Newstrack Special: Google Maps को कैसे पता चलता है ट्रैफिक जाम? फोन से ऐसे पता चलता है Traffic

Google Maps को कैसे पता चलता है कि सड़क पर ट्रैफिक जाम है? जानिए GPS, फोन की लोकेशन, स्पीड, लाइव ट्रैफिक डेटा और AI की मदद से Google कैसे जाम और ETA का अनुमान लगाता है।

Yogesh Mishra
Published on: 22 Aug 2026 7:21 PM IST
Google Maps Traffic Jam Explained in Hindi
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Google Maps Traffic Jam Explained in Hindi

Google Maps Traffic Jam Explained: आप सड़क पर फंसे हैं और गूगल मैप बता रहा है कि आगे भारी जाम है। सवाल यह है कि उसे यह पता कैसे चला? क्या सड़क पर लगे कैमरे हर गाड़ी को देख रहे हैं? या कोई ट्रैफिक पुलिसकर्मी लगातार गूगल को जानकारी दे रहा है? असल में गूगल मैप के लिए सड़क पर चल रहा आपका फोन ही एक तरह का सेंसर बन जाता है। हजारों-लाखों फोन जब एक साथ अपनी जगह, रफ्तार और चलने की दिशा के संकेत देते हैं, तो गूगल उन आंकड़ों को जोड़कर समझ सकता है कि किसी सड़क पर गाड़ियां सामान्य रफ्तार से चल रही हैं या अचानक रेंगने लगी हैं। फिर वह इस जानकारी को पुराने ट्रैफिक के आंकड़ों, दुर्घटना और सड़क बंद होने जैसी सूचनाओं के साथ मिलाकर यह भी अनुमान लगाता है कि आने वाले कुछ समय में जाम कितना बढ़ सकता है। यानी गूगल मैप सिर्फ यह नहीं देखता कि अभी सड़क पर क्या हो रहा है, वह यह अनुमान लगाने की कोशिश भी करता है कि जब आप वहां पहुंचेंगे तब सड़क की हालत कैसी होगी।

जब बड़ी संख्या में लोग गूगल मैप्स (Google Maps) की नेविगेशन सुविधा इस्तेमाल करते हुए किसी सड़क से गुजरते हैं, तो उनके जीपीएस (GPS) लोकेशन, गति और यात्रा की दिशा जैसी जानकारी को मिलाकर गूगल यह अनुमान लगा सकता है कि उस सड़क पर वाहन सामान्य गति से चल रहे हैं या बहुत धीमे हो गए हैं। Google स्वयं बताता है कि नेविगेशन डेटा जैसे कि जीपीएस, लिया गया रूट और कुछ डिवाइस सेंसर डेटा रियल टाइम के ट्रैफिक हालात और व्यवधान समझने में इस्तेमाल होता है।

मान लीजिए किसी सड़क पर सामान्यतः शाम पाँच बजे कारें 45 किलोमीटर प्रति घंटा चलती हैं। आज उसी सड़क पर कई अलग-अलग फोन लगातार 8 - 10 किलोमीटर प्रति घंटा की गति से आगे बढ़ रहे हैं। यदि यह केवल एक फोन के साथ हो रहा है तो संभव है कि वह व्यक्ति पैदल हो, कार खड़ी कर चुका हो या GPS में गलती हो। लेकिन यदि उसी सड़क के उसी हिस्से में दर्जनों या सैकड़ों उपकरण लगभग समान धीमी गति दिखा रहे हों, तो प्रणाली के लिए यह मजबूत संकेत बन जाता है कि वहाँ वास्तविक ट्रैफिक धीमा है।

कैसे काम करती है भीड़ की बुद्धि?

यहीं ‘भीड़ की बुद्धि’ काम करती है। एक फोन विश्वसनीय नहीं, लेकिन हजारों फोन एक विशाल वितरित यातायात सेंसर-नेटवर्क बन जाते हैं। इसे बहुत सरल रूप में समझें। सड़क पर सौ कारें हैं। उनमें से कई में Google Maps चल रहा है। हर वाहन आगे बढ़ते हुए बार-बार अपना नया स्थान देता है। प्रणाली देखती है कि पहले वाहन ने 30 सेकंड में 400 मीटर तय किए। लेकिन अब वही दूरी तय करने में तीन मिनट लग रहे हैं। पीछे आने वाले अनेक वाहनों में भी वही पैटर्न है। तभी Maps उस सड़क के हिस्से को नारंगी या लाल दिखाना शुरू कर सकता है। Google के अनुसार ट्रैफिक लेयर में हरा रंग सामान्य गति, नारंगी मध्यम जाम और लाल धीमा ट्रैफिक दिखाता है; जितना गहरा लाल, गति उतनी कम।

लेकिन केवल वर्तमान गति जानना पर्याप्त नहीं है। आपको घर से ऑफिस पहुँचने में 45 मिनट लगेंगे या 70 मिनट, यह बताने के लिए Google को भविष्य का ट्रैफिक भी अनुमान लगाना पड़ता है। इसके लिए Google वर्तमान लाइव डेटा को सड़क के पुराने इतिहास के साथ मिलाता है। उदाहरण के लिए किसी फ्लाईओवर पर सोमवार से शुक्रवार सुबह आठ से दस बजे तक वर्षों से गति कम रहती है। रविवार को वही सड़क लगभग खाली रहती है। Google इन ऐतिहासिक पैटर्न को सीखता है। फिर आज के लाइव ट्रैफिक से मिलाता है कि क्या आज वही सामान्य सोमवार वाला पैटर्न है, उससे ज्यादा जाम है या कम? Google ने बताया है कि उसकी यातायात भविष्यवाणी प्रणाली पिछले ट्रैफिक पैटर्न और लाइव स्थितियों को मशीन लर्निंग के माध्यम से जोड़ती है।

यानी यदि आप सुबह 7 बजे Maps खोलकर पूछते हैं कि 8:30 बजे एयरपोर्ट पहुँचने में कितना समय लगेगा, तो Google केवल इस क्षण सड़क पर मौजूद वाहनों को नहीं देख रहा। वह यह भी अनुमान लगा रहा है कि जब आप 25 मिनट बाद उस सड़क पर पहुँचेंगे, तब वहाँ कितनी भीड़ होने की संभावना है। यही कारण है कि कभी-कभी आपकी यात्रा शुरू करते समय मैप 55 मिनट बताता है और कुछ देर बाद अचानक कहता है - ‘12 मिनट की देरी।’ बीच में आगे कहीं दुर्घटना, निर्माण या असामान्य भीड़ पैदा हो गई होगी और लाइव डेटा ने पुराने अनुमान को बदल दिया।

एआई की मदद से भविष्यवाणी

इस भविष्यवाणी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता महत्वपूर्ण है। Google ने DeepMind के साथ मिलकर ग्राफ न्यूरल नेटवर्क्स (Graph Neural Networks) जैसी मशीन-लर्निंग तकनीकों का उपयोग यातायात और ETA की भविष्यवाणी सुधारने के लिए किया है। सड़कें अलग-अलग स्वतंत्र रेखाएँ नहीं हैं। वे एक नेटवर्क हैं। यदि एक मुख्य सड़क जाम होती है तो उसका असर पास की दूसरी सड़क, चौराहे और वैकल्पिक मार्ग पर भी जा सकता है। ग्राफ आधारित मॉडल इसी नेटवर्क प्रभाव को समझने की कोशिश करते हैं।

गूगल को कैसे पता चलता है कि धीमी गति जाम है या ट्रैफिक सिग्नल?

यहाँ ऐतिहासिक पैटर्न बहुत काम आता है। यदि किसी चौराहे पर लगभग हर बार वाहन 45 सेकंड रुकते हैं और फिर तेजी से आगे बढ़ते हैं, तो मॉडल सीख सकता है कि यह सामान्य सिग्नल व्यवहार है। लेकिन यदि उसी चौराहे से दो किलोमीटर पहले से वाहन लगातार रेंग रहे हैं और सामान्य समय की तुलना में औसत गति बहुत नीचे है, तो यह जाम का अलग पैटर्न है।इसी तरह टोल प्लाजा, रेलवे क्रॉसिंग, स्कूल ज़ोन या स्पीड ब्रेकर के आसपास की सामान्य धीमी गति को भी लंबे समय के डेटा से अलग पहचाना जा सकता है। वास्तविक प्रणाली के सभी आंतरिक नियम गूगल सार्वजनिक नहीं करता, लेकिन वह स्पष्ट रूप से लाइव और हिस्टोरिकल ट्रैफिक डेटा को जोड़ता है।

अब दुर्घटना का मामला लें। केवल गति देखकर मैप्स इतना तो समझ सकता है कि ट्रैफिक अचानक धीमा हुआ है, लेकिन उसे यह कैसे पता चले कि कार दुर्घटना हुई है?

इसका एक स्रोत यूजर्स की रिपोर्ट है। चालक मैप्स में दुर्घटना, रोड बंदी, निर्माण कार्य, अटका वाहन या रास्ते में बाधा की सूचना दे सकते हैं। Google इन रियल टाइम रिपोर्ट को रूटीन में इस्तेमाल करता है। इसके अलावा स्थानीय सरकारों और दूसरे आधिकारिक भागीदारों से सड़क बंद होने, निर्माण और प्रतिबंधों जैसी जानकारी ली जाती है। इसलिए यदि आपको Maps पर दुर्घटना का छोटा निशान दिखाई देता है, तो वह केवल फोन की गति देखकर निकाला गया अनुमान नहीं हो सकता; उसके पीछे ड्राइवर रिपोर्ट या किसी आधिकारिक स्रोत की सूचना भी हो सकती है। Google कुछ वाहनों और उपकरणों से अतिरिक्त सेंसर इनफ़ॉर्मेशन भी ले सकता है, जहाँ उपयोगकर्ता ने ऐसी शेयरिंग इनेबल की हो।

उदाहरण के लिए, गूगल की कारों में पहले से लगी मैप सेवा में जीपीएस, रास्ते की जानकारी, सड़क की जानकारी, वायुदाब मापने वाला यंत्र और ऐसे वाहनों से मिलने वाली पहियों की गति जैसी सेंसर जानकारी यातायात और नक्शे को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।

क्या गूगल हमारी हर कार और हर फोन को व्यक्तिगत रूप से ट्रैक करता है?

गूगल की सार्वजनिक जानकारी के अनुसार, रास्ता दिखाने वाले आंकड़ों का इस्तेमाल यातायात जैसी सुविधाओं के लिए एक साथ मिलाकर किया जाता है। फोन से मिलने वाली ऐसी स्थान संबंधी जानकारी, जिससे किसी व्यक्ति की पहचान सीधे न हो सके, दूसरे उपकरणों से मिले आंकड़ों के साथ मिलाई जाती है। इसका मकसद यह है कि यातायात की जानकारी को किसी एक व्यक्ति या किसी एक उपकरण की पहचान से न जोड़ा जाए। कुछ यात्रा और सेंसर संबंधी जानकारी को गूगल खाते से अलग, समय-समय पर बदलने वाली सुरक्षित पहचान संख्या से जोड़ने की भी बात कही गई है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि यातायात का नक्शा बनाने के लिए गूगल को किसी व्यक्ति का नाम जानने की जरूरत नहीं है। उसे सिर्फ यह जानना है कि सड़क के इस हिस्से में पर्याप्त संख्या में उपकरण किस गति से और किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यही कारण है कि किसी शहर की लाखों कारें गूगल के लिए व्यक्तिगत रूप से ‘रमेश की कार’ या ‘सीमा की कार’ नहीं, बल्कि आंकड़ों के रूप में आगे बढ़ रहे हजारों-लाखों बिंदुओं का एक बड़ा समूह बन सकती हैं।

एक मजेदार उदाहरण इस व्यवस्था की कमजोरी भी दिखाता है। अगर कोई व्यक्ति बड़ी संख्या में चालू स्मार्टफोन एक ठेले में रखकर बहुत धीरे-धीरे सड़क पर ले जाए, तो क्या गूगल को लग सकता है कि वहां भारी जाम है? सैद्धांतिक रूप से इस तरह किसी भीड़ से मिलने वाली यातायात जानकारी को भ्रमित करने की कोशिश की जा सकती है। इसी वजह से आधुनिक व्यवस्थाएं सिर्फ यह नहीं देखतीं कि सड़क पर कितने फोन हैं। वे उनकी गति, दिशा, समय, उस सड़क के पुराने आंकड़ों और दूसरे संकेतों को भी एक साथ देखती हैं। किसी एक असामान्य समूह को वास्तविक जाम मान लेना एक भरोसेमंद व्यवस्था के लिए पर्याप्त नहीं होना चाहिए।

गूगल मैप अनुमान लगाता रहता है

गूगल मैप का एक और कम समझा जाने वाला काम है यह पता लगाना कि फोन वास्तव में किस सड़क पर चल रहा है। जीपीएस हमेशा पूरी तरह सटीक नहीं होता। ऊंची इमारतों, फ्लाईओवरों या उपग्रह से कमजोर संपर्क की स्थिति में आपका नीला बिंदु असली सड़क से कुछ मीटर दूर दिखाई दे सकता है। इसलिए मैप को अनुमान लगाना पड़ता है कि फोन वास्तव में किस सड़क और किस दिशा में चल रहा है।

अगर दो समानांतर सड़कें केवल दस मीटर की दूरी पर हों तो यह काम और मुश्किल हो जाता है। रास्ते की जानकारी, चलने की दिशा और गति जैसे संकेत यह तय करने में मदद करते हैं कि उपयोगकर्ता सड़क के किस हिस्से पर है। अगर ऐसा न किया जाए तो बगल की सर्विस सड़क पर खड़े वाहनों का जाम मुख्य राजमार्ग पर दिखाई दे सकता है।

अब समझिए कि मैप पर दिखाई देने वाला ‘लाल रंग’ वास्तव में क्या बताता है। इसका मतलब जरूरी नहीं कि सड़क पर गाड़ियों की संख्या बहुत ज्यादा है। यह मुख्य रूप से इस बात का संकेत है कि गाड़ियां सामान्य रफ्तार की तुलना में कितनी धीमी चल रही हैं।

मसलन, सड़क पर बहुत सारी गाड़ियां हों, लेकिन राजमार्ग पर सभी 70 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल रही हों, तो वहां गंभीर जाम नहीं माना जाएगा। दूसरी तरफ, किसी संकरी सड़क पर केवल कुछ दर्जन गाड़ियां हों, लेकिन वे 3 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से रेंग रही हों, तो वह सड़क लाल दिखाई दे सकती है। गूगल के यातायात संकेतों में भी रंगों का संबंध वाहनों की गति से है। इसलिए सड़क पर गाड़ियों की संख्या और जाम की स्थिति एक ही बात नहीं है।

इस सड़क से गुजरने में अभी सामान्य से कितना ज्यादा समय लगेगा?

यहीं पहुंचने का अनुमानित समय यानी ईटीए काम आता है। गूगल आपके पूरे रास्ते को छोटे-छोटे सड़क हिस्सों में बांट सकता है। हर हिस्से के लिए अनुमानित यात्रा समय निकाला जाता है और फिर उन सभी को जोड़कर पूरी यात्रा का समय तय किया जाता है। रास्ते में जैसे-जैसे वास्तविक यातायात बदलता है, इन हिस्सों का अनुमानित समय भी बदलता जाता है और आपकी पूरी यात्रा का समय भी बदल जाता है। इसीलिए मैप कभी-कभी बताता है - ‘इससे तेज रास्ता उपलब्ध है, 8 मिनट बचेंगे।’

उसने केवल नया रास्ता नहीं खोजा। उसने यह भी गणना की कि जिस रास्ते पर आप जा रहे हैं, वहां आगे चलकर गाड़ियों की रफ्तार कम होने की संभावना है और दूसरा रास्ता अब कुल मिलाकर कम समय ले सकता है। गूगल के अनुसार, भविष्य के यातायात का अनुमान लगाने वाली तकनीक रास्ता चुनने में इस्तेमाल होती है और अगर किसी रास्ते पर भारी जाम की संभावना हो तो मैप दूसरा रास्ता सुझा सकता है।

लेकिन यहां एक अजीब स्थिति पैदा हो सकती है। अगर मैप सभी लोगों को एक ही ‘तेज रास्ते’ पर भेज दे, तो वही रास्ता कुछ देर बाद खुद जाम हो सकता है। इसलिए आधुनिक रास्ता दिखाने वाली व्यवस्था लगातार बदलती रहने वाली समस्या की तरह काम करती है। लोग मैप की सलाह के आधार पर रास्ता बदलते हैं और लोगों के रास्ता बदलने से यातायात की स्थिति बदल जाती है। फिर मैप नई स्थिति के आधार पर रास्ता बदलता है। यानी ऐप सिर्फ यातायात को देख नहीं रहा। कुछ हद तक वह यातायात के बंटवारे को प्रभावित भी कर रहा है।

क्या किसी नई सड़क पर यातायात की जानकारी दिखाई नहीं देगी?

कम आंकड़े होने पर वास्तविक समय के यातायात का अनुमान स्वाभाविक रूप से कम भरोसेमंद हो सकता है। ऐसे में गूगल पुराने यातायात के आंकड़ों, सरकारी और दूसरे भागीदारों से मिली जानकारी तथा उपलब्ध अन्य स्रोतों पर ज्यादा निर्भर कर सकता है। यही कारण है कि किसी बड़े शहर की व्यस्त सड़क की तुरंत मिलने वाली यातायात जानकारी किसी दूरदराज की ग्रामीण सड़क की तुलना में ज्यादा सटीक लग सकती है।

और गूगल के पास केवल फोन से मिलने वाली जानकारी ही नहीं होती। स्थानीय सरकारों, गैर-लाभकारी संस्थाओं, कारोबारों और दूसरे भागीदारों से भी यातायात और दुर्घटना जैसी घटनाओं की जानकारी मिल सकती है। गूगल की मैप सहायता सामग्री भी भागीदारों से मिलने वाली जानकारी को यातायात संबंधी आंकड़ों के स्रोतों में शामिल करती है।

क्या है पूरी व्यवस्था?

इसलिए पूरी व्यवस्था को आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं।

पहली परत यह देखती है कि इस समय सड़क पर चल रहे उपकरण कितनी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

दूसरी परत यह देखती है कि इस सड़क पर इस दिन और इस समय आम तौर पर गाड़ियों की रफ्तार कितनी रहती है।

तीसरी परत यह पता लगाने की कोशिश करती है कि कोई दुर्घटना, निर्माण कार्य, बंद सड़क या कोई विशेष आयोजन तो नहीं है।

चौथी परत में मशीन से सीखने वाली तकनीक यह अनुमान लगाती है कि जब आप वहां पहुंचेंगे तब सड़क की हालत कैसी हो सकती है।

इन सभी जानकारियों का नतीजा आपके फोन पर एक साधारण लाल रेखा के रूप में दिखाई देता है।

इसमें एक और कमाल है। मान लीजिए सुबह किसी सड़क पर दुर्घटना हो गई और 20 मिनट में लंबा जाम लग गया। मैप को शुरुआत में सिर्फ थोड़ी धीमी रफ्तार दिखाई देगी। जैसे-जैसे पीछे आने वाले वाहनों की गति कम होती जाएगी, लाल हिस्सा पीछे की ओर लंबा होता जाएगा। दुर्घटना हटने के बाद सामने की गाड़ियां चलने लगेंगी, लेकिन पीछे लगा जाम तुरंत खत्म नहीं होगा। इसलिए मैप के आंकड़ों में भी जाम धीरे-धीरे खुलता हुआ दिखाई देगा। यातायात के विज्ञान में इसे ‘झटके की लहर’ जैसी स्थिति समझा जाता है। जाम सड़क पर पीछे की ओर फैलने वाली लहर की तरह आगे बढ़ सकता है, जबकि सभी गाड़ियां खुद आगे की दिशा में चल रही होती हैं। गूगल की व्यवस्था इस बदलती रफ्तार को लगातार पढ़ती रहती है। सबसे दिलचस्प स्थिति उस जाम की है जिसे कई बार ‘बिना वजह वाला जाम’ कहा जा सकता है। कई बार न कोई दुर्घटना होती है, न बैरिकेड और न ही सड़क टूटी होती है। एक चालक अचानक ब्रेक लगा देता है। उसके पीछे वाला उससे थोड़ा ज्यादा ब्रेक लगाता है। उसके पीछे वाला उससे भी ज्यादा। यह असर एक के बाद दूसरे वाहन तक पहुंचता जाता है और कुछ दूरी बाद गाड़ियां लगभग रुक जाती हैं। थोड़ी देर बाद वे फिर चलने लगती हैं।

मैप इसे भी वास्तविक जाम के रूप में देख सकता है, क्योंकि उसके लिए सबसे पहले यह मायने रखता है कि वाहन वास्तव में धीमे हो गए हैं। जाम किस वजह से लगा, यह जानकारी बाद में मिल सकती है। इसीलिए गूगल मैप को जाम का पता लगाने के लिए हमेशा यह जानना जरूरी नहीं कि जाम क्यों लगा है। पहले वह यह पता लगा सकता है कि सड़क पर गाड़ियां धीमी हो गई हैं। इसके बाद चालक की रिपोर्ट या सरकारी जानकारी से यह पता चल सकता है कि इसकी वजह दुर्घटना, सड़क बंद होना या कोई दूसरी समस्या है।

इस पूरी तकनीक की खूबसूरती यह है कि पहले यातायात का पता लगाने के लिए शहरों में सड़क के भीतर विशेष सेंसर लगाने, कैमरे लगाने या यातायात पुलिस की रिपोर्ट पर निर्भर रहना पड़ता था। ये तरीके आज भी उपयोगी हैं, लेकिन स्मार्टफोन के दौर ने सड़क पर चलने वाले लगभग हर व्यक्ति को संभावित यातायात सेंसर बना दिया है।

आपकी जेब में रखा फोन उपग्रहों की मदद से अपनी जगह का पता लगाता है। समय के साथ उसकी जगह बदलने से उसकी रफ्तार और दिशा का अनुमान लगाया जा सकता है। यही जानकारी हजारों दूसरे उपकरणों से मिलती है। मशीन इस जानकारी को सड़क के डिजिटल नक्शे पर रखती है, पुराने यातायात के आंकड़ों से इसकी तुलना करती है और फिर आने वाले कुछ मिनटों की स्थिति का अनुमान लगाती है।

और कुछ ही सेकंड में आपकी स्क्रीन पर लिखा आता है—‘भारी यातायात, 18 मिनट की देरी।’

इसलिए जब अगली बार गूगल मैप आपको लाल सड़क दिखाए, तो समझिए कि कहीं कोई एक व्यक्ति बैठकर यह नहीं बता रहा कि ‘यहां जाम है।’ ज्यादातर मामलों में सड़क पर चल रहे लोगों ने अपने फोन की गति के जरिए मिलकर यह जानकारी पैदा की है। गूगल उन छोटे-छोटे डिजिटल संकेतों को जोड़कर सड़क की ऐसी तस्वीर बना देता है जिसे कोई अकेला चालक अपनी आंखों से नहीं देख सकता।

सरल शब्दों में कहें तो गूगल मैप सड़क को ऊपर से देखकर जाम नहीं पहचानता। वह सड़क पर चल रही भीड़ की रफ्तार को पढ़कर जाम का अंदाजा लगाता है। और उसका अगला कदम इससे भी ज्यादा दिलचस्प है कि वह सिर्फ यह नहीं बताता कि अभी जाम कहां है, बल्कि यह अनुमान लगाने की कोशिश करता है कि जब आप वहां पहुंचेंगे, तब जाम कहां और कितना हो सकता है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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