How Air Purifier Works: क्या एयर प्यूरीफायर से गला और नाक सूखते हैं? जानिए नमी और फिल्टर का पूरा सच

How Air Purifier Works: एयर प्यूरीफायर हवा से PM 2.5, धूल और धुएँ के कण कैसे हटाता है?

Yogesh Mishra
Published on: 31 Oct 2026 2:08 PM IST
How Air Purifier Works | Air Purifier Working Principle | HEPA Air Purifier | Newstrack Hindi News
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How Air Purifier Works | Air Purifier Working Principle | HEPA Air Purifier | Newstrack Hindi News

How Air Purifier Works: दिल्ली, लखनऊ, कानपुर और उत्तर भारत के कई शहरों में सर्दियाँ शुरू होते ही वायु प्रदूषण की समस्या बढ़ने लगती है। हवा में मौजूद बेहद महीन कण साँस के साथ फेफड़ों तक पहुँच सकते हैं। इनमें से कुछ कण फेफड़ों की गहराई तक पहुँचकर स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचा सकते हैं। यही वजह है कि सर्दियों में घरों और दफ्तरों में एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल बढ़ जाता है।

लेकिन क्या ये मशीनें सचमुच प्रदूषित हवा को साफ कर देती हैं? क्या एयर प्यूरीफायर चलाने से कमरे की ऑक्सीजन खत्म हो सकती है? क्या यह हवा की नमी भी सोख लेता है, जिससे गला और नाक सूखने लगते हैं? और अगर कोई अपने घर के लिए एयर प्यूरीफायर खरीदना चाहता है, तो उसे किस तकनीक और कितनी क्षमता वाली मशीन चुननी चाहिए?

अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी यानी ईपीए के अनुसार, सही क्षमता वाला एयर प्यूरीफायर कमरे की हवा में मौजूद महीन प्रदूषक कणों की मात्रा कम कर सकता है। लेकिन कोई भी सामान्य एयर प्यूरीफायर हर तरह के प्रदूषण को पूरी तरह खत्म नहीं करता। इसकी उपयोगिता मशीन में लगे फिल्टर, हवा साफ करने की क्षमता, कमरे के आकार और मशीन के इस्तेमाल पर निर्भर करती है।

सबसे पहले एक बात समझना जरूरी है। एयर प्यूरीफायर और डीह्यूमिडिफायर दो अलग-अलग उपकरण हैं। सामान्य HEPA एयर प्यूरीफायर कमरे की नमी नहीं सोखता। उसका मुख्य काम हवा में मौजूद धूल, धुएँ और दूसरे महीन कणों को रोकना है। नमी कम करने के लिए अलग मशीन की जरूरत होती है।

एयर प्यूरीफायर क्या है और यह काम कैसे करता है?

एयर प्यूरीफायर बिजली से चलने वाला ऐसा उपकरण है, जो कमरे की हवा में मौजूद प्रदूषक कणों और उपयुक्त फिल्टर होने पर कुछ गैसों की मात्रा कम कर सकता है।

सामान्य एयर प्यूरीफायर के भीतर एक पंखा लगा होता है। यह कमरे की हवा को खींचकर फिल्टरों से गुजारता है। फिल्टर हवा में मौजूद धूल, धुएँ और दूसरे प्रदूषक कणों को रोक लेते हैं। इसके बाद साफ हुई हवा मशीन से बाहर निकलकर वापस कमरे में फैल जाती है। यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।

इसे पानी के घरेलू फिल्टर के उदाहरण से समझ सकते हैं। जैसे पानी का फिल्टर कुछ अशुद्धियों को रोकता है, वैसे ही एयर प्यूरीफायर हवा में मौजूद कुछ प्रदूषक कणों को अपने फिल्टर में रोकता है। हालांकि, पानी और हवा को साफ करने की तकनीक एक जैसी नहीं होती।

यहाँ एक बात समझना जरूरी है कि सामान्य एयर प्यूरीफायर बाहर से ताजी हवा नहीं लाता। वह कमरे के भीतर मौजूद हवा को बार-बार खींचकर साफ करता है और वापस छोड़ता है। इससे हवा में मौजूद प्रदूषक कणों की मात्रा कम हो सकती है।

लेकिन बंद कमरे में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड को सामान्य HEPA प्यूरीफायर प्रभावी ढंग से नहीं हटाता। इसलिए एयर प्यूरीफायर को वेंटिलेशन यानी ताजी हवा के आवागमन का विकल्प नहीं मानना चाहिए। दोनों का काम अलग-अलग है।

क्या एयर प्यूरीफायर पीएम 2.5 और पीएम 10 को हटा सकता है?

वायु प्रदूषण की चर्चा में पीएम 2.5 और पीएम 10 शब्द अक्सर सुनाई देते हैं। पीएम का पूरा नाम पार्टिकुलेट मैटर है। इसका मतलब है हवा में मौजूद ठोस और तरल पदार्थों के बेहद छोटे कण।

पीएम 10 ऐसे कणों को कहा जाता है जिनका आकार 10 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। वहीं, पीएम 2.5 के कणों का आकार 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। एक माइक्रोमीटर, एक मिलीमीटर का हजारवाँ हिस्सा होता है। इंसान के बाल की मोटाई आमतौर पर कई दर्जन माइक्रोमीटर होती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पीएम 2.5 के कण कितने छोटे होते हैं।

पीएम 2.5 विशेष चिंता का विषय है, क्योंकि ये साँस के साथ फेफड़ों में गहराई तक पहुँच सकते हैं। वाहनों से निकलने वाला धुआँ, ईंधन जलाना, औद्योगिक गतिविधियाँ, आग और वातावरण में होने वाली रासायनिक प्रक्रियाएँ इन कणों के प्रमुख स्रोत हैं।

अच्छी गुणवत्ता वाला HEPA फिल्टर इन महीन कणों को रोकने में प्रभावी हो सकता है। अमेरिकी ईपीए के अनुसार, पोर्टेबल एयर प्यूरीफायर हवा में मौजूद कणीय प्रदूषण कम करने में मदद कर सकते हैं। इसके लिए कमरे के आकार के हिसाब से सही क्षमता वाली मशीन चुनना जरूरी है।

हालांकि, प्यूरीफायर चलाते ही कमरे की सारी हवा पूरी तरह साफ नहीं हो जाती। बाहर से नए प्रदूषक कमरे में आ सकते हैं। घर के भीतर खाना पकाने, धूम्रपान या अगरबत्ती जलाने से भी नए कण पैदा होते हैं। इसलिए मशीन की क्षमता के साथ प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण रखना भी जरूरी है।

HEPA फिल्टर क्या है और यह छोटे कणों को कैसे पकड़ता है?

HEPA का पूरा नाम 'हाई एफिशिएंसी पार्टिकुलेट एयर' है। यह हवा में मौजूद बेहद छोटे कणों को रोकने वाली उच्च क्षमता की फिल्ट्रेशन तकनीक है।

अमेरिकी मानक के अनुसार, HEPA फिल्टर परीक्षण की तय परिस्थितियों में 0.3 माइक्रोमीटर आकार के कम से कम 99.97 प्रतिशत कणों को रोकने में सक्षम होता है। यूरोप में H13 और H14 जैसे HEPA फिल्टर के अलग मानक हैं। उनकी जाँच और दक्षता तय करने के तरीके अलग हो सकते हैं। इसलिए केवल HEPA लिखा देखकर अलग-अलग फिल्टरों को एक जैसा नहीं मानना चाहिए।

HEPA फिल्टर किसी साधारण जाली की तरह काम नहीं करता, जिसमें बड़े कण फँस जाते हैं और छोटे कण आसानी से निकल जाते हैं। इसके भीतर बेहद महीन रेशों का जाल होता है। हवा इन रेशों के बीच से गुजरती है और अलग-अलग आकार के कण कई प्रक्रियाओं के जरिए उनमें फँस जाते हैं।

बड़े कण हवा के साथ बहते हुए फिल्टर के रेशों से टकराकर रुक सकते हैं। कुछ छोटे कण हवा के रास्ते का अनुसरण करते हुए रेशों के बहुत पास पहुँचते हैं और उनसे चिपक जाते हैं। बेहद छोटे कण हवा के अणुओं से टकराकर अनियमित दिशा में घूमते हैं। इस प्रक्रिया को 'ब्राउनियन' गति कहा जाता है। इससे उनके फिल्टर के रेशों से टकराकर फँसने की संभावना बढ़ जाती है।

इसलिए यह धारणा गलत है कि HEPA फिल्टर केवल 0.3 माइक्रोमीटर से बड़े कणों को पकड़ता है और उससे छोटे सभी कण बाहर निकल जाते हैं। दरअसल, 0.3 माइक्रोमीटर के आसपास के कण कुछ परीक्षण स्थितियों में फिल्टर के लिए विशेष चुनौती होते हैं। उनसे छोटे कई कण भी HEPA फिल्टर में फँस सकते हैं।

लेकिन फिल्टर की क्षमता और पूरी मशीन की सफाई करने की क्षमता अलग-अलग बातें हैं। अगर मशीन का पंखा कमजोर है, फिल्टर ठीक से फिट नहीं है या कुछ हवा फिल्टर से गुजरे बिना बाहर निकल रही है, तो अच्छी गुणवत्ता वाला फिल्टर होने के बावजूद मशीन का प्रदर्शन कमजोर हो सकता है। सिर्फ यह देखकर एयर प्यूरीफायर नहीं खरीदना चाहिए कि उसके डिब्बे पर 99.97 प्रतिशत फिल्ट्रेशन लिखा है। मशीन की CADR रेटिंग भी देखनी जरूरी है।

क्या एयर प्यूरीफायर धूल, परागकण, धुआँ और वायरस भी रोकता है?

HEPA फिल्टर वाला एयर प्यूरीफायर हवा में मौजूद कई तरह के कणों की मात्रा कम कर सकता है। इनमें घर की धूल, परागकण, पालतू जानवरों से निकलने वाले एलर्जी पैदा करने वाले कण और धुएँ के महीन कण शामिल हैं।

कुछ बैक्टीरिया और वायरस भी हवा में छोटी बूंदों या बेहद महीन कणों के साथ मौजूद हो सकते हैं। उपयुक्त फिल्ट्रेशन से ऐसे कणों की संख्या कम करने में मदद मिल सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि एयर प्यूरीफायर लगाने से किसी संक्रामक बीमारी के फैलने का खतरा पूरी तरह खत्म हो जाता है।

मसलन, अगर कोई संक्रमित व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के बिल्कुल पास बैठकर बात कर रहा है, तो प्यूरीफायर के कमरे की हवा साफ करने से पहले ही संक्रमण फैलने का जोखिम हो सकता है। इसलिए जरूरत के अनुसार वेंटिलेशन और दूसरी सावधानियाँ भी जरूरी हैं।

इसी तरह HEPA फिल्टर हवा में मौजूद फफूँद के कुछ बीजाणुओं को रोक सकता है, लेकिन दीवारों या फर्नीचर पर लगी फफूँद को खत्म नहीं करता। इसके लिए नमी के स्रोत को ठीक करना और प्रभावित जगह की उचित सफाई करना जरूरी है।

क्या एयर प्यूरीफायर कमरे की नमी भी सोख लेता है?

सामान्य HEPA एयर प्यूरीफायर कमरे की नमी नहीं सोखता। यह इसके बारे में फैली सबसे आम गलतफहमियों में से एक है। हवा में मौजूद जलवाष्प (वाटर वेपर) और प्रदूषण के महीन कण अलग-अलग चीजें हैं। HEPA फिल्टर का काम हवा में तैरते ठोस और तरल प्रदूषक कणों को रोकना है। जलवाष्प गैस के रूप में हवा में मौजूद रहती है और सामान्य HEPA फिल्टर से गुजर जाती है।

इसलिए एयर प्यूरीफायर को डीह्यूमिडिफायर यानी नमी कम करने वाली मशीन नहीं समझना चाहिए। डीह्यूमिडिफायर हवा में मौजूद जलवाष्प को हटाकर पानी के रूप में जमा करता है। कुछ मशीनें हवा को ठंडा करके उसमें मौजूद नमी को पानी में बदलती हैं, जबकि कुछ विशेष नमी सोखने वाले पदार्थों का इस्तेमाल करती हैं। सामान्य एयर प्यूरीफायर में ऐसी व्यवस्था नहीं होती। उसमें पानी जमा करने के लिए अलग टंकी भी नहीं होती। अगर किसी मशीन में हवा साफ करने और नमी कम करने, दोनों की सुविधा दी गई है, तो उसमें नमी हटाने के लिए अलग तकनीक लगी होगी। यह काम HEPA फिल्टर नहीं करता।

एक्टिवेटेड कार्बन फिल्टर हवा में मौजूद कुछ गैसों और गंध को कम करने में मदद करता है। लेकिन सामान्य घरेलू कार्बन-HEPA प्यूरीफायर को कमरे की नमी नियंत्रित करने वाला उपकरण नहीं माना जा सकता।

एयर प्यूरीफायर चलाने पर गला और नाक सूखे हुए क्यों महसूस होते हैं?

कई लोगों को लगता है कि एयर प्यूरीफायर चलाने के बाद उनका गला या नाक सूखने लगता है। यह अनुभव वास्तविक हो सकता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि मशीन ने कमरे की नमी सोख ली है।

अगर प्यूरीफायर की हवा सीधे चेहरे या शरीर पर पड़ रही है, तो हवा के तेज बहाव से त्वचा और नाक-गले की सतह पर मौजूद नमी तेजी से उड़ सकती है। इससे सूखापन महसूस हो सकता है।

दूसरी वजह सर्दियों का मौसम हो सकता है। इस दौरान कमरे की हवा पहले से शुष्क हो सकती है। अगर कमरे में हीटर चल रहा है, तो हवा गर्म होने के कारण उसकी सापेक्ष आर्द्रता कम हो सकती है। इसका मतलब यह नहीं कि हवा से जलवाष्प की कुल मात्रा भी कम हो गई है।

एयर कंडीशनर भी कुछ परिस्थितियों में हवा की नमी कम करता है। उसकी ठंडी कॉइल पर जलवाष्प पानी में बदलकर बाहर निकल सकती है। लेकिन सामान्य एयर प्यूरीफायर इस तरह काम नहीं करता।

अगर किसी व्यक्ति को लगातार नाक, गले, आँख या त्वचा में सूखापन महसूस होता है, तो कमरे की वास्तविक नमी मापने के लिए हाइग्रोमीटर का इस्तेमाल किया जा सकता है। केवल सूखापन महसूस होने के आधार पर प्यूरीफायर को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है।

कमरे में कितनी नमी होनी चाहिए?

घर के भीतर सापेक्ष आर्द्रता यानी रिलेटिव ह्यूमिडिटी सामान्यतः 30 से 50 प्रतिशत के बीच रखना उपयोगी माना जाता है। बहुत ज्यादा नमी रहने पर फफूँद और धूल के सूक्ष्म जीवों से जुड़ी समस्याएँ बढ़ सकती हैं। दूसरी ओर, बहुत कम नमी से कुछ लोगों में त्वचा, आँख और नाक का सूखापन बढ़ सकता है।

अगर कमरे में नमी लगातार 60 प्रतिशत से अधिक रहती है और दीवारों पर सीलन या फफूँद दिखाई देती है, तो केवल एयर प्यूरीफायर लगाने से समस्या हल नहीं होगी। इसके लिए पानी के रिसाव को ठीक करना, हवा के आवागमन में सुधार करना और जरूरत पड़ने पर डीह्यूमिडिफायर इस्तेमाल करना होगा।

इसी तरह सर्दियों में कमरे की नमी बहुत कम हो तो ह्यूमिडिफायर उपयोगी हो सकता है। यह हवा में नमी बढ़ाने का काम करता है। लेकिन इसमें साफ पानी का इस्तेमाल और नियमित सफाई जरूरी है। नमी जरूरत से ज्यादा बढ़ाने पर फफूँद जैसी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं।

क्या एयर प्यूरीफायर बदबू और जहरीली गैसें भी हटाता है?

इस सवाल का जवाब समझने के लिए HEPA और एक्टिवेटेड कार्बन फिल्टर के बीच अंतर जानना जरूरी है।

HEPA फिल्टर मुख्य रूप से हवा में मौजूद धूल, धुएँ और दूसरे महीन कणों को रोकता है। लेकिन हवा में केवल कण ही नहीं होते। उसमें कई तरह की गैसें और रासायनिक वाष्प भी मौजूद हो सकती हैं। इन्हें वाष्पशील कार्बनिक यौगिक यानी वीओसी कहा जाता है। घर में इस्तेमाल होने वाले कुछ सफाई उत्पाद, पेंट, फर्नीचर और चिपकाने वाले पदार्थ ऐसी गैसें छोड़ सकते हैं। सामान्य HEPA फिल्टर इन्हें प्रभावी ढंग से हटाने के लिए नहीं बनाया गया है।

इसी वजह से कुछ एयर प्यूरीफायर में एक्टिवेटेड कार्बन फिल्टर भी लगाया जाता है। इसमें बहुत छोटे छेद होते हैं और इसकी अंदरूनी सतह काफी बड़ी होती है। कुछ गैसें और गंध पैदा करने वाले अणु इस सतह पर चिपक जाते हैं। इस प्रक्रिया को एडसॉर्प्शन कहा जाता है।

हालांकि, सभी गैसें कार्बन फिल्टर से समान रूप से नहीं हटतीं। इसका प्रदर्शन फिल्टर में मौजूद कार्बन की मात्रा, उसकी गुणवत्ता, हवा के बहाव और गैस के प्रकार पर निर्भर करता है।

अमेरिकी ईपीए के अनुसार, गैसों को हटाने के लिए पर्याप्त मात्रा में उपयुक्त फिल्टर सामग्री होना जरूरी है। इसलिए बहुत पतली कार्बन परत वाले प्यूरीफायर से उतने अच्छे नतीजों की उम्मीद नहीं करनी चाहिए, जितने पर्याप्त मात्रा में कार्बन वाले फिल्टर से मिल सकते हैं।

एक जरूरी सावधानी यह भी है कि सामान्य घरेलू एयर प्यूरीफायर कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी जानलेवा गैस से भरोसेमंद सुरक्षा नहीं देता। गैस हीटर, अंगीठी या दूसरे ईंधन जलाने वाले उपकरणों से कार्बन मोनोऑक्साइड का खतरा हो सकता है। इससे बचने के लिए सुरक्षित उपकरण, उचित वेंटिलेशन और कार्बन मोनोऑक्साइड अलार्म जरूरी हैं।

क्या एयर प्यूरीफायर कमरे की ऑक्सीजन खत्म कर देता है?

सामान्य एयर प्यूरीफायर ऑक्सीजन का इस्तेमाल करके हवा साफ नहीं करता। वह कमरे की हवा को फिल्टर से गुजारता है। इसलिए यह दावा गलत है कि एयर प्यूरीफायर चलाने से कमरे की ऑक्सीजन खत्म हो जाती है। लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि सामान्य एयर प्यूरीफायर कमरे में नई ऑक्सीजन नहीं बनाता। वह बंद कमरे में जमा कार्बन डाइऑक्साइड को भी प्रभावी ढंग से नहीं हटाता।

अगर किसी कमरे में कई लोग लंबे समय तक बैठे हैं और बाहर से ताजी हवा आने की व्यवस्था नहीं है, तो केवल प्यूरीफायर चलाने से वेंटिलेशन की जरूरत खत्म नहीं होगी। सर्दियों में बाहर का प्रदूषण बहुत ज्यादा होने पर खिड़कियाँ लगातार खोलकर रखना भी सही नहीं हो सकता, क्योंकि इससे बाहर के प्रदूषक कण कमरे में आ सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कमरे को पूरी तरह बंद कर दिया जाए। बाहर की हवा की स्थिति और उपलब्ध वेंटिलेशन व्यवस्था को ध्यान में रखकर ताजी हवा का आवागमन बनाए रखना जरूरी है।

आयोनाइजर और ओजोन बनाने वाले प्यूरीफायर से क्यों बचना चाहिए?

कुछ कंपनियाँ अपने एयर प्यूरीफायर में HEPA फिल्टर के अलावा आयोनाइजर, प्लाज्मा, यूवी और दूसरी तकनीकों का प्रचार करती हैं। इनमें से कुछ तकनीकों के खास इस्तेमाल हो सकते हैं, लेकिन हर अतिरिक्त सुविधा से मशीन की सफाई क्षमता बेहतर हो, यह जरूरी नहीं है।

आयोनाइजर हवा में आवेशित कण छोड़ता है। ये कुछ प्रदूषक कणों को विद्युत आवेश देकर उन्हें आसपास की सतहों पर जमा करने में मदद कर सकते हैं। लेकिन अलग-अलग आयोनाइजर का प्रदर्शन अलग होता है। कुछ इलेक्ट्रॉनिक एयर क्लीनर ओजोन भी पैदा कर सकते हैं।

ओजोन तीन ऑक्सीजन परमाणुओं से बनी गैस है। ऊपरी वातावरण में मौजूद ओजोन की परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है। लेकिन जमीन के पास मौजूद ओजोन साँस के साथ शरीर में पहुँचकर फेफड़ों को नुकसान पहुँचा सकती है।

अमेरिकी ईपीए ने ऐसे एयर क्लीनर से बचने की सलाह दी है, जो जानबूझकर ओजोन पैदा करते हैं। कुछ आयोनाइजर, प्लाज्मा और यूवी आधारित उपकरणों में भी ओजोन निकलने की आशंका हो सकती है।

घर के लिए एयर प्यूरीफायर खरीदते समय उच्च क्षमता वाले मैकेनिकल फिल्ट्रेशन यानी फिल्टर के जरिए हवा साफ करने वाली तकनीक को प्राथमिकता देना बेहतर है। केवल 'ऑक्सीजन एक्टिवेशन', 'आयन बूस्टर' या 'हवा को जीवाणुमुक्त करने' जैसे विज्ञापनों से मशीन की वास्तविक गुणवत्ता साबित नहीं होती।

एयर प्यूरीफायर खरीदते समय सबसे पहले क्या देखना चाहिए?

एयर प्यूरीफायर खरीदते समय सबसे अहम तकनीकी मानक CADR है। इसका पूरा नाम 'क्लीन एयर डिलीवरी रेट' है। आसान भाषा में इसका मतलब है कि मशीन एक तय समय में कितनी साफ हवा उपलब्ध करा सकती है।

भारत में कई कंपनियाँ CADR को घनमीटर प्रति घंटे यानी m³/h में बताती हैं। उदाहरण के लिए, अगर किसी मशीन का CADR 300 घनमीटर प्रति घंटा है, तो मानकीकृत परीक्षण की परिस्थितियों में उसकी साफ हवा देने की क्षमता 300 घनमीटर प्रति घंटे के बराबर है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मशीन एक घंटे में कमरे की सारी हवा को पूरी तरह साफ कर देगी। वास्तविक परिणाम कमरे के आकार, हवा के बहाव, दरवाजे-खिड़कियों की स्थिति और कमरे में लगातार पैदा हो रहे प्रदूषण पर निर्भर करते हैं।

अमेरिका की एसोसिएशन ऑफ होम अप्लायंस मैन्युफैक्चरर्स यानी एएचएएम भी एयर प्यूरीफायर चुनते समय CADR को एक अहम मानक मानती है। उसका प्रमाणन कार्यक्रम स्वतंत्र प्रयोगशालाओं में कुछ मॉडलों की हवा साफ करने की क्षमता की जाँच करता है। मशीन खरीदते समय केवल उसके फिल्टर पर लिखी दक्षता नहीं, बल्कि पूरी मशीन की CADR रेटिंग देखना जरूरी है।

कमरे के आकार के हिसाब से कितनी क्षमता वाला प्यूरीफायर लेना चाहिए?

एयर प्यूरीफायर खरीदते समय कमरे का आकार सबसे अहम बातों में से एक है। मशीन की क्षमता इतनी होनी चाहिए कि वह कमरे की हवा को पर्याप्त तेजी से साफ कर सके।

मान लीजिए आपका बेडरूम 12 फुट लंबा और 12 फुट चौड़ा है। इसका क्षेत्रफल 144 वर्ग फुट होगा। अगर कमरे की ऊँचाई नौ फुट है, तो उसमें कुल हवा का आयतन लगभग 36.7 घनमीटर होगा।

अब अगर आप चाहते हैं कि प्यूरीफायर की साफ हवा देने की क्षमता कमरे की कुल हवा के आयतन के लगभग पाँच गुने के बराबर प्रति घंटे हो, तो करीब 185 घनमीटर प्रति घंटे CADR की जरूरत पड़ेगी। यह एक अनुमानित गणना है। वास्तविक कमरे में हवा हर जगह एक समान तरीके से नहीं घूमती और न ही हर बार पूरी तरह फिल्टर होती है।

इसी आधार पर नौ फुट ऊँची छत वाले सामान्य कमरे के लिए लगभग 150 वर्ग फुट के क्षेत्र में 200 से 250 CADR वाला प्यूरीफायर उपयोगी हो सकता है। करीब 200 वर्ग फुट के कमरे के लिए 300 या उससे अधिक CADR देखना बेहतर होगा। लगभग 300 वर्ग फुट के कमरे में 400 से 450 CADR वाला विकल्प उपयोगी हो सकता है। वहीं, 400 वर्ग फुट के कमरे के लिए करीब 500 से 600 CADR या उससे अधिक क्षमता की जरूरत पड़ सकती है।

ये अनुमान प्रति घंटे लगभग पाँच बार कमरे के बराबर हवा साफ करने के लक्ष्य पर आधारित हैं। अगर कमरे की छत ऊँची है, बाहर से प्रदूषण तेजी से भीतर आ रहा है या मशीन को कम गति पर चलाना है, तो अधिक क्षमता की जरूरत हो सकती है।

एएचएएम की पारंपरिक कमरे के आकार की रेटिंग भी लगभग 4.8 प्रभावी एयर चेंज प्रति घंटे के आधार पर तय की जाती रही है। इसलिए किसी कंपनी के विज्ञापन में लिखे अधिकतम कवरेज एरिया को देखकर ही मशीन नहीं खरीदनी चाहिए। कमरे का वास्तविक आयतन और CADR ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं।

क्या कमरे से बड़ी क्षमता वाला प्यूरीफायर लेना नुकसानदायक है?

आमतौर पर नहीं। अगर 200 वर्ग फुट के कमरे के लिए 350 या 400 CADR वाला प्यूरीफायर लिया जाए, तो वह उपयुक्त परिस्थितियों में हवा को अपेक्षाकृत तेजी से साफ कर सकता है। बड़ी क्षमता वाली मशीन का एक फायदा यह भी हो सकता है कि कमरे में हवा साफ रखने के लिए उसे हर समय सबसे तेज गति पर चलाने की जरूरत न पड़े। कम गति पर मशीन की आवाज कम हो सकती है, जिससे रात में इस्तेमाल करना आसान होता है। हालांकि, बड़ी मशीन की कीमत, बिजली की खपत और फिल्टर बदलने का खर्च भी अधिक हो सकता है। इसलिए क्षमता का चुनाव कमरे के आकार और जरूरत के हिसाब से करना चाहिए।

फिल्टर बदलने का खर्च मशीन की कीमत से ज्यादा महत्त्वपूर्ण क्यों है?

एयर प्यूरीफायर खरीदते समय कई लोग केवल उसकी शुरुआती कीमत देखते हैं। लेकिन यह ऐसा उपकरण है, जिसमें समय-समय पर फिल्टर बदलना जरूरी होता है।

मशीन चलते रहने पर HEPA फिल्टर में धूल और दूसरे प्रदूषक कण जमा होते जाते हैं। एक्टिवेटेड कार्बन फिल्टर की गैस और गंध सोखने की क्षमता भी धीरे-धीरे कम हो सकती है। इसलिए कुछ समय बाद फिल्टर बदलना पड़ता है। कई कंपनियाँ छह से बारह महीने में फिल्टर बदलने की सलाह देती हैं। कुछ मशीनों के फिल्टर इससे अधिक समय तक चलने का दावा भी किया जाता है। लेकिन वास्तविक अवधि इस बात पर निर्भर करती है कि मशीन कितने घंटे चलती है और कमरे में प्रदूषण कितना है।

मान लीजिए कोई मशीन 10 हजार रुपये में मिल रही है और उसका नया फिल्टर चार हजार रुपये का है। ऐसे में कुछ वर्षों के भीतर फिल्टर बदलने पर होने वाला खर्च काफी बढ़ सकता है। दूसरी ओर, कोई महँगी मशीन लंबे समय तक चलने वाले फिल्टर के कारण कुल खर्च के मामले में बेहतर साबित हो सकती है।

इसलिए खरीदने से पहले फिल्टर की कीमत, उसे बदलने की अवधि और नए फिल्टर की उपलब्धता जरूर जाँचनी चाहिए। कुछ मशीनों में जालीदार प्री-फिल्टर होता है, जिसे साफ करके दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन सामान्य HEPA फिल्टर को पानी से धोना उचित नहीं है, जब तक निर्माता ने इसकी स्पष्ट अनुमति न दी हो। पानी से धोने पर उसके महीन रेशों की बनावट और काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

क्या एयर प्यूरीफायर दिनभर चलाना चाहिए?

अगर बाहर का प्रदूषण लगातार ज्यादा है और कमरे में लोग लंबे समय तक रहते हैं, तो प्यूरीफायर को अधिक समय तक चलाने से हवा में मौजूद प्रदूषक कणों की मात्रा कम रखने में मदद मिल सकती है।

अमेरिकी ईपीए के अनुसार, आम तौर पर पंखे की गति जितनी अधिक होगी और मशीन जितने लंबे समय तक चलेगी, उतनी अधिक हवा फिल्टर होगी। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर घर में मशीन को हर समय सबसे तेज गति पर चलाना जरूरी है।

अगर कमरे में प्रदूषण कम है और मशीन में भरोसेमंद सेंसर तथा ऑटो मोड है, तो वह हवा की स्थिति के अनुसार पंखे की गति बदल सकती है। रात में शोर से बचने के लिए स्लीप मोड उपयोगी हो सकता है। लेकिन कम गति पर मशीन की CADR क्षमता भी घट जाती है। इसलिए प्रदूषण बहुत ज्यादा होने पर केवल सबसे शांत मोड पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं हो सकता।

मशीन को ऐसी जगह रखना चाहिए जहाँ हवा के आने और बाहर निकलने का रास्ता खुला हो। उसे भारी पर्दों के पीछे, बंद अलमारी में या ऐसी जगह नहीं रखना चाहिए जहाँ हवा का बहाव रुक जाए। मशीन के आसपास कितनी जगह छोड़नी है, इसके लिए निर्माता के निर्देशों का पालन करना चाहिए।

भारत में किन कंपनियों के एयर प्यूरीफायर पर विचार किया जा सकता है?

भारत में फिलिप्स, काउवे, शाओमी, हनीवेल और दूसरी कंपनियों के एयर प्यूरीफायर उपलब्ध हैं। लेकिन खरीदते समय केवल ब्रांड का नाम देखकर फैसला नहीं करना चाहिए। मशीन की CADR क्षमता, फिल्टर की गुणवत्ता, कमरे का आकार और नए फिल्टर की उपलब्धता ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं।

उदाहरण के लिए, काउवे का Airmega 150 एक ऐसा मॉडल है, जिसमें प्री-फिल्टर, कार्बन फिल्टर और उच्च दक्षता वाला पार्टिकुलेट फिल्टर दिया गया है। कंपनी के आधिकारिक विवरण के अनुसार, इसका CADR 303 घनमीटर प्रति घंटा है। इसकी अधिकतम बिजली खपत 38 वॉट बताई गई है और फिल्टर की घोषित आयु लगभग 8,500 उपयोग घंटे है। कंपनी इसे करीब 355 वर्ग फुट तक के कमरे के लिए उपयुक्त बताती है। हालांकि, अधिक प्रदूषण वाले कमरे में बेहतर सफाई के लिए कमरे के आयतन और मशीन की वास्तविक क्षमता को ध्यान में रखना चाहिए।

फिलिप्स के AC1711 मॉडल में कंपनी ने 300 घनमीटर प्रति घंटे CADR और HEPA तथा एक्टिवेटेड कार्बन फिल्ट्रेशन की जानकारी दी है। इसमें ऑटो मोड, हवा की गुणवत्ता मापने वाला सेंसर और स्लीप मोड जैसी सुविधाएँ भी हैं। कंपनी के अनुसार, फिल्टर बदलने की अवधि लगभग एक वर्ष हो सकती है। वास्तविक अवधि उपयोग और प्रदूषण की स्थिति के अनुसार बदल सकती है।

शाओमी के Smart Air Purifier 4 Lite का घोषित पार्टिकल CADR 360 घनमीटर प्रति घंटा है। कंपनी के अनुसार, इसमें तीन स्तरों वाला फिल्ट्रेशन, एक्टिवेटेड कार्बन और मोबाइल ऐप से नियंत्रण की सुविधा मिलती है। इसमें हवा की गुणवत्ता दिखाने वाला सेंसर भी है। कंपनी ने इसका कवरेज लगभग 269 से 463 वर्ग फुट बताया है। हालांकि, वास्तविक जरूरत कमरे के आकार और प्रदूषण के स्तर पर निर्भर करेगी।

शाओमी के Smart Air Purifier 4 में घोषित पार्टिकल CADR 400 घनमीटर प्रति घंटा है। इस मॉडल में तापमान और नमी मापने वाला सेंसर भी दिया गया है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि नमी मापने वाला सेंसर होने का मतलब यह नहीं है कि मशीन कमरे की नमी कम भी कर सकती है। सेंसर केवल नमी का स्तर बताता है। सामान्य एयर प्यूरीफायर की तरह यह मशीन भी डीह्यूमिडिफायर का काम नहीं करती।

इन मॉडलों का उल्लेख बाजार में उपलब्ध तकनीकी विकल्पों के उदाहरण के रूप में किया गया है। इन्हें किसी स्वतंत्र प्रयोगशाला की तुलना के आधार पर सर्वश्रेष्ठ से कमतर क्रम में नहीं रखा गया है। खरीदने से पहले मॉडल की मौजूदा कीमत, रिप्लेसमेंट फिल्टर का खर्च और आपके शहर में सर्विस की उपलब्धता जरूर जाँच लें।

उत्तर भारत में प्रदूषण से बचाव के लिए कैसा प्यूरीफायर चुनें?

लखनऊ, दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, कानपुर और उत्तर भारत के कई शहरों में सर्दियों के दौरान पीएम 2.5 प्रदूषण बड़ी चिंता बन जाता है। ऐसे में अगर आपका मुख्य उद्देश्य हवा में मौजूद महीन कणों को कम करना है, तो पर्याप्त CADR वाला उच्च दक्षता का HEPA फिल्ट्रेशन सिस्टम चुनना बेहतर होगा।

150 से 200 वर्ग फुट के सामान्य बेडरूम के लिए लगभग 250 से 350 घनमीटर प्रति घंटे CADR वाला अच्छा एयर प्यूरीफायर उपयोगी विकल्प हो सकता है। अगर कमरे का आकार 250 से 300 वर्ग फुट है, तो लगभग 350 से 450 या उससे अधिक CADR वाले मॉडल देखे जा सकते हैं।

हालांकि, मशीन चुनते समय केवल विज्ञापन में दिए गए अधिकतम कवरेज एरिया पर भरोसा नहीं करना चाहिए। कमरे का वास्तविक आकार, छत की ऊँचाई और मशीन की साफ हवा देने की क्षमता ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं।

अगर कमरे में धूल, धुआँ और पीएम 2.5 मुख्य समस्या हैं, तो HEPA आधारित फिल्ट्रेशन और पर्याप्त CADR को प्राथमिकता दें। अगर खाना पकाने की गंध या कुछ रासायनिक गैसों की समस्या भी है, तो पर्याप्त मात्रा में एक्टिवेटेड कार्बन वाला फिल्टर उपयोगी हो सकता है। लेकिन यह ध्यान रखें कि सामान्य घरेलू प्यूरीफायर सभी तरह की गैसों को प्रभावी ढंग से नहीं हटा सकता।

जिन घरों में बच्चे, बुजुर्ग या साँस से जुड़ी समस्याओं वाले लोग रहते हैं, वहाँ घर के भीतर हवा की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देना उपयोगी हो सकता है। लेकिन एयर प्यूरीफायर किसी बीमारी का इलाज या डॉक्टर की सलाह का विकल्प नहीं है।

क्या पूरे घर के लिए एक एयर प्यूरीफायर पर्याप्त है?

आमतौर पर एक पोर्टेबल एयर प्यूरीफायर एक कमरे या सीमित खुले हिस्से की हवा साफ करने के लिए बनाया जाता है।

मान लीजिए किसी घर में तीन बेडरूम, एक ड्राइंग रूम और एक रसोई है। अगर ड्राइंग रूम में एक प्यूरीफायर लगा दिया जाए और बाकी कमरों के दरवाजे बंद हों, तो यह मानना सही नहीं होगा कि उसी मशीन से पूरे घर की हवा प्रभावी ढंग से साफ हो रही है।

दीवारें, दरवाजे और हवा के आने-जाने का रास्ता तय करते हैं कि मशीन घर के किन हिस्सों की हवा को बार-बार फिल्टर कर सकती है।

ऐसे घर में उन कमरों को प्राथमिकता देना बेहतर होगा जहाँ परिवार के लोग ज्यादा समय बिताते हैं। उदाहरण के लिए, रात में बेडरूम और दिन में बैठक या काम करने वाले कमरे में अलग प्यूरीफायर की जरूरत हो सकती है।

अगर घर में केंद्रीय एयर कंडीशनिंग या एचवीएसी व्यवस्था है, तो उसमें उपयुक्त उच्च क्षमता वाला फिल्टर लगाना भी एक विकल्प हो सकता है। अमेरिकी ईपीए ऐसी व्यवस्थाओं में सिस्टम की क्षमता के अनुसार MERV-13 या उससे बेहतर फिल्टर पर विचार करने की सलाह देती है। हालांकि, मौजूदा एसी सिस्टम में ऐसा फिल्टर लगाने से पहले यह देखना जरूरी है कि वह उस मशीन के अनुकूल है या नहीं।

क्या एयर प्यूरीफायर होने के बाद घर की सफाई की जरूरत नहीं रहती?

ऐसा बिल्कुल नहीं है। एयर प्यूरीफायर हवा में तैरते प्रदूषक कणों की मात्रा कम करता है। वह फर्श पर जमी धूल, बिस्तर की गंदगी या दीवारों पर लगी फफूँद को साफ नहीं करता। अगर घर में लगातार धूल आती है, तो उसके स्रोत को कम करना जरूरी है। इसी तरह, अगर किसी कमरे में धूम्रपान होता है या नियमित रूप से धुआँ पैदा होता है, तो केवल एयर प्यूरीफायर पर निर्भर रहना ठीक नहीं है। घर की नियमित सफाई, धूल के स्रोतों पर नियंत्रण और जरूरत के अनुसार वेंटिलेशन भी महत्त्वपूर्ण हैं। अमेरिकी ईपीए भी प्रदूषण के स्रोत को कम करने और उचित वेंटिलेशन को हवा की गुणवत्ता सुधारने के प्रमुख उपाय मानती है। फिल्ट्रेशन इन उपायों में मदद करता है, उनकी जगह नहीं लेता।

ध्यान रखें कि सही मशीन चुनना जरूरी है। घर के लिए प्यूरीफायर खरीदते समय केवल कंपनी का नाम या विज्ञापन में बताया गया अधिकतम कवरेज एरिया नहीं देखना चाहिए। CADR, फिल्टर का मानक, कमरे का आयतन, मशीन का शोर, फिल्टर बदलने का खर्च और नए फिल्टर की उपलब्धता ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं। अगर गैसों या गंध की समस्या भी है, तो पर्याप्त एक्टिवेटेड कार्बन वाले फिल्टर पर विचार किया जा सकता है। ओजोन पैदा करने वाली मशीनों से बचना बेहतर है।

आखिरकार, एयर प्यूरीफायर की सफलता उसकी कीमत, ब्रांड या डिजिटल डिस्प्ले से तय नहीं होती। असली बात यह है कि वह आपके कमरे में हवा के प्रदूषक कणों को कितनी प्रभावी ढंग से कम कर पाता है। मशीन खरीदते समय यही सबसे महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक आधार होना चाहिए।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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