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Data Business Kya Hai: इंटरनेट पर आपकी गतिविधियों को कौन ट्रैक करता है और पैसा कैसे बनता है?
Data Business Kya Hai: इंटरनेट पर आप क्या खोजते हैं, कौन-सी वेबसाइट देखते हैं और किस वीडियो पर रुकते हैं—इन संकेतों से कंपनियां आपकी प्रोफाइल और रुचियों का अनुमान कैसे लगाती हैं?
Data Business Kya Hai: आपने सुबह इंटरनेट पर जूते खोजे। दो-तीन वेबसाइट देखीं और बिना खरीदारी किए वापस आ गए। कुछ देर बाद समाचार पढ़ते समय वही जूते विज्ञापन में दिखाई देने लगे। शाम को सोशल मीडिया खोला तो फिर जूते, स्पोर्ट्स वियर और फिटनेस से जुड़े विज्ञापन सामने थे। कभी ऐसा भी लगता है कि आपने किसी दोस्त से किसी शहर में घूमने की बात की और कुछ ही देर बाद उसी शहर के होटल और यात्रा से जुड़े विज्ञापन दिखाई देने लगे।
ऐसे अनुभव के बाद पहला शक अक्सर फोन के माइक्रोफोन पर जाता है। लगता है कि शायद फोन हमारी बातें सुन रहा है। लेकिन डिजिटल दुनिया की असली कहानी इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प और जटिल है। कई बार आपको पहचानने या आपकी रुचि का अनुमान लगाने के लिए फोन को आपकी बातचीत सुनने की जरूरत ही नहीं पड़ती।
आपने क्या खोजा, कौन-सा पन्ना खोला, उस पर कितनी देर रुके, किस विज्ञापन पर क्लिक किया, कौन-सा वीडियो पूरा देखा, किसे तुरंत आगे बढ़ा दिया, किस वेबसाइट पर दोबारा लौटे, किस उपकरण से आए, मोटे तौर पर कहां से जुड़े और पहले किन सेवाओं का इस्तेमाल किया, इन छोटे-छोटे संकेतों को जोड़कर आपके बारे में काफी उपयोगी अनुमान लगाया जा सकता है।
यही आधुनिक इंटरनेट की एक बड़ी आर्थिक कहानी है। आप किसी सेवा के लिए सीधे पैसा न दें, फिर भी आपका व्यवहार, आपका ध्यान और आपके व्यवहार से निकाले गए अनुमान आर्थिक मूल्य पैदा कर सकते हैं। विज्ञापन आधारित डिजिटल कारोबार इसी व्यवस्था पर काफी हद तक टिका है। अमेरिकी संघीय व्यापार आयोग यानी एफटीसी की सोशल मीडिया और वीडियो सेवाओं पर की गई व्यापक जांच में भी यह सामने आया कि बड़े डिजिटल मंचों के कारोबार में बड़े पैमाने पर उपभोक्ता डेटा जुटाना और उसका इस्तेमाल, खासकर लक्षित विज्ञापन के लिए, महत्वपूर्ण आर्थिक भूमिका निभाता है।
‘कंपनी मेरा डेटा बेच रही है’ का मतलब क्या है?
डेटा कारोबार को समझने में यह सबसे जरूरी फर्क है। मान लीजिए किसी डिजिटल मंच के पास ऐसे संकेत हैं जिनसे उसे लगता है कि आप 45 से 55 वर्ष की उम्र के हैं, लखनऊ में रहते हैं, पिछले महीने कई बार एसयूवी से जुड़े वीडियो देख चुके हैं, कार बीमा की वेबसाइट पर जा चुके हैं और नई कारों की कीमत भी खोज चुके हैं।
जरूरी नहीं कि वह मंच किसी कार कंपनी को आपका नाम, फोन नंबर और पूरा इंटरनेट इतिहास देकर कहे, ‘इन्हें कार बेचिए।’
विज्ञापन का सामान्य मॉडल इससे अलग हो सकता है। कार कंपनी कह सकती है कि उसे ऐसे लोगों तक अपना विज्ञापन पहुंचाना है जिनमें नई कार खरीदने की संभावना ज्यादा है। मंच अपने पास मौजूद संकेतों के आधार पर ऐसे दर्शकों को चुन सकता है और उन्हें विज्ञापन दिखा सकता है। यानी कई मामलों में विज्ञापनदाता किसी व्यक्ति की पूरी पहचान नहीं खरीद रहा होता, बल्कि उस व्यक्ति या उसके जैसे लोगों तक पहुंचने का अवसर खरीद रहा होता है।
इसलिए यह कहना ज्यादा सही है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था में सिर्फ डेटा का कारोबार नहीं होता। डेटा से निकाली गई जानकारी, प्रोफाइल, अनुमान और किसी खास तरह के उपयोगकर्ता तक पहुंचने की क्षमता भी आर्थिक मूल्य रखती है। इसके साथ एक अलग उद्योग भी है, जिसे डेटा-ब्रोकर कारोबार कहा जाता है। इसमें अलग-अलग स्रोतों से जानकारी जुटाई, मिलाई, वर्गीकृत और व्यावसायिक उपयोग के लिए तैयार की जा सकती है। एफटीसी की जांच में भी बड़ी डिजिटल विज्ञापन सेवाओं द्वारा डेटा-ब्रोकरों से आय, स्थान और रुचियों जैसी विशेषताओं वाले डेटासेट लेने की जानकारी सामने आई थी।
कुकी क्या है और इसने इंटरनेट को ट्रैक करना कैसे आसान बनाया?
कुकी मूल रूप से वेबसाइट द्वारा आपके ब्राउज़र में रखी जाने वाली छोटी-सी जानकारी है। कुकी अपने आप में कोई वायरस या जासूसी कार्यक्रम नहीं है। इंटरनेट की कई सामान्य सुविधाएं कुकी की मदद से ही ठीक से काम करती हैं।
मान लीजिए आपने किसी ऑनलाइन दुकान में तीन चीजें कार्ट में डाल दीं और फिर दूसरे पन्ने पर चले गए। वेबसाइट को याद रखना है कि कार्ट में क्या था। आपने किसी वेबसाइट पर लॉगिन किया तो हर पन्ने पर दोबारा पासवर्ड नहीं मांगा जाना चाहिए। आपने भाषा हिंदी चुनी तो वेबसाइट अगली बार उसे याद रख सकती है। ऐसे कामों में कुकी उपयोगी है।
समस्या तब शुरू होती है जब इसी पहचान व्यवस्था का इस्तेमाल अलग-अलग वेबसाइटों पर आपकी गतिविधियों को आपस में जोड़ने के लिए किया जाता है।
इसे समझने के लिए प्रथम-पक्ष और तृतीय-पक्ष कुकी का फर्क देखना उपयोगी है। प्रथम-पक्ष कुकी उस वेबसाइट से जुड़ी होती है जिस पर आप सीधे गए हैं। तृतीय-पक्ष कुकी किसी दूसरे डोमेन से जुड़ी हो सकती थी, जैसे विज्ञापन या विश्लेषण सेवा।
ऐतिहासिक रूप से अगर एक ही विज्ञापन नेटवर्क हजारों वेबसाइटों पर मौजूद था तो वह अपने पहचान संकेत के जरिए अलग-अलग वेबसाइटों पर आपकी गतिविधियों को एक ही ब्राउज़र से जोड़ने की कोशिश कर सकता था।
तब एक डिजिटल कहानी बनने लगती थी। सुबह आपने समाचार वेबसाइट खोली, दोपहर में कारों की वेबसाइट देखी, शाम को यात्रा वेबसाइट और रात में क्रिकेट की साइट। हर वेबसाइट अकेले आपके बारे में बहुत कम जान सकती थी। लेकिन अगर उनके बीच मौजूद विज्ञापन और विश्लेषण व्यवस्था आपकी गतिविधियों को एक पहचान संकेत से जोड़ सके तो आपकी रुचियों का कहीं ज्यादा विस्तृत नक्शा तैयार हो सकता था।
आपने एक वेबसाइट पर कुछ देखा और वही विज्ञापन दूसरी जगह क्यों दिखाई दिया?
इसे लंबे समय तक रीटार्गेटिंग या रीमार्केटिंग जैसे नामों से समझाया गया। मान लीजिए आपने पहाड़ी साइकिल की एक वेबसाइट देखी। उस वेबसाइट पर किसी विज्ञापन सेवा की तकनीक लगी हुई है। आपकी यात्रा से यह संकेत बन सकता है कि इस ब्राउज़र या उपयोगकर्ता ने साइकिल में रुचि दिखाई। अब आप दूसरी ऐसी वेबसाइट खोलते हैं जहां वही विज्ञापन व्यवस्था काम कर रही है। वहां आपको साइकिल का विज्ञापन दिखाई दे सकता है।
गूगल अपने विज्ञापन संबंधी विवरण में भी इसी तरह का उदाहरण देता है कि किसी विज्ञापन सेवा का इस्तेमाल करने वाली साइकिल वेबसाइट देखने के बाद, वैयक्तिक विज्ञापन चालू होने की स्थिति में दूसरी सहभागी वेबसाइट पर साइकिल से संबंधित विज्ञापन दिखाई दे सकता है।
इस प्रक्रिया में वेबसाइट के पन्ने का पता, आईपी पता और कुकी जैसी जानकारी अलग-अलग परिस्थितियों में विज्ञापन व्यवस्था तक पहुंच सकती है। इसलिए कई बार ऐसा जरूरी नहीं कि दूसरी वेबसाइट खुद जानती हो कि आपने कल क्या देखा था। बीच की विज्ञापन व्यवस्था अलग-अलग संकेतों को जोड़ रही हो सकती है।
लेकिन थर्ड पार्टी कुकी बंद होने के बाद भी ट्रैकिंग क्यों नहीं खत्म हुई?
क्योंकि कुकी ट्रैकिंग की केवल एक तकनीक है, पूरी व्यवस्था नहीं। ब्राउज़र निर्माताओं ने पिछले वर्षों में क्रॉस-साइट ट्रैकिंग को सीमित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। लेकिन वेबसाइटों और विज्ञापन प्रणालियों के पास पहचान जोड़ने के दूसरे तरीके भी रहे हैं।
WebKit, जो Safari की तकनीकी नींव से जुड़ा है, अपनी गोपनीयता नीति में कुकी के अलावा स्थानीय संग्रह, URL में जोड़े गए पहचान संकेत, कैश और फिंगरप्रिंटिंग जैसी तकनीकों का भी उल्लेख करता है।
यानी इंटरनेट की दुनिया में एक तरह की तकनीकी खींचतान चलती रही है। एक तरफ कंपनियां उपयोगकर्ता को समझने और अलग-अलग सेवाओं में उसकी गतिविधियों को जोड़ने की कोशिश करती हैं, दूसरी तरफ ब्राउज़र उस तरह की अनावश्यक पहचान को कठिन बनाने के उपाय करते हैं। और इसी कहानी में आता है ब्राउज़र फिंगरप्रिंटिंग।
फिंगरप्रिंटिंग: कुकी नहीं है, फिर भी ब्राउज़र को पहचानने की कोशिश
कल्पना कीजिए कि किसी व्यक्ति का नाम आपको नहीं मालूम। लेकिन आपको पता है कि उसकी लंबाई कितनी है, वह किस तरह का चश्मा पहनता है, किस हाथ से लिखता है, कौन-सी भाषा बोलता है और हर दिन किस समय ऑफिस आता है। इनमें से कोई एक पहचान अकेले पर्याप्त नहीं होगी। लेकिन कई संकेतों को एक साथ जोड़ दिया जाए तो भीड़ में उस व्यक्ति को पहचानना आसान हो सकता है।
ब्राउज़र फिंगरप्रिंटिंग का सिद्धांत कुछ ऐसा ही है। किसी वेबसाइट को आपके ब्राउज़र और उपकरण से कई तकनीकी संकेत मिल सकते हैं, जैसे ब्राउज़र का प्रकार, ऑपरेटिंग सिस्टम, स्क्रीन का आकार, भाषा, समय क्षेत्र, ग्राफिक्स से जुड़ी जानकारी, IP पता और कुछ दूसरी तकनीकी विशेषताएं। अलग-अलग संकेत अपने आप में सामान्य हो सकते हैं। लेकिन उनका संयोजन कुछ परिस्थितियों में अपेक्षाकृत विशिष्ट हो सकता है। यही संभावित पहचान ‘ब्राउज़र फिंगरप्रिंट’ कहलाती है। सरल भाषा में कहें तो कुकी आपके ब्राउज़र पर एक पहचान संख्या रख सकती है। फिंगरप्रिंटिंग में कोशिश यह होती है कि बिना ऐसी स्पष्ट पहचान संख्या रखे भी आपके उपकरण की तकनीकी विशेषताओं से आपको पहचानने या अलग करने की कोशिश की जाए।
Incognito या Private Mode क्या आपको इंटरनेट पर अदृश्य बना देता है?
यह इंटरनेट की सबसे आम गलतफहमियों में से एक है।
निजी ब्राउज़िंग का मुख्य उद्देश्य आपके अपने उपकरण पर ब्राउज़िंग के स्थायी निशान कम करना है। उदाहरण के लिए सत्र समाप्त होने के बाद इतिहास या कुछ स्थानीय जानकारी सामान्य ब्राउज़िंग की तरह सुरक्षित नहीं रहती।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इंटरनेट पर कोई आपको देख ही नहीं सकता। जिस वेबसाइट में आपने लॉगिन किया है, वह आपका खाता जानती है। वेबसाइट को आपका IP पता मिल सकता है। कुछ परिस्थितियों में फिंगरप्रिंटिंग या दूसरे संकेत भी पहचान जोड़ने की कोशिश कर सकते हैं।
मोबाइल ऐप में कुकी नहीं है तो ट्रैकिंग कैसे होती है?
मोबाइल की दुनिया में पहचान के दूसरे तरीके हैं। फोन में विज्ञापन पहचानकर्ता हो सकते हैं। ऐप के भीतर किसी तीसरी कंपनी का SDK, यानी तैयार सॉफ्टवेयर कंपोनेंट लगा हो सकता है। यह कंपोनेंट विज्ञापन, उपयोग का विश्लेषण, तकनीकी गड़बड़ी की जानकारी या दूसरी सेवाओं के लिए कुछ डेटा साझा कर सकता है।
गूगल के विज्ञापन संबंधी विवरण के अनुसार, मोबाइल ऐप में जहां सामान्य वेब कुकी उपलब्ध नहीं होती, वहां विज्ञापन पहचानकर्ता जैसी तकनीक समान भूमिका निभा सकती है। कुछ परिस्थितियों में ऐप और उसी उपकरण के ब्राउज़र से जुड़े विज्ञापन संकेतों को भी आपस में जोड़ा जा सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि हर ऐप आपका निजी जीवन बेच रहा है। लेकिन यह जरूर समझना चाहिए कि किसी ऐप का काम केवल उसकी स्क्रीन पर दिखाई देने वाले काम तक सीमित नहीं होता। उसके भीतर लगी बाहरी तकनीकें भी यह तय कर सकती हैं कि कौन-सा डेटा कहां जा रहा है।
सबसे शक्तिशाली ट्रैकिंग शायद कुकी नहीं, आपका व्यवहार है
अब सोशल मीडिया की दुनिया देखिए। यहां किसी कंपनी को आपको दूसरी वेबसाइट पर पहचानने की जरूरत ही नहीं पड़ सकती, क्योंकि आप स्वयं उसके मंच के भीतर लगातार गतिविधि कर रहे हैं। आप किस पोस्ट को लाइक करते हैं, यह तो स्पष्ट संकेत है। लेकिन उससे भी दिलचस्प वे संकेत हैं जिन्हें आप जानबूझकर नहीं देते।
किस वीडियो पर आप रुक गए? किसे दो सेकंड में आगे बढ़ा दिया? किस वीडियो को पूरा देखा? किसे दोबारा देखा? किस पोस्ट को खोला लेकिन लाइक नहीं किया? किस खाते को फॉलो किया? किस विषय पर बार-बार रुकते हैं? इन हजारों छोटे व्यवहारों से डिजिटल मंच यह अनुमान लगाने की कोशिश कर सकता है कि अगली कौन-सी सामग्री आपका ध्यान खींचेगी। एफटीसी की सोशल मीडिया और वीडियो सेवाओं पर जांच में भी बड़े पैमाने पर डेटा संग्रह, स्वचालित विश्लेषण और लक्षित विज्ञापन के बीच गहरा संबंध सामने आया था।
सोशल मीडिया का असली ‘उत्पाद’ क्या है?
एक लोकप्रिय वाक्य है, ‘अगर सेवा मुफ्त है तो उत्पाद आप हैं।’ यह सुनने में प्रभावशाली है, लेकिन पूरी तस्वीर नहीं बताता।
ज्यादा सटीक बात यह है कि विज्ञापन आधारित सोशल मीडिया में आपका ध्यान एक मूल्यवान संसाधन है, आपका व्यवहार भविष्यवाणी के लिए डेटा है और विज्ञापनदाता भुगतान करने वाला ग्राहक है।
मंच की चुनौती होती है कि आपको ऐसा क्या दिखाया जाए जिससे आप कुछ देर और रुके रहें, अगली सामग्री देखें, वापस आएं या किसी विज्ञापन पर प्रतिक्रिया दें। इसलिए एल्गोरिदम केवल यह नहीं सीखता कि आपको क्या पसंद है। वह यह भी अनुमान लगाने की कोशिश करता है कि आप किस सामग्री पर रुकेंगे, किस पर क्लिक करेंगे और किस पर प्रतिक्रिया देंगे। यहीं डेटा पैसा बनना शुरू होता है।
आपने अपनी आय नहीं बताई, फिर सिस्टम को आपके बारे में इतना कैसे पता चलता है?
क्योंकि डिजिटल दुनिया में दिया हुआ डेटा और अनुमान से निकाला गया डेटा दो अलग चीजें हैं। आपने अपनी आय कभी नहीं बताई। लेकिन आप किन इलाकों में जाते हैं, किस तरह के उपकरण इस्तेमाल करते हैं, किन उत्पादों को देखते हैं और किन सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं, इन संकेतों से कोई प्रणाली आपकी आर्थिक स्थिति का अनुमान लगाने की कोशिश कर सकती है।
आपने यह नहीं बताया कि आपके घर में छोटे बच्चे हैं। लेकिन लगातार बच्चों के कपड़े, खिलौने और स्कूल सामग्री खोजने से ऐसा अनुमान बन सकता है। आपने यह भी नहीं कहा कि आप नई कार खरीदने वाले हैं। लेकिन दो सप्ताह तक SUV की समीक्षा, कार ऋण, बीमा और कीमतें देखने के बाद आपको संभावित कार खरीदारों के समूह में रखा जा सकता है। यही डिजिटल डेटा कारोबार का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। कई बार डेटा का मूल्य इस बात में नहीं होता कि कंपनी आपके बारे में क्या जानती है, बल्कि इस बात में होता है कि वह आपके बारे में क्या अनुमान लगा सकती है।
विज्ञापन दिखने से पहले मिलीसेकंड में बाजार कैसे लग जाता है?
डिजिटल विज्ञापन का एक बड़ा हिस्सा स्वचालित विज्ञापन नीलामी पर आधारित है।
सरल भाषा में समझिए : आपने कोई वेबसाइट या ऐप खोला। वहां विज्ञापन दिखाने के लिए जगह उपलब्ध हुई। विज्ञापन व्यवस्था को कुछ संकेत मिले। पन्ना किस विषय पर है, उपकरण कैसा है, सामान्य स्थान क्या है और नियमों तथा आपकी सहमति के भीतर कौन-से यूज़र संकेत इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
अब अलग-अलग विज्ञापनदाता या उनकी स्वचालित प्रणालियां तय कर सकती हैं कि उस विज्ञापन अवसर का उनके लिए कितना मूल्य है। अगर आप कारों पर लेख पढ़ रहे हैं और उपलब्ध संकेत बताते हैं कि आप वाहन खरीदने में रुचि रखने वाले दर्शक-समूह से मेल खाते हैं तो किसी कार कंपनी के लिए उस समय आपको विज्ञापन दिखाना ज्यादा मूल्यवान हो सकता है। फिर स्वचालित बोली लग सकती है और चुना गया विज्ञापन आपके सामने दिखाई देता है।
यह पूरी प्रक्रिया इतनी तेज हो सकती है कि यूज़र को केवल वेबसाइट खुलती हुई दिखाई देती है।
डेटा-ब्रोकर इंटरनेट के अदृश्य थोक व्यापारी क्यों हैं?
डेटा-ब्रोकर आम इंटरनेट उपयोगकर्ता के लिए सबसे कम दिखाई देने वाली परतों में से एक हैं। उनका काम अलग-अलग स्रोतों से जानकारी जुटाना, उसे साफ करना, आपस में जोड़ना, वर्गीकृत करना और व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए तैयार करना हो सकता है।
एक स्रोत के पास खरीदारी से जुड़ी जानकारी हो सकती है। दूसरे के पास स्थान से जुड़े संकेत। तीसरे के पास सार्वजनिक रिकॉर्ड और चौथे के पास ऑनलाइन रुचियों से जुड़ी जानकारी। इन सभी को मिलाने पर किसी व्यक्ति या परिवार के बारे में ज्यादा विस्तृत अनुमान बनाया जा सकता है। यह जरूरी नहीं कि हर डेटा-ब्रोकर हर व्यक्ति की पूरी जिंदगी जानता हो। लेकिन बड़े पैमाने पर छोटे-छोटे डेटा स्रोतों को जोड़ने की क्षमता ही इस कारोबार की ताकत है।
असली चिंता विज्ञापन नहीं, प्रोफाइलिंग है
अगर पूरी व्यवस्था केवल इतना करती कि क्रिकेट देखने वाले व्यक्ति को क्रिकेट बैट का विज्ञापन दिखाया जाए तो गोपनीयता की चिंता शायद इतनी गंभीर नहीं होती। समस्या तब बड़ी होती है जब डेटा से संवेदनशील जीवन-स्थितियों के बारे में अनुमान बनने लगते हैं। स्थान डेटा बता सकता है कि कोई व्यक्ति नियमित रूप से किस अस्पताल या दूसरी संवेदनशील जगह पर जाता है। इंटरनेट पर की गई खोज किसी स्वास्थ्य चिंता का संकेत दे सकती है। आर्थिक गतिविधियों से वित्तीय परेशानी का अनुमान लगाया जा सकता है।
एफटीसी ने संवेदनशील स्थान डेटा से जुड़े मामलों में इसी जोखिम पर कार्रवाई की है। Mobilewalla मामले में चिकित्सा केंद्रों और पूजा स्थलों जैसी संवेदनशील जगहों से जुड़े स्थान डेटा के जोखिम का भी उल्लेख किया गया।
इसलिए डिजिटल गोपनीयता का सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि ‘मुझे जूते का विज्ञापन क्यों दिखा?’ बड़ा सवाल यह है कि ‘मेरे बारे में कौन-कौन से अनुमान बनाए गए हैं और उनका इस्तेमाल किस काम में हो रहा है?’
क्या आपके डेटा के आधार पर अलग-अलग कीमत दिखाई जा सकती है?
यहीं डेटा कारोबार का एक नया और विवादास्पद सवाल सामने आता है। विज्ञापन में डेटा का इस्तेमाल काफी समय से हो रहा है। लेकिन अगर उपभोक्ता के व्यवहार, स्थान, खरीदारी इतिहास या दूसरी जानकारी के आधार पर किसी व्यक्ति को अलग कीमत, छूट या ऑफर दिखाया जाए तो मामला ज्यादा गंभीर हो जाता है।
एफटीसी ने इसे ‘surveillance pricing’ के संदर्भ में जांच के दायरे में लिया है। आयोग यह समझने की कोशिश कर रहा है कि प्रत्यक्ष और अनुमानित उपभोक्ता डेटा तथा अलग-अलग स्रोतों की जानकारी का इस्तेमाल ऐसे उपकरण बनाने में किस तरह हो सकता है जो अलग-अलग लोगों या समूहों को दिखाई जाने वाली कीमत को प्रभावित करें। लेकिन यहां एक जरूरी सावधानी है। इसका यह अर्थ नहीं है कि हर एयरलाइन, होटल या ऑनलाइन दुकान हर ग्राहक की निजी प्रोफाइल देखकर उसकी कीमत तय करती है। एफटीसी की जांच का उद्देश्य ही यह समझना है कि ऐसी तकनीकें कहां और किस तरह इस्तेमाल हो रही हैं।
भविष्य की गोपनीयता बहस इसलिए केवल विज्ञापन तक सीमित नहीं रहेगी। सवाल यह भी होगा कि हमारे डेटा से निकली प्रोफाइल कहीं हमारे सामने आने वाली कीमत, छूट या अवसर को तो प्रभावित नहीं कर रही।
क्या फोन हमारी बातें सुनकर विज्ञापन दिखाता है?
हर संयोग को माइक्रोफोन से जासूसी का प्रमाण मानना सही नहीं है। आधुनिक डिजिटल विज्ञापन व्यवस्था के पास पहले से इतने संकेत हैं कि सामान्य लक्षित विज्ञापन दिखाने के लिए लगातार आपकी बातचीत सुनने की जरूरत ही नहीं होती। मान लीजिए आपने दोस्त से मालदीव जाने की बात की और कुछ घंटे बाद मालदीव का विज्ञापन दिखाई दिया। इसके कई दूसरे कारण हो सकते हैं। आपने पहले यात्रा से जुड़ी सामग्री देखी हो सकती है। आपके सामान्य स्थान और समय के आधार पर यात्रा विज्ञापन चल रहा हो सकता है। आपके जैसे व्यवहार वाले लोगों को वही अभियान दिखाया जा रहा हो सकता है। या आपने विज्ञापन पहले भी देखा हो, लेकिन बातचीत के बाद पहली बार उस पर ध्यान गया हो।
इसका मतलब यह नहीं कि ऐप को माइक्रोफोन की अनुमति देना महत्वहीन है। अनावश्यक माइक्रोफोन, कैमरा और स्थान की अनुमति बंद रखना अच्छी डिजिटल आदत है।
लेकिन ‘मैंने बात की और उसके बाद विज्ञापन आया, इसलिए फोन ने जरूर सुना’ वैज्ञानिक रूप से पर्याप्त प्रमाण नहीं है। डिजिटल प्रोफाइलिंग की असली ताकत यही है कि कई बार उसे आपकी बातचीत सुनने की जरूरत ही नहीं पड़ती।
एल्गोरिदम आपको आपसे पहले कैसे ‘जान’ लेता है?
वास्तव में एल्गोरिदम आपको इंसान की तरह नहीं जानता। उसे आपकी जिंदगी, भावनाओं या इरादों का मानवीय ज्ञान नहीं होता। वह सांख्यिकीय समानताएं खोजता है। मान लीजिए दस लाख लोगों में एक खास व्यवहार बार-बार दिखाई देता है। पहले वे फिटनेस वीडियो देखते हैं, फिर रनिंग शू खोजते हैं, फिर मैराथन सामग्री और उसके बाद स्पोर्ट्स घड़ी। अब कोई नया व्यक्ति पहले तीन चरणों जैसा व्यवहार करता है। प्रणाली अनुमान लगा सकती है कि उसके स्पोर्ट्स घड़ी खरीदने की संभावना सामान्य उपयोगकर्ता से ज्यादा है।
वह व्यक्ति के दिमाग में नहीं झांक रही। वह लाखों पिछले व्यवहारों से अगले व्यवहार की संभावना निकाल रही है।
लेकिन करोड़ों उपयोगकर्ताओं और अरबों गतिविधियों पर यही संभावना का गणित बहुत मूल्यवान हो सकता है।
सोशल मीडिया हमें वही क्यों दिखाता रहता है जिससे हम उत्तेजित होते हैं?
क्योंकि उपयोगकर्ता का ध्यान डिजिटल मंच के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण फर्क है। जिसे हम पसंद करते हैं और जिस पर हम प्रतिक्रिया देते हैं, दोनों हमेशा एक ही चीज नहीं हैं।
कोई पोस्ट हमें बहुत गुस्सा दिला सकती है, लेकिन फिर भी हम उसे पूरा पढ़ सकते हैं, टिप्पणी कर सकते हैं और दूसरों को भेज सकते हैं। डर, आश्चर्य और विवाद भी ध्यान रोक सकते हैं। अगर कोई सामग्री लगातार प्रतिक्रिया पैदा कर रही है तो सहभागिता पर आधारित प्रणाली उसे महत्वपूर्ण संकेत मान सकती है, हालांकि आधुनिक मंच इसके साथ कई दूसरे गुणवत्ता और सुरक्षा संकेत भी इस्तेमाल करते हैं। यहीं डिजिटल कारोबार और सामाजिक प्रभाव के बीच तनाव पैदा होता है। ज्यादा सहभागिता का मतलब ज्यादा समय और ज्यादा विज्ञापन अवसर हो सकता है। लेकिन जो सामग्री सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया पैदा करती है, वह हमेशा सबसे उपयोगी या समाज के लिए सबसे स्वस्थ सामग्री हो, यह जरूरी नहीं।
ट्रैकिंग बंद करने पर क्या विज्ञापन बंद हो जाएंगे?
ट्रैकिंग या विज्ञापन वैयक्तिकरण सीमित करने का मतलब यह नहीं कि इंटरनेट पर विज्ञापन खत्म हो जाएंगे। इसका मतलब यह हो सकता है कि विज्ञापन को आपके लंबे व्यवहारिक इतिहास और व्यक्तिगत रुचियों के आधार पर तैयार करने की क्षमता कम हो जाए।
विज्ञापन फिर भी उस पन्ने के विषय, आपकी वर्तमान खोज, सामान्य स्थान या दूसरे संदर्भों के आधार पर दिख सकता है।
एक विज्ञापन का तरीका हो सकता है: ‘यह व्यक्ति पिछले महीने से कार खोज रहा है, इसे SUV दिखाओ।’
दूसरा तरीका हो सकता है: ‘यह व्यक्ति अभी कारों पर लेख पढ़ रहा है, इसे कार का विज्ञापन दिखाओ।’
दूसरे को संदर्भ आधारित विज्ञापन कहा जा सकता है। इसमें वर्षों की व्यक्तिगत प्रोफाइल की जरूरत जरूरी नहीं।
क्या ट्रैकिंग पूरी तरह बंद की जा सकती है?
सामान्य उपयोगकर्ता के लिए इंटरनेट पर हर तरह की पहचान और डेटा संग्रह को शून्य कर देना व्यावहारिक रूप से बहुत कठिन है। लेकिन इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है।
आधुनिक ब्राउज़र क्रॉस-साइट ट्रैकिंग और फिंगरप्रिंटिंग को सीमित करने की कोशिश करते हैं। Safari में क्रॉस-साइट ट्रैकिंग को रोकने की व्यवस्था है और WebKit ने फिंगरप्रिंटिंग के लिए उपलब्ध विशिष्ट तकनीकी संकेतों को सीमित करने को अपनी गोपनीयता नीति का हिस्सा बनाया है।
व्यावहारिक तौर पर अनावश्यक ऐप अनुमतियां बंद रखना, खासकर सटीक स्थान, माइक्रोफोन, कैमरा और संपर्कों की अनुमति सोच-समझकर देना, विज्ञापन वैयक्तिकरण की सेटिंग देखना, जिन सेवाओं की जरूरत नहीं उनके खाते हटाना और वेबसाइटों पर बिना पढ़े हर बार ‘Accept All’ दबाने से बचना डेटा का अनावश्यक प्रवाह कम कर सकता है।
असली कारोबार ‘आपका डेटा’ नहीं, आपके अगले कदम की भविष्यवाणी है
डेटा अर्थव्यवस्था को एक वाक्य में समझना हो तो शायद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है: आप आगे क्या करने वाले हैं? आप कौन-सी कार खरीद सकते हैं? किस विज्ञापन पर क्लिक करेंगे? कौन-सा वीडियो आपको रोक लेगा? किस उत्पाद की जरूरत आपको जल्द पड़ सकती है? कब यात्रा करने की संभावना है? किस ग्राहक के खरीदारी करने की संभावना सबसे ज्यादा है?
कच्चे डेटा का अपना मूल्य है, लेकिन उसका आर्थिक मूल्य तब और बढ़ जाता है जब उसे भविष्यवाणी में बदला जाता है। आपके पिछले दस हजार क्लिक विज्ञापनदाता के लिए उतने महत्वपूर्ण नहीं हो सकते, जितना यह अनुमान कि आप अगले तीन महीने में कार खरीदने वाले संभावित ग्राहकों के समूह में हैं। विज्ञापनदाता को आपका पूरा डिजिटल जीवन नहीं चाहिए। उसे सही समय पर आपके सामने पहुंचने का अवसर चाहिए।
इंटरनेट की सबसे मूल्यवान चीज शायद जानकारी नहीं, आपका इरादा है
पुरानी विज्ञापन दुनिया अनुमान पर चलती थी। टीवी पर क्रिकेट मैच के दौरान कार का विज्ञापन इसलिए दिया जाता था क्योंकि दर्शकों के एक हिस्से के संभावित ग्राहक होने की संभावना थी। अखबार में मकान का विज्ञापन हजारों ऐसे लोगों ने भी देखा होगा जिन्हें मकान खरीदना ही नहीं था।
डिजिटल विज्ञापन ने इस अपव्यय को कम करने का वादा किया। सही व्यक्ति, सही समय और सही संदेश।
लेकिन इसके लिए डेटा चाहिए। कुकी ने बताया कि ब्राउज़र कहां गया। फिंगरप्रिंटिंग ने बिना स्पष्ट कुकी के पहचान जोड़ने की कोशिश की। मोबाइल पहचानकर्ताओं और SDK ने ऐप की दुनिया में डेटा संग्रह को संभव बनाया। सोशल मीडिया ने उपयोगकर्ता का व्यवहार अपने मंच के भीतर ही देख लिया। डेटा-ब्रोकरों ने अलग-अलग स्रोतों की जानकारी को जोड़ने का कारोबार बनाया। एल्गोरिदम ने इन संकेतों को रुचि और संभावना में बदला और स्वचालित विज्ञापन नीलामी ने उस संभावना को पैसे में बदलने का रास्ता दिया।
इसलिए आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था को सिर्फ यह कहकर समझना अधूरा है कि ‘कंपनियां हमारा डेटा बेच रही हैं।’
ज्यादा सटीक तस्वीर यह है कि हमारी गतिविधियां डेटा बनती हैं, डेटा से प्रोफाइल और अनुमान बनते हैं, अनुमान से हमारे अगले व्यवहार की संभावना निकाली जाती है और उस संभावना तक पहुंच विज्ञापनदाता के लिए आर्थिक मूल्य बन जाती है।
और शायद डिजिटल युग की सबसे बड़ी गोपनीयता समस्या यह नहीं है कि इंटरनेट को पता है कि हमने कल क्या खरीदा था। असली सवाल यह है कि हमारे पिछले व्यवहार को देखकर कोई व्यवस्था हमारे भविष्य के व्यवहार के बारे में कितना सटीक अनुमान लगा सकती है, वह अनुमान किसके पास पहुंचता है और उसके आधार पर हमें कौन-सा विज्ञापन, कौन-सी सामग्री, कौन-सा ऑफर या भविष्य में कौन-सी कीमत दिखाई जाती है। डेटा का कारोबार आखिरकार केवल अतीत की जानकारी बेचने का कारोबार नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे मनुष्य के अगले कदम की संभावना को आर्थिक उत्पाद में बदलने का कारोबार बन गया है।


