पेले के उदय और ब्राज़ील के स्वर्ण युग की पूरी कहानी।
Fifa World Cup History Sweden 1958 Pele Story
Fifa World Cup History: 1954 के स्विट्जरलैंड विश्वकप में दुनिया ने ‘बर्न का चमत्कार’ देखा था। फुटबॉल के सबसे बड़े मंच पर पश्चिम जर्मनी ने महान हंगरी को हराकर इतिहास की सबसे अप्रत्याशित जीत दर्ज की थी। लेकिन चार वर्ष बाद स्वीडन में आयोजित होने वाला विश्वकप केवल किसी टीम की जीत के लिए याद नहीं किया जाने वाला था। यह उस खिलाड़ी के जन्म की कहानी बनने वाला था, जिसे आगे चलकर फुटबॉल का पर्याय माना गया। यह वह विश्वकप था जिसने एक किशोर को अमर बना दिया। यह वह विश्वकप था, जिसने ब्राज़ील को केवल एक सफल टीम नहीं। बल्कि फुटबॉल की सबसे आकर्षक शक्ति में बदल दिया।
1950 में माराकाना की त्रासदी झेलने वाला ब्राज़ील अभी भी उस घाव को पूरी तरह भूल नहीं पाया था। उरुग्वे के हाथों मिली हार ने पूरे राष्ट्र को झकझोर दिया था। लाखों लोगों ने उसे केवल खेल पराजय नहीं। बल्कि राष्ट्रीय अपमान माना था। अगले वर्षों में ब्राज़ील ने अपने फुटबॉल ढांचे का व्यापक पुनर्गठन किया। खिलाड़ियों के चयन, प्रशिक्षण, फिटनेस, मनोविज्ञान और रणनीति पर पहले से कहीं अधिक ध्यान दिया जाने लगा। पहली बार वैज्ञानिक दृष्टिकोण से टीम तैयार करने की कोशिश हुई। ब्राज़ीलियाई फुटबॉल संघ ने टीम के साथ बकायदा एक मनोवैज्ञानिक (Psychologist) भेजा था। वे देखना चाहते थे कि खिलाड़ी दबाव झेलने के लिए मानसिक रूप से तैयार हैं या नहीं।
ब्राज़ीलियाई फुटबॉल की सबसे बड़ी विशेषता उसकी रचनात्मकता थी। सड़कों, समुद्र तटों और खुले मैदानों में खेलते हुए विकसित हुई यह शैली यूरोपीय फुटबॉल की तुलना में अधिक स्वतंत्र और कलात्मक थी। लेकिन 1950 तक यह आरोप भी लगाया जाता था कि ब्राज़ील के खिलाड़ी प्रतिभाशाली तो हैं, पर दबाव में बिखर जाते हैं। 1958 की टीम इस धारणा को हमेशा के लिए बदलने वाली थी। इस अनूठी ब्राज़ीलियाई शैली को 'गिंगा' (Ginga) कहा जाता था। यह मार्शल आर्ट और डांस का एक खूबसूरत मिश्रण था। यूरोपीय रक्षक इस शैली को समझ नहीं पाते थे।
स्वीडन विश्वकप कई दृष्टियों से आधुनिक फुटबॉल की शुरुआत माना जाता है। पहली बार विश्वकप का प्रसारण इतने व्यापक स्तर पर हुआ कि यूरोप और अन्य क्षेत्रों में लाखों लोग नियमित रूप से मैच देखने लगे। टेलीविजन ने खिलाड़ियों को वैश्विक पहचान देना शुरू कर दिया। अब फुटबॉल केवल स्थानीय नायकों का खेल नहीं रहा। वह अंतरराष्ट्रीय सितारों को जन्म देने लगा। सोवियत संघ की टीम ने भी इस विश्वकप में पहली बार कदम रखा था। उनके पास लेव याशिन (Lev Yashin) जैसे महान गोलकीपर थे। उन्हें 'ब्लैक स्पाइडर' कहा जाता था।
प्रतियोगिता में सोलह टीमें शामिल हुईं। ब्राज़ील, पश्चिम जर्मनी, फ्रांस, अर्जेंटीना और मेजबान स्वीडन प्रमुख दावेदार माने जा रहे थे। लेकिन शुरुआती दिनों में किसी की विशेष नजर उस दुबले-पतले सत्रह वर्षीय लड़के पर नहीं थी, जो ब्राज़ील की टीम में शामिल था। उसका पूरा नाम एडसन अरांटिस दो नैसिमेंटो था। दुनिया उसे आगे चलकर ‘पेले’ के नाम से जानने वाली थी। एक दिलचस्प प्रशासनिक गलती के कारण पेले को जर्सी नंबर 10 मिली थी। ब्राज़ीलियाई अधिकारियों ने फीफा को खिलाड़ियों की सूची बिना नंबरों के भेजी थी। फीफा ने यादृच्छिक (Randomly) रूप से पेले को 10 नंबर दे दिया। आगे चलकर यह नंबर फुटबॉल का सबसे प्रतिष्ठित नंबर बन गया।
पेले का बचपन गरीबी में बीता था। उसके पिता भी फुटबॉलर थे। लेकिन बड़ी सफलता नहीं पा सके। छोटे पेले ने कभी कपड़ों के पुराने टुकड़ों से बनी गेंद से खेला। कभी नंगे पैर मैदान में दौड़ लगाई। प्रतिभा इतनी असाधारण थी कि किशोरावस्था में ही वह ब्राज़ील के प्रमुख क्लब सैंटोस के लिए खेलने लगा। फिर भी विश्वकप से पहले बहुत कम लोगों को अंदाजा था कि यह लड़का इतिहास बदलने वाला है।
टूर्नामेंट की शुरुआत में पेले चोट से जूझ रहे थे और शुरुआती मैचों में नहीं खेले। लेकिन ब्राज़ील के पास प्रतिभा की कमी नहीं थी। टीम में गारिंशा, डिडी, वावा, निल्टन सैंटोस और ज़ागालो जैसे खिलाड़ी मौजूद थे। विशेष रूप से गारिंशा को देखने वाले अक्सर कहते थे कि गेंद उनके पैरों से चिपकी रहती है। उनकी ड्रिब्लिंग विरोधी रक्षकों के लिए दुःस्वप्न थी। सोवियत संघ के खिलाफ तीसरे मैच में कोच विसेंट फेओला ने एक बड़ा जोखिम लिया। उन्होंने पेले और गारिंशा दोनों को एक साथ मैदान पर उतार दिया। फुटबॉल इतिहास की यह सबसे खतरनाक जोड़ी साबित हुई।
ब्राज़ील ने धीरे-धीरे अपनी लय पकड़ी। समूह चरण में उसने शानदार प्रदर्शन किया। फिर क्वार्टर फाइनल में वेल्स के खिलाफ मुकाबला आया। यह मैच लंबे समय तक गोलरहित रहा। दबाव बढ़ रहा था। तभी सत्रह वर्षीय पेले ने अवसर बनाया और निर्णायक गोल कर दिया। यह विश्वकप में उनका पहला गोल था। इस गोल के साथ ही पेले विश्वकप के इतिहास में गोल करने वाले सबसे युवा खिलाड़ी बन गए। तब उनकी उम्र केवल 17 वर्ष 239 दिन थी।
शायद उसी क्षण विश्व फुटबॉल ने एक नए युग में प्रवेश किया।सेमीफाइनल में ब्राज़ील का सामना फ्रांस से हुआ। फ्रांस की टीम बेहद मजबूत थी। उसके पास उस समय के महान स्ट्राइकर जस्ट फोंटेन थे। फोंटेन इस विश्वकप में गोल पर गोल किए जा रहे थे। लेकिन इस मैच में सारी सुर्खियां पेले ने बटोर लीं।
उन्होंने हैट्रिक बना दी। पेले ने दूसरे हाफ में केवल 23 मिनट के भीतर तीन गोल दागे थे। फ्रांस की रक्षापंक्ति इस युवा खिलाड़ी की गति के सामने असहाय नजर आ रही थी। ब्राज़ील ने फ्रांस को 5-2 से हराकर फाइनल में प्रवेश कर लिया।
दूसरी ओर मेजबान स्वीडन ने भी शानदार प्रदर्शन किया था। घरेलू दर्शकों का समर्थन उसके साथ था। अनुभवी खिलाड़ी और संगठित टीम उसे खतरनाक प्रतिद्वंद्वी बना रहे थे। फाइनल में स्वीडन और ब्राज़ील आमने-सामने थे।
29 जून, 1958 को स्टॉकहोम में फाइनल खेला गया। मैच शुरू होने से पहले स्वीडन के राजा गुस्ताव VI एडॉल्फ खुद मैदान पर आए थे। उन्होंने दोनों टीमों के खिलाड़ियों से हाथ मिलाकर उनका हौसला बढ़ाया था।
मैच की शुरुआत स्वीडन के लिए शानदार रही। उसने शुरुआती गोल करके बढ़त बना ली। स्टेडियम में बैठे स्वीडिश दर्शकों में उत्साह की लहर दौड़ गई। लेकिन ब्राज़ील घबराया नहीं। उसने जल्द ही बराबरी कर ली और फिर बढ़त भी हासिल कर ली।
इसके बाद जो हुआ, वह फुटबॉल इतिहास के सबसे सुंदर क्षणों में गिना जाता है।
पेले ने एक ऊंची गेंद को अपने सीने से नियंत्रित किया, डिफेंडर के ऊपर से उछाला और फिर शानदार वॉली के साथ गोल कर दिया। यह गोल केवल तकनीकी उत्कृष्टता का उदाहरण नहीं था। यह कला और खेल के मिलन का दृश्य था। स्वीडन के डिफेंडर सिगे पारलिंग ने बाद में स्वीकार किया था कि जब पेले ने वह गोल किया, तो वे खुद उनके सम्मान में ताली बजाना चाहते थे।
ब्राज़ील ने अंततः 5-2 से जीत दर्ज की।अंतिम सीटी बजते ही सत्रह वर्षीय पेले भावनाओं से भर उठे। वे मैदान पर ही रो पड़े। साथी खिलाड़ियों ने उन्हें कंधों पर उठा लिया। दुनिया ने एक नए सुपरस्टार का जन्म देखा।ब्राज़ील पहली बार विश्व चैंपियन बन चुका था। यह इतिहास में पहली बार था जब किसी दक्षिण अमेरिकी देश ने यूरोपीय धरती पर जाकर विश्वकप जीतने का कारनामा किया था।
यह जीत केवल ट्रॉफी जीतने की घटना नहीं थी। यह 1950 के दर्द का उत्तर थी। यह माराकाना की त्रासदी से मुक्ति थी। यह उस राष्ट्र की विजय थी जिसने अपनी असफलता से सीखकर खुद को पुनर्गठित किया था।
पेले तुरंत वैश्विक नायक बन गए। उनके खेल में गति थी, शक्ति थी, तकनीक थी, कल्पनाशीलता थी और सबसे बढ़कर आनंद था। वे केवल गोल नहीं करते थे, वे फुटबॉल को सुंदर बनाते थे। आने वाले वर्षों में उनका नाम दुनिया के हर कोने में पहुंचने वाला था।
1958 के विश्वकप ने एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। इसने दिखाया कि फुटबॉल केवल परिणाम का खेल नहीं है। शैली भी महत्वपूर्ण है। ब्राज़ील ने जीत के साथ सौंदर्य को जोड़ा। उसके खेल में संगीत जैसी लय थी। इसी कारण आगे चलकर ब्राज़ील को ‘जोगो बोनितो’ अर्थात ‘सुंदर खेल’ का प्रतीक माना जाने लगा।
फ्रांस के जस्ट फोंटेन ने इस विश्वकप में तेरह गोल किए। आज भी एक ही विश्वकप में सर्वाधिक गोल का रिकॉर्ड उन्हीं के नाम है। लेकिन उनकी इस महान उपलब्धि के बावजूद इतिहास की सबसे चमकदार रोशनी पेले और ब्राज़ील पर ही पड़ी।
1958 का विश्वकप इसलिए विशेष है क्योंकि इसने फुटबॉल के पहले वैश्विक सुपरस्टार को जन्म दिया। इससे पहले महान खिलाड़ी थे, किंतु पेले एक वैश्विक सांस्कृतिक प्रतीक बन गए। वे केवल खिलाड़ी नहीं रहे। वे आशा, प्रतिभा और खेल की सार्वभौमिक भाषा के प्रतिनिधि बन गए।
यदि 1954 ‘बर्न का चमत्कार’ था, तो 1958 ‘प्रतिभा का विस्फोट’ था। यदि जर्मनी ने दुनिया को साहस का महत्व बताया था, तो ब्राज़ील ने उसे सुंदरता का अर्थ समझाया। और उस सुंदरता के केंद्र में खड़ा था एक सत्रह वर्षीय लड़का, जिसने दुनिया को बताया कि महानता उम्र नहीं देखती।
विश्व फुटबॉल अब पूरी तरह बदल चुका था। लेकिन पेले की कहानी अभी शुरू ही हुई थी। चार वर्ष बाद वह फिर विश्वकप में लौटेगा। ब्राज़ील फिर लौटेगा। और दुनिया देखेगी कि कोई टीम लगातार दूसरी बार भी विश्व चैंपियन बन सकती है।


