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E-Bus Delivery Delay: ई-बसों की डिलीवरी क्यों अटकी? बसों की कमी नहीं, ये है असली अड़चन
E-Bus Delivery Delay: ई-बसें तैयार होने के बावजूद डिपो और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी से डिलीवरी और संचालन में देरी हो रही है। जानें असली अड़चन।
E-Bus Delivery Delay: Buses Are Ready, But Depots and Charging Infra Are Holding Them Back
E-Bus Delivery Delay: पर्यावरण संरक्षण और ईंधन संकट जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए भारत में इलेक्ट्रिक बसों की संख्या बढ़ाने की तैयारी तेजी से चल रही है, लेकिन अब एक ऐसी अड़चन सामने आई है जो पूरी योजना की रफ्तार धीमी कर सकती है। कई जगह बसें तैयार हैं, कंपनियां उत्पादन के लिए तैयार हैं, ऑर्डर भी मिल चुके हैं, लेकिन उन्हें सड़कों पर उतारने के लिए जरूरी डिपो और चार्जिंग ढांचा समय पर तैयार नहीं हो पा रहा है। यानी समस्या ई-बसों की कमी नहीं, बल्कि उन्हें खड़ा करने और चार्ज करने की व्यवस्था की है।
एका मोबिलिटी के संस्थापक और चेयरमैन सुधीर मेहता ने इस चुनौती को लेकर महत्वपूर्ण सुझाव दिया है। उनका कहना है कि ई-बसों की खरीद के साथ ही डिपो और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की तैयारी को अलग प्रक्रिया के तौर पर आगे बढ़ाना चाहिए। इससे बसों की डिलीवरी और संचालन के बीच का लंबा इंतजार कम किया जा सकता है।
पहले डिपो और चार्जिंग सिस्टम, फिर बसों की डिलीवरी
सुधीर मेहता के मुताबिक ई-बस बनाने में लगने वाला समय अब पहले की तुलना में काफी कम हुआ है। इलेक्ट्रिक बसों के मॉडल और डिजाइन ज्यादा मानकीकृत हो रहे हैं और कंपनियों को खरीद प्रक्रिया का भी बेहतर अनुभव मिल रहा है। इसके मुकाबले एक ई-बस डिपो तैयार करना कहीं ज्यादा जटिल और समय लेने वाला काम है।
एक डिपो के लिए केवल बस खड़ी करने की जगह पर्याप्त नहीं होती। वहां बिजली का कनेक्शन, पर्याप्त विद्युत क्षमता, चार्जिंग स्टेशन, केबलिंग, पार्किंग एरिया और अन्य सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना पड़ता है। इन सभी कामों में अनुमति और निर्माण प्रक्रिया के कारण लंबा समय लग सकता है।
12 से 24 महीने पहले तैयार हो चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर
मेहता ने सुझाव दिया है कि सरकारों को आने वाले कई वर्षों में कितनी ई-बसों की जरूरत होगी, इसका पहले से अनुमान लगाना चाहिए। इसके आधार पर डिपो और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए अलग से टेंडर जारी किया जा सकता है।
उनके अनुसार इस पूरी प्रक्रिया में करीब 12 से 24 महीने लग सकते हैं। अगर यह काम पहले ही पूरा हो जाए तो बसों का ऑर्डर मिलने के बाद उन्हें कुछ ही महीनों में सड़कों पर उतारना संभव होगा। इससे बस खरीद और वास्तविक संचालन के बीच का अंतर काफी कम हो सकता है।
3,485 ई-बसों का ऑर्डर हासिल कर चुकी है एका
एका मोबिलिटी खुद इस समस्या का सामना कर रही है। दिसंबर 2025 में कंपनी ने पीएम ई-ड्राइव योजना के तहत केंद्र सरकार की 10,900 इलेक्ट्रिक बसों वाली निविदा में 3,485 बसों के ऑर्डर हासिल किए थे। इस निविदा में कंपनी देश की दूसरी सबसे बड़ी बोलीदाता रही।
मेहता के मुताबिक कंपनी के प्लांट में बसें तैयार होने के बावजूद कुछ मामलों में उन्हें संबंधित डिपो तक भेजना संभव नहीं हुआ, क्योंकि वहां जरूरी बुनियादी ढांचा तैयार नहीं था। इसका सीधा असर कंपनी की उत्पादन योजना पर भी पड़ा है।
अब कंपनी अपने उत्पादन कार्यक्रम को इस आधार पर तय कर रही है कि अलग-अलग जगहों पर डिपो कब तक तैयार हो पाएंगे।
ई-बस खरीद तेज, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर पीछे
देश में इलेक्ट्रिक बसों की खरीद को बढ़ावा देने में पीएम ई-ड्राइव जैसी सरकारी योजनाओं की बड़ी भूमिका है। लेकिन बड़ी संख्या में बसों का ऑर्डर देना ही पर्याप्त नहीं है। उन्हें नियमित सेवा में लगाने के लिए मजबूत चार्जिंग नेटवर्क और पर्याप्त बिजली आपूर्ति भी जरूरी है।
ई-बस डिपो में सामान्य बस डिपो की तुलना में बिजली से जुड़ी जरूरतें काफी अधिक होती हैं। बड़ी संख्या में बसों को एक साथ चार्ज करने के लिए पर्याप्त विद्युत क्षमता और चार्जिंग व्यवस्था चाहिए। अगर बिजली कनेक्शन या चार्जर तैयार नहीं है तो बसें कंपनी से निकलने के बाद भी उपयोग में नहीं लाई जा सकतीं।
पांच साल की जरूरत देखकर बने पूरी योजना
इलेक्ट्रिक बसों का विस्तार केवल बस खरीदने की प्रक्रिया तक सीमित नहीं रखा जा सकता। शहरों को पहले यह तय करना होगा कि अगले पांच वर्षों में कितनी बसें चलानी हैं और उनके लिए कितने डिपो तथा चार्जिंग पॉइंट की जरूरत पड़ेगी।
अगर डिपो निर्माण, बिजली कनेक्शन और चार्जिंग स्टेशन की निविदा पहले जारी कर दी जाए तो बस कंपनियों को भी अपने उत्पादन की बेहतर योजना बनाने में मदद मिलेगी। इससे तैयार बसों के लंबे समय तक प्लांट में खड़े रहने की स्थिति कम होगी और सार्वजनिक परिवहन में इलेक्ट्रिक बसों को तेजी से शामिल किया जा सकेगा।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक भारत में ई-बसों का अगला बड़ा सवाल यह नहीं है कि कंपनियां कितनी बसें बना सकती हैं, बल्कि यह है कि उन बसों को सड़क पर उतारने के लिए शहरों का इंफ्रास्ट्रक्चर कितनी तेजी से तैयार होता है। आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रिक बसों की सफलता काफी हद तक इसी तैयारी पर निर्भर करेगी।


