Electric Car Battery Life: इलेक्ट्रिक कार की बैटरी इतनी भारी और महँगी क्यों है? जानिए फायदे-नुकसान

Explained: Electric car की battery इतनी भारी और महंगी क्यों होती है? जानिए EV battery का पूरा गणित, कीमत, वजन, 12–15 साल की संभावित जिंदगी, charging, फायदे-नुकसान और future technology।

Yogesh Mishra
Published on: 10 Aug 2026 7:49 PM IST
Electric Car Battery Life Explained in Hindi
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Electric Car Battery Life Explained in Hindi

Electric Car Battery Life Explained: इलेक्ट्रिक कार को देखकर सबसे बड़ा भ्रम यह होता है कि उसमें इंजन नहीं है। गियरबॉक्स बहुत सरल है। पेट्रोल टैंक नहीं है और चलने वाले पुर्जे भी कम हैं। तो वह पेट्रोल कार से हल्की और सस्ती क्यों नहीं हो जाती? वास्तविकता यह है कि इलेक्ट्रिक वाहन का सबसे महँगा और सबसे भारी हिस्सा उसका इंजन नहीं। बल्कि बैटरी पैक होता है। आधुनिक इलेक्ट्रिक कार में लगी बैटरी केवल मोबाइल फोन की बहुत बड़ी बैटरी नहीं होती। वह हजारों विद्युत कोशिकाओं, भारी सुरक्षा आवरण, ताप नियंत्रक व्यवस्था, विद्युत संयोजनों, सेंसर, शीतलक पाइप, अग्नि सुरक्षा, बैटरी प्रबंधन प्रणाली और मजबूत संरचनात्मक ढाँचे का विशाल समूह होती है। यही कारण है कि मध्यम आकार की इलेक्ट्रिक कार में 50 से 80 किलोवाट-घंटा क्षमता की बैटरी कई सौ किलोग्राम वजन की हो सकती है। बड़े और लंबी दूरी वाले वाहनों में बैटरी इससे भी भारी हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार 2025 में यूरोपीय संघ में बिकने वाली बैटरी इलेक्ट्रिक कारों की औसत बैटरी क्षमता लगभग 70 किलोवाट-घंटा, चीन में 60 किलोवाट-घंटा से कम और अमेरिका में लगभग 90 किलोवाट-घंटा थी। जितनी अधिक क्षमता, उतनी अधिक कोशिकाएँ, अधिक पदार्थ, अधिक सुरक्षा और सामान्यतः अधिक वजन तथा लागत।

क्या है किलोवाट-आवर?

सबसे पहले ‘किलोवाट-ऑवर’ को समझना जरूरी है, क्योंकि बैटरी की पूरी अर्थव्यवस्था इसी संख्या से शुरू होती है। किलोवाट शक्ति की इकाई है, जबकि किलोवाट-घंटा ऊर्जा की मात्रा बताता है। यदि किसी बैटरी की क्षमता 60 किलोवाट-घंटा है, तो सैद्धांतिक रूप से वह 60 किलोवाट शक्ति एक घंटे तक, 30 किलोवाट दो घंटे तक या 6 किलोवाट दस घंटे तक दे सकती है। हालांकि वास्तविक वाहन में तापमान, गति, विद्युत हानि और सुरक्षित उपयोग सीमा के कारण पूरा गणित थोड़ा अलग होता है।


यदि किसी इलेक्ट्रिक कार को औसतन 15 किलोवाट-घंटा ऊर्जा में 100 किलोमीटर चलाया जा सकता है, तो 60 किलोवाट-घंटा बैटरी से आदर्श परिस्थितियों में लगभग 400 किलोमीटर की सीमा निकलती है। लेकिन तेज गति, वातानुकूलन, चढ़ाई, ठंडा या अत्यधिक गर्म मौसम, टायर का दबाव, वाहन का भार और बैटरी की उम्र इस दूरी को घटा सकते हैं। अमेरिकी ऊर्जा विभाग के अनुसार आधुनिक हल्के इलेक्ट्रिक वाहन 100 मील चलने में लगभग 25 से 40 किलोवाट-घंटा ऊर्जा खर्च कर सकते हैं, जो उनकी ऊँची ऊर्जा दक्षता दिखाता है।

क्यों भरी होती है बैटरी?

बैटरी भारी क्यों है, इसका वास्तविक उत्तर ऊर्जा-घनत्व में छिपा है। ऊर्जा-घनत्व बताता है कि एक किलोग्राम पदार्थ में कितनी विद्युत ऊर्जा संग्रहित की जा सकती है। आधुनिक लिथियम-आयन कोशिकाओं की विशिष्ट ऊर्जा रसायन के अनुसार बदलती है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के 2026 विश्लेषण में नवीन सोडियम-आयन कोशिकाओं के लिए लगभग 175 वाट-घंटा प्रति किलोग्राम, एलएफपी यानी लिथियम-आयरन-फॉस्फेट कोशिकाओं के लिए लगभग 205 वाट-घंटा प्रति किलोग्राम और निकेल-आधारित एनएमसी कोशिकाओं के लिए लगभग 255 वाट-घंटा प्रति किलोग्राम तक के स्तर बताए गए हैं। यह कोशिका स्तर का आंकड़ा है। पूरा बैटरी पैक इससे भारी होता है क्योंकि उसमें आवरण, शीतलन, तार, नियंत्रण व्यवस्था और सुरक्षा संरचना भी जुड़ जाती है।

यहीं पेट्रोल और बैटरी के बीच सबसे बड़ा भौतिक अंतर सामने आता है। पेट्रोल में प्रति किलोग्राम रासायनिक ऊर्जा बैटरी की तुलना में बहुत अधिक होती है। पेट्रोल का इंजन उस ऊर्जा का बड़ा हिस्सा गर्मी और निकास में गंवा देता है, जबकि इलेक्ट्रिक मोटर ऊर्जा को पहियों तक पहुँचाने में कहीं अधिक दक्ष है। फिर भी ईंधन के वजन की दृष्टि से पेट्रोल असाधारण रूप से ऊर्जा-सघन है। यही कारण है कि 40 या 50 लीटर पेट्रोल का टैंक कार को सैकड़ों किलोमीटर चला सकता है, जबकि उतनी ही दूरी के लिए इलेक्ट्रिक कार को कई सौ किलोग्राम की बैटरी चाहिए। इलेक्ट्रिक वाहन की समस्या मोटर की दक्षता नहीं, ऊर्जा को अपने साथ लेकर चलने की भारी कीमत है।

इसे सरल गणित से समझें। मान लें किसी बैटरी कोशिका की औसत ऊर्जा-घनत्व 200 वाट-घंटा प्रति किलोग्राम है। 60 किलोवाट-घंटा का अर्थ 60,000 वाट-घंटा है। केवल कोशिकाओं के स्तर पर 60,000 को 200 से भाग देने पर लगभग 300 किलोग्राम वजन आता है। अब कोशिकाओं के बाहर मजबूत धातु संरचना, अग्नि सुरक्षा, शीतलक, तार, संपर्क यंत्र, इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण और दुर्घटना में सुरक्षा देने वाला बाहरी ढाँचा जोड़ें तो पूरा पैक कई दर्जन या सौ से अधिक किलोग्राम और भारी हो सकता है। यही कारण है कि समान आकार की इलेक्ट्रिक कार अक्सर पेट्रोल संस्करण से कई सौ किलोग्राम भारी होती है। एलएफपी बैटरी अपेक्षाकृत सस्ती, सुरक्षित और लंबी आयु वाली हो सकती है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार उसकी प्रति किलोग्राम ऊर्जा-घनत्व एनएमसी पैक से लगभग पाँचवाँ हिस्सा कम हो सकती है। प्रति आयतन ऊर्जा-घनत्व लगभग एक-तिहाई कम। इसलिए समान दूरी के लिए एलएफपी पैक कुछ अधिक बड़ा या भारी हो सकता है।

बैटरी की कीमत का फार्मूला

बैटरी की कीमत का भी सीधा संबंध किलोवाट-घंटा से है। यदि किसी बैटरी पैक की औसत लागत उदाहरण के लिए 100 डॉलर प्रति किलोवाट-घंटा हो, तो 60 किलोवाट-घंटा पैक की उत्पादन लागत लगभग 6,000 डॉलर बैठ सकती है। वास्तविक वाहन में यह संख्या निर्माता, देश, बैटरी रसायन, मात्रा और आपूर्ति श्रृंखला के अनुसार काफी बदल सकती है।


2025 में वैश्विक औसत बैटरी कीमतों में लगभग 8 प्रतिशत की और गिरावट आई थी। चीन में बैटरी पैक की औसत कीमत उत्तर अमेरिका से लगभग 30 प्रतिशत और यूरोप से लगभग 35 प्रतिशत कम थी। उसी वर्ष एलएफपी पैक औसतन एनएमसी विकल्पों से 40 प्रतिशत से भी अधिक सस्ते थे। इससे स्पष्ट होता है कि किसी कार की बैटरी कीमत केवल लिथियम के भाव से नहीं। बल्कि रसायन, उत्पादन पैमाने, स्थानीय उद्योग और तकनीकी दक्षता से तय होती है।

बैटरी के महंगे कॉम्पोनेन्ट

बैटरी में सबसे महँगा हिस्सा केवल लिथियम नहीं है। कैथोड में प्रयुक्त निकेल, कोबाल्ट, मैंगनीज, लिथियम, एनोड में ग्रेफाइट, तांबा और एल्युमिनियम जैसे पदार्थ, विशेष विभाजक, इलेक्ट्रोलाइट, उच्च शुद्धता वाली निर्माण प्रक्रिया और सुरक्षा जाँच—सभी लागत बढ़ाते हैं। एनएमसी बैटरी में निकेल और कोबाल्ट जैसे पदार्थ अधिक महँगे और भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो सकते हैं। एलएफपी बैटरी में कोबाल्ट और निकेल नहीं होते, इसलिए उसका पदार्थ खर्च कम हो सकता है। यही कारण है कि चीन सहित कई निर्माता छोटी और मध्यम दूरी वाली इलेक्ट्रिक कारों में एलएफपी बैटरी को तेजी से अपना रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी बताती है कि 2025 में एलएफपी की बहुत कम कीमतों ने वैश्विक बैटरी लागत घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

बैटरी महँगी इसलिए भी है क्योंकि उसमें सुरक्षा के लिए अत्यधिक इंजीनियरिंग करनी पड़ती है। किसी कार की बैटरी सैकड़ों वोल्ट पर काम कर सकती है और उसमें इतनी ऊर्जा होती है कि गंभीर आंतरिक खराबी की स्थिति में आग लग सकती है। इसलिए पैक को दुर्घटना, पानी, कंपन, अधिक तापमान, अधिक चार्ज, शॉर्ट सर्किट और दूसरे जोखिमों के विरुद्ध सुरक्षित बनाना पड़ता है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग के अनुसार आधुनिक इलेक्ट्रिक वाहन उच्च वोल्टेज प्रणालियों पर चलते हैं, जो लगभग 400 से 1,000 वोल्ट तक हो सकती हैं। और बैटरी पैकों को अधिक चार्ज, कंपन, अत्यधिक तापमान, शॉर्ट सर्किट, नमी, आग, टक्कर तथा पानी में डूबने जैसी परिस्थितियों के परीक्षणों से गुजरना पड़ता है।

बैटरी प्रबंधन प्रणाली इस पूरे पैक का मस्तिष्क होती है। हजारों कोशिकाओं में से यदि कुछ अत्यधिक गर्म हो जाएँ, कुछ अधिक चार्ज हों और कुछ कम, तो पूरी बैटरी की आयु और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। इसलिए इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण प्रत्येक समूह का वोल्टेज, तापमान और चार्ज स्थिति लगातार देखता है। अच्छी कारें बैटरी को अत्यधिक गर्म या ठंडा होने से बचाने के लिए तरल शीतलन और ताप नियंत्रण इस्तेमाल करती हैं। यही तकनीक बैटरी की जिंदगी बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग के अनुसार तापमान, चार्जिंग की आदत, बैटरी रसायन, डिजाइन और वाहन की ताप-नियंत्रण प्रणाली बैटरी जीवन को प्रभावित करते हैं।

कितने साल चलती है बैटरी?

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न - इलेक्ट्रिक कार की बैटरी कितने साल चलती है? इसका कोई एक निश्चित उत्तर नहीं है, क्योंकि बैटरी बल्ब की तरह एक दिन अचानक ‘समाप्त’ नहीं होती। अधिकतर लिथियम-आयन बैटरियाँ धीरे-धीरे अपनी क्षमता खोती हैं। नई बैटरी यदि 400 किलोमीटर की वास्तविक दूरी देती है तो कई वर्षों बाद वही पूर्ण चार्ज पर 350 या 320 किलोमीटर दे सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि बैटरी पूरी तरह खराब हो गई। मोटर वाहन उद्योग आम तौर पर बैटरी की शुरुआती क्षमता का लगभग 70 प्रतिशत शेष रहने को उपयोगी मोटर वाहन जीवन के महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु के रूप में देखता है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग से जुड़ी जानकारी के अनुसार कार में उपयोग समाप्त होने के समय भी बैटरी में 70 प्रतिशत या उससे अधिक प्रारंभिक क्षमता शेष हो सकती है। वह स्थिर ऊर्जा भंडारण में कई वर्ष और काम कर सकती है।

वास्तविक जीवन के आधुनिक आंकड़े बैटरी आयु को लेकर पहले की तुलना में काफी आश्वस्त करते हैं। अमेरिकी वैकल्पिक ईंधन डेटा केंद्र के अनुसार कई निर्माता लगभग 8 वर्ष या 1,00,000 मील, यानी करीब 1.6 लाख किलोमीटर की बैटरी वारंटी देते हैं। मॉडलिंग से आज की बैटरियों की संभावित आयु मध्यम जलवायु में लगभग 12 से 15 वर्ष और अत्यधिक गर्म या ठंडे क्षेत्रों में लगभग 8 से 12 वर्ष आंकी गई है। इसलिए ‘हर पाँच साल में पूरी बैटरी बदलनी पड़ेगी’ जैसा सामान्य दावा आधुनिक इलेक्ट्रिक कारों के लिए सही नहीं है।

वास्तविक विफलता के आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं। अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने लगभग 15,000 पुराने और नए प्लग-इन वाहनों के अध्ययन का उल्लेख करते हुए बताया कि 2011 से 2023 मॉडल वर्षों में, वापस बुलाए गए वाहनों को छोड़कर, बैटरी बदलने की कुल दर लगभग 1.5 प्रतिशत थी। 2016 से 2023 मॉडल वर्ष की अपेक्षाकृत नई तकनीक वाली गाड़ियों में बैटरी विफलता के कारण बदलने की दर एक प्रतिशत से काफी कम रही। इसका अर्थ यह नहीं कि कोई बैटरी कभी खराब नहीं होगी। केवल इतना कि आधुनिक ताप-नियंत्रित बैटरियों में समय से पहले पूरी विफलता पहले की तुलना में दुर्लभ दिखाई देती है।

क्यों घटती है बैटरी की उम्र?

बैटरी की उम्र दो अलग प्रक्रियाओं से घटती है—एक समय के साथ और दूसरी उपयोग के साथ। गाड़ी खड़ी रहने पर भी रासायनिक प्रतिक्रिया धीरे-धीरे कोशिका को बूढ़ा करती है। इसे कैलेंडर आयु क्षय कहा जा सकता है। दूसरी ओर बार-बार चार्ज और डिस्चार्ज करने से चक्र-आधारित क्षय होता है। तापमान, कितनी गहराई तक बैटरी खाली की जाती है। और कितने उच्च चार्ज स्तर पर लंबे समय तक रखी जाती है , इनका प्रभाव पड़ता है। राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा प्रयोगशाला के शोध में तापमान, चार्ज अवस्था और रोज की चार्ज-डिस्चार्ज गहराई को बैटरी क्षमता और शक्ति घटने के प्रमुख कारणों में शामिल किया गया है।




यही कारण है कि कुछ बैटरी रसायनों में रोज 100 प्रतिशत चार्ज करने की सलाह नहीं दी जाती, जबकि एलएफपी में निर्माता समय-समय पर 100 प्रतिशत चार्ज की अनुमति या सलाह दे सकते हैं। एनएमसी बैटरी को हमेशा लंबे समय तक पूर्ण चार्ज पर रखना दीर्घकालीन क्षय बढ़ा सकता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी भी एलएफपी के लाभों में यह बताती है कि उसे आवश्यकता पड़ने पर 100 प्रतिशत चार्ज तक ले जाना दीर्घकालिक प्रदर्शन के लिए एनएमसी की तुलना में कम समस्या पैदा करता है, जबकि कई एनएमसी प्रणालियों में आयु बचाने के लिए सामान्य उपयोग सीमा लगभग 80 प्रतिशत के आसपास रखने की सलाह दी जाती है।

मसला फ़ास्ट चार्जिंग का

तेज चार्जिंग भी एक जटिल विषय है। कभी-कभार लंबी यात्रा में तेज चार्जर इस्तेमाल करना सामान्य आधुनिक वाहन के लिए बनाया ही गया है। लेकिन अत्यधिक बार उच्च शक्ति पर चार्ज करना, खासकर बहुत गर्म या बहुत ठंडी बैटरी में, क्षय बढ़ा सकता है। इसी कारण आधुनिक कार चार्जिंग की गति स्वयं नियंत्रित करती है। बैटरी 10 से 50 प्रतिशत के बीच बहुत तेज चार्ज हो सकती है। लेकिन 80 प्रतिशत के बाद गति कम कर दी जाती है। ऐसा केवल उपयोगकर्ता को परेशान करने के लिए नहीं बल्कि बैटरी की सुरक्षा और रसायन की सीमाओं के कारण होता है।

भारत जैसे गर्म देश में तापमान महत्वपूर्ण है। अत्यधिक गर्मी लिथियम-आयन रसायन के क्षय को तेज कर सकती है। इसीलिए तरल शीतलन वाली आधुनिक कारें केवल आराम के लिए नहीं, बैटरी आयु के लिए भी बेहतर हो सकती हैं। बहुत सस्ती या खराब ताप-प्रबंधन वाली प्रणालियाँ कठोर गर्मी में अधिक तेजी से क्षमता खो सकती हैं। दूसरी ओर बेहद ठंडे देशों में बैटरी अस्थायी रूप से कम शक्ति और कम दूरी दे सकती है, क्योंकि ठंड में रासायनिक प्रतिक्रियाएँ धीमी होती हैं। इसलिए वास्तविक बैटरी जीवन वाहन के डिजाइन पर उतना ही निर्भर है जितना कोशिका के नाम पर।

सबसे महँगा पुर्जा

अब सबसे बड़ा डर, यदि बैटरी खराब हो गई तो कितने लाख रुपये लगेंगे? उत्तर वाहन के अनुसार बहुत बदलता है। बैटरी इलेक्ट्रिक कार का सबसे महँगा पुर्जा है और वारंटी समाप्त होने के बाद पूरा पैक बदलना वास्तव में महँगा हो सकता है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग भी स्पष्ट करता है कि वारंटी से बाहर पूर्ण बैटरी बदलना बड़ा खर्च हो सकता है। लेकिन पूरी बैटरी बदलना हर समस्या का समाधान नहीं होता। अनेक प्रणालियों में मॉड्यूल, शीतलन तंत्र, संपर्क यंत्र या नियंत्रण इकाई अलग सुधारी जा सकती है। भविष्य में मरम्मत और पुनर्निर्मित बैटरी उद्योग बढ़ने से लागत और कम हो सकती है।

इसमें एक आर्थिक परिवर्तन भी लगातार हो रहा है। पिछले दशक में बैटरी की कीमत नाटकीय रूप से गिरी है। 2025 में भी वैश्विक औसत कीमत 8 प्रतिशत कम हुई। जैसे-जैसे फैक्ट्रियाँ बड़ी हुईं, रसायन बदले, कोबाल्ट का उपयोग कम हुआ और एलएफपी का हिस्सा बढ़ा, प्रति किलोवाट-घंटा लागत नीचे आई। इसलिए आज खरीदी कार की बैटरी यदि दस या बारह साल बाद बदलनी पड़े तो यह आवश्यक नहीं कि उस समय भी उसकी कीमत आज जितनी ही हो। दूसरी तरफ खनिज कीमत, व्यापार युद्ध, कर और आपूर्ति बाधाएँ लागत बढ़ा भी सकती हैं। इसलिए भविष्य की सटीक कीमत अभी तय नहीं की जा सकती।

क्या हैं ईवी के फायदे?

इलेक्ट्रिक कार का सबसे बड़ा लाभ उसकी ऊर्जा दक्षता है। पेट्रोल या डीज़ल इंजन ईंधन की बड़ी ऊर्जा गर्मी, निकास और घर्षण में गंवा देता है। इलेक्ट्रिक मोटर बहुत अधिक प्रतिशत ऊर्जा को वास्तविक गति में बदल सकती है। यही कारण है कि छोटी मात्रा की विद्युत ऊर्जा में इलेक्ट्रिक कार काफी दूरी तय करती है। शहर में तो उसकी दक्षता और बेहतर हो सकती है क्योंकि ब्रेक लगाते समय मोटर जनरेटर बनकर कार की गतिज ऊर्जा का कुछ हिस्सा वापस बैटरी में भेज सकती है। इसे पुनर्योजी ब्रेकिंग कहा जाता है। पेट्रोल कार में ब्रेक लगाने पर अधिकांश गतिज ऊर्जा गर्मी बनकर नष्ट हो जाती है। इलेक्ट्रिक कार उसका एक हिस्सा वापस संग्रहित कर सकती है।

इलेक्ट्रिक कार का दूसरा बड़ा लाभ कम रखरखाव है। इसमें इंजन तेल बदलना नहीं पड़ता, स्पार्क प्लग नहीं होते, पारंपरिक इंजन और अनेक चलने वाले पुर्जे नहीं होते। अमेरिकी ऊर्जा विभाग के अनुसार शुद्ध इलेक्ट्रिक वाहनों में बैटरी, मोटर और विद्युत प्रणाली को बहुत कम नियमित रखरखाव चाहिए, तरल पदार्थ कम होते हैं और पुनर्योजी ब्रेकिंग के कारण ब्रेक की घिसावट भी कम हो सकती है। इसलिए लंबे समय में सेवा खर्च पेट्रोल-डीज़ल कार की तुलना में कम हो सकता है।

तीसरा लाभ शहरों की हवा है। शुद्ध इलेक्ट्रिक कार के निकास पाइप से धुआँ नहीं निकलता, क्योंकि उसमें निकास पाइप ही नहीं होता। इससे शहर में नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और स्थानीय निकास प्रदूषण कम होता है। लेकिन इसका अर्थ ‘शून्य प्रदूषण’ नहीं है। बिजली यदि कोयले से बनी है तो प्रदूषण बिजलीघर पर पैदा होगा। बैटरी बनाने में खनन और ऊर्जा लगती है। टायर और सड़क की घिसावट से कण निकलते हैं। फिर भी अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के अनुसार बिजली उत्पादन और निर्माण को जोड़ने के बाद भी एक सामान्य इलेक्ट्रिक वाहन का कुल जीवनकाल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन औसत नई पेट्रोल कार से कम रहता है, हालांकि वास्तविक लाभ उस देश के बिजली मिश्रण पर निर्भर करता है।

बैटरी का पर्यावरण पर प्रभाव

बैटरी निर्माण स्वयं पर्यावरण की दृष्टि से मुफ्त नहीं है। लिथियम, निकेल, कोबाल्ट और ग्रेफाइट निकालने के लिए खनन, शोधन, परिवहन और बड़े कारखाने चाहिए। इसलिए इलेक्ट्रिक कार का निर्माण चरण, खासकर बड़ी बैटरी वाली कार में, पेट्रोल कार की तुलना में अधिक कार्बन उत्सर्जन पैदा कर सकता है। लेकिन उपयोग के दौरान पेट्रोल जलाना नहीं पड़ता और यही अंतर धीरे-धीरे प्रारंभिक अतिरिक्त उत्सर्जन की भरपाई कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के जीवन-चक्र विश्लेषण में इलेक्ट्रिक वाहन वैश्विक स्तर पर आंतरिक दहन इंजन वाहनों की तुलना में पहले ही उत्सर्जन लाभ देते पाए गए हैं।

इसलिए एक बहुत बड़ी इलेक्ट्रिक एसयूवी को छोटी पेट्रोल हैचबैक से तुलना करके ‘इलेक्ट्रिक हमेशा शून्य प्रदूषण’ कहना भी गलत है। वाहन जितना भारी, उसकी बैटरी उतनी बड़ी और उत्पादन में पदार्थ उतना अधिक। फिर भी IEA के विश्लेषण में बड़ी बैटरी इलेक्ट्रिक एसयूवी भी समान आंतरिक दहन वाहन से जीवनकाल उत्सर्जन में काफी बेहतर पाई गई और मध्यम पेट्रोल वाहन की तुलना में भी लगभग 40 प्रतिशत कम जीवन-चक्र उत्सर्जन का उदाहरण दिया गया है...आगे की खबर पढ़ने के लिए Next Page पर क्लिक करें

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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