Asian Games Records: एशियन गेम्स रिकॉर्ड, एशियाई रिकॉर्ड और राष्ट्रीय रिकॉर्ड में क्या अंतर है?

Asian Games Records: मिल्खा सिंह का 400 मीटर रिकॉर्ड करीब 38 साल, श्रीराम सिंह का 800 मीटर रिकॉर्ड 42 साल और पीटी उषा का 400 मीटर हर्डल रिकॉर्ड करीब 42 साल कायम रहा। जानिए भारतीय एथलेटिक्स की रिकॉर्ड कहानी।

Yogesh Mishra
Published on: 5 Oct 2026 10:04 PM IST
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Asian Games 2026 Indian Athletics Records

Asian Games Records: रिकॉर्ड बनते ही इसलिए हैं कि एक दिन टूटें।लेकिन भारतीय खेल इतिहास में कुछ रिकॉर्ड ऐसे रहे जिनके सामने यह कहावत भी कमजोर पड़ती दिखाई दी। खिलाड़ी आए। राष्ट्रीय चैंपियन बने। एशियाई खेलों और ओलंपिक तक पहुँचे। फिर संन्यास लेकर चले गए। लेकिन घड़ी या फीते पर लिखी पुरानी संख्या वहीं खड़ी रही। मिल्खा सिंह की 400 मीटर की सीमा को पार करने में किसी भारतीय को करीब 38 वर्ष लगे। श्रीराम सिंह का 800 मीटर राष्ट्रीय रिकॉर्ड 42 वर्ष तक कायम रहा।टीसी योहानन की एशियाड में लगाई गई एक छलांग को कोई भारतीय तीन दशक तक पार नहीं कर पाया। पीटी उषा की 400 मीटर बाधा दौड़ का राष्ट्रीय रिकॉर्ड इतना लंबा चला कि उसे बनाने के समय पैदा भी न हुई विथ्या रामराज ने पहले 39 वर्ष बाद उसकी बराबरी की। फिर 2026 के एशियन गेम्स में आखिरकार उसे तोड़ा।

लेकिन इस कहानी में सबसे पहले एक भ्रम दूर करना जरूरी है। एशियन गेम्स रिकॉर्ड, एशियाई रिकॉर्ड और भारतीय राष्ट्रीय रिकॉर्ड तीन अलग चीजें हैं। पीटी उषा का प्रसिद्ध 55.42 सेकंड का रिकॉर्ड एशियन गेम्स में नहीं, 1984 लॉस एंजिल्स ओलंपिक में बना भारतीय राष्ट्रीय रिकॉर्ड था। मिल्खा सिंह का दशकों चला 400 मीटर राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी रोम ओलंपिक 1960 की दौड़ से जुड़ा था।श्रीराम सिंह का 800 मीटर रिकॉर्ड मॉन्ट्रियल ओलंपिक 1976 में बना था। इसके विपरीत टीसी योहानन का 8.07 मीटर लंबी कूद रिकॉर्ड 1974 तेहरान एशियाड में ही बना था। इसलिए इन सभी को सीधे ‘एशियन गेम्स रिकॉर्ड’ कहना गलत होगा। सही कहानी यह है कि ये भारत के महान एशियाड खिलाड़ियों के वे रिकॉर्ड थे जिन्होंने भारतीय खेल में दशकों तक अगली पीढ़ियों के लिए सीमा तय कर रखी थी। और इनमें कुछ रिकॉर्ड वास्तव में एशियाड में ही बने थे।

एशियाड में बनी वह छलांग जिसे भारतीय 30 वर्ष तक पार नहीं कर सका

12 सितंबर, 1974 को तेहरान एशियाई खेलों में टीसी योहानन लंबी कूद के रनवे पर उतरे और 8.07 मीटर की छलांग लगा दी। यह केवल स्वर्ण पदक दिलाने वाली छलांग नहीं थी। उस समय यह एशियाई रिकॉर्ड और भारतीय राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बनी। भारत का कोई लंबी कूद खिलाड़ी इससे पहले उस स्तर तक नहीं पहुँचा था। योहानन ने आठ मीटर की उस मनोवैज्ञानिक सीमा को पार किया जो आज भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लंबी कूद की गुणवत्ता का महत्वपूर्ण पैमाना मानी जाती है।

फिर इंतजार शुरू हुआ। 1970 का दशक समाप्त हुआ।1980 का पूरा दशक चला गया। 1990 का दशक भी समाप्त हो गया। नई सदी आ गई। लेकिन किसी भारतीय की वैध छलांग 8.07 मीटर से आगे नहीं निकल सकी। आखिरकार 16 मार्च, 2004 को दिल्ली में फेडरेशन कप के दौरान अमृतपाल सिंह ने 8.08 मीटर की छलांग लगाई और योहानन का रिकॉर्ड तोड़ा। पूरे 30 वर्ष की प्रतीक्षा और रिकॉर्ड केवल एक सेंटीमीटर से टूटा।

योहानन की कहानी इस विषय का सबसे शुद्ध उदाहरण इसलिए है क्योंकि रिकॉर्ड एशियाड में बना, स्वर्ण पदक दिलाया और फिर भारतीय राष्ट्रीय रिकॉर्ड के रूप में तीन दशक कायम रहा। खेल विज्ञान, प्रशिक्षण, उपकरण और सुविधाओं में भारी बदलाव के बावजूद तीन पीढ़ियों को उनसे केवल एक सेंटीमीटर आगे जाने में 30 वर्ष लगे।

पीटी उषा, 55.42 की दीवार 42 वर्ष बाद टूटी

भारतीय महिला एथलेटिक्स में शायद कोई संख्या 55.42 जितनी प्रसिद्ध नहीं रही। 8 अगस्त, 1984 को लॉस एंजिल्स ओलंपिक के महिला 400 मीटर बाधा दौड़ फाइनल में पीटी उषा ने 55.42 सेकंड का समय निकाला। वह कांस्य पदक से केवल एक सौवें सेकंड से चूक गईं, लेकिन उन्होंने ऐसा भारतीय राष्ट्रीय रिकॉर्ड बना दिया जो आने वाले चार दशकों तक चुनौती बना रहा।

इसके बाद उषा ने 1986 सियोल एशियाड में इतिहास रचा। उन्होंने 200 मीटर, 400 मीटर, 400 मीटर बाधा दौड़ और 4x400 मीटर रिले में चार स्वर्ण तथा 100 मीटर में रजत जीता। 200 मीटर में 23.44, 400 मीटर में 52.16 और 400 मीटर बाधा दौड़ में 56.08 सेकंड के उनके प्रदर्शन उस समय एशियन गेम्स रिकॉर्ड थे। लेकिन उनकी सबसे लंबी चलने वाली भारतीय सीमा 55.42 ही रही, जो दो वर्ष पहले लॉस एंजिल्स में बनी थी।

साल गुजरते गए। उषा का करियर समाप्त हुआ। भारतीय एथलेटिक्स में नई धाविकाएँ आईं। सिंथेटिक ट्रैक बेहतर हुए। प्रशिक्षण विज्ञान बदला।आधुनिक जूते आए। खेल पोषण और पुनर्वास की व्यवस्था बदली।लेकिन 55.42 नहीं बदला।फिर 2 अक्टूबर , 2023 को हांगझोऊ एशियाड में विथ्या रामराज ने महिला 400 मीटर बाधा दौड़ की हीट पूरी की। घड़ी पर समय आया—55.42 सेकंड।

ठीक वही समय जो उषा ने 39 वर्ष पहले दौड़ा था।

भारतीय एथलेटिक्स के सबसे पुराने रिकॉर्डों में से एक टूटने के बजाय बराबर हो गया। उषा और विथ्या दोनों संयुक्त राष्ट्रीय रिकॉर्डधारी बन गईं। फिर तीन वर्ष और लगे। 2026 आइची-नागोया एशियन गेम्स में विथ्या ने 54.75 सेकंड दौड़कर न केवल रिकॉर्ड तोड़ा बल्कि पहली बार किसी भारतीय महिला को इस स्पर्धा में 55 सेकंड से नीचे पहुँचा दिया। अंतर भी मामूली नहीं था। 55.42 से सीधे 54.75—0.67 सेकंड का सुधार। 400 मीटर बाधा दौड़ जैसी स्पर्धा में यह बहुत बड़ा अंतर है।

इस तरह उषा का रिकॉर्ड लगभग 42 वर्ष चला। और इस कहानी में एशियाड की खूबसूरत भूमिका यह रही कि रिकॉर्ड बना भले ओलंपिक में था। उसकी बराबरी हांगझोऊ एशियाड में हुई और उसका अंत नागोया एशियाड में।

एक समय अजेय दिखाई देते थे उषा के एशियाड रिकॉर्ड

पीटी उषा की कहानी को केवल 55.42 तक सीमित कर देना भी उचित नहीं होगा। 1986 सियोल में उनका प्रदर्शन एशियन गेम्स इतिहास के महानतम व्यक्तिगत प्रदर्शनों में गिना जाता है। उन्होंने चार स्वर्ण और एक रजत जीता। 200 मीटर में 23.44 सेकंड, 400 मीटर में 52.16 सेकंड और 400 मीटर बाधा दौड़ में 56.08 सेकंड के साथ एशियन गेम्स रिकॉर्ड बनाए। इन रिकॉर्डों की उम्र उनके राष्ट्रीय 55.42 रिकॉर्ड जैसी चार दशक लंबी नहीं रही। जैसे-जैसे एशियाई महिला एथलेटिक्स में चीन, श्रीलंका, कजाखस्तान और दूसरे देशों की ताकत बढ़ी, ये रिकॉर्ड टूटते गए।

यही एक महत्वपूर्ण अंतर है—उषा का भारतीय रिकॉर्ड 42 वर्ष तक रहा। जबकि एशियाई स्तर पर प्रतिस्पर्धा उससे कहीं तेजी से आगे बढ़ी। इससे एक दूसरी कहानी भी सामने आती है। कभी उषा एशिया की अग्रणी धाविकाओं में थीं। लेकिन भारत को उनकी घरेलू सीमा पार करने में उस गति से बहुत अधिक समय लगा जिस गति से एशिया आगे बढ़ गया।

800 मीटर की दौड़ जिसे भारतीय 42 वर्ष तक नहीं दोहरा पाया

श्रीराम सिंह स्वयं एशियाड के महान भारतीय चैंपियन थे। उन्होंने 1974 तेहरान और 1978 बैंकॉक, दोनों एशियाई खेलों में पुरुष 800 मीटर का स्वर्ण जीता। लेकिन उनका सबसे लंबे समय तक कायम रहने वाला भारतीय रिकॉर्ड एशियाड में नहीं, 1976 मॉन्ट्रियल ओलंपिक में बना। 25 जुलाई, ट

1976 के 800 मीटर ओलंपिक फाइनल में श्रीराम ने शुरुआत से ही तेज दौड़ लगाई। क्यूबा के महान अल्बर्टो जुआंतोरेना ने अंततः विश्व रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण जीता, लेकिन श्रीराम सिंह ने 1 मिनट 45.77 सेकंड का भारतीय रिकॉर्ड बनाया।और फिर यह समय जैसे भारतीय रिकॉर्ड-बुक में जम गया। 1976 से 1980, 1990, 2000 और फिर 2010 का दशक आ गया। भारतीय मध्य दूरी के धावक बदलते रहे। लेकिन 1:45.77 नहीं टूटा। आखिरकार 2018 में जिनसन जॉनसन ने 1:45.65 दौड़कर इसे पीछे छोड़ा।

अंतर केवल 0.12 सेकंड। लेकिन इस 0.12 सेकंड के लिए भारत को 42 वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ी। और कहानी में एक शानदार संयोग था। जिस वर्ष जिनसन जॉनसन ने श्रीराम सिंह का 42 वर्ष पुराना रिकॉर्ड तोड़ा, उसी वर्ष जकार्ता एशियाड में उन्होंने 1500 मीटर का स्वर्ण भी जीत लिया। यानी एक एशियाड महानायक की सीमा अंततः दूसरे एशियाड चैंपियन ने पार की।

38 साल तक मिल्खा सिंह से धावक उनसे तेज नहीं दौड़ पाया

मिल्खा सिंह की एशियाड कहानी भारतीय खेल इतिहास की बुनियादी कथाओं में है। 1958 टोक्यो एशियाड में उन्होंने 200 और 400 मीटर दोनों स्वर्ण जीते। 400 मीटर में 47.0 सेकंड का समय उस समय एशियन गेम्स रिकॉर्ड था। 1962 जकार्ता एशियाड में उन्होंने 400 मीटर का स्वर्ण फिर जीता और भारत की 4x400 मीटर रिले टीम को भी स्वर्ण दिलाया।

लेकिन उनका दशकों तक कायम भारतीय राष्ट्रीय रिकॉर्ड 1958 के एशियाड से नहीं बल्कि 1960 रोम ओलंपिक की प्रसिद्ध 400 मीटर दौड़ से जुड़ा है। मिल्खा चौथे स्थान पर रहे, लेकिन उनका प्रदर्शन लंबे समय तक भारतीय रिकॉर्ड रहा। पुराने समय की हस्तचालित और बाद में इलेक्ट्रॉनिक समय पद्धति के कारण मिल्खा के रिकॉर्ड को विभिन्न जगह 45.6 और 45.73 के रूप में लिखा गया है, आधुनिक रिकॉर्ड संदर्भों में इलेक्ट्रॉनिक समकक्ष 45.73 सेकंड व्यापक रूप से इस्तेमाल होता है।

करीब 38 वर्ष तक कोई भारतीय इस सीमा से आगे नहीं गया।

1998 में परमजीत सिंह ने 45.70 सेकंड दौड़कर मिल्खा का रिकॉर्ड तोड़ा। अंतर केवल तीन सौवें सेकंड का था।

इस रिकॉर्ड की उम्र को समझने के लिए इतना पर्याप्त है कि जब मिल्खा ने वह दौड़ लगाई थी तब भारत में आधुनिक उच्च प्रदर्शन खेल ढाँचा लगभग अस्तित्व में नहीं था। जब रिकॉर्ड टूटा तब देश आर्थिक उदारीकरण के दौर में प्रवेश कर चुका था, टेलीविजन और आधुनिक खेल प्रसारण का युग आ चुका था और एथलेटिक्स की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी थी।

लेकिन रिकॉर्ड अभी भी मिल्खा का था।

पीटी उषा के केवल एक नहीं, कई भारतीय रिकॉर्डों ने अगली पीढ़ी को वर्षों रोके रखा

पीटी उषा की असाधारणता का एक कम चर्चित पक्ष यह है कि केवल 400 मीटर बाधा दौड़ में ही नहीं, भारतीय महिला स्प्रिंट की कई रिकॉर्ड पंक्तियों पर उनका नाम वर्षों तक बना रहा।

1985 में उन्होंने 100 मीटर में 11.39 सेकंड का राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया। 200 मीटर में उनका 23.25 सेकंड का समय लंबे समय तक भारतीय मानक रहा। 400 मीटर में भी उनका प्रदर्शन वर्षों तक राष्ट्रीय रिकॉर्ड रहा।

फिर वर्ष 2000 में भारतीय महिला एथलेटिक्स में जैसे अचानक एक दीवार टूटी। रचिता मिस्त्री ने 100 मीटर में 11.26 सेकंड दौड़कर उषा का पुराना रिकॉर्ड पीछे छोड़ा। विनीता त्रिपाठी ने 200 मीटर में 23.04 सेकंड के साथ उषा की सीमा पार की और केएम बीनामोल ने 400 मीटर में 51.21 सेकंड का नया भारतीय रिकॉर्ड बनाया।

लेकिन इन तीन रिकॉर्डों के चले जाने के बाद भी 400 मीटर बाधा दौड़ का 55.42 बचा रहा।

वह अगले 26 वर्ष और बचा रहा।

यानी भारतीय महिला एथलेटिक्स की रिकॉर्ड-बुक से उषा का प्रभुत्व एक साथ समाप्त नहीं हुआ। उनकी बनाई सीमाएँ एक-एक करके टूटीं और सबसे कठिन सीमा 2026 तक खड़ी रही।

एशियाड में बना टीसी योहानन का रिकॉर्ड इस सूची में सबसे खास क्यों है?

इस पूरी कहानी में टीसी योहानन का नाम फिर याद करना जरूरी है क्योंकि उनके मामले में तीनों चीजें एक साथ जुड़ती हैं—एशियाड, स्वर्ण और दशकों लंबा भारतीय रिकॉर्ड।

तेहरान 1974।

8.07 मीटर।

एशियाई खेलों का स्वर्ण।

उस समय एशियाई रिकॉर्ड।

भारतीय राष्ट्रीय रिकॉर्ड।

और फिर 30 वर्ष तक कोई भारतीय आगे नहीं।

इसलिए यदि सवाल बिल्कुल सख्ती से पूछा जाए कि “एशियाड में बना कौन-सा भारतीय प्रदर्शन दशकों तक राष्ट्रीय रिकॉर्ड रहा”, तो योहानन इसका सबसे साफ और शानदार उदाहरण हैं।

कुछ महान एशियाड रिकॉर्ड दशकों नहीं चले, क्योंकि एशिया भारत से तेजी से आगे बढ़ा

यहाँ एक उलटी कहानी भी है और वह उतनी ही महत्वपूर्ण है। मिल्खा, उषा और दूसरे भारतीय महान खिलाड़ियों के राष्ट्रीय रिकॉर्ड दशकों चले, लेकिन उनके वास्तविक एशियन गेम्स रिकॉर्ड उतने लंबे समय तक नहीं टिके।

कारण सीधा है।

भारतीय अगली पीढ़ी पुराने महान खिलाड़ियों तक पहुँचने में देर करती रही, लेकिन एशिया नहीं रुका।

चीन विश्व खेल शक्ति बना। जापान की पुरानी ताकत बनी रही। दक्षिण कोरिया ऊपर आया। मध्य एशियाई देश जुड़े। श्रीलंका ने स्प्रिंट में विश्व स्तरीय खिलाड़ी पैदा किए। कजाखस्तान और उज्बेकिस्तान एथलेटिक्स तथा दूसरे खेलों में मजबूत हुए।

इसलिए किसी भारतीय का राष्ट्रीय रिकॉर्ड 30-40 वर्ष जीवित रह सकता था, लेकिन उसी खिलाड़ी का एशियाड रिकॉर्ड अगले आठ-दस वर्ष में कोई विदेशी खिलाड़ी तोड़ देता था।

यह फर्क भारतीय खेल इतिहास की एक बहुत महत्वपूर्ण सच्चाई बताता है।

लंबा रिकॉर्ड महानता भी बताता है और व्यवस्था की कमजोरी भी

जब हम कहते हैं कि पीटी उषा का रिकॉर्ड 42 वर्ष चला तो स्वाभाविक रूप से यह उनकी महानता का प्रमाण है। जब श्रीराम सिंह का रिकॉर्ड 42 वर्ष चलता है तो यह बताता है कि 1976 में वह अपने समय से कितने आगे थे। मिल्खा का 38 वर्ष और योहानन का 30 वर्ष भी यही बताते हैं।

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू थोड़ा असहज है।

यदि किसी देश का राष्ट्रीय रिकॉर्ड चार दशक तक नहीं टूट रहा तो क्या केवल पुराना खिलाड़ी असाधारण था, या नई पीढ़ियाँ पर्याप्त तेजी से आगे नहीं बढ़ीं?

असल उत्तर दोनों है।

उषा असाधारण थीं, लेकिन यह भी सच है कि भारत को अगली 55 सेकंड की महिला 400 मीटर बाधा धाविका तैयार करने में चार दशक लग गए।

श्रीराम असाधारण थे, लेकिन भारत 42 वर्ष तक 1:45.77 से तेज 800 मीटर धावक पैदा नहीं कर पाया।

योहानन अपने समय से बहुत आगे थे, लेकिन भारत को दूसरी 8.08 मीटर छलांग के लिए 30 वर्ष इंतजार करना पड़ा।

यही कारण है कि किसी राष्ट्रीय रिकॉर्ड का बहुत लंबा चलना हमेशा केवल उत्सव की बात नहीं होता।

आधुनिक भारतीय एथलेटिक्स में अब तस्वीर कुछ बदल रही है

आज कुछ भारतीय स्पर्धाओं में एक खिलाड़ी के पीछे दूसरा विश्व स्तरीय खिलाड़ी दिखाई देने लगा है। पुरुष भाला फेंक इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। हांगझोऊ एशियाड में नीरज चोपड़ा ने 88.88 मीटर और किशोर जेना ने 87.54 मीटर फेंका। एक ही फाइनल में दो भारतीय विश्व स्तर की दूरी तक पहुँचे।

यही गहराई पुराने भारतीय एथलेटिक्स में अक्सर गायब थी।

इसी तरह पुरुष लंबी कूद में मुरली श्रीशंकर 8.40 मीटर से आगे जा चुके हैं, यानी योहानन की कभी असंभव लगने वाली 8.07 मीटर सीमा से अब कई भारतीय प्रदर्शन आगे निकल चुके हैं। महिलाओं की 400 मीटर बाधा दौड़ में विथ्या ने 55.42 की बराबरी करके रुकने के बजाय तीन वर्ष बाद 54.75 कर दिया।

इसका अर्थ है कि भारतीय एथलेटिक्स के कुछ हिस्सों में अब रिकॉर्ड एक महान खिलाड़ी की अकेली विरासत के बजाय प्रतिस्पर्धी पीढ़ियों के बीच आगे बढ़ सकते हैं।

चार रिकॉर्ड, 152 वर्षों की संयुक्त प्रतीक्षा

इन चार महान सीमाओं को एक साथ रखिए तो तस्वीर चौंकाती है।

मिल्खा सिंह — 400 मीटर — लगभग 38 वर्ष।

टीसी योहानन — लंबी कूद — 30 वर्ष।

श्रीराम सिंह — 800 मीटर — 42 वर्ष।

पीटी उषा — 400 मीटर बाधा दौड़ — लगभग 42 वर्ष।

इनकी रिकॉर्ड आयु को जोड़ दें तो लगभग 152 वर्ष होते हैं।

यह कोई वैज्ञानिक आँकड़ा नहीं, लेकिन भारतीय एथलेटिक्स के इतिहास को महसूस करने का दिलचस्प तरीका जरूर है। चार खिलाड़ियों ने चार अलग स्पर्धाओं में ऐसी सीमाएँ बनाईं जिन्हें पार करने में अगली भारतीय पीढ़ियों को कुल मिलाकर डेढ़ सदी से अधिक का इंतजार करना पड़ा।

और चारों खिलाड़ी एशियन गेम्स की भारतीय स्वर्णिम परंपरा के बड़े नाम थे।

अब सबसे दिलचस्प सवाल विथ्या रामराज की 54.75 को लेकर है

पीटी उषा की 55.42 की कहानी समाप्त हो चुकी है। अब भारतीय रिकॉर्ड 54.75 है।

लेकिन असली परीक्षा यह नहीं होगी कि विथ्या का रिकॉर्ड कितने वर्ष चलता है।

असली परीक्षा ठीक उलटी होगी।

यदि कोई दूसरी भारतीय धाविका इसे पाँच-सात वर्ष में तोड़ देती है तो वह विथ्या की उपलब्धि को छोटा नहीं करेगी, बल्कि भारतीय महिला एथलेटिक्स की प्रगति का प्रमाण होगी।

यही बात नीरज चोपड़ा के रिकॉर्ड पर लागू होती है। यही लंबी कूद, 800 मीटर और दूसरे खेलों पर।

महान खिलाड़ी की विरासत केवल यह नहीं कि उसका रिकॉर्ड 40 वर्ष तक कोई न तोड़ पाए। उससे भी बड़ी विरासत यह है कि उसके बाद आने वाली पीढ़ी उस सीमा को सामान्य बना दे और फिर उससे आगे निकल जाए।

मिल्खा सिंह ने भारतीयों को बताया कि 46 सेकंड के भीतर 400 मीटर दौड़ना संभव है। श्रीराम सिंह ने दिखाया कि भारतीय 800 मीटर धावक विश्व के सर्वश्रेष्ठ लोगों के साथ दौड़ सकता है। टीसी योहानन ने 1974 में आठ मीटर की दीवार तोड़ी। पीटी उषा ने 1984 में भारतीय महिला एथलेटिक्स को उस स्तर तक पहुँचा दिया जहाँ अगली पीढ़ी को पहुँचने में चार दशक लग गए।

और 2026 में विथ्या रामराज ने उस कहानी में नई पंक्ति जोड़ दी।

रिकॉर्ड अब 55.42 नहीं है। वह 54.75 है।

भारतीय एथलेटिक्स के लिए सबसे सुखद भविष्य वह नहीं होगा जिसमें 2068 में कोई धाविका विथ्या का 42 वर्ष पुराना रिकॉर्ड तोड़े। सबसे सुखद भविष्य वह होगा जिसमें 54.75 बहुत जल्दी इतिहास बन जाए, फिर 54 सेकंड टूटे और उसके बाद भारतीय धाविकाएँ उस स्तर पर नियमित रूप से पहुँचें जहाँ पुराने महान रिकॉर्ड दशकों तक इसलिए न टिकें क्योंकि हर नई पीढ़ी पिछली पीढ़ी से तेज, ऊँची और आगे जा रही हो।

यही रिकॉर्ड टूटने का असली अर्थ है। पुराना महान खिलाड़ी छोटा नहीं होता, खेल बड़ा हो जाता है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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