AI and Democracy: क्या लोकतंत्र का अगला बड़ा संकट AI होगी? डीपफेक, चुनाव और सत्ता का नया खतरा

AI and Democracy: कृत्रिम बुद्धिमत्ता लोकतंत्र के लिए कैसे चुनौती बन सकती है? डीपफेक, चुनावी प्रचार, व्यक्तिगत राजनीतिक संदेश, सरकारी निगरानी, नकली जनमत और AI के बढ़ते प्रभाव से जुड़े खतरों को समझिए।

Yogesh Mishra
Published on: 27 Sept 2026 5:43 PM IST
AI and Democracy: क्या लोकतंत्र का अगला बड़ा संकट AI होगी? डीपफेक, चुनाव और सत्ता का नया खतरा
X

Artificial Intelligence and Democracy: लोकतंत्र का अगला बड़ा संकट एआई यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता हो सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अपने आप लोकतंत्र के लिए खतरा है। असली खतरा तब पैदा होता है जब एआई, यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विशाल निजी डेटा, राजनीतिक ध्रुवीकरण, कमजोर संस्थाओं, अपारदर्शी डिजिटल मंचों और घटते जनविश्वास के साथ मिल जाती है।

लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। इसकी बुनियाद इस भरोसे पर टिकी है कि नागरिक को सही जानकारी मिले, वह जिस नेता को बोलते देख रहा है वह वास्तव में वही हो, सरकार नागरिक की हर गतिविधि पर नजर न रख सके, मीडिया सत्ता से सवाल पूछ सके और मतदाता अपनी इच्छा से फैसला कर सके। कृत्रिम बुद्धिमत्ता इन सभी बातों को एक साथ प्रभावित करने की क्षमता रखती है।

इसलिए ज्यादा सही बात यह है कि एआई लोकतंत्र का अकेला संकट नहीं है। वह लोकतंत्र की पहले से मौजूद कमजोरियों को कई गुना बढ़ा सकती है। झूठ पहले भी था, राजनीतिक प्रचार पहले भी था, निगरानी भी होती थी और चुनावों में मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश भी नई नहीं है। फर्क यह है कि एआई इन कामों को बहुत तेज, बहुत बड़े पैमाने पर और हर व्यक्ति के हिसाब से कर सकती है।

लोकतंत्र पहले से दबाव में है

कृत्रिम बुद्धिमत्ता ऐसे समय में तेजी से आगे बढ़ रही है जब दुनिया के कई लोकतंत्र पहले से दबाव में हैं। International IDEA की Global State of Democracy 2025 रिपोर्ट के अनुसार जिन देशों का अध्ययन किया गया, उनमें 54 प्रतिशत में पिछले पांच वर्षों की तुलना में लोकतंत्र के कम से कम एक प्रमुख क्षेत्र में गिरावट आई। 2024 में प्रतिनिधित्व से जुड़ा सूचकांक भी दो दशक से ज्यादा समय के सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच गया। न्यायपालिका की स्वतंत्रता, प्रेस की आजादी और चुनावी व्यवस्था पर भी दबाव दर्ज किया गया।

इसी दौरान इंटरनेट की स्वतंत्रता भी घट रही है। Freedom House ने 2025 में लगातार 15वें साल वैश्विक इंटरनेट स्वतंत्रता में गिरावट दर्ज की। उसकी रिपोर्ट में कहा गया कि इंटरनेट पर नियंत्रण और हस्तक्षेप बढ़ रहा है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल सरकारें किस तरह करती हैं, यह आने वाले समय में इंटरनेट की स्वतंत्रता को काफी प्रभावित करेगा। यानी एआई किसी ऐसी दुनिया में नहीं आ रही जहां लोकतांत्रिक संस्थाएं हर जगह मजबूत हों। वह ऐसी दुनिया में आ रही है जहां समाजों में ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, नागरिकों का संस्थाओं पर भरोसा कम हो रहा है और सोशल मीडिया राजनीतिक संघर्ष का बड़ा मैदान बन चुका है।

पहला खतरा, जब सच और झूठ में फर्क करना मुश्किल हो जाए

लोकतंत्र में लोगों की राय अलग-अलग हो सकती है। कोई सरकार के पक्ष में हो सकता है, कोई विरोध में। लेकिन इसके बावजूद लोकतंत्र के लिए कुछ साझा तथ्य जरूरी हैं। अगर यह ही तय करना मुश्किल हो जाए कि घटना वास्तव में हुई थी या नहीं, तो लोकतांत्रिक बहस कमजोर पड़ने लगती है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता किसी नेता की आवाज की नकल कर सकती है, किसी व्यक्ति के चेहरे को ऐसे वीडियो में लगा सकती है जिसमें वह कभी मौजूद ही नहीं था और कुछ ही समय में हजारों नकली तस्वीरें, वीडियो और लेख तैयार कर सकती है। इससे एक नई समस्या पैदा होती है। नकली सामग्री को असली मान लिया जाए, यह तो खतरा है ही। लेकिन इससे भी खतरनाक स्थिति तब बनती है जब असली सामग्री को भी नकली कहकर खारिज किया जाने लगे। मान लीजिए किसी नेता का वास्तविक वीडियो सामने आता है और वह नेता कोई आपत्तिजनक बात कहता दिखाई देता है। वह यह कह सकता है कि वीडियो एआई से बनाया गया है। उसके समर्थक भी इसे डीपफेक बताकर खारिज कर सकते हैं। इस तरह एआई केवल झूठ पैदा नहीं करती, बल्कि असली सबूत पर भी संदेह पैदा करने का रास्ता खोल सकती है। लोकतंत्र में बहस जरूरी है, लेकिन बहस के लिए कम से कम कुछ साझा तथ्य भी जरूरी हैं। अगर हर पक्ष अपनी अलग ‘सच्चाई’ बनाने लगे तो लोकतांत्रिक बहस बहुत कमजोर हो सकती है।

चुनाव से ठीक पहले का समय सबसे संवेदनशील

एआई का चुनावी खतरा पूरे चुनाव के दौरान एक जैसा नहीं होता। मतदान से ठीक पहले फैलने वाली नकली सामग्री ज्यादा नुकसान कर सकती है, क्योंकि उसे जांचने और उसका जवाब देने के लिए समय बहुत कम होता है। कल्पना कीजिए कि मतदान से एक दिन पहले किसी उम्मीदवार की आवाज में एक नकली संदेश सोशल मीडिया पर फैलता है। संदेश में वह किसी समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक बात करता दिखाई देता है। कुछ घंटों में यह लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। बाद में जांच से पता चले कि वह नकली था, लेकिन तब तक बहुत से लोग उसे देख चुके होंगे।

2023 के स्लोवाकिया चुनाव में मतदान से ठीक पहले एआई से तैयार राजनीतिक आवाज की सामग्री सामने आई थी। अमेरिका में 2024 के न्यू हैम्पशायर प्राथमिक चुनाव से पहले तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन जैसी आवाज में मतदाताओं को मतदान न करने की सलाह देने वाली स्वचालित फोन कॉल की गईं। बाद में अमेरिकी संघीय संचार आयोग ने इस मामले में कार्रवाई की। इसलिए अब चुनाव की सुरक्षा का मतलब केवल मतदाता सूची, मतदान मशीन और मतगणना की सुरक्षा नहीं रह गया है। मतदाता के मोबाइल फोन पर पहुंचने वाली सूचना भी चुनावी व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी है।

भारत भी इससे अछूता नहीं है

भारत में यह चुनौती और बड़ी है। यहां बहुत बड़ी मतदाता संख्या है, अनेक भाषाएं हैं, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज है और करोड़ों लोग सोशल मीडिया के जरिए राजनीतिक जानकारी हासिल करते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान आमिर खान और रणवीर सिंह के नाम से एआई से बनाए गए नकली वीडियो सामने आए। इनमें दोनों को राजनीतिक संदेश देते हुए दिखाया गया था, जबकि वीडियो नकली थे। दूसरी ओर राजनीतिक दलों ने एआई का वैध इस्तेमाल भी किया। डिजिटल प्रस्तोता, कई भाषाओं में सामग्री और दिवंगत नेताओं की डिजिटल छवि जैसे प्रयोग देखने को मिले।

भारत निर्वाचन आयोग ने 2024 में राजनीतिक दलों को डीपफेक और भ्रामक एआई सामग्री से बचने के निर्देश दिए। आयोग ने शिकायत मिलने पर ऐसी सामग्री को तेजी से हटाने की व्यवस्था पर भी जोर दिया। 2025 में आयोग ने एआई से बनाई या बड़े स्तर पर बदली गई चुनावी सामग्री पर यह साफ करने की सलाह दी कि वह कृत्रिम रूप से बनाई गई है। यह कदम जरूरी है, लेकिन केवल लेबल लगा देने से समस्या खत्म नहीं होगी। भारत में एक झूठा वीडियो पूरे देश के लिए नहीं, बल्कि किसी खास जिले, भाषा या समुदाय के लिए बनाया जा सकता है। वह सामग्री राष्ट्रीय स्तर पर पकड़ में आने से पहले ही अपना असर डाल सकती है। यही एआई की एक बड़ी ताकत है। वह बड़े पैमाने पर प्रचार कर सकती है, लेकिन उससे भी ज्यादा आसानी से बहुत छोटे समूह के लिए खास संदेश बना सकती है।

हर मतदाता को अलग संदेश

पुराने जमाने में नेता एक मंच से भाषण देता था और हजारों लोग एक ही संदेश सुनते थे। टेलीविजन के दौर में भी लाखों लोग एक ही विज्ञापन देखते थे। सोशल मीडिया ने इस व्यवस्था को बदला। एआई इसे और आगे ले जा सकती है। भविष्य में किसी राजनीतिक अभियान के पास किसी व्यक्ति की भाषा, उम्र, रुचि, ऑनलाइन व्यवहार और राजनीतिक पसंद से जुड़ी बहुत सारी जानकारी हो सकती है। एआई उस जानकारी के आधार पर अलग-अलग लोगों के लिए अलग संदेश बना सकती है। किसी को रोजगार का संदेश, किसी को महंगाई का, किसी को सुरक्षा का और किसी को पहचान से जुड़ा संदेश। केवल मुद्दा ही नहीं, संदेश की भाषा और उसका भाव भी अलग हो सकता है। समस्या यह है कि नेता सार्वजनिक मंच पर एक बात कहे, लेकिन अलग-अलग लोगों को निजी तौर पर अलग बातें बताई जाएं तो उसकी जवाबदेही कैसे तय होगी? यूरोपीय संघ ने इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक विज्ञापनों में पारदर्शिता बढ़ाने के नियम लागू किए हैं। इन नियमों के तहत लोगों को यह जानने का अधिकार दिया गया है कि राजनीतिक विज्ञापन के पीछे कौन है और उसे किस आधार पर उनके सामने दिखाया गया। यह सवाल आगे और बड़ा होने वाला है। क्या लोकतंत्र में हर नागरिक को अलग राजनीतिक दुनिया दिखाई दे सकती है?

एआई मतदाता की कमजोरी पहचान सकती है

राजनीतिक प्रचार का उद्देश्य हमेशा से लोगों को प्रभावित करना रहा है। भाषण, पोस्टर, विज्ञापन और नारे इसी काम के साधन रहे हैं। इसलिए हर राजनीतिक प्रचार को गलत नहीं कहा जा सकता। एआई के साथ फर्क यह है कि वह लोगों की प्रतिक्रियाओं का बहुत तेजी से अध्ययन कर सकती है। इससे यह पता लगाया जा सकता है कि किसी व्यक्ति या समूह पर किस तरह का संदेश ज्यादा असर करता है। किसी पर डर का असर हो सकता है, किसी पर आर्थिक चिंता का, किसी पर राष्ट्रवाद का और किसी पर पहचान से जुड़ी बातों का। अगर मशीन लगातार यह देखती रहे कि कौन सा संदेश किस व्यक्ति पर कितना असर कर रहा है, तो राजनीतिक प्रचार सामान्य विज्ञापन से आगे जाकर बहुत व्यक्तिगत हो सकता है।

यहां लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है। अगर किसी व्यक्ति ने अपनी इच्छा से वोट दिया, लेकिन उसकी भावनाओं और सोच को प्रभावित करने के लिए उसके बारे में इकट्ठा किए गए डेटा और एआई का इस्तेमाल हुआ, तो उस निर्णय को कितना स्वतंत्र माना जाएगा?

लाखों नकली नागरिक भी बहस में आ सकते हैं

सोशल मीडिया पर आज भी नकली खाते और स्वचालित खाते मौजूद हैं। एआई इस समस्या को बहुत बड़ा कर सकती है। अब ऐसा खाता बनाया जा सकता है जो सामान्य व्यक्ति की तरह लिखे, किसी स्थानीय भाषा या बोली में बात करे, अलग-अलग लोगों से बहस करे और लंबे समय तक असली नागरिक जैसा दिखाई दे। मान लीजिए किसी राजनीतिक मुद्दे पर सोशल मीडिया पर अचानक हजारों लोग एक जैसी राय व्यक्त करने लगते हैं। आम नागरिक को लग सकता है कि पूरा समाज उसी राय के पक्ष में है। लेकिन अगर उन खातों का बड़ा हिस्सा मशीनों द्वारा चलाया जा रहा हो तो यह जनमत नहीं, बनाया हुआ माहौल हो सकता है। इसका असर नेताओं और पत्रकारों पर भी पड़ सकता है। अगर वे सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया को वास्तविक जनमत समझकर फैसले लेने लगें तो कृत्रिम जनमत नीति और राजनीतिक निर्णयों को भी प्रभावित कर सकता है।

सबसे गंभीर खतरा, सरकारी निगरानी

डीपफेक दिखाई देता है। सरकारी निगरानी का खतरा अक्सर दिखाई नहीं देता। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से कैमरे, चेहरे की पहचान, स्थान संबंधी जानकारी, बैंकिंग गतिविधियां, यात्रा रिकॉर्ड और ऑनलाइन व्यवहार जैसी अलग-अलग सूचनाओं को जोड़ना आसान हो सकता है। किसी अपराध के बाद संदिग्ध व्यक्ति की पहचान करना एक बात है। लेकिन अगर सरकार पहले से यह अनुमान लगाने लगे कि कौन विरोध प्रदर्शन में शामिल हो सकता है, कौन सरकार की आलोचना कर सकता है या कौन ‘जोखिम’ माना जा सकता है, तो बात बहुत आगे बढ़ जाती है। ऐसी व्यवस्था में नागरिक को यह भी पता नहीं चलेगा कि उसके बारे में कौन सी जानकारी जमा की जा रही है और उसका इस्तेमाल किस तरह हो रहा है। यहीं लोकतंत्र और तकनीकी निगरानी के बीच बड़ा सवाल खड़ा होता है। सरकार नागरिकों की सुरक्षा के लिए तकनीक का इस्तेमाल करे, यह एक बात है। लेकिन नागरिकों की स्वतंत्रता सीमित करने के लिए उसी तकनीक का इस्तेमाल हो, तो मजबूत कानूनी और न्यायिक निगरानी जरूरी होगी।

जब सरकारी फैसला मशीन लेने लगे

सरकारें एआई का इस्तेमाल स्वास्थ्य, शिक्षा, कर व्यवस्था, पुलिसिंग, सरकारी योजनाओं और प्रशासन में कर सकती हैं। इससे काम तेजी से हो सकता है और भ्रष्टाचार या गलतियों को पकड़ना आसान हो सकता है। लेकिन एक समस्या भी है। अगर किसी एआई प्रणाली ने गलती से किसी नागरिक को धोखाधड़ी का जोखिम मान लिया और उसका सरकारी लाभ रोक दिया, तो वह नागरिक किससे शिकायत करेगा? अगर अधिकारी कहे कि फैसला कंप्यूटर ने लिया और कंपनी कहे कि उसके मॉडल की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती, तो जवाबदेही किसकी होगी?

लोकतंत्र का एक मूल सिद्धांत है कि सत्ता के फैसले के लिए कोई जिम्मेदार व्यक्ति या संस्था होनी चाहिए। एआई के बढ़ते इस्तेमाल के साथ यह तय करना जरूरी होगा कि अंतिम जिम्मेदारी मशीन की नहीं, इंसान और संबंधित संस्था की रहे।

मीडिया के लिए भी बड़ी चुनौती

एआई पत्रकारिता के लिए खतरा भी है और अवसर भी। खतरा यह है कि इंटरनेट पर इतनी बड़ी मात्रा में कृत्रिम सामग्री पैदा हो सकती है कि असली पत्रकारिता उसमें दब जाए। अगर हजारों वेबसाइटें, वीडियो चैनल और सोशल मीडिया खाते मशीन से सामग्री बनाने लगें तो पाठक के लिए यह पता करना कठिन होगा कि भरोसेमंद खबर कहां है। दूसरी समस्या आर्थिक है। अगर मीडिया संस्थान मानव पत्रकार रखने की जगह बहुत सस्ती एआई सामग्री पर निर्भर होने लगें तो रिपोर्टिंग की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। खासकर खोजी पत्रकारिता, स्थानीय रिपोर्टिंग और लंबे समय तक चलने वाली जांच महंगी होती है। लेकिन एआई पत्रकारिता को मजबूत भी कर सकती है। हजारों दस्तावेजों को पढ़ना, आंकड़ों में गड़बड़ी खोजना, अलग-अलग भाषाओं की सामग्री समझना और बड़ी मात्रा में जानकारी की तुलना करना इससे आसान हो सकता है।

इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि एआई पत्रकारिता को खत्म करेगी या नहीं। सवाल यह है कि मीडिया व्यवस्था किस तरह की सामग्री को ज्यादा महत्व देती है, भरोसेमंद पत्रकारिता को या सस्ती और तेजी से बनाई गई सामग्री को।

विदेशी हस्तक्षेप भी आसान हो सकता है

किसी दूसरे देश की राजनीति को प्रभावित करना पहले महंगा और कठिन काम था। स्थानीय भाषा, प्रचार तंत्र और स्थानीय नेटवर्क की जरूरत पड़ती थी। एआई इन बाधाओं को कम कर सकती है। किसी विदेशी शक्ति के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय भाषा वाले नकली खाते चलाना, अलग-अलग समूहों को अलग संदेश भेजना और राजनीतिक विवादों को बढ़ाना पहले की तुलना में आसान हो सकता है। इसका उद्देश्य किसी खास उम्मीदवार को जिताना जरूरी नहीं होगा। किसी देश में अविश्वास पैदा करना भी काफी हो सकता है। अगर नागरिक चुनाव आयोग, अदालत, मीडिया और चुनाव परिणाम पर ही भरोसा करना बंद कर दें तो लोकतंत्र कमजोर होता है। लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी समस्या केवल गलत सूचना नहीं, बल्कि ऐसी स्थिति भी है जिसमें नागरिक किसी सूचना पर भरोसा ही न कर सके।

तकनीकी कंपनियां भी राजनीतिक शक्ति बन सकती हैं

एआई के दौर में लोकतंत्र के सामने केवल सरकार और राजनीतिक दल नहीं होंगे। बड़ी तकनीकी कंपनियों के पास शक्तिशाली एआई मॉडल, विशाल डेटा और दुनिया भर तक पहुंचने वाले डिजिटल मंच हैं। अगर कोई नागरिक राजनीतिक जानकारी के लिए एआई सहायक पर निर्भर होने लगे तो एक नया सवाल पैदा होगा। वह सहायक कौन सी जानकारी पहले दिखाएगा? किन स्रोतों का इस्तेमाल करेगा? किसी नेता के बारे में क्या बताएगा और क्या नहीं बताएगा? आज सोशल मीडिया मंच यह तय करते हैं कि कौन सी पोस्ट ज्यादा लोगों को दिखाई देगी। भविष्य में एआई खुद नागरिक के लिए हजारों सूचनाओं का सार बनाकर बताएगी कि उसे क्या जानना चाहिए। इससे एआई केवल सूचना पहुंचाने का माध्यम नहीं रहेगी। वह सूचना को चुनने और समझाने वाली शक्ति भी बन सकती है।

क्या एआई अभी चुनावों के नतीजे बदल रही है?

2024 में दुनिया के कई बड़े चुनावों में एआई का इस्तेमाल हुआ। डीपफेक और नकली आवाज के मामले सामने आए, लेकिन चुनावों के परिणामों पर परंपरागत राजनीतिक मुद्दों, अर्थव्यवस्था, नेतृत्व, दलों के संगठन और सामाजिक परिस्थितियों का प्रभाव भी बना रहा। तकनीक बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है और कानून तथा चुनावी संस्थाएं अक्सर उसके पीछे चल रही हैं। यही अंतर आने वाले वर्षों में बड़ी समस्या बन सकता है।

तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक भी नहीं है। सरकार एआई की मदद से लाखों नागरिकों की शिकायतों का विश्लेषण कर सकती है और पता लगा सकती है कि किस इलाके में पानी, सड़क या स्वास्थ्य की समस्या ज्यादा गंभीर है। संसद बड़ी संख्या में नागरिक सुझावों को जल्दी समझ सकती है। कानूनों और सरकारी योजनाओं को अलग-अलग भाषाओं में सरल तरीके से समझाया जा सकता है। चुनाव आयोग भ्रामक सामग्री को जल्दी पहचान सकता है।

कम साक्षर नागरिकों और दिव्यांग लोगों के लिए भी एआई राजनीतिक और सरकारी जानकारी को आसान बना सकती है। छोटी भाषाओं और स्थानीय बोलियों में जानकारी उपलब्ध कराकर यह उन लोगों को भी सार्वजनिक बहस में शामिल कर सकती है जो अभी डिजिटल व्यवस्था से पूरी तरह नहीं जुड़ पाए हैं। असली सवाल यह है कि एआई को कौन नियंत्रित करेगा और उसके फैसलों की जवाबदेही किसकी होगी।

लोकतंत्र को सिर्फ डीपफेक कानून से नहीं बचाया जा सकता

डीपफेक पर रोक जरूरी हो सकती है, लेकिन यह अकेले काफी नहीं होगी। राजनीतिक सामग्री में यह साफ होना चाहिए कि उसे किसने बनाया और किसने उसके लिए पैसा दिया। लोगों की संवेदनशील निजी जानकारी का इस्तेमाल राजनीतिक प्रचार के लिए किस सीमा तक हो सकता है, यह स्पष्ट होना चाहिए। चुनाव के दौरान नकली सामग्री की शिकायतों पर बहुत तेजी से कार्रवाई करने की व्यवस्था होनी चाहिए। सरकारें जिस एआई का इस्तेमाल नागरिकों से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों में करें, उसके खिलाफ नागरिक को अपील का अधिकार होना चाहिए। सरकारी निगरानी पर अदालत और संसद की निगरानी जरूरी होगी।

लेकिन यहां एक और सावधानी बहुत महत्वपूर्ण है। फर्जी खबर रोकने के नाम पर सरकार को इतनी ताकत नहीं दी जा सकती कि वह असहमति या आलोचना को भी ‘फर्जी’ बताकर हटा दे।

लोकतंत्र में सरकार सत्य की अंतिम मालिक नहीं हो सकती। गलत सूचना से लड़ने की व्यवस्था भी पारदर्शी, स्वतंत्र और अपील योग्य होनी चाहिए।

भारत के सामने बड़ी जिम्मेदारी

भारत के लिए यह चुनौती इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां विशाल मतदाता आधार और तेजी से बढ़ता डिजिटल समाज दोनों मौजूद हैं। निर्वाचन आयोग ने एआई से बनी सामग्री की पहचान और उसके इस्तेमाल को लेकर शुरुआती कदम उठाए हैं। आगे राजनीतिक दलों को एआई के इस्तेमाल की जानकारी सार्वजनिक करने, डिजिटल चुनाव खर्च को पारदर्शी बनाने, मशीन से चलाए जा रहे खातों की पहचान करने और चुनाव से ठीक पहले फैलने वाली नकली सामग्री पर तेजी से कार्रवाई की व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन भारत को नियमन और अभिव्यक्ति की आजादी के बीच संतुलन भी रखना होगा। गलत सूचना रोकने का कानून खुद राजनीतिक आलोचना रोकने का माध्यम नहीं बनना चाहिए।

सबसे मजबूत बचाव, नागरिक की समझ

हर नकली वीडियो को पकड़ने के लिए तकनीक बनाई जा सकती है। लेकिन नकली सामग्री बनाने वाली तकनीक भी लगातार बेहतर होती रहेगी। यह मुकाबला कभी खत्म नहीं होगा। इसलिए लोकतंत्र की सबसे जरूरी सुरक्षा केवल तकनीकी नहीं, नागरिक समझ भी है। डिजिटल साक्षरता का मतलब अब सिर्फ इंटरनेट चलाना नहीं है। नागरिक को यह समझना होगा कि स्क्रीन पर दिखाई देने वाली तस्वीर, आवाज या वीडियो अपने आप प्रमाण नहीं है। किसी सनसनीखेज जानकारी को आगे बढ़ाने से पहले उसका स्रोत देखना, दूसरी जगह पुष्टि करना और भावनात्मक सामग्री पर तुरंत प्रतिक्रिया न देना जरूरी होगा। स्कूलों और कॉलेजों में सूचना को परखने की समझ भी उतनी ही जरूरी हो सकती है जितनी भाषा और गणित की शिक्षा।

असली संकट एआई नहीं, एआई के हाथों सत्ता का जाना है

लोकतंत्र का अगला बड़ा संकट कृत्रिम बुद्धिमत्ता हो सकता है, लेकिन खतरा केवल एआई मशीन से नहीं आएगा। असली खतरा तब पैदा होगा जब एआई, सत्ता और विशाल डेटा एक ही जगह बहुत ज्यादा केंद्रित हो जाएं।

डीपफेक उसका दिखाई देने वाला हिस्सा है। असली चुनौती उससे कहीं बड़ी है। कौन सा मतदाता क्या देखता है, किसे कौन सा संदेश मिलता है, किस नागरिक को जोखिम माना जाता है, किस जानकारी को ज्यादा महत्व दिया जाता है और सरकारी फैसला किस आधार पर लिया जाता है, ये सभी सवाल भविष्य के लोकतंत्र के केंद्र में होंगे।

लोकतंत्र ने अब तक सत्ता पर नियंत्रण के लिए संविधान, संसद, न्यायपालिका, चुनाव और स्वतंत्र मीडिया जैसी संस्थाएं बनाई हैं। एआई के साथ एक नई चुनौती सामने आ रही है। अब सूचना बनाई भी जा सकती है, बदली भी जा सकती है, हर व्यक्ति तक अलग रूप में पहुंचाई भी जा सकती है और उसके व्यवहार का अनुमान भी लगाया जा सकता है।

इसलिए आने वाले समय का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि मशीन इंसान से ज्यादा बुद्धिमान हो गई या नहीं। सवाल यह होगा कि क्या नागरिक को पता है कि उसके राजनीतिक फैसले को प्रभावित करने वाली ताकत कौन सी है। अगर एआई का इस्तेमाल पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक अधिकारों के साथ किया गया तो यह लोकतंत्र को मजबूत कर सकती है। लेकिन अगर इसके जरिए सूचना, निगरानी और राजनीतिक प्रभाव कुछ सरकारों, संगठनों या कंपनियों के हाथ में बहुत ज्यादा केंद्रित हो गया, तो लोकतंत्र का बाहरी ढांचा भले ही बना रहे, उसकी असली स्वतंत्रता कमजोर हो सकती है। यही एआई और लोकतंत्र की सबसे बड़ी लड़ाई है। यह मनुष्य बनाम मशीन की लड़ाई नहीं है। यह इस बात की लड़ाई है कि निर्णय लेने की शक्ति आखिर किसके हाथ में रहेगी, नागरिक के या उन अदृश्य प्रणालियों के, जिन्हें वह न देख सकता है और न पूरी तरह समझ सकता है।

Yogesh Mishra
ABOUT THE AUTHOR

Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

Next Story