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Smartphone Screen: फोन गिरा तो कोना ही क्यों टूटा? क्या है काँच की फिजिक्स
Smartphone Screen Physics: जानिए मोबाइल की स्क्रीन गिरने पर कोने से ही क्यों टूटती है, कांच की बनावट, दबाव, स्ट्रेस कॉन्सेंट्रेशन और Gorilla Glass के पीछे का विज्ञान।
Why Phone Screens Crack at the Corners | Smartphone Screen Physics | Newstrack Hindi News
Smartphone Screen Physics: फोन हाथ से छूटता है, ज़मीन से टकराता है और हम सब साँस रोके उसे उठाते हैं। ज़्यादातर बार दरार किसी कोने से शुरू होती है और वहाँ से मकड़ी के जाले की तरह फैल जाती है। स्क्रीन का बीच वाला हिस्सा अक्सर बच जाता है, जबकि वही सबसे बड़ा हिस्सा है और देखने में सबसे कमज़ोर लगता है। इसका जवाब किसी एक चीज़ में नहीं, बल्कि चार चीज़ों के मेल में है: फोन गिरता कैसे है, ज़मीन से कहाँ छूता है, काँच खुद कैसी चीज़ है और कोने की बनावट में क्या ख़ास है।
फोन ज़्यादातर कोने से ही क्यों टकराता है
फोन आपके हाथ या जेब से सीधा सपाट नहीं गिरता। हाथ से फिसलते वक़्त उसे हल्का-सा झटका या घुमाव मिलता है, और हवा में कुछ ही सेकंड के दसवें हिस्से में वह घूमने लगता है। एक मीटर की ऊँचाई से गिरने में लगभग आधा सेकंड लगता है, और उतने में फोन अक्सर आधा चक्कर या उससे कम घूमता है। ऊपर से फोन का आकार ऐसा है कि सबसे बाहर निकले हुए हिस्से कोने ही हैं। जब कोई आयताकार चीज़ ज़मीन के पास आते हुए थोड़ी भी तिरछी हो, तो ज़मीन को सबसे पहले छूने वाला बिंदु लगभग हमेशा उसका कोना या किनारा होता है। कोने का टकराना सिर्फ़ संयोग नहीं, ज्यामिति की मजबूरी है।
ताक़त की नहीं, दबाव की कहानी
अब असली फिजिक्स शुरू होती है। एक मीटर की ऊँचाई से गिरते फोन की गति ज़मीन से टकराते वक़्त लगभग 4.4 मीटर प्रति सेकंड होती है, यानी करीब 16 किलोमीटर प्रति घंटा। 200 ग्राम के फोन की गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) बस लगभग दो जूल (Joule) होती है, जो एक छोटे सेब को कुछ सेंटीमीटर उठाने जितनी ऊर्जा है। फिर भी स्क्रीन टूट जाती है, क्योंकि फर्क इस बात से पड़ता है कि यह ऊर्जा कितनी जगह में और कितनी देर में खर्च होती है।
फोन को टकरा कर रुकने में बस एक-दो मिलीसेकंड लगते हैं, यानी सेकंड का हज़ारवाँ हिस्सा। इतनी तेज़ी से रुकने का मतलब है कि पल भर के लिए फोन पर गुरुत्वाकर्षण से सैकड़ों गुना तेज़ त्वरण (Acceleration) लगता है। मोटा हिसाब लगाएँ तो एक मिलीसेकंड में रुकने पर औसत बल लगभग 900 न्यूटन के आसपास बैठता है, जो करीब नब्बे किलो वज़न के बराबर है। यह मोटा अनुमान है, असल संख्या सतह और कोण पर निर्भर करती है, पर बात समझने के लिए काफ़ी है।
अब देखिए कि यह बल कहाँ लगता है। दबाव की परिभाषा है बल को क्षेत्रफल से भाग देना। अगर फोन सपाट गिरे, तो यह बल पूरी पीठ पर लगभग सौ वर्ग सेंटीमीटर में फैल जाता है और दबाव मामूली रहता है। लेकिन कोने से टकराने पर संपर्क का क्षेत्रफल एक वर्ग मिलीमीटर के आसपास सिमट जाता है। उतना ही बल सैकड़ों-हज़ारों गुना छोटी जगह में उतर जाता है, और दबाव उतने ही गुना बढ़ जाता है। यह वही सिद्धांत है जिससे हथौड़े की चौड़ी सतह के बजाय कील की नोक लकड़ी में घुस जाती है।
काँच दबाव से नहीं, खिंचाव से टूटता है
यहाँ काँच की असली प्रकृति आती है। काँच दबाने पर बहुत मज़बूत होता है, पर खींचने या मोड़ने पर बहुत नाज़ुक। जब किसी चीज़ को मोड़ा जाता है तो एक तरफ़ की सतह दबती है और दूसरी तरफ़ की खिंचती है। काँच इसी खिंचाव वाली तरफ़ से टूटता है।
पर काँच की सैद्धांतिक मज़बूती और असली मज़बूती में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है। परमाणुओं के बंधन के हिसाब से काँच गज़ब का मज़बूत होना चाहिए, लेकिन असल में वह हज़ारों गुना कमज़ोर टूटता है। इसकी वजह ब्रिटिश इंजीनियर ए. ए. ग्रिफ़िथ ने 1920 में समझाई। उन्होंने बताया कि हर काँच की सतह पर इंसानी आँख से अदृश्य, सूक्ष्म खरोंचें और दरारें होती हैं। जब काँच पर खिंचाव आता है, तो ये खरोंचें उस ताक़त को अपनी नोक पर केंद्रित कर लेती हैं, और जहाँ एक बार दरार चल पड़ी, वहाँ आगे का रास्ता खुद बनता जाता है। दरार काँच में लगभग 1,500 मीटर प्रति सेकंड की रफ़्तार से दौड़ सकती है, यानी आपकी आँख झपकने से पहले जाला बन चुका होता है। जो चीज़ पूरे काँच को नहीं तोड़ पाती, वह बस एक ऐसे सूक्ष्म दोष पर टिकी होती है जो सबसे कमज़ोर था।
कोनों पर तनाव का जमाव
अब कोने की बात। इंजीनियरिंग में इसे "स्ट्रेस कॉन्सेंट्रेशन" यानी तनाव का जमाव कहते हैं। किसी चीज़ पर बल पड़ता है तो भीतर तनाव एक नदी की तरह बहता है। जहाँ आकार तेज़ मोड़ लेता है, जैसे नुकीला कोना, छेद या दरार, वहाँ यह नदी सँकरी होकर तेज़ बहने लगती है। यानी वहाँ तनाव औसत से कई गुना ज़्यादा हो जाता है।
इसका सबसे डरावना उदाहरण 1954 का है। ब्रिटेन के पहले जेट यात्री विमान डी हैविलैंड कॉमेट के कई विमान हवा में टूटकर गिरे। लंबी जाँच के बाद पता चला कि दोषी चौकोर खिड़कियों के तेज़ कोने थे। हर उड़ान में केबिन का दबाव बढ़ता-घटता था, और इन कोनों पर तनाव इतना जमा होता था कि धातु में थकान की दरारें बन गईं। उसके बाद से विमान की खिड़कियाँ गोल-अंडाकार बनाई जाने लगीं। फोन के कोने भी इसी वजह से गोल बनाए जाते हैं।
फोन के काँच में दोहरी मार है। टकराव के क्षण काँच मुड़ता है और कोने पर तनाव जमा होता है, जहाँ पहले से मौजूद सूक्ष्म खरोंचें और चिप सबसे ज़्यादा हैं। काँच को काटने और घिसने के दौरान किनारे और कोने ही सबसे ज़्यादा सूक्ष्म नुकसान झेलते हैं, क्योंकि वहाँ औज़ार सीधे काँच को छूता है। यानी कोने में सबसे बड़ा तनाव और सबसे कमज़ोर काँच, दोनों एक साथ मौजूद हैं।
फिर बीच वाला हिस्सा कैसे बच जाता है?
बीच का हिस्सा बच इसलिए जाता है कि उसके साथ ये सारे समीकरण उलटे होते हैं। वहाँ ज़्यादातर बार कोई सीधा टकराव नहीं होता। अगर फोन सपाट गिरे भी, तो बल पूरी सतह में बँट जाता है और दबाव कम रहता है। नीचे फोन का फ्रेम और बैटरी जैसे ठोस हिस्से भी काँच को सहारा देते हैं, जबकि कोने पर काँच का सहारा कम होता है और वह अपेक्षाकृत ज़्यादा लचकता है। फ्रेम अक्सर काँच से थोड़ा ऊपर उठा होता है, जो फोन को सीधा ज़मीन से छूने से बचाता है।
अपवाद भी हैं। अगर फोन किसी छोटे कंकड़ या नुकीली चीज़ पर गिरे, तो बीच में भी नुकीला बिंदु-बल लगता है और वहाँ गोलाकार या शंकु जैसी दरार बन सकती है, जिसे वैज्ञानिक 'हर्ट्ज़ियन' दरार कहते हैं। इसीलिए कभी-कभी बिना गिराए, जेब में दबे सिक्के या चाबी की वजह से भी स्क्रीन के बीच में दरार आ जाती है।
ख़ास तरह से मज़बूत किया गया काँच
स्मार्टफोन का काँच साधारण खिड़की का काँच नहीं होता। उसे "आयन-एक्सचेंज" नाम की प्रक्रिया से मज़बूत किया जाता है। काँच को पिघले हुए पोटैशियम नमक के गर्म घोल में डुबोया जाता है, जहाँ काँच की सतह के छोटे सोडियम आयन बाहर निकलते हैं और उनकी जगह बड़े पोटैशियम आयन ठूँस दिए जाते हैं। जैसे छोटी जगह में बड़ी चीज़ें भरने से दबाव बढ़ता है, वैसे ही सतह पर भारी संपीड़न तनाव (Tensile Stress) पैदा हो जाता है। यह परत माइक्रॉन भर मोटी होती है, पर उसका असर बहुत बड़ा है। दरार को शुरू होने के लिए पहले इस दबी हुई परत को खींचकर खोलना पड़ता है, जो उसे मुश्किल बना देता है।
इस तकनीक का इतिहास दिलचस्प है। अमेरिकी कंपनी कॉर्निंग ने 1960 के दशक में इसका ऐसा ही काँच बनाया था, पर वर्षों तक उसका कोई खरीदार नहीं मिला। फिर करीब 2007 में पहले आईफ़ोन के लिए ऐसे काँच की ज़रूरत पड़ी और वही शेल्फ़ में पड़ी तकनीक गोरिल्ला ग्लास बनकर लौटी।
एक और मिलती-जुलती मिसाल "प्रिंस रूपर्ट की बूँद" है, जो पिघले काँच को पानी में टपकाने से बनती है। उसके मोटे सिरे पर हथौड़ा मारने पर भी वह नहीं टूटती, पर पतली पूँछ को हल्का-सा तोड़ते ही पूरी बूँद चूर-चूर हो जाती है। कारण वही है: बाहर की परत संपीड़न में है और भीतर तनाव भरा है। यह बताती है कि मज़बूत काँच की मज़बूती सतह में छिपी होती है, और सतह में किनारे पर सबसे कमज़ोर कड़ी होती है।
मुश्किल यह है कि कोनों और किनारों पर यह संपीड़न की परत उतनी असरदार नहीं रहती, क्योंकि वहाँ काँच दो तरफ़ से कटा होता है और ज्यामिति ही तनाव को बढ़ा देती है। इसीलिए सबसे मज़बूत काँच भी कोने पर सबसे पहले हार मानता है।
इस फिजिक्स से क्या सीखें?
सबसे उपयोगी सबक़ यह है कि बल को फैलाइए और टकराव को लंबा कीजिए। मोबाइल कवर इसीलिए काम करता है। नरम किनारे टकराव के समय को कुछ मिलीसेकंड और बढ़ा देते हैं, जिससे बल घटता है, और उभरा हुआ किनारा स्क्रीन को सीधे ज़मीन से बचाता है। टेम्पर्ड ग्लास प्रोटेक्टर भी एक क़ुर्बानी की परत की तरह टूटकर ऊर्जा खा जाता है।
और अगली बार जब फोन कोने से टूटा दिखे, तो याद रखिए कि यह क़िस्मत की ख़राबी नहीं थी। एक नन्हे से बिंदु पर बल का जमाव, काँच की सूक्ष्म खरोंचें और कोने की ज्यामिति, तीनों ने मिलकर वही किया जो भौतिकी के नियम उनसे करवाते हैं।


