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Face Recognition कैसे काम करता है, चेहरा पहचानने की पूरी Science, कौन था इसका पहला Pioneer?
Face Recognition Technology चेहरे को कैसे पहचानती है? जानिए Face Detection, AI, Face Embedding, Face ID, Eigenfaces, FaceNet और Woodrow Bledsoe से लेकर आधुनिक Deep Learning तक की पूरी कहानी।
Face Recognition Technology
Face Recognition Technology: किसी मोबाइल फोन को चेहरे के सामने करते ही उसका ताला खुल जाना आज इतना सामान्य हो गया है कि हमें इसमें कोई विशेष बात दिखाई नहीं देती। हवाई अड्डे पर कैमरा किसी यात्री की पहचान कर सकता है, किसी फोटो संग्रह में सॉफ्टवेयर हजारों तस्वीरों के बीच एक ही व्यक्ति की तस्वीरें खोज सकता है और सुरक्षा एजेंसी लाखों चेहरों के संग्रह में किसी संदिग्ध चेहरे से मिलता-जुलता चेहरा तलाश सकती है। लेकिन इस पूरी तकनीक के पीछे एक अत्यंत रोचक विचार है - कंप्यूटर वास्तव में आपका चेहरा उसी तरह नहीं ‘देखता’ जैसे कोई मनुष्य देखता है। वह चेहरे को पहले एक चित्र से गणितीय आंकड़ों में बदलता है और फिर उन आंकड़ों की तुलना करता है। आधुनिक चेहरा पहचानने का मूल खेल यही है। चेहरे की पहचान किसी एक आविष्कारक की खोज नहीं है; इसकी कहानी 1960 के दशक में शुरू हुए अर्ध-स्वचालित प्रयोगों से 1990 के दशक की गणितीय Eigenfaces तकनीक और फिर आज के गहरे तंत्रिका-जाल तक फैली हुई है।
चेहरा ढूँढना और चेहरा पहचानना दो अलग चीजें
सबसे पहले यह फर्क समझना आवश्यक है कि चेहरा ढूँढना और चेहरा पहचानना दो अलग चीजें हैं। यदि कैमरे की तस्वीर में दस लोग खड़े हैं तो पहला काम यह पता लगाना है कि तस्वीर के किन हिस्सों में मानव चेहरे हैं। इसे फेस डिटेंशन कहते हैं। इसके बाद कंप्यूटर यह जानने की कोशिश कर सकता है कि सामने मौजूद चेहरा पहले से दर्ज किसी व्यक्ति का है या नहीं, यह चेहरा पहचानना है। तीसरी अलग तकनीक चेहरे का विश्लेषण है, जिसमें चेहरे से उम्र, भाव, दिशा या दूसरी विशेषताओं का अनुमान लगाने की कोशिश की जाती है। अमेरिका की मानक संस्था एनआईएसटी (NIST) भी इन तीन कामों को स्पष्ट रूप से अलग मानती है—चेहरे का पता लगाना तस्वीर में चेहरा खोजता है, चेहरे के पहचान की पुष्टि या खोज करता है और चेहरे का दशा या भाव क्या है? चेहरे की दूसरी विशेषताओं का अनुमान लगाता है।
अब मान लीजिए आपने अपने मोबाइल में चेहरा दर्ज किया। सबसे पहले कैमरा आपके चेहरे का चित्र लेता है। साधारण प्रणाली में यह सामान्य कैमरे की तस्वीर हो सकती है, जबकि अधिक सुरक्षित प्रणालियाँ गहराई, अवरक्त प्रकाश या दूसरे सेन्सर्स का भी उपयोग करती हैं। उदाहरण के लिए Apple का Face ID केवल सामान्य सामने वाले कैमरे की एक तस्वीर पर निर्भर नहीं करता। उसकी TrueDepth प्रणाली चेहरे पर हजारों अदृश्य अवरक्त बिंदु डालकर चेहरे की गहराई का नक्शा तैयार करती है और अवरक्त चित्र भी लेती है। फिर उपकरण का तंत्रिका-प्रसंस्करण भाग इस पूरी जानकारी को गणितीय प्रतिनिधित्व में बदलता है और पहले से दर्ज चेहरे से तुलना करता है। इसीलिए सुरक्षित चेहरा किसका और केवल ‘सेल्फी देखकर फोन खोलने’ वाली सस्ती प्रणाली में सुरक्षा का बहुत बड़ा अंतर हो सकता है।
चेहरा मिल जाने के बाद अगला काम उसे सीधा और सामान्य रूप में लाना होता है। आपने सिर थोड़ा घुमाया हो सकता है, कैमरा ऊपर हो सकता है, रोशनी एक तरफ से आ रही हो सकती है या चेहरे का आकार तस्वीर में बड़ा-छोटा हो सकता है। प्रणाली आँखों, नाक, मुंह और चेहरे की दूसरी प्रमुख स्थितियों का अनुमान लगाकर चेहरे को एक मानक दिशा में व्यवस्थित करने की कोशिश करती है। इसे सामान्यतः alignment कहा जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि तुलना करते समय यह फर्क न पड़े कि एक फोटो में आपकी आँखों के बीच दूरी 100 पिक्सेल और दूसरी में 220 पिक्सेल दिखाई दे रही है। प्रणाली पहले दोनों चेहरों को लगभग समान पैमाने और दिशा में लाती है।
अल्गोरिद्म का कमाल
पुरानी चेहरा पहचानने की प्रणालियाँ चेहरे को कुछ स्पष्ट नापों से पहचानने की कोशिश करती थीं। उदाहरण के लिए आँखों के बीच दूरी कितनी है, नाक कहाँ है, मुंह कितना चौड़ा है, कान और ठुड्डी की स्थिति क्या है। NIST भी सरल व्याख्या में बताता है कि चेहरा पहचानने वाले एल्गोरिद्म चेहरे की विशेषताओं, उनके आकार और एक-दूसरे से दूरी जैसी चीजों का उपयोग कर सकते हैं। लेकिन आधुनिक प्रणालियाँ इससे कहीं अधिक जटिल हैं। वे केवल दस या बीस नाप नहीं लेतीं, बल्कि पूरे चेहरे से सैकड़ों या हजारों सूक्ष्म दृश्य पैटर्न सीख सकती हैं।
यहीं चेहरे का गणितीय प्रतिनिधित्व बनता है। इसे अक्सर face template या embedding कहा जाता है। इसका अर्थ आपकी फोटो की छोटी प्रति नहीं है। कल्पना कीजिए कि प्रणाली आपके चेहरे को 128, 256 या उससे अधिक संख्याओं की एक गणितीय सूची में बदल दे। इन संख्याओं का संयुक्त पैटर्न चेहरे की पहचान का प्रतिनिधित्व करता है। दूसरी तस्वीर आने पर उसे भी उसी तरह संख्याओं में बदला जाता है। फिर दोनों गणितीय प्रतिनिधित्वों के बीच दूरी या समानता मापी जाती है। यदि दूरी बहुत कम है तो संभावना अधिक है कि दोनों तस्वीरें एक ही व्यक्ति की हैं; यदि दूरी अधिक है तो वे अलग व्यक्तियों के चेहरे माने जाते हैं।
यह प्रणाली यह सीखती कैसे है कि कौन-सा चेहरा किसके करीब होना चाहिए? इसके लिए विशाल संख्या में चेहरे वाली तस्वीरों पर कृत्रिम तंत्रिका-जाल को प्रशिक्षित किया जाता है। प्रशिक्षण के दौरान प्रणाली को एक ही व्यक्ति की अलग तस्वीरें और दूसरे लोगों की तस्वीरें दिखाई जाती हैं। धीरे-धीरे वह यह सीखती है कि कौन-सी विशेषताएँ व्यक्ति की पहचान के लिए स्थिर और उपयोगी हैं तथा कौन-सी चीजें बदल सकती हैं, जैसे रोशनी, मुस्कान, कैमरे का कोण, बाल या कुछ हद तक उम्र। FaceNet ने प्रशिक्षण में ऐसा तरीका इस्तेमाल किया जिसमें एक व्यक्ति की दो तस्वीरों को पास और किसी दूसरे व्यक्ति की तस्वीर को उनसे दूर रखने की गणितीय कोशिश की जाती थी। उद्देश्य यह नहीं था कि कंप्यूटर को कहा जाए “नाक इतनी है, आँख इतनी है”। बल्कि उसे उदाहरणों से स्वयं चेहरे की पहचान योग्य विशेषताएँ सीखने दी जाएँ।
डीप लर्निंग आधारित सिस्टम
इससे आधुनिक Face Recognition की एक अद्भुत बात समझ आती है। सॉफ्टवेयर को जरूरी नहीं कि मनुष्य की तरह पता हो कि “यह नाक है और यह भौंह है।” तंत्रिका-जाल चेहरे के भीतर ऐसे जटिल दृश्य पैटर्न सीख सकता है जिन्हें मनुष्य आसानी से शब्दों में वर्णित ही नहीं कर सकता। उसकी मध्यवर्ती परतों में बन रही पहचान आँख, त्वचा, आकृति, किनारों और अनेक सूक्ष्म संरचनाओं का ऐसा मिश्रण हो सकती है जिसका कोई सरल मानवीय नाम नहीं। यही Deep Learning आधारित प्रणालियों की ताकत है।
अब दो प्रकार की पहचान समझना जरूरी है—1:1 और 1:N। मान लीजिए आपने मोबाइल में अपना चेहरा पहले से दर्ज किया है। फोन के सामने चेहरा रखने पर प्रश्न यह है—“क्या अभी सामने वाला चेहरा उसी व्यक्ति का है जिसका चेहरा इस फोन में दर्ज है?” यह एक बनाम एक तुलना है। इसे 1:1 verification कहा जाता है। पासपोर्ट द्वार पर भी ऐसी व्यवस्था हो सकती है। कैमरे से लिया गया चेहरा पासपोर्ट या सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद उसी व्यक्ति के चेहरे से मिलाया जाए। NIST इस प्रकार की प्रणालियों का अलग परीक्षण करता है।
दूसरी स्थिति कहीं अधिक कठिन है। पुलिस के पास किसी संदिग्ध की CCTV तस्वीर है और उसके पास दस लाख चेहरों का संग्रह है। सवाल अब यह नहीं है कि “क्या यह रमेश है?” बल्कि है—“इन दस लाख लोगों में यह कौन हो सकता है?” यह 1:N identification है। प्रणाली एक चेहरे की तुलना पूरे संग्रह से करती है और सबसे अधिक मिलते उम्मीदवार सामने रख सकती है। संख्या जितनी बड़ी होगी, गलती और गलत उम्मीदवार आने का प्रश्न उतना महत्वपूर्ण हो जाता है। NIST इस प्रकार की विशाल-संग्रह पहचान का भी स्वतंत्र परीक्षण करता है और इसमें उपयोग की जाने वाली सीमा। यानी कितनी समानता पर चेहरे को संभावित मिलान माना जाए—बहुत महत्वपूर्ण होती है।
अलग है मोबाइल की तकनीक
यही कारण है कि मोबाइल Face Unlock और पुलिस की भीड़ में पहचान तकनीक को एक ही पैमाने से नहीं देखना चाहिए। मोबाइल को सामान्यतः पहले से पता है कि उसे किस एक चेहरे से तुलना करनी है। पुलिस खोज प्रणाली को हजारों या लाखों चेहरों में से संभावित व्यक्ति चुनना पड़ सकता है। पहले मामले में प्रश्न अपेक्षाकृत सीमित है। दूसरे में गलत सकारात्मक परिणाम का सामाजिक और कानूनी प्रभाव बहुत अधिक हो सकता है।
कैसे हुई शुरुआत?
अब इसके इतिहास पर लौटते हैं। Face Recognition की शुरुआती कहानी अमेरिकी गणितज्ञ और कंप्यूटर वैज्ञानिक Woodrow Wilson Bledsoe से जुड़ी है। टेक्सस विश्वविद्यालय के उनके स्मृति-लेख के अनुसार 1964 और 1965 में Bledsoe ने Helen Chan और Charles Bisson के साथ कंप्यूटर द्वारा मानव चेहरा पहचानने पर काम किया। उन दिनों कंप्यूटर इतने शक्तिशाली नहीं थे कि आज की तरह पूरी तस्वीर स्वयं समझ लें। इसलिए मानव संचालक चेहरे की तस्वीरों में आँखों, नाक, मुंह और दूसरी प्रमुख जगहों को चिह्नित करता था। फिर कंप्यूटर इन मापों के आधार पर तुलना करता था। इसे आधुनिक पूर्ण स्वचालित Face Recognition नहीं कहा जा सकता।लेकिन तकनीक की प्रारंभिक नींव यहीं दिखाई देती है।
इसलिए “Face Recognition का आविष्कार किसने किया?” का सबसे संतुलित उत्तर यह है कि Woodrow Bledsoe को शुरुआती कंप्यूटर-आधारित चेहरा पहचान प्रयोगों के प्रमुख अग्रदूतों में माना जाता है, लेकिन आधुनिक Face Recognition किसी एक व्यक्ति की अकेली खोज नहीं है। अगले छह दशकों में गणितज्ञों, कंप्यूटर वैज्ञानिकों, सरकारी अनुसंधान कार्यक्रमों और तकनीकी कंपनियों ने अलग-अलग चरणों में इसे विकसित किया।
1980 और 1990 के दशक में चेहरे को गणितीय रूप से समझने का तरीका बदल गया। Lawrence Sirovich और Michael Kirby ने चेहरे की तस्वीरों को कम संख्या के मुख्य गणितीय पैटर्न में व्यक्त करने की दिशा में काम किया। इसके बाद 1991 में MIT के Matthew Turk और Alex Pentland ने प्रसिद्ध Eigenfaces for Recognition पद्धति प्रस्तुत की। इसमें चेहरे की तस्वीर को हर आँख, नाक और मुंह के अलग नाप के रूप में नहीं। बल्कि पूरे चेहरे के प्रमुख गणितीय बदलावों के संयोजन के रूप में दर्शाया गया। इन विशेष पैटर्नों को Eigenfaces कहा गया। यह तकनीक अपने समय में बहुत प्रभावशाली बनी क्योंकि कंप्यूटर अब किसी चेहरे को कम आयाम वाले face space में रखकर दूसरे चेहरे से तुलना कर सकता था।
1993 में अमेरिकी रक्षा विभाग ने FERET यानी Face Recognition Technology कार्यक्रम शुरू किया। इसका उद्देश्य स्वचालित Face Recognition को प्रयोगशाला की अवधारणा से वास्तविक प्रदर्शन योग्य तकनीक की दिशा में ले जाना और अलग-अलग प्रणालियों की निष्पक्ष तुलना के लिए मानक चित्र-संग्रह तथा परीक्षण व्यवस्था बनाना था। NIST के अनुसार FERET कार्यक्रम सितंबर 1993 में शुरू हुआ और उसके शुरुआती उद्देश्यों में स्वचालित चेहरा पहचान प्रणालियों की व्यवहार्यता स्थापित करना तथा भविष्य की प्रगति मापने के लिए आधार तैयार करना था। इसके चित्र-संग्रह में हजारों तस्वीरें थीं और बाद के वर्षों में Face Recognition शोध में इस कार्यक्रम की बड़ी भूमिका रही।
इसके बाद 2000 के दशक में डिजिटल कैमरे, इंटरनेट पर तस्वीरों का विस्फोट, कंप्यूटर की तेज होती क्षमता और मशीन सीखने की तकनीकों ने इस क्षेत्र को तेजी से बदलना शुरू किया। फिर Deep Learning का दौर आया। विशाल तंत्रिका-जालों ने यह संभव किया कि एल्गोरिद्म चेहरे की आवश्यक विशेषताएँ स्वयं सीखें। NIST के परीक्षण बताते हैं कि 2014 से 2018 के बीच बड़े संग्रह में चेहरा खोजने वाले एल्गोरिद्म की क्षमता में अत्यंत तेज सुधार हुआ; NIST ने उस अवधि में कुछ परीक्षण परिस्थितियों में त्रुटि दर में लगभग बीस गुना सुधार दर्ज किया था। यह वही दौर था जब Deep Learning ने चेहरा पहचान की पुरानी तकनीकों को बड़े पैमाने पर पीछे छोड़ना शुरू किया।
कैसे काम करती है मशीन?
अब एक रोचक सवाल, यदि उम्र बढ़ जाए तो मशीन पहचान कैसे लेती है? आपने 25 वर्ष की उम्र में चेहरा दर्ज किया और अब 35 वर्ष के हैं। आधुनिक प्रणालियाँ केवल एक निश्चित फोटो से पिक्सेल-से-पिक्सेल तुलना नहीं करतीं। वे व्यक्ति की अधिक स्थायी चेहरे संबंधी संरचनाओं का गणितीय प्रतिनिधित्व सीखने की कोशिश करती हैं। बाल बढ़ना, दाढ़ी आना, चश्मा लगाना या सामान्य उम्र परिवर्तन के बावजूद कई मूल विशेषताएँ बनी रहती हैं। Apple उदाहरण के लिए बताता है कि Face ID दाढ़ी बढ़ने या श्रृंगार जैसे क्रमिक बदलावों के अनुसार अनुकूलित हो सकता है; बहुत बड़ा बदलाव होने पर वह पहले पासकोड से पहचान की अतिरिक्त पुष्टि मांग सकता है।
लेकिन मशीन अचूक नहीं है। रोशनी बहुत खराब हो, चेहरा बहुत छोटा हो, सिर अत्यधिक मुड़ा हो, कैमरा खराब हो या चेहरे का बड़ा हिस्सा ढका हो तो पहले चरण में ही ठीक template बनाना कठिन हो सकता है। कोविड के दौरान मास्क ने इस समस्या को बहुत स्पष्ट किया। NIST ने मास्क वाले चेहरों पर सैकड़ों एल्गोरिद्म का परीक्षण किया और पाया कि चेहरे का हिस्सा ढकने से प्रणालियों के प्रदर्शन पर असर पड़ सकता है, हालांकि बाद की प्रणालियों ने मास्क को ध्यान में रखकर काफी सुधार किया।
अब सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रश्न—क्या किसी की फोटो दिखाकर Face Recognition को धोखा दिया जा सकता है? कमजोर व्यवस्था में संभव है। यदि कोई सस्ता मोबाइल केवल सामान्य सामने वाले कैमरे की दो-आयामी तस्वीर से चेहरा मिला रहा है और यह नहीं जांच रहा कि सामने जीवित त्रि-आयामी व्यक्ति है या नहीं, तो छपी तस्वीर, दूसरे फोन पर चलाया गया वीडियो या दूसरी चालें समस्या बन सकती हैं। इसे presentation attack कहा जाता है। NIST के अनुसार ऐसे हमलों में किसी की छपी हुई फोटो, स्क्रीन पर डिजिटल तस्वीर या नकली मुखौटा कैमरे के सामने रखा जा सकता है। आधुनिक अधिक सुरक्षित प्रणालियाँ इसलिए liveness या presentation attack detection जैसे उपाय जोड़ती हैं।
Apple Face ID जैसी प्रणाली में इसीलिए गहराई का नक्शा और अवरक्त चित्र उपयोगी हैं। एक सपाट छपी फोटो में वास्तविक चेहरे जैसी त्रि-आयामी गहराई नहीं होती। इसके अलावा प्रणाली आँखों की उपस्थिति और ध्यान जैसी चीजें भी देख सकती है। इससे सामान्य फोटो से धोखा देना कठिन हो जाता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि दुनिया की हर Face Recognition प्रणाली इतनी ही सुरक्षित है। Face Recognition एक व्यापक तकनीकी नाम है।उसके नीचे बेहद साधारण से लेकर अत्यधिक उन्नत प्रणालियाँ मौजूद हैं।
डीपफेक की चुनौती
Deepfake ने इस सुरक्षा संघर्ष को और जटिल बनाया है। अब हमलावर केवल छपी फोटो नहीं, कृत्रिम रूप से बनाया हुआ वीडियो या डिजिटल चेहरा प्रस्तुत कर सकता है। NIST इसी कारण भौतिक presentation attacks के साथ डिजिटल injection attacks का भी अध्ययन करता है, जिसमें कैमरा उपयोग किए बिना नकली डिजिटल चित्र या वीडियो सीधे प्रणाली में डालने की कोशिश की जाती है। यानी सुरक्षा की अगली लड़ाई केवल “यह चेहरा किसका है?” नहीं बल्कि “क्या यह कैमरे के सामने मौजूद वास्तविक जीवित व्यक्ति का वास्तविक चित्र है?” भी है।
कितना सटीक है ये सिस्टम?
इसके बाद बड़ा प्रश्न है—Face Recognition कितना सटीक है? इसका कोई एक प्रतिशत उत्तर नहीं है। सटीकता एल्गोरिद्म, कैमरे की गुणवत्ता, रोशनी, चेहरे का आकार, डेटाबेस, उम्र, तस्वीरों के बीच समय और यह 1:1 है या 1:N—इन सब पर निर्भर करती है। आधुनिक श्रेष्ठ एल्गोरिद्म अच्छी गुणवत्ता वाली तस्वीरों में बेहद उच्च सटीकता हासिल कर सकते हैं। NIST ने विमान-यात्री पहचान जैसे नियंत्रित वातावरण में श्रेष्ठ प्रणालियों को बहुत कम त्रुटि के साथ पहचान करते पाया है। लेकिन खराब CCTV तस्वीर, दस साल पुराना फोटो और लाखों लोगों का संग्रह उसी एल्गोरिद्म के लिए कहीं कठिन समस्या हो सकता है।
और यहाँ दो अलग तरह की गलतियाँ होती हैं। एक है false negative—व्यक्ति वही है, लेकिन मशीन कहती है कि मेल नहीं हुआ। उदाहरण के लिए आपका अपना फोन आपको पहचानने से मना कर दे। यह परेशान करने वाला है, लेकिन सामान्यतः पासकोड से समाधान हो सकता है। दूसरी है false positive—व्यक्ति कोई और है लेकिन मशीन कहती है कि शायद यही व्यक्ति है। अपराध जांच में यह कहीं अधिक गंभीर समस्या है, क्योंकि गलत व्यक्ति संभावित संदिग्ध बन सकता है। इसलिए पुलिस या सुरक्षा उपयोग में Face Recognition को अंतिम न्यायिक प्रमाण की तरह नहीं, एक खोज संकेत के रूप में इस्तेमाल करने की आवश्यकता पर जोर दिया जाता है।
इसी से पक्षपात का प्रश्न आता है। सभी चेहरों पर एल्गोरिद्म की त्रुटि दर हमेशा समान नहीं रही है। NIST के व्यापक परीक्षणों ने कई एल्गोरिद्म में उम्र, लिंग और विभिन्न जनसांख्यिकीय समूहों के बीच प्रदर्शन में अंतर पाया है, हालांकि अलग एल्गोरिद्म में अंतर की दिशा और मात्रा समान नहीं होती और समय के साथ तकनीक में सुधार भी हुआ है। इसका कारण प्रशिक्षण तस्वीरों की असमानता, कैमरे की गुणवत्ता, चित्र लेने की परिस्थितियाँ और स्वयं एल्गोरिद्म सहित कई चीजें हो सकती हैं। इसलिए “मशीन है, इसलिए निष्पक्ष होगी” मान लेना सुरक्षित नहीं है।
चेहरा पासवर्ड नहीं
Face Recognition की सबसे संवेदनशील बात यह है कि चेहरा पासवर्ड नहीं है। पासवर्ड चोरी हो जाए तो आप नया बना सकते हैं। बैंक कार्ड खो जाए तो नया कार्ड मिल सकता है। लेकिन चेहरा जीवनभर आपके साथ है और सार्वजनिक स्थानों पर स्वाभाविक रूप से दिखाई देता है। आपकी फोटो सोशल मीडिया, पहचानपत्र, समाचार, CCTV और पारिवारिक तस्वीरों में हो सकती है। इसलिए चेहरे से बनी जैवमितीय पहचान की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि किसी संस्था के पास लाखों लोगों के face templates हैं तो उस संग्रह की चोरी साधारण पासवर्ड सूची की चोरी से अलग तरह का खतरा पैदा करती है।
इसी कारण अच्छे मोबाइल उपकरण कोशिश करते हैं कि आपका मूल चेहरा या उसका सुरक्षित गणितीय प्रतिनिधित्व सामान्य बादल-भंडारण में न घूमे। Apple के अनुसार Face ID से संबंधित गणितीय जानकारी उपकरण के Secure Enclave में संरक्षित रहती है और Face ID का डेटा उपकरण से बाहर भेजना आवश्यक नहीं होता। इससे एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है—जहाँ संभव हो, जैवमितीय तुलना स्थानीय उपकरण पर ही की जाए।
लेकिन हवाई अड्डे, पुलिस और बड़े संस्थानों में व्यवस्था अलग हो सकती है। वहाँ एक केंद्रीय या साझा चेहरे का संग्रह हो सकता है। यदि हवाई अड्डे पर आपका चेहरा पासपोर्ट रिकॉर्ड से मिलाया जा रहा है तो यह सीमित 1:1 सत्यापन हो सकता है। यदि किसी शहर में कैमरों से आने वाले चेहरों को विशाल अपराधी संग्रह से लगातार मिलाया जाए तो वह 1:N निगरानी व्यवस्था होगी। तकनीक दोनों में लगभग समान परिवार की हो सकती है, लेकिन निजता और नागरिक स्वतंत्रता का प्रश्न बिल्कुल अलग है।
यही Face Recognition का ‘खेल’ भी है। तकनीकी रूप से यह एक शानदार उपलब्धि है—कंप्यूटर किसी चेहरे को सेकंड के छोटे हिस्से में गणितीय पहचान में बदल सकता है और करोड़ों संभावित चित्रों में समानता तलाश सकता है। लेकिन यही शक्ति निगरानी को भी पहले से कहीं आसान बना सकती है। पुराने समय में भी सार्वजनिक जगह पर व्यक्ति का चेहरा दिखाई देता था, लेकिन दस लाख CCTV तस्वीरों में उसे खोजने के लिए हजारों मनुष्यों को बैठाना लगभग असंभव था। Face Recognition इस लागत को बहुत कम कर देता है। इसलिए इस तकनीक पर विवाद केवल ‘यह सही पहचानती है या नहीं’ का नहीं। बल्कि “इसे किसे, किस उद्देश्य से और कितनी सीमा तक इस्तेमाल करने की अनुमति होनी चाहिए” का भी है।
यह तकनीक स्कूल में उपस्थिति दर्ज करने से लेकर बैंक में ग्राहक सत्यापन, कार्यालय प्रवेश, फोन खोलने, फोटो व्यवस्थित करने, हवाई अड्डे, सीमा नियंत्रण और कानून-प्रवर्तन तक इस्तेमाल हो सकती है। इन सभी उपयोगों का जोखिम समान नहीं है। अपने फोन को अपने चेहरे से खोलना स्वैच्छिक निजी प्रमाणीकरण है; सड़क पर चलते हर व्यक्ति के चेहरे को सरकारी संग्रह से मिलाना व्यापक निगरानी हो सकती है। इसलिए Face Recognition की नैतिकता तकनीक से उतनी नहीं, उसके इस्तेमाल से तय होती है।
फोटो से ज्यादा जरूरी है टेम्पलेट
एक और भ्रम है कि मशीन चेहरे की पूरी ‘फोटो’ अपने मन में रखती है। आधुनिक प्रणाली में कई बार अधिक महत्वपूर्ण चीज फोटो नहीं बल्कि template है—चेहरे का संख्यात्मक प्रतिनिधित्व। यह सुरक्षा के लिए अच्छा लग सकता है, लेकिन template को भी महत्वहीन डेटा नहीं समझना चाहिए। यदि किसी उन्नत प्रणाली से किसी व्यक्ति का जैवमितीय प्रतिनिधित्व चोरी हो जाए तो वह संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी हो सकती है। सुरक्षा का लक्ष्य इसलिए केवल मूल फोटो छिपाना नहीं, biometric template की रक्षा करना भी है।
क्या जुड़वाँ बच्चों को Face Recognition अलग कर सकता है? समान जुड़वाँ इस तकनीक के कठिन मामलों में हो सकते हैं क्योंकि उनकी चेहरे की संरचना बहुत समान होती है। उन्नत प्रणालियाँ अत्यंत सूक्ष्म अंतर पकड़ सकती हैं, लेकिन हर प्रणाली का प्रदर्शन समान नहीं होता। इसी कारण अत्यधिक सुरक्षा वाले उपयोगों में अकेले चेहरे पर निर्भर रहने के बजाय कभी दूसरी पहचान विधि—जैसे पासकोड, दस्तावेज या अन्य जैवमितीय संकेत—भी जोड़े जा सकते हैं।
क्या श्रृंगार करके मशीन को धोखा दिया जा सकता है? सामान्य श्रृंगार से आधुनिक अच्छी प्रणाली को हमेशा धोखा देना आसान नहीं है, लेकिन जानबूझकर चेहरे के दृश्य पैटर्न को बिगाड़ने वाले विशेष डिजाइन, मुखौटे या दूसरी तकनीकें शोध का विषय रही हैं। इसी प्रकार कैमरा भी केवल ‘आँख’ नहीं है। चित्र लेने की गुणवत्ता पूरी प्रणाली की विश्वसनीयता तय करती है। खराब कैमरा अच्छे एल्गोरिद्म को भी खराब परिणाम दे सकता है।
Face Recognition का एक और अत्यंत रोचक पक्ष यह है कि मनुष्य और मशीन चेहरे को एक ही तरीके से नहीं पहचानते। मनुष्य परिचित व्यक्ति को चाल, बाल, आवाज, कपड़े और पूरे सामाजिक संदर्भ से भी पहचान सकता है। मशीन अक्सर उसे दिए गए चेहरे के चित्र और प्रशिक्षित गणितीय प्रतिरूप पर अधिक निर्भर होती है। इसलिए कभी कोई मनुष्य धुँधली तस्वीर में परिचित दोस्त को तुरंत पहचान लेता है जबकि सॉफ्टवेयर असफल हो सकता है; दूसरी ओर आधुनिक एल्गोरिद्म लाखों अपरिचित चेहरों की तुलना इतनी तेज कर सकता है जो मनुष्य के लिए असंभव है।
इस तकनीक के विकास की गति असाधारण रही है। NIST के P. Jonathon Phillips के बारे में प्रकाशित विवरण में 1993 से 2023 तक Face Recognition परीक्षणों में त्रुटि दर में लगभग हर दो वर्ष में आधे होने जैसी दीर्घकालीन प्रगति का उल्लेख है। यह मोटा ऐतिहासिक माप है, हर परिस्थिति पर लागू नियम नहीं, लेकिन यह दिखाता है कि कंप्यूटर दृष्टि के इस क्षेत्र में तीन दशकों में कितनी तेज उन्नति हुई है।
60 के दशक की तकनीक
आज की सर्वोत्तम Face Recognition प्रणाली इसलिए 1960 के दशक के Bledsoe प्रयोग से लगभग पहचान में न आने वाली तकनीक है। उस समय मनुष्य को फोटो पर आँख और नाक की स्थिति बतानी पड़ती थी। 1991 में Eigenfaces ने पूरे चेहरे को गणितीय स्थान में बदलने का नया रास्ता दिया। 1993 के FERET कार्यक्रम ने तुलनात्मक परीक्षण और बड़े शोध को गति दी। 2010 के दशक में Deep Learning और विशाल चित्र-संग्रह ने मशीनों को स्वयं पहचान योग्य चेहरे के पैटर्न सीखने दिए। 2015 का FaceNet ऐसा प्रभावशाली उदाहरण बना जिसमें चेहरे को एक संक्षिप्त गणितीय स्थान में रखा गया और समानता दूरी से मापी गई। आज यह मूल विचार अनगिनत आधुनिक प्रणालियों में अलग-अलग विकसित रूपों में दिखाई देता है।
यदि पूरी प्रक्रिया को एक सामान्य व्यक्ति की तस्वीर के उदाहरण में समेटें तो कैमरा पहले चित्र लेता है; सॉफ्टवेयर उसमें चेहरा खोजता है।चेहरे की दिशा और आकार सामान्य करता है; तंत्रिका-जाल उससे पहचान योग्य विशेषताओं का गणितीय प्रतिनिधित्व बनाता है; फिर उस प्रतिनिधित्व की पहले से दर्ज चेहरे या चेहरों के संग्रह से तुलना होती है; समानता का अंक निकलता है एक तय सीमा से ऊपर समानता होने पर प्रणाली कहती है कि संभवतः चेहरा मेल खाता है। इसके बाद वास्तविक व्यवस्था निर्णय लेती है—फोन खोलना है, द्वार खोलना है या संभावित उम्मीदवारों की सूची किसी मानव अधिकारी के सामने रखनी है।
यही अंतिम चरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। एल्गोरिद्म सामान्यतः “यह व्यक्ति निश्चित रूप से अमुक है” जैसा दार्शनिक सत्य नहीं खोजता; वह समानता का गणितीय अनुमान देता है। निर्णय की सीमा जितनी कठोर होगी, गलत व्यक्ति स्वीकार होने का जोखिम घट सकता है लेकिन सही व्यक्ति अस्वीकार होने की संभावना बढ़ सकती है। सीमा ढीली करेंगे तो सही पहचान अधिक मिल सकती है। लेकिन गलत मिलान भी बढ़ सकते हैं। यही कारण है कि Face Recognition की वास्तविक दुनिया में सटीकता केवल एल्गोरिद्म का गुण नहीं, उसे किस सीमा और किस परिस्थिति में लगाया गया है, इसका परिणाम भी है।
इसलिए ‘मेरा फोन मुझे पहचानता है’ सुनने में जितना मानवीय लगता है, तकनीकी वास्तविकता उतनी मानवीय नहीं है। फोन आपको नाम, व्यक्तित्व या स्मृति से नहीं पहचानता। वह कहता है—“अभी कैमरे से बने गणितीय चेहरे और पहले सुरक्षित किए गए गणितीय चेहरे के बीच समानता निर्धारित सीमा से अधिक है।” हमारे लिए यह ‘यही मैं हूँ’ है।कंप्यूटर के लिए यह संख्याओं के बीच दूरी का प्रश्न है।
और शायद यही Face Recognition की सबसे अद्भुत बात है। जिस चेहरे से मनुष्य प्रेम, भय, पहचान, उम्र और भावना पढ़ता है, कंप्यूटर उसी चेहरे को संख्याओं की ऐसी अदृश्य संरचना में बदल देता है जिसमें दो व्यक्तियों के बीच गणितीय दूरी मापी जा सकती है। Woodrow Bledsoe के 1960 के दशक के प्रयोगों से शुरू हुआ यह सफर आज उस दौर तक पहुँच गया है जहाँ एक फोन आपके चेहरे को अंधेरे में पहचान सकता है और एक शक्तिशाली प्रणाली विशाल चित्र-संग्रह में कुछ क्षणों में संभावित चेहरा खोज सकती है।
लेकिन तकनीक जितनी शक्तिशाली हुई है, उतना ही महत्वपूर्ण उसका दूसरा प्रश्न हुआ है—कंप्यूटर आपका चेहरा पहचान सकता है, लेकिन उसे पहचानने का अधिकार किसे होना चाहिए? मोबाइल में आपकी अनुमति से चेहरा पहचानना सुविधा है; भीड़ में बिना जानकारी के लाखों चेहरे पहचानना निगरानी का प्रश्न है। किसी बैंक में धोखाधड़ी रोकना सुरक्षा हो सकती है; गलत मिलान से निर्दोष व्यक्ति संदिग्ध बनना गंभीर खतरा हो सकता है। इसलिए Face Recognition की कहानी केवल कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सफलता की कहानी नहीं है। यह तकनीक, सुरक्षा, निजता और नागरिक स्वतंत्रता के बीच बनने वाले नए संतुलन की भी कहानी है।
अंततः इसका सबसे सरल वैज्ञानिक सार यही है—Face Recognition आपका चेहरा याद नहीं करता, वह आपके चेहरे को गणित में बदलता है। पहले चेहरा खोजा जाता है, फिर उसकी स्थिति सुधारी जाती है, फिर तंत्रिका-जाल उसका संख्यात्मक प्रतिनिधित्व बनाता है और अंत में उस प्रतिनिधित्व की दूसरे चेहरे से तुलना होती है। इस विचार की शुरुआत 1960 के दशक के Bledsoe जैसे अग्रदूतों ने की, Eigenfaces ने इसे गणितीय छलांग दी, FERET जैसे कार्यक्रमों ने व्यवस्थित परीक्षण की नींव रखी और Deep Learning ने इसे आज की असाधारण क्षमता तक पहुँचा दिया। तकनीक अत्यंत प्रभावी है, लेकिन अचूक नहीं; फोटो, खराब रोशनी, उम्र, मास्क, नकली प्रस्तुति और जनसांख्यिकीय अंतर इसके सामने चुनौतियाँ पैदा कर सकते हैं। इसलिए इसे सुविधा के रूप में जितनी सहजता से अपनाया जा रहा है, पहचान और निगरानी के औजार के रूप में उतनी ही सावधानी से समझना भी जरूरी है।


