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Google Maps में रास्ता बताने वाली आवाज किसकी होती है? जानिए GPS और AI Voice कैसे काम करते हैं
Google Maps को कैसे पता चलता है कि आप कहां हैं, किस सड़क पर चल रहे हैं और किस दिशा में जाना है? जानिए GPS, फोन सेंसर, Map Matching, Routing और AI Voice का पूरा विज्ञान।
Google Maps Voice Explained in Hindi
Google Maps Voice Explained: हम कार लेकर किसी अनजान शहर में निकलते हैं। मोबाइल में Google Maps खोलकर मंजिल डालते हैं और कुछ ही सेकंड बाद एक आवाज रास्ता बताना शुरू कर देती है - “कुछ दूरी बाद दाएं मुड़िए”, “अगले मोड़ से बाएं लीजिए।”
अगर हम बताए गए मोड़ को छोड़ दें तो आवाज नाराज नहीं होती। कुछ क्षण बाद नया रास्ता निकाल देती है। आगे जाम हो तो कई बार हमारे वहां पहुंचने से पहले ही बता देती है कि दूसरा रास्ता तेज रहेगा। लेकिन सवाल है कि मोबाइल को आखिर कैसे पता चलता है कि हमारी कार इस समय सड़क के किस हिस्से में है? वह किस दिशा में जा रही है, कितनी तेज चल रही है और आगे कौन-सा मोड़ आने वाला है? और इससे भी दिलचस्प सवाल है कि वह आवाज कौन है? क्या किसी महिला या पुरुष को स्टूडियो में बैठाकर लाखों सड़कों के नाम और “200 मीटर बाद दाएं मुड़ें” जैसे करोड़ों निर्देश रिकॉर्ड कराए गए हैं?
असल कहानी इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प है। इसके पीछे उपग्रहों से मिलने वाले संकेत, फोन के सेंसर, डिजिटल नक्शे, सड़क का विशाल आंकड़ा-तंत्र, गणितीय तरीके, मशीन लर्निंग और कृत्रिम आवाज बनाने वाली तकनीक एक साथ काम करती है।
गूगल के अनुसार भारत में मैप्स ने लाखों किलोमीटर की शहरी और ग्रामीण सड़कों तथा 30 करोड़ से ज्यादा इमारतों को मानचित्रित किया है। 2023 में कंपनी ने बताया था कि भारत में Google Maps रोजाना 2.5 अरब किलोमीटर से ज्यादा की दिशाओं को संभाल रहा था।
Google Maps को कैसे पता चलता है कि आपका फोन कहां है?
पूरी व्यवस्था की शुरुआत होती है लोकेशन पता लगाने से। आम बोलचाल में हम इसे जीपीएस कहते हैं। हालांकि आधुनिक मोबाइल केवल अमेरिकी जीपीएस पर निर्भर नहीं रहते। वे जरूरत और उपलब्धता के अनुसार दूसरी वैश्विक उपग्रह-आधारित स्थान प्रणालियों तथा अन्य संकेतों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। पृथ्वी के चारों ओर घूम रहे नेविगेशन उपग्रह लगातार बेहद सटीक समय और अपनी स्थिति से जुड़े संकेत भेजते रहते हैं। आपका फोन इन उपग्रहों को कोई संदेश भेजकर यह नहीं पूछता कि “मैं कहां हूं?” बल्कि वह उनके रेडियो संकेतों को ग्रहण करता है। अलग-अलग उपग्रहों से आने वाले संकेतों को फोन तक पहुंचने में कितना समय लगा, इससे फोन उनकी दूरी का अनुमान लगाता है। पर्याप्त संकेत मिलने पर गणितीय गणना से फोन अपनी स्थिति और अपनी घड़ी की छोटी-सी गलती का भी अनुमान लगा सकता है। इसीलिए खुले आसमान के नीचे स्थान पता लगाना आम तौर पर बेहतर होता है। ऊंची इमारतों के बीच, सुरंग में या भूमिगत पार्किंग में स्थिति कमजोर हो सकती है, क्योंकि उपग्रहों के बहुत कमजोर रेडियो संकेत वहां पहुंचते-पहुंचते बाधित या दूसरी जगह से टकराकर आ सकते हैं।
फोन सिर्फ उपग्रहों पर निर्भर नहीं रहता
अगर मोबाइल केवल उपग्रहों से मिलने वाले संकेतों पर निर्भर रहे तो शहरों में रास्ता बताने का अनुभव काफी खराब हो सकता है। इसलिए फोन परिस्थितियों और उपलब्ध अनुमति के अनुसार मोबाइल नेटवर्क, आसपास के वाई-फाई संकेत और अपने सेंसरों की जानकारी का भी सहारा ले सकता है। फोन का त्वरणमापी यह महसूस कर सकता है कि गति बढ़ी या घटी है। घूमने की दिशा बताने वाला सेंसर यह समझने में मदद करता है कि फोन किस तरफ मुड़ा है। दिशा बताने वाला चुंबकीय सेंसर भी सहायक हो सकता है। इसलिए Maps में दिखाई देने वाला नीला बिंदु केवल “आसमान से आया जीपीएस बिंदु” नहीं है। उसके पीछे कई स्रोतों से मिली जानकारी को मिलाकर स्थान का अनुमान लगाया जा सकता है।
मैप्स को कैसे पता चलता है कि आप इसी सड़क पर हैं?
यहीं आती है एक बहुत महत्वपूर्ण प्रक्रिया यानी सड़क से मिलान। जीपीएस से मिला स्थान हर पल बिल्कुल सटीक नहीं होता। मान लीजिए आप सड़क पर कार चला रहे हैं, लेकिन उस क्षण फोन आपका स्थान सड़क से पांच-छह मीटर दूर दिखा रहा है। अगर मैप्स हर कच्चे जीपीएस बिंदु को ही अंतिम सच मान ले तो कभी आपकी कार फुटपाथ पर दिखाई दे सकती है, कभी बगल की सर्विस लेन पर और कभी पास की दूसरी सड़क पर। इसलिए प्रणाली केवल यह नहीं देखती कि आपका अक्षांश और देशांतर क्या है। वह यह भी देखती है कि आसपास कौन-कौन सी सड़कें हैं, आप किस दिशा में बढ़ रहे हैं, कुछ सेकंड पहले कहां थे, आपकी गति क्या है और इनमें से कौन-सी सड़क आपके सफर से सबसे अच्छी तरह मेल खाती है। मान लीजिए जीपीएस आपको सड़क से छह मीटर दूर दिखा रहा है, लेकिन आप पिछले दो मिनट से उसी सड़क पर 45 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चल रहे हैं और अगला स्थान-बिंदु भी उसी दिशा में है। ऐसे में प्रणाली के पास यह मानने का मजबूत आधार है कि आप वास्तव में उसी सड़क पर हैं। इसी प्रक्रिया को मैप मैचिंग कहा जाता है। लेकिन यह हमेशा सही नहीं होती। ऊपर फ्लाईओवर और नीचे सड़क हो, दो सड़कें बहुत पास-पास हों या कोई जटिल चौराहा हो तो कभी-कभी मैप्स को यह समझने में परेशानी हो सकती है कि आप ऊपर हैं या नीचे।
मंजिल डालते ही रास्ता कुछ सेकंड में कैसे निकल आता है?
मैप्स के लिए सड़कें केवल नक्शे पर खींची गई रेखाएं नहीं हैं। कंप्यूटर के लिए पूरा सड़क तंत्र एक बहुत बड़े जाल की तरह होता है। चौराहे, मोड़ और दूसरे महत्वपूर्ण स्थान इस जाल के बिंदु हो सकते हैं। इन्हें जोड़ने वाली सड़कें अलग-अलग रास्ते बनाती हैं। हर सड़क के साथ कई तरह की जानकारी जुड़ी हो सकती है, सड़क एकतरफा है या दोतरफा, किस तरह की सड़क है, कहां मोड़ने की अनुमति है, कहां मोड़ना मना है, सामान्य तौर पर वहां पहुंचने में कितना समय लगता है और इस समय यातायात कैसा है। अब मान लीजिए आपको लखनऊ से कानपुर जाना है। इसके लिए कई संभावित रास्ते हो सकते हैं। कंप्यूटर हर रास्ते को इंसान की तरह शुरू से आखिर तक चलाकर नहीं देखता। मार्ग खोजने वाले गणितीय तरीके अलग-अलग रास्तों की संभावित “लागत” की तुलना करते हैं और उपयोगी विकल्प खोजते हैं। और सबसे छोटा रास्ता हमेशा सबसे तेज रास्ता नहीं होता। 50 किलोमीटर की ऐसी सड़क जिस पर भारी जाम हो, वह 55 किलोमीटर की खाली सड़क से धीमी हो सकती है। मैप्स दूरी के साथ-साथ यातायात, सड़क की स्थिति, सड़क का आकार, रास्ते की सीधाई और उपलब्ध दूसरी जानकारी को भी ध्यान में रख सकता है।
आप गलत मोड़ ले लें तो मैप्स इतनी जल्दी कैसे समझ जाता है?
मान लीजिए मैप्स ने कहा , “200 मीटर बाद दाएं मुड़िए।” लेकिन आप सीधे निकल गए। फोन लगातार आपकी बदलती स्थिति का अनुमान लगाता रहता है। कुछ समय बाद अगर आपकी स्थिति बताए गए रास्ते से मेल नहीं खाती तो प्रणाली समझ जाती है कि आप अपेक्षित सड़क पर नहीं गए हैं। अब आपकी नई जगह नया शुरुआती बिंदु बन जाती है और मंजिल वही रहती है। इसके बाद मार्ग खोजने वाली प्रणाली सड़क के पूरे जाल में फिर से रास्ता निकालती है। इसी को री-रूटिंग कहा जाता है। कभी नया रास्ता आपको आगे जाकर पुराने रास्ते से जोड़ देता है और कभी पूरी तरह अलग मार्ग चुनता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि मैप्स को पहले से यह पता नहीं होता कि आप “गलती करने वाले हैं।” वह आपके वास्तविक स्थान और दिशा को लगातार देखे गए अनुमान से मिलाता है। जब अंतर पर्याप्त हो जाता है, तो नई गणना शुरू होती है।
सबसे दिलचस्प सवाल:“दाएं मुड़िए” कहने वाली आवाज किसकी है?
क्या कोई महिला स्टूडियो में बैठकर दुनिया की हर सड़क का नाम और हर संभावित निर्देश रिकॉर्ड करती है? ऐसा नहीं है। आधुनिक नेविगेशन में मुख्य भूमिका ‘वाणी-संश्लेषण’ यानी लिखे हुए शब्दों को कृत्रिम आवाज में बदलने वाली तकनीक की होती है। गूगल की सहायता जानकारी के अनुसार एंड्राइड फोन में मैप्स की नेविगेशन आवाज फोन की लिखे हुए शब्दों को आवाज में बदलने वाली व्यवस्था से जुड़ी होती है। इसका कारण भी साफ है। दुनिया में सड़कों, स्थानों और संभावित रास्तों की संख्या इतनी ज्यादा है कि हर संभव निर्देश को किसी इंसान से रिकॉर्ड करवाना व्यावहारिक नहीं होगा। आज आप लखनऊ की किसी नई कॉलोनी में जा रहे हैं। कल दिल्ली की किसी नई सड़क पर और अगले दिन किसी ऐसे स्थान पर, जिसका नाम हाल में नक्शे में जोड़ा गया है। हर बार किसी इंसान की नई रिकॉर्डिंग कराना असंभव जैसा होगा। इसके बजाय प्रणाली निर्देश तैयार करती है, जैसे कि “200 मीटर बाद अमुक सड़क की ओर मुड़िए”और फिर वाणी-संश्लेषण उसे सुनाई देने वाली आवाज में बदल देता है।
आवाज इतनी इंसानी क्यों लगती है?
पुरानी कंप्यूटर आवाजें अक्सर सपाट और रोबोट जैसी लगती थीं। आज की वाणी-संश्लेषण तकनीक काफी आगे बढ़ चुकी है। मशीन सीखने वाले मॉडल आवाज में उतार-चढ़ाव, विराम, लय और उच्चारण जैसी चीजों को इस तरह तैयार कर सकते हैं कि आवाज काफी हद तक इंसानी लगे। इसलिए मैप्स में सुनाई देने वाली आवाज को केवल “रिकॉर्ड की गई आवाज” मानना सही नहीं है। हां, आवाज के पीछे वास्तविक मानव आवाज के नमूनों या मानव आवाज से सीखे गए मॉडल का इस्तेमाल हो सकता है, लेकिन हर सड़क और हर निर्देश को किसी इंसान ने बोलकर रिकॉर्ड किया हो, ऐसा नहीं है। यही वजह है कि मैप्स नई सड़क, नया स्थान या नया रास्ता आने पर भी तुरंत निर्देश बना सकता है।
कभी-कभी सड़क या जगह का नाम अजीब क्यों बोलता है?
यहीं कृत्रिम आवाज की एक दिलचस्प कमजोरी सामने आती है। “200 मीटर बाद दाएं मुड़ें” जैसे सामान्य वाक्य का उच्चारण आसान है। लेकिन किसी छोटे गांव, मोहल्ले या स्थानीय व्यक्ति के नाम पर बनी सड़क का उच्चारण मुश्किल हो सकता है। भारत में यह समस्या और बड़ी है। एक ही जगह का नाम हिंदी, अंग्रेजी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में अलग-अलग लिखा जा सकता है। अंग्रेजी में लिखे नाम से उसका स्थानीय उच्चारण हमेशा सही तरीके से समझ में नहीं आता। इसीलिए कभी सामान्य हिंदी वाक्य बहुत स्वाभाविक सुनाई देता है, लेकिन बीच में आया किसी मोहल्ले या गांव का नाम अचानक अजीब सुनाई पड़ता है। यह जरूरी नहीं कि मशीन “गलत भाषा” बोल रही हो। कई बार समस्या यह होती है कि उसे स्थानीय नाम के सही उच्चारण की पर्याप्त जानकारी नहीं मिली होती।
सुरंग में जीपीएस बंद हो जाए तो मैप्स क्या करता है?
सुरंग जीपीएस के लिए स्वाभाविक चुनौती है। उपग्रहों के रेडियो संकेत जमीन और मोटी कंक्रीट संरचनाओं के भीतर आसानी से नहीं पहुंचते। लंबी सुरंग में फोन को पर्याप्त उपग्रह संकेत न मिलें तो उसकी स्थिति का अनुमान कमजोर हो सकता है। छोटी सुरंग में फोन अपने हालिया स्थान, गति और दिशा के आधार पर कुछ समय तक अनुमान लगा सकता है। लेकिन इसे वास्तविक उपग्रह मापन नहीं समझना चाहिए। सुरंग से बाहर निकलते ही जब उपग्रह संकेत फिर मिलने लगते हैं तो स्थान का अनुमान दोबारा सुधर सकता है। इसी तरह भूमिगत पार्किंग से बाहर निकलते समय मैप्स को कुछ क्षण लग सकते हैं यह समझने में कि कार किस सड़क पर और किस दिशा में आई है। ऊंची इमारतों के बीच भी उपग्रह संकेत इमारतों से टकराकर फोन तक पहुंच सकते हैं। इससे कभी-कभी नीला बिंदु अचानक दूसरी सड़क पर दिखाई दे सकता है। यह कोई रहस्यमय समस्या नहीं, बल्कि स्थान पता लगाने की तकनीकी सीमा है।
इंटरनेट बंद हो जाए तो क्या मैप्स भी बंद हो जाता है?
ऐसा जरूरी नहीं। जीपीएस से स्थान पता करने के लिए मोबाइल इंटरनेट जरूरी नहीं है। फोन का स्थान-निर्धारण तंत्र उपग्रहों से सीधे संकेत प्राप्त कर सकता है। लेकिन मैप्स की दूसरी कई सुविधाएं इंटरनेट पर निर्भर हो सकती हैं, जैसे ताजा यातायात, अचानक बदले रास्ते, नई जगहों की जानकारी और ऑनलाइन नक्शे में होने वाले बदलाव। अगर आपने किसी इलाके का नक्शा पहले से फोन में डाउनलोड कर रखा है तो इंटरनेट न होने पर भी वहां रास्ता खोजने और बारी-बारी से दिशा बताने जैसी कई सुविधाएं काम कर सकती हैं। लेकिन ऑफलाइन स्थिति में सबसे बड़ी कमी ताजा जानकारी की होती है। मान लीजिए आपने नक्शा डाउनलोड किया हुआ है और फोन को आपकी जगह भी पता है। लेकिन पांच किलोमीटर आगे अभी-अभी दुर्घटना हुई है। इंटरनेट न होने पर उस नई घटना की जानकारी मैप्स तक तुरंत नहीं पहुंच सकती। जीपीएस जैसी प्रणालियां मुख्य रूप से स्थान बताने में मदद करती हैं। गूगल मैप्स उस स्थान को सड़क नेटवर्क, मंजिल, यातायात, स्थानों और रास्ता खोजने की पूरी व्यवस्था से जोड़ता है।
क्या गूगल मैप्स हमेशा सबसे सही रास्ता बताता है?
इतना बड़ा और जटिल तंत्र होने के बावजूद मैप्स अचूक नहीं है। नक्शे में सड़क दर्ज हो सकती है, लेकिन जमीन पर वह अस्थायी रूप से बंद हो। किसी गली की हालत कार चलाने लायक न हो। निर्माण कार्य शुरू हो गया हो। स्थानीय यातायात नियम हाल में बदले हों या सड़क का वास्तविक स्वरूप डिजिटल जानकारी से अलग हो। जीपीएस की गलती, कमजोर संकेत और अचानक बदलता यातायात भी असर डाल सकता है। इसलिए सड़क पर मौजूद वास्तविक यातायात संकेत, पुलिस का निर्देश, बैरिकेड और सुरक्षा संबंधी जानकारी मोबाइल के निर्देश से ऊपर है। अगर मैप्स किसी बंद सड़क पर जाने को कह रहा है लेकिन सामने बैरिकेड लगा है, तो फोन की बात नहीं माननी चाहिए।
गूगल मैप्स अब सिर्फ नक्शा नहीं रहा
कागज का नक्शा आपको बताता था कि सड़क कहां है। आधुनिक मैप्स इससे आगे जाकर यह समझने की कोशिश करता है कि आप अभी कहां हैं। किस दिशा में जा रहे हैं। आपकी मंजिल कहां है। वहां पहुंचने के कौन-कौन से रास्ते हैं। किस सड़क पर इस समय यातायात ज्यादा है। आपके वहां पहुंचने तक यातायात कैसा हो सकता है। रास्ते में कुछ बदल जाए तो दूसरा रास्ता कौन-सा हो सकता है। गूगल भारत में बड़े पैमाने पर मानचित्र बनाने, यातायात का अनुमान लगाने और स्थानों की जानकारी को उपयोगी बनाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भी इस्तेमाल कर रहा है। और अब मैप्स एक और दिशा में बढ़ रहा है। गूगल ने मैप्स में जेमिनी आधारित सुविधाएं जोड़नी शुरू की हैं। अमेरिका में शुरू की गई एक सुविधा में रास्ता बताने के लिए केवल दूरी बताने के बजाय दिखाई देने वाले स्थानों और इमारतों जैसे पहचानने योग्य स्थलचिह्नों का इस्तेमाल करने की दिशा दिखाई गई है। यानी भविष्य का निर्देश सिर्फ यह नहीं होगा कि “500 फीट बाद दाएं मुड़िए।” बल्कि कुछ ऐसा हो सकता है - “आगे दिखाई दे रही इमारत के बाद दाएं मुड़िए।” यह उसी तरह है जैसे कोई इंसान रास्ता समझाते समय कहता है कि “आगे मंदिर आएगा, उसके बाद बाएं मुड़ जाना।”
एक छोटी-सी आवाज के पीछे पूरा तकनीकी तंत्र
इसलिए अगली बार जब कार में एक शांत आवाज कहे कि “कुछ दूरी बाद दाएं मुड़िए”तो उसके पीछे सिर्फ एक नक्शा और किसी महिला की रिकॉर्ड की हुई आवाज की कल्पना मत कीजिए। उस एक वाक्य के पीछे अंतरिक्ष में घूमते नेविगेशन उपग्रह हैं। फोन के सेंसर हैं। डिजिटल सड़क नेटवर्क है। आपके स्थान का लगातार अनुमान है। सड़क से उस स्थान का मिलान करने वाली गणना है। रास्ता खोजने वाले गणितीय तरीके हैं। बड़ी संख्या में वाहनों की गति से तैयार होता यातायात पैटर्न है। पुराने यातायात आंकड़े हैं। मशीन लर्निंग है। और अंत में लिखे हुए निर्देश को इंसान जैसी आवाज में बदलने वाली वाणी-संश्लेषण तकनीक है। हम कार में सिर्फ एक आवाज सुनते हैं। लेकिन उस आवाज के पीछे अंतरिक्ष से लेकर सड़क तक फैला हुआ पूरा तकनीकी तंत्र एक साथ काम कर रहा होता है।


