Asian Games History: 5 दौड़, 5 पदक, 4 स्वर्ण! पीटी उषा ने जो किया, भारत 40 साल बाद भी नहीं दोहरा सका

Asian Games History: 1986 सियोल एशियाड में पीटी उषा ने 5 स्पर्धाओं में 5 पदक जीते। 100 मीटर में रजत और 200, 400, 400 मीटर हर्डल व 4×400 मीटर रिले में स्वर्ण जीतने की पूरी कहानी जानिए।

Yogesh Mishra
Published on: 5 Oct 2026 8:17 PM IST
Asian Games History in Hindi | Asian Games 2026 Latest Hindi News | Newstrack Hindi News
X

Asian Games History in Hindi | Asian Games 2026 Latest Hindi News | Newstrack Hindi News 

Asian Games History in Hindi: एक खिलाड़ी, पाँच स्पर्धाएँ, हर स्पर्धा में पदक, चार स्वर्ण और एक रजत। आज जब एथलेटिक्स में विशेषज्ञता इतनी बढ़ चुकी है कि 100 मीटर का धावक 400 मीटर में उतरने से पहले कई बार सोचता है। 400 मीटर की खिलाड़ी बाधा दौड़ नहीं दौड़ती और व्यक्तिगत स्पर्धाओं के बीच रिले के लिए शरीर को बचाना भी रणनीति का हिस्सा होता है। तब 1986 सियोल एशियन गेम्स में पीटी उषा ने जो किया था वह लगभग अविश्वसनीय दिखाई देता है। उन्होंने 100 मीटर दौड़ी, 200 मीटर दौड़ी, 400 मीटर दौड़ी, 400 मीटर बाधा दौड़ में उतरीं और फिर 4×400 मीटर रिले में भारतीय टीम का हिस्सा बनीं। पाँचों में पदक। 100 मीटर में रजत, बाकी चार में स्वर्ण। इनमें व्यक्तिगत स्वर्ण केवल अलग-अलग दूरी के नहीं थे। बल्कि दो बिल्कुल अलग प्रकार की दौड़ों—सपाट दौड़ और बाधा दौड़—में आए थे। यही कारण है कि लगभग चार दशक बाद भी भारतीय एथलेटिक्स में सवाल बना हुआ है—क्या कोई भारतीय फिर कभी एक ही एशियाड में पीटी उषा जैसा प्रदर्शन कर पाएगा?

इस सवाल का उत्तर खोजने के लिए केवल उनके चार स्वर्ण गिनना पर्याप्त नहीं है। सियोल की पाँचों दौड़ों को अलग-अलग देखना होगा। क्योंकि उनमें एक हार थी। तीन अलग व्यक्तिगत विजय थीं। एक टीम विजय थी। शरीर पर असाधारण दबाव था और इसके पीछे 1984 लॉस एंजिलिस ओलंपिक की वह पीड़ा भी थी, जहाँ उषा 400 मीटर बाधा दौड़ में कांस्य पदक केवल एक सौवें सेकंड से चूक गई थीं।

दो वर्ष पहले ओलंपिक पदक 0.01 सेकंड से छूटा था, सियोल पहुँची उषा केवल एशियाई चैंपियन नहीं

1986 की कहानी वास्तव में 1984 से शुरू होती है।

लॉस एंजिलिस ओलंपिक में महिलाओं की 400 मीटर बाधा दौड़ पहली बार ओलंपिक कार्यक्रम में शामिल हुई थी। पीटी उषा फाइनल तक पहुँचीं। उस समय किसी भारतीय महिला ट्रैक एथलीट का ओलंपिक फाइनल तक पहुँचना ही असाधारण था। फाइनल में मोरक्को की नवाल एल मुतवाकेल ने स्वर्ण जीता। अमेरिका की जूडी ब्राउन रजत पर रहीं। कांस्य के लिए रोमानिया की क्रिस्टीना कोजोकारू और उषा लगभग साथ पहुँचीं।

कोजोकारू—55.41 सेकंड।

उषा—55.42 सेकंड।

अंतर—0.01 सेकंड।

सिर्फ एक सौवाँ सेकंड।

भारतीय एथलेटिक्स के इतिहास में शायद ही कोई समय इतना प्रसिद्ध हुआ हो।

55.42 सेकंड का वह समय भारतीय राष्ट्रीय रिकॉर्ड बन गया। यह रिकॉर्ड इतना मजबूत था कि 39 वर्ष बाद 2023 हांगझोऊ एशियाड में विथ्या रामराज ने पहले उसकी बराबरी की और 2026 आइची-नागोया एशियाड में 54.75 सेकंड दौड़कर आखिरकार उसे तोड़ा।

इसलिए 1986 सियोल में उतरने वाली उषा केवल एशिया की तेज धाविका नहीं थीं। वह ऐसी खिलाड़ी थीं जो दो वर्ष पहले दुनिया के सबसे बड़े मंच पर ओलंपिक पदक से एक पलक झपकने से भी कम समय से चूकी थीं।और उनकी उम्र तब केवल 22 वर्ष थी।

लेकिन सियोल की कहानी स्वर्ण से नहीं, हार से शुरू हुई

यही 1986 की कहानी को और रोचक बनाता है। उषा ने सियोल में हर दौड़ नहीं जीती। उनकी पाँच पदकों वाली यात्रा में एक हार थी और वह 100 मीटर में आई।

फिलीपींस की लिडिया डी वेगा उस समय एशिया की सबसे तेज महिला धावकों में थीं। 1982 दिल्ली एशियाड में भी उन्होंने 100 मीटर स्वर्ण जीता था और उषा को रजत मिला था। चार वर्ष बाद सियोल में फिर दोनों आमने-सामने थीं।यानी यह केवल 100 मीटर फाइनल नहीं था। यह एशिया की दो सबसे बड़ी महिला स्प्रिंट सितारों का पुनर्मुकाबला था।डी वेगा ने फिर बाजी मारी। उन्होंने लगभग 11.53 सेकंड में स्वर्ण जीता। पीटी उषा लगभग 11.67 सेकंड में रजत पर रहीं।चार वर्ष बाद भी 100 मीटर का ताज फिलीपींस की धाविका के पास रहा।और यही सियोल में उषा की एकमात्र हार साबित हुई।

100 मीटर की हार के बाद जो हुआ, उसने उषा को महान से ऐतिहासिक बनाया

किसी खिलाड़ी के लिए एक बड़ी प्रतियोगिता में पहला महत्वपूर्ण फाइनल हार जाना मानसिक रूप से भारी हो सकता है। विशेष रूप से तब जब सामने वही प्रतिद्वंद्वी हो जिसने चार वर्ष पहले भी आपको हराया हो।लेकिन उषा का एशियाड यहीं से बदल गया। 100 मीटर में रजत के बाद उन्होंने अगली व्यक्तिगत स्पर्धाओं में हार नहीं देखी।

200 मीटर—स्वर्ण।

400 मीटर—स्वर्ण।

400 मीटर बाधा—स्वर्ण।

फिर 4×400 मीटर रिले—स्वर्ण।

अर्थात सियोल में उनकी कहानी पराजय से शुरू होकर लगातार चार स्वर्ण तक पहुँची।

यह मनोवैज्ञानिक पहलू उनके प्रदर्शन को केवल आंकड़ों से बड़ा बनाता है।

200 मीटर, जहाँ उषा ने डी वेगा से 100 मीटर की हार का जवाब दिया

100 मीटर में लिडिया डी वेगा ने उषा को हराया था। लेकिन 200 मीटर अलग दौड़ थी। यहाँ केवल विस्फोटक शुरुआत पर्याप्त नहीं होती। शुरुआती मोड़, गति का नियंत्रण, सीधी पट्टी में शरीर की स्थिति और अंतिम 50 मीटर तक गति बनाए रखने की क्षमता निर्णायक होती है। और यह उषा के लिए अधिक अनुकूल था। सियोल में उन्होंने 23.44 सेकंड में 200 मीटर स्वर्ण जीता। यह प्रदर्शन उस समय एशियन गेम्स रिकॉर्ड के रूप में दर्ज हुआ। 100 मीटर की विजेता डी वेगा 200 मीटर में उषा से आगे नहीं निकल सकीं। इस दौड़ का महत्व इसलिए भी था कि उसने सियोल की कहानी बदल दी। यदि 100 मीटर के बाद धारणा बनी कि डी वेगा अभी भी एशिया की स्प्रिंट क्वीन हैं तो 200 मीटर ने बता दिया कि उषा का दायरा कहीं बड़ा है।वह केवल छोटी दूरी की स्प्रिंटर नहीं थीं। उनकी असली ताकत गति को लंबी दूरी तक बनाए रखने में थी।

400 मीटर, वह दूरी जहाँ उषा का शरीर और प्रशिक्षण सबसे अधिक अनुकूल दिखा

100 मीटर में विस्फोट चाहिए।

200 मीटर में विस्फोट और गति-सहनशीलता दोनों।

लेकिन 400 मीटर अलग यातना है।

एक पूरा चक्कर लगभग अधिकतम गति के आसपास दौड़ना पड़ता है। अंतिम 100 मीटर में शरीर लैक्टिक अम्ल, थकान और ऑक्सीजन की मांग से लड़ता है। अच्छे 400 मीटर धावक की असली परीक्षा अक्सर आखिरी मोड़ से निकलने के बाद होती है।

यहीं उषा असाधारण थीं।सियोल में उन्होंने महिलाओं की 400 मीटर दौड़ लगभग 52.16 सेकंड में जीतकर स्वर्ण हासिल किया।यह भी एशियाड रिकॉर्ड था।अब उनके पास 200 और 400 मीटर दोनों का स्वर्ण था।लेकिन इससे भी बड़ी बात आगे थी।400 मीटर जीतने वाली यही खिलाड़ी कुछ ही समय बाद उसी दूरी को दस बाधाओं के साथ दौड़ने वाली थी।आज की अत्यधिक विशेषज्ञ एथलेटिक्स व्यवस्था में यही बात सबसे असाधारण लगती है।

400 मीटर बाधा, वह स्पर्धा जिसने उषा को दो साल पहले रुलाया

यदि सियोल 1986 में उषा के लिए कोई एक दौड़ सबसे भावनात्मक रही होगी तो वह 400 मीटर बाधा दौड़ रही होगी।यही वह स्पर्धा थी जिसमें 1984 लॉस एंजिलिस में ओलंपिक कांस्य 0.01 सेकंड से छूटा था।भारत में वर्षों तक उस एक सौवें सेकंड की चर्चा होती रही। लेकिन ओलंपिक की वह हार एक और तथ्य छिपा देती है—उषा उस समय दुनिया की सर्वश्रेष्ठ 400 मीटर बाधा धाविकाओं में शामिल थीं।

एशिया में उनकी स्थिति और मजबूत थी।सियोल में उन्होंने लगभग 56.08 सेकंड में 400 मीटर बाधा दौड़ जीती।

स्वर्ण।

और एशियाड रिकॉर्ड।इस तरह उनके तीन व्यक्तिगत स्वर्ण तीन अलग क्षमताओं में आए—

200 मीटर की गति,

400 मीटर की गति-सहनशीलता,

और 400 मीटर बाधा की गति, लय और तकनीक।

यही 1986 को साधारण बहु-पदक प्रदर्शन से अलग करता है।

फिर रिले, जहाँ पीटी उषा अकेली नहीं

चार स्वर्ण की गिनती में एक महत्वपूर्ण बात अक्सर छूट जाती है।4×400 मीटर रिले का स्वर्ण केवल पीटी उषा का नहीं था।वह भारतीय टीम का स्वर्ण था।रिले में व्यक्तिगत महानता तभी पदक बनती है जब चारों धावक अपना काम करें। भारत की महिला 4×400 मीटर टीम ने सियोल में स्वर्ण जीतकर उषा के व्यक्तिगत अभियान को टीम सफलता में बदल दिया।भारत ने लगभग 3 मिनट 34.58 सेकंड के एशियाड रिकॉर्ड समय में यह स्वर्ण जीता। यानी उषा ने सियोल में जिस दूरी पर व्यक्तिगत 400 मीटर स्वर्ण जीता था, उसी दूरी की रिले में भी भारत को शीर्ष पर पहुँचाने में भूमिका निभाई।

अब गणना पूरी थी।100 मीटर—रजत।200 मीटर—स्वर्ण।400 मीटर—स्वर्ण।

400 मीटर बाधा—स्वर्ण।4×400 मीटर रिले—स्वर्ण।

पाँच स्पर्धाएँ, पाँच पदक, चार स्वर्ण, एक रजत पदक

पाँच दौड़ें वास्तव में कितनी कठिन थीं, इसे आज की एथलेटिक्स से समझिए

आज यदि कोई भारतीय खिलाड़ी 100 मीटर का शीर्ष धावक है तो वह सामान्यतः 100 और 200 मीटर पर केंद्रित रहेगा।400 मीटर खिलाड़ी 400 और 4×400 रिले में उतर सकता है। 400 मीटर बाधा खिलाड़ी बाधा दौड़ और कभी-कभी रिले में शामिल हो सकता है।

लेकिन एक ही खिलाड़ी का—

100 मीटर,

200 मीटर,

400 मीटर,

400 मीटर बाधा,

और 4×400 मीटर रिले—

इन सभी में एशियाई पदक स्तर पर उतरना अत्यंत कठिन है।कारण केवल थकान नहीं है।इन स्पर्धाओं की जैव-यांत्रिकी और ऊर्जा आवश्यकताएँ अलग हैं।100 मीटर में लगभग शुद्ध विस्फोटक गति चाहिए।200 में मोड़ और गति-सहनशीलता जुड़ती है।

400 मीटर में शरीर को लगभग पूर्ण गति पर लंबे समय तक टिकाना पड़ता है।400 मीटर बाधा में यही शारीरिक यातना दस बाधाओं की लय और तकनीक के साथ आती है।रिले में फिर एक और उच्च तीव्रता वाला 400 मीटर दौड़ना पड़ता है। आज का खेल विज्ञान सामान्यतः खिलाड़ी को उस क्षेत्र में अधिक विशेषज्ञ बनाता है जहाँ उसके पदक की संभावना अधिकतम हो।उषा का 1986 प्रदर्शन उस युग का था जब असाधारण बहुमुखी प्रतिभा को एक ही प्रतियोगिता में कई दिशाओं में इस्तेमाल किया जा सकता था।

केवल पाँच फाइनल नहीं, उनके पीछे हीट और क्वालिफिकेशन भी

चार स्वर्ण और एक रजत देखकर ऐसा लग सकता है कि उषा ने पाँच दौड़ें दौड़ीं।वास्तविक प्रतियोगिता का शारीरिक भार इससे अधिक था।स्प्रिंट स्पर्धाओं में फाइनल तक पहुँचने के लिए शुरुआती दौर और सेमीफाइनल हो सकते हैं। अलग-अलग स्पर्धाओं के बीच शरीर को रिकवरी चाहिए। वार्म-अप, कूल-डाउन, उपचार, भोजन, नींद और अगले मुकाबले की तैयारी लगातार चलती है।एक एथलीट का शरीर केवल फाइनल के 11, 23, 52 या 56 सेकंड में काम नहीं करता।वह प्रतियोगिता के पूरे सप्ताह काम करता है।यही कारण है कि बहु-स्पर्धा पदक अभियान में असली चुनौती केवल गति नहीं, रिकवरी भी होती है।और 1986 की खेल चिकित्सा, पोषण, पुनर्वास और निगरानी व्यवस्था आज जितनी विकसित नहीं थी। इस संदर्भ में उषा की उपलब्धि और बड़ी दिखाई देती है।

इसके पीछे एक और व्यक्ति था, ओ.एम. नांबियार

पीटी उषा की कहानी उनके प्रशिक्षक ओ.एम. नांबियार के बिना पूरी नहीं हो सकती।

केरल के पय्योली से निकली दुबली-पतली लड़की को अंतरराष्ट्रीय एथलीट बनाने में नांबियार की भूमिका केंद्रीय थी।उस दौर में भारत के पास आज जैसी राष्ट्रीय उच्च प्रदर्शन व्यवस्था, वैज्ञानिक प्रशिक्षण केंद्र, पोषण विशेषज्ञों की बड़ी टीम, जैव-यांत्रिक विश्लेषण, अंतरराष्ट्रीय स्तर की पुनर्वास व्यवस्था और आधुनिक प्रदर्शन आंकड़े नहीं थे।प्रशिक्षक और खिलाड़ी का रिश्ता इसलिए कहीं अधिक व्यापक था।नांबियार ने उषा की प्राकृतिक गति को केवल छोटी दूरी तक सीमित नहीं रखा। धीरे-धीरे उन्हें लंबी स्प्रिंट और 400 मीटर बाधा की ओर ले जाया गया।

और वही निर्णय उषा के करियर का सबसे बड़ा मोड़ बना।100 मीटर में वह एशिया की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में थीं।400 मीटर बाधा में वह दुनिया की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में पहुँच गईं।

1986 में उषा वास्तव में कितनी बड़ी थीं, यह भारत की कुल पदक संख्या से समझिए

सियोल एशियाड में भारत का प्रदर्शन आज के मुकाबले बहुत छोटा था।भारत ने कुल मिलाकर केवल पाँच स्वर्ण पदक जीते।उनमें से चार स्वर्ण अकेले पीटी उषा से जुड़े थे।यानी भारत के 80 प्रतिशत स्वर्ण पदकों में एक ही खिलाड़ी का नाम था। इसके अतिरिक्त उनका 100 मीटर रजत भी था।

आज भारत 100 से अधिक एशियाड पदक जीतने की क्षमता तक पहुँच चुका है, इसलिए किसी एक खिलाड़ी का राष्ट्रीय पदक तालिका पर इतना बड़ा प्रभाव लगभग असंभव दिखाई देता है।लेकिन 1986 में पीटी उषा भारतीय दल के भीतर लगभग स्वयं एक पदक अभियान थीं।

एक दिलचस्प विरोधाभास, एशियाड की महानतम भारतीय खिलाड़ियों में एक के पास ओलंपिक पदक नहीं

उषा की कहानी में एक विडंबना है।आज महान भारतीय खिलाड़ियों का मूल्यांकन करते समय ओलंपिक पदक सबसे बड़ा पैमाना माना जाता है।पीटी उषा के पास ओलंपिक पदक नहीं है।

लेकिन वह ओलंपिक पदक से 0.01 सेकंड दूर थीं।और एशियाड में उनका रिकॉर्ड ऐसा है जिसे बाद की भारतीय पीढ़ियाँ अभी तक नहीं दोहरा सकीं।यही कारण है कि केवल पदक संख्या किसी खिलाड़ी की महानता का पूरा वर्णन नहीं करती।यदि 1984 में उषा 0.02 सेकंड तेज दौड़ जातीं तो भारतीय खेल इतिहास में उनके नाम के आगे ‘ओलंपिक पदक विजेता’ लिखा होता।लेकिन वह एक सौवाँ सेकंड उनकी वास्तविक क्षमता को कम नहीं करता।

सियोल 1986 उसका प्रमाण है।

क्या आज कोई भारतीय चार स्वर्ण जीत सकता

सैद्धांतिक रूप से—हाँ।व्यावहारिक रूप से—बहुत कठिन। इसके कई कारण हैं।

पहला, एशियाई एथलेटिक्स का स्तर 1986 की तुलना में बहुत व्यापक हो चुका है। चीन, जापान, बहरीन, कतर, कजाखस्तान, उज्बेकिस्तान और दूसरे देशों में विश्व स्तर के खिलाड़ी हैं।

दूसरा, विशेषज्ञता बढ़ी है।

तीसरा, प्रतियोगिता कार्यक्रम खिलाड़ी को कई स्पर्धाओं में उतारने के बजाय मुख्य स्पर्धा बचाने की रणनीति को प्रोत्साहित करता है।

चौथा, आज किसी खिलाड़ी का ओलंपिक और विश्व चैंपियनशिप कार्यक्रम भी ध्यान में रखा जाता है।

और पाँचवाँ, 100 से 400 मीटर बाधा तक उषा जैसा स्वाभाविक विस्तार अत्यंत दुर्लभ है।

लेकिन असंभव क्यों नहीं

क्योंकि आधुनिक एशियाड में ऐसे उदाहरण अब भी मिलते हैं जहाँ एक खिलाड़ी कई स्वर्ण जीतता है।तैराकी में एक खिलाड़ी के पास कई व्यक्तिगत और रिले स्पर्धाएँ होती हैं। निशानेबाजी में व्यक्तिगत, टीम और मिश्रित स्पर्धाओं से अवसर बढ़ते हैं।तीरंदाजी में व्यक्तिगत, टीम और मिश्रित टीम पदक संभव हैं। जिम्नास्टिक्स में एक खिलाड़ी कई उपकरणों पर पदक जीत सकता है।इसीलिए जापान की रिकाको इकी 2018 में छह स्वर्ण जीत सकीं और चीन के झांग झानशुओ 2026 में सात स्वर्ण तक पहुँचे।इस अर्थ में कोई भारतीय भविष्य में चार या पाँच एशियाड स्वर्ण जीत सकता है।

लेकिन एथलेटिक्स में उषा जैसा करना अलग प्रश्न है।

पदकों की संख्या दोहराई जा सकती है, उषा का तरीका दोहराना अधिक कठिन है

मान लीजिए कोई भारतीय निशानेबाज एक एशियाड में व्यक्तिगत, टीम और मिश्रित टीम सहित चार स्वर्ण जीतता है।संख्या में वह उषा के बराबर होगा।कोई तीरंदाज व्यक्तिगत, टीम और मिश्रित स्पर्धा में तीन स्वर्ण जीत सकता है और अतिरिक्त किसी नई स्पर्धा से चौथा अवसर बन सकता है।कोई तैराक अनेक दूरी और रिले में चार से अधिक स्वर्ण जीत सकता है। लेकिन उषा की विशिष्टता यह है कि उन्होंने एथलेटिक्स में चार स्वर्ण जीते और तीन व्यक्तिगत स्वर्ण अलग-अलग शारीरिक तथा तकनीकी मांग वाली स्पर्धाओं में आए।

यही कारण है कि भविष्य में कोई भारतीय ‘चार स्वर्ण’ का आंकड़ा बराबर कर सकता है, लेकिन 100 मीटर से 400 मीटर बाधा तक पाँच पदक वाला उषा मॉडल दोहराना कहीं कठिन होगा।

2026 में विथ्या रामराज ने उषा का 42 वर्ष पुराना रिकॉर्ड तोड़ा, लेकिन इससे उषा छोटी नहीं हुईं

खेल की खूबसूरती यही है कि रिकॉर्ड टूटते हैं।1984 में उषा ने 400 मीटर बाधा में 55.42 सेकंड का भारतीय रिकॉर्ड बनाया था।2023 हांगझोऊ में विथ्या रामराज ने 55.42 दौड़कर उसकी बराबरी की।फिर 2026 आइची-नागोया में उन्होंने 54.75 सेकंड दौड़कर उसे तोड़ दिया।

42 वर्ष बाद।

भारत की पहली महिला 55 सेकंड से नीचे पहुँची।यह उषा की विरासत का अंत नहीं था।यह उसका विस्तार था। यदि किसी राष्ट्रीय रिकॉर्ड को तोड़ने में 42 वर्ष लगते हैं तो वह बताता है कि रिकॉर्ड बनाने वाली खिलाड़ी अपने समय से कितनी आगे थी।और यदि अगली पीढ़ी उसे तोड़ती है तो वह बताता है कि खेल आखिरकार आगे बढ़ रहा है।

शायद अगली पीटी उषा कोई “दूसरी पीटी उषा” होगी ही नहीं

यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है—भारत को अगली पीटी उषा कब मिलेगी?शायद प्रश्न ही गलत है। अगली महान भारतीय महिला एथलीट को उषा जैसा बनने की आवश्यकता नहीं। वह 100 और 200 मीटर की धाविका हो सकती है।वह केवल 400 मीटर बाधा दौड़ सकती है।वह लंबी कूद में विश्व चैंपियन बन सकती है। वह किसी एक स्पर्धा में ओलंपिक स्वर्ण जीत सकती है।आज विशेषज्ञता के युग में महानता का स्वरूप बदल गया है।लेकिन उषा का 1986 प्रदर्शन इसलिए विशेष रहेगा क्योंकि वह उस समय का प्रतिनिधित्व करता है जब एक असाधारण खिलाड़ी लगभग पूरे स्प्रिंट कार्यक्रम को अपने कंधे पर उठा सकती थी।

पाँच दौड़ों को एक पंक्ति में लिख देना इसलिए इतिहास को छोटा करना है

100 मीटर का रजत केवल रजत नहीं था—वह लिडिया डी वेगा से लगातार दूसरी एशियाड हार थी। 200 मीटर का स्वर्ण केवल स्वर्ण नहीं था—वह उसी प्रतिद्वंद्विता का जवाब था।400 मीटर का स्वर्ण केवल तीसरा पदक नहीं था—वह उषा की असाधारण गति-सहनशीलता का प्रमाण था।400 मीटर बाधा का स्वर्ण केवल चौथा पदक नहीं था—उसके पीछे लॉस एंजिलिस का वह 0.01 सेकंड खड़ा था।और 4×400 मीटर रिले केवल उषा का चौथा स्वर्ण नहीं था—वह व्यक्तिगत महानता का भारतीय टीम की सामूहिक जीत में बदलना था।

इसीलिए 1986 सियोल को “चार स्वर्ण और एक रजत” लिख देना तथ्य तो है, लेकिन पूरी कहानी नहीं।

पूरी कहानी है—एक 22 वर्षीय भारतीय महिला एथलीट एशिया के सबसे बड़े खेल आयोजन में पाँच अलग चुनौतियों में उतरी।

पहली बड़ी लड़ाई में हारी।

फिर अगली चार स्वर्ण में बदल दीं।

और जब सियोल एशियाड समाप्त हुआ तो भारत के कुल पाँच स्वर्ण पदकों में चार पर पीटी उषा का नाम था।

क्या कोई भारतीय फिर वैसा कर पाएगा?

संख्या की दृष्टि से इसका उत्तर है—संभव है।

भारत की खेल शक्ति बढ़ रही है। तीरंदाजी, निशानेबाजी, तैराकी जैसे बहु-पदक खेल भविष्य में किसी भारतीय खिलाड़ी को एक ही एशियाड में चार या उससे अधिक स्वर्ण जीतने का अवसर दे सकते हैं।लेकिन यदि सवाल यह है कि क्या कोई भारतीय एथलीट फिर एक ही एशियाड में 100 मीटर, 200 मीटर, 400 मीटर, 400 मीटर बाधा और 4×400 मीटर रिले जैसी पाँच स्पर्धाओं में उतरेगा, हर स्पर्धा में पदक जीतेगा और चार स्वर्ण लेकर लौटेगा—तो यह संभावना बहुत छोटी दिखाई देती है।और यही पीटी उषा के 1986 सियोल एशियाड की वास्तविक महानता है।

उनका रिकॉर्ड केवल पदकों का रिकॉर्ड नहीं है।

वह बहुमुखी प्रतिभा का रिकॉर्ड है।

वह सहनशक्ति का रिकॉर्ड है।

वह एक हार के बाद लगातार जीतने का रिकॉर्ड है।

वह उस भारतीय महिला का रिकॉर्ड है जो ओलंपिक कांस्य से एक सौवें सेकंड से चूकने के दो वर्ष बाद एशिया पहुँची और पाँच स्पर्धाओं में पाँच पदक लेकर लौटी।

रिकॉर्ड टूटते हैं।

विथ्या रामराज ने उषा का 42 वर्ष पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़कर यह साबित भी कर दिया।एक दिन कोई भारतीय एक एशियाड में चार से अधिक स्वर्ण भी जीत सकता है।

लेकिन कुछ उपलब्धियाँ केवल इसलिए महान नहीं रहतीं कि उनका आंकड़ा नहीं टूटा।

वे इसलिए महान रहती हैं क्योंकि जिस तरह वे हासिल हुई थीं, वैसा दोबारा होना लगभग असंभव हो जाता है।

सियोल 1986 में पीटी उषा ने ठीक ऐसा ही किया था।

Yogesh Mishra
ABOUT THE AUTHOR

Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

Next Story