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Shyok River Road: ‘मौत की नदी’ के किनारे बनेगी 150 KM सड़क, लद्दाख में भारत की बड़ी तैयारी
Shyok River Road की करीब 150 KM योजना पर DPR प्रक्रिया शुरू हो गई है। जानें श्योक नदी, DBO और लद्दाख की इस रणनीतिक सड़क का पूरा प्लान।
Shyok River Road: 150 KM Road Planned Along ‘River of Death’ to Boost DBO Connectivity
Shyok River Road: लद्दाख की बर्फीली और खामोश वादियों में बहने वाली श्योक नदी सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि सदियों पुराने अनबुझ किस्सों और कहानियों का केंद्र भी रही है। अब तक जाने कितनी पीढ़ियां इसके आस पास बसी और विदा हो गईं। अब इसी नदी के पूर्वी किनारे पर करीब 150 किलोमीटर लंबी नई सड़क की योजना मूर्त रूप लेने जा रही है। यह सड़क दौलत बेग ओल्डी (DBO) की दिशा में संपर्क को और मजबूत कर सकती है। खास बात यह है कि जिस नदी को कभी इसके खतरनाक स्वभाव के कारण ‘रिवर ऑफ डेथ’ यानी मौत की नदी कहा गया, आज उसी के किनारे आधुनिक सड़क नेटवर्क तैयार करने की तैयारी हो रही है।
श्योक नदी के किनारे 150 किमी सड़क की क्या है योजना?
सीमा सड़क संगठन यानी BRO ने श्योक नदी के पूर्वी तट के साथ करीब 150 किलोमीटर लंबी सड़क के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार कराने की प्रक्रिया शुरू की है। रक्षा मंत्रालय के आधिकारिक ई-प्रोक्योरमेंट रिकॉर्ड में इस काम को D-S-DBO रोड से जोड़ा गया है और इसे पांच पैकेज यानी Package I से V में बांटा गया है। सड़क को नई NHDL यानी National Highway Double Lane विनिर्देशों के अनुसार तैयार करने की योजना है। फिलहाल उपलब्ध सरकारी दस्तावेज 150 किलोमीटर सड़क के निर्माण का पूरा काम शुरू होने की बजाय DPR तैयार कराने की प्रक्रिया की पुष्टि की गई हैं। 30 सितंबर 2026 को BRO की ओर से इसी DPR के लिए दोबारा टेंडर भी जारी किया गया है। यानी अभी परियोजना की विस्तृत इंजीनियरिंग, सर्वे और व्यवहार्यता से जुड़े पहलुओं को अंतिम रूप दिया जाना बाकी है।
क्यों मुश्किल है श्योक नदी के किनारे सड़क बनाना?
श्योक नदी जिस इलाके से गुजरती है, वह सामान्य सड़क परियोजना के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है। यहां ऊंचाई बहुत ज्यादा है, सर्दियों में तापमान बेहद नीचे चला जाता है और गर्मियों में ग्लेशियरों तथा बर्फ के पिघलने से नदी का बहाव बदल सकता है। नदी अपने साथ बड़ी मात्रा में पत्थर और मलबा भी बहाती है। सरकारी भूजल सर्वेक्षण दस्तावेजों में श्योक घाटी को ऊबड़-खाबड़ पर्वतीय भूभाग वाला क्षेत्र बताया गया है, जहां नदी के बाढ़ मैदानों में बड़े पत्थरों से लेकर महीन रेत तक मिलती है। ऐसे इलाके में सड़क सिर्फ पहाड़ काटकर बना देना पर्याप्त नहीं होता। पुल, कलवर्ट, ड्रेनेज, रिटेनिंग वॉल और नदी के बदलते प्रवाह को ध्यान में रखकर डिजाइन तैयार करना पड़ता है। यही वजह है कि DPR में इन इंजीनियरिंग चुनौतियों का विस्तृत अध्ययन महत्वपूर्ण होगा।
श्योक नदी का नाम इतना रहस्यमयी क्यों है?
श्योक नदी को लेकर सबसे दिलचस्प बात इसका नाम है। इसे अक्सर ‘River of Death’ यानी ‘मौत की नदी’ के नाम से जोड़ा जाता है। इसकी वजह नदी का खतरनाक और तेजी से बदलने वाला स्वभाव तथा पुराने समय में इसके आसपास से गुजरने वाले कारवां बताए जाते हैं।
लेकिन नाम की उत्पत्ति को लेकर एक मत नहीं है। शोधकर्ताओं ने इसके अलग-अलग अर्थ बताए हैं। 1977 में फ्रेडरिक ए. पीटर ने ‘Shyok’ को तिब्बती नाम Shayog से जोड़ते हुए इसका अर्थ ‘बजरी फैलाने वाली’ बताया था। नाम के पीछे के वजह नदी की बाढ़ के दौरान बड़े पैमाने पर बजरी और मलबा जमा करने की प्रकृति से जुड़ी है। वहीं पर्वतारोही और लेखक हरिश कपाड़िया ने 1992 में एक अलग व्याख्या दी थी। उन्होंने ऊपरी श्योक घाटी के कई नामों को मध्य एशिया के यारकंदी व्यापारियों की भाषा से जोड़ते हुए ‘River of Death’ वाली व्याख्या सामने रखी।
पुराने कारवां मार्ग से जुड़ा है श्योक का इतिहास
आधुनिक सड़कों से पहले लद्दाख और मध्य एशिया के बीच व्यापारिक आवाजाही के लिए कठिन पर्वतीय रास्तों और नदी घाटियों का इस्तेमाल होता था। श्योक घाटी भी इस पुराने संपर्क क्षेत्र का हिस्सा रही है।
सदियों पहले व्यापारी और उनके पशु इस दुर्गम क्षेत्र से गुजरते थे। नदी को कई जगह पार करना पड़ता था और मौसम खराब होने पर जोखिम और बढ़ जाता था। यही वजह है कि श्योक को लेकर खतरनाक नदी और मौत से जुड़ी कहानियां समय के साथ लोकप्रिय हुईं।
श्योक नदी कहां से निकलती है और कहां जाती है?
श्योक नदी का उद्गम पूर्वी काराकोरम के रिमो ग्लेशियर क्षेत्र से होता है। इसके बाद यह उत्तरी लद्दाख के दुर्गम इलाकों से गुजरती है और आगे चलकर सिंधु नदी तंत्र का हिस्सा बनती है। इसकी प्रमुख सहायक नदियों में नुब्रा, गैलवान और चांग चेनमो जैसी नदियां शामिल हैं। नुब्रा नदी का भी इस पूरे भूगोल में खास महत्व है। यह सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र से निकलकर श्योक में मिलती है और दोनों नदियों का संगम नुब्रा घाटी के भूगोल को आकार देता है।
DBO के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह इलाका?
दौलत बेग ओल्डी पूर्वी लद्दाख के बेहद ऊंचाई वाले और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में स्थित है। यहां से डेपसांग मैदान और काराकोरम क्षेत्र तक पहुंच जुड़ी हुई है। इसलिए इस इलाके में सड़क संपर्क का महत्व सिर्फ स्थानीय आवाजाही तक सीमित नहीं है।
पहले से मौजूद दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी (DS-DBO) सड़क ने इस क्षेत्र में पहुंच और लॉजिस्टिक क्षमता को बढ़ाया है। श्योक के पूर्वी किनारे प्रस्तावित नया मार्ग तैयार होने पर मौजूदा नेटवर्क को अतिरिक्त संपर्क और संभावित वैकल्पिक मार्ग मिल सकता है।
BRO के तकनीकी दस्तावेजों में भी DS-DBO मार्ग पर श्योक नदी के ऊपर अत्यधिक ऊंचाई पर पुल निर्माण की चुनौतियों का विवरण दिया गया है। एक तकनीकी अध्ययन में करीब 14,500 फीट की ऊंचाई पर श्योक नदी पर माइक्रोपाइल फाउंडेशन वाले पुल काजिक्र किया गया है।
लद्दाख में तेजी से बदल रहा है सड़क नेटवर्क
श्योक नदी के किनारे प्रस्तावित सड़क निर्माण लद्दाख में पिछले वर्षों में हुए बड़े सीमा सड़क निर्माण के व्यापक क्रम का हिस्सा है। BRO ने इस क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण सड़क और पुल परियोजनाओं पर काम किया है। निमू-पदम-दारचा जैसे मार्गों से लेकर नुब्रा और DBO को जोड़ने वाली परियोजनाओं तक, दुर्गम सीमावर्ती इलाकों में सालभर संपर्क बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
लद्दाख प्रशासन ने भी दिसंबर 2025 में BRO की परियोजनाओं की जानकारी देते हुए खालसर-अघम-श्योक सड़क के काम और अन्य रणनीतिक सड़क परियोजनाओं का जिक्र किया था। कभी जिस श्योक नदी को उसके उफनते पानी, बर्फीले रास्तों और खतरनाक सफर के कारण रहस्यमयी और भयावह नदी के रूप में देखा जाता था, आज उसी घाटी में इंजीनियरिंग की नई कहानी लिखी जा रही है।


