HTTPS Kya Hai: वेबसाइट के आगे HTTPS और ताले का निशान किसने और क्यों ‘अनिवार्य’ किया?

HTTPS Kya Hai: वेबसाइट के आगे HTTPS और ताले का निशान क्यों होता है? जानिए HTTPS किसने बनाया, यह कैसे काम करता है और क्या ताला वेबसाइट को सच में सुरक्षित और भरोसेमंद बनाता है।

Yogesh Mishra
Published on: 10 Aug 2026 6:00 PM IST
HTTPS Security HTTPS Kya Hai
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HTTPS Security HTTPS Kya Hai 

HTTPS Kya Hai: आज लगभग हर वेबसाइट के पते के आगे https:// दिखाई देता है। कई वर्षों तक उसके साथ ब्राउज़र की पता-पट्टी में ताले का छोटा निशान भी दिखता था। इससे सामान्य लोगों में यह धारणा बन गई कि जिस वेबसाइट पर ताला है, वह सुरक्षित, असली और भरोसेमंद है। जबकि वास्तविकता थोड़ी अलग है। HTTPS का मुख्य काम वेबसाइट की ईमानदारी की जांच करना नही। बल्कि आपके उपकरण और वेबसाइट के सर्वर के बीच होने वाले संचार को सुरक्षित करना है। इसका अर्थ यह है कि रास्ते में कोई तीसरा व्यक्ति आपकी जानकारी आसानी से पढ़ न सके। उसमें चुपचाप बदलाव न कर सके। आपका ब्राउज़र यह जांच सके कि वह जिस डोमेन से संपर्क कर रहा है, उसके लिए प्रस्तुत डिजिटल प्रमाणपत्र वैध है। यही HTTPS का वास्तविक सुरक्षा वादा है। इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि वेबसाइट का मालिक ईमानदार है। वेबसाइट पर लिखा हर तथ्य सही है। वहाँ कोई धोखाधड़ी नहीं हो सकती। इसी भ्रम के कारण Google Chrome ने पुराने ताले के निशान को हटाकर अधिक तटस्थ चिन्ह अपनाना शुरू किया। क्योंकि बहुत से उपयोगकर्ता ताले को वेबसाइट की विश्वसनीयता का प्रमाण समझ रहे थे।

क्या है ये कोड वर्ड?

HTTPS को समझने के लिए पहले HTTP समझना जरूरी है। इंटरनेट के शुरुआती दौर में वेबसाइट और ब्राउज़र के बीच जानकारी सामान्य HTTP यानी Hypertext Transfer Protocol से जाती थी। उस समय यदि कोई व्यक्ति नेटवर्क के बीच में बैठकर यातायात देख सकता था। तो कई स्थितियों में वह भेजी जा रही सामग्री को पढ़ सकता था या उसमें बदलाव कर सकता था।


शुरुआती वेब पर इसका खतरा कम दिखाई देता था। क्योंकि अधिकांश वेबसाइटें केवल जानकारी दिखाती थीं। लेकिन जैसे-जैसे इंटरनेट पर पासवर्ड, बैंकिंग, ईमेल, खरीदारी, क्रेडिट कार्ड और निजी संदेश आने लगे, खुले HTTP की कमजोरी गंभीर हो गई। HTTPS ने उसी HTTP को एक सुरक्षित, कूटबद्ध परत के भीतर भेजना शुरू किया। आज इस सुरक्षा परत को TLS यानी Transport Layer Security कहा जाता है।

किसने शुरू की ये तकनीक?

इस तकनीक की शुरुआत किसी सरकार ने नहीं की थी। 1990 के दशक के मध्य में Netscape Communications ने वेब पर सुरक्षित संचार के लिए SSL यानी Secure Sockets Layer विकसित किया। SSL 1.0 सार्वजनिक रूप से जारी नहीं हुआ। लेकिन बाद में SSL 2.0 और SSL 3.0 आए। आगे चलकर इंटरनेट मानक संस्था IETF ने इसी विचार को विकसित करके TLS बनाया। 1999 में TLS 1.0 को औपचारिक मानक के रूप में जारी किया गया। बाद में HTTP को TLS के ऊपर चलाने की व्यवस्था आधुनिक HTTPS का आधार बनी। इसलिए HTTPS का कोई एक आविष्कारक नहीं है। Netscape ने सुरक्षित वेब संचार की शुरुआत की और IETF ने उसे आगे विकसित करके मानकीकृत किया।

इसे अनिवार्य किसने किया?

अब बड़ा सवाल यह है कि इसे अनिवार्य किसने किया। दुनिया की किसी एक संस्था ने ऐसा कानून नहीं बनाया कि हर वेबसाइट को HTTPS इस्तेमाल करना ही होगा। तकनीकी रूप से आज भी HTTP वेबसाइट बनाई जा सकती है। लेकिन Google, Mozilla, Apple और Microsoft जैसे ब्राउज़र निर्माताओं ने धीरे-धीरे HTTP को असुरक्षित दिखाना शुरू किया। Google ने 2014 में HTTPS को खोज परिणामों में एक छोटा-सा प्राथमिकता संकेत भी बनाया। बाद में Chrome ने HTTP वेबसाइटों के सामने Not Secure यानी ‘असुरक्षित’चेतावनी दिखानी शुरू की। जुलाई 2018 से सभी सामान्य HTTP वेबसाइटों को Chrome में असुरक्षित चिह्नित किया जाने लगा। इससे वेबसाइट मालिकों पर दबाव बढ़ा कि वे HTTPS अपनाएँ। क्योंकि कोई भी व्यवसाय नहीं चाहता कि उसके ग्राहकों को वेबसाइट खोलते ही ‘असुरक्षित’ लिखा दिखाई दे।

दूसरी वजह यह थी कि आधुनिक वेब की कई संवेदनशील सुविधाएँ केवल HTTPS पर उपलब्ध कराई गईं। कैमरा, माइक्रोफोन, स्थान, कुछ प्रकार की पृष्ठभूमि सेवाएँ और आधुनिक वेब अनुप्रयोगों की कई क्षमताएँ केवल ‘सुरक्षित संदर्भ’ में काम करती हैं। उदाहरण के लिए वेबसाइट यदि आपके कैमरे या माइक्रोफोन की अनुमति लेना चाहती है, तो सामान्य इंटरनेट पर उसका HTTPS के माध्यम से खुलना आवश्यक है। इसके पीछे सीधा तर्क है—यदि कोई वेबसाइट आपके कैमरे या माइक्रोफोन जैसी संवेदनशील चीज तक पहुँच सकती है, तो ब्राउज़र को कम-से-कम यह भरोसा होना चाहिए कि रास्ते में किसी हमलावर ने पेज को बदलकर कुछ और नहीं बना दिया।

HTTPS के तेजी से फैलने में एक और महत्वपूर्ण भूमिका Let’s Encrypt की रही। एक समय डिजिटल प्रमाणपत्र खरीदना, लगाना और समय-समय पर उसका नवीनीकरण करना छोटे वेबसाइट मालिकों के लिए महँगा और तकनीकी काम था। Let’s Encrypt ने प्रमाणपत्र मुफ्त और स्वचालित कर दिए। 2015 में इसकी सार्वजनिक रूप से विश्वसनीय प्रमाणपत्र सेवा शुरू हुई और उसके बाद छोटे ब्लॉग, संस्थाएँ, गैर-लाभकारी संगठन और छोटे व्यवसाय भी बिना अतिरिक्त प्रमाणपत्र शुल्क के HTTPS अपना सके। इससे वेब पर HTTPS का प्रसार बहुत तेजी से हुआ।

क्या है ताले का निशान?

अब उस ताले के निशान को समझना जरूरी है जिसने सबसे अधिक भ्रम पैदा किया। ताले का अर्थ यह था कि आपका ब्राउज़र वेबसाइट से TLS के माध्यम से कूटबद्ध संपर्क कर रहा है।


उसका डिजिटल प्रमाणपत्र सही पाया गया है। लेकिन लोगों ने धीरे-धीरे इसका अर्थ यह समझ लिया कि ‘यह वेबसाइट पूरी तरह भरोसेमंद है।’ जबकि कोई धोखेबाज भी अपना डोमेन खरीदकर उसके लिए वैध HTTPS प्रमाणपत्र ले सकता है। Google की एक शोध रिपोर्ट में पाया गया कि बहुत कम लोग ताले के निशान का सही अर्थ समझते थे। इसी कारण Chrome ने 2023 में कहा कि ताले का निशान वेबसाइट की विश्वसनीयता नहीं बताता और उसे बदलने का निर्णय लिया।

तीन तरह की सुरक्षा

HTTPS वास्तव में तीन मुख्य सुरक्षा देता है। पहली है गोपनीयता। यदि आप किसी होटल, हवाई अड्डे या रेलवे स्टेशन के सार्वजनिक Wi-Fi पर हैं और HTTPS वेबसाइट खोलते हैं, तो आपके और वेबसाइट के सर्वर के बीच चलने वाली सामग्री कूटबद्ध रहती है। कोई सामान्य हमलावर रास्ते में आपका पासवर्ड, फॉर्म में भरी जानकारी या पेज की सामग्री सीधे पढ़ नहीं सकता। दूसरी सुरक्षा है अखंडता, यानी रास्ते में डेटा को चुपचाप बदलना कठिन हो जाता है। तीसरी है पहचान की तकनीकी पुष्टि, जिसमें ब्राउज़र वेबसाइट के डिजिटल प्रमाणपत्र की जांच करता है।

लेकिन इस सुरक्षा की एक बड़ी सीमा है। प्रमाणपत्र यह साबित कर सकता है कि सामने वाला सर्वर उस डोमेन के लिए वैध प्रमाणपत्र रखता है। लेकिन वह यह नहीं बताता कि डोमेन का मालिक ईमानदार है। कोई व्यक्ति bank-secure-login-example.com जैसा भ्रमित करने वाला डोमेन खरीद सकता है और उसके लिए वैध HTTPS प्रमाणपत्र ले सकता है। ब्राउज़र तब भी बताएगा कि कनेक्शन कूटबद्ध है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होगा कि वह वास्तविक बैंक है। इसलिए HTTPS और असली वेबसाइट—दो अलग बातें हैं।

इसे एक उदाहरण से समझना आसान है। मान लीजिए आपने किसी ठग को एक मजबूत, सीलबंद और सुरक्षित लिफाफे में अपनी निजी जानकारी भेज दी। रास्ते में डाकिया वह लिफाफा नहीं खोल सकता। लेकिन जिस ठग को आपने स्वयं लिफाफा भेजा, वह उसे खोल सकता है। HTTPS वही सुरक्षित लिफाफा है। वह रास्ते की सुरक्षा देता है, सामने वाले व्यक्ति की नीयत की नहीं।

वायरस से कोई लेनादेना नहीं

HTTPS यह भी नहीं बताता कि वेबसाइट पर वायरस नहीं है। यदि किसी असली वेबसाइट का सर्वर हैक हो गया और उसमें दुर्भावनापूर्ण प्रोग्राम डाल दिया गया, तो वही हानिकारक सामग्री HTTPS के सुरक्षित रास्ते से आपके ब्राउज़र तक पहुँच सकती है। HTTPS केवल यह सुनिश्चित करता है कि रास्ते में किसी तीसरे व्यक्ति ने सामग्री नहीं बदली। वह यह नहीं जांचता कि सर्वर के अंदर पहले से मौजूद सामग्री अच्छी है या खराब।

इसी तरह HTTPS आपको वेबसाइट से नहीं छिपाता। आप किसी खरीदारी वेबसाइट पर अपना नाम, पता, मोबाइल नंबर और कार्ड संबंधी जानकारी भेजते हैं तो वह वेबसाइट उसे प्राप्त करती है, क्योंकि वही उसका निर्धारित प्राप्तकर्ता है। HTTPS केवल बीच के लोगों से उस जानकारी को छिपाता है। यदि वेबसाइट स्वयं आपका व्यवहार दर्ज करती है, कुकी रखती है या विज्ञापन कंपनियों के साथ कुछ जानकारी साझा करती है, तो HTTPS उसे नहीं रोकता। इसलिए HTTPS को पूर्ण निजता व्यवस्था नहीं समझना चाहिए।

HTTPS यह भी सुनिश्चित नहीं करता कि इंटरनेट सेवा प्रदाता को कुछ भी पता नहीं चलेगा। आपका सेवा प्रदाता सामान्यतः यह देख सकता है कि आपका उपकरण किन इंटरनेट पतों से संपर्क कर रहा है और कितना डेटा जा रहा है। आधुनिक तकनीकें इस जानकारी को और कम दृश्य बनाने की कोशिश करती हैं। लेकिन HTTPS का मुख्य उद्देश्य वेबसाइट की सामग्री को कूटबद्ध करना है, न कि आपको पूरी तरह अदृश्य बनाना।

क्या है डिजिटल प्रमाणपत्र

डिजिटल प्रमाणपत्र की व्यवस्था को समझना भी जरूरी है। जब आप कोई HTTPS वेबसाइट खोलते हैं तो वेबसाइट का सर्वर एक डिजिटल प्रमाणपत्र प्रस्तुत करता है। यह प्रमाणपत्र बताता है कि वह संबंधित डोमेन के लिए जारी हुआ है। आपका ब्राउज़र जांचता है कि इसे किसी ऐसी प्रमाणपत्र प्राधिकरण संस्था ने जारी किया है जिस पर ब्राउज़र भरोसा करता है। यदि प्रमाणपत्र की अवधि समाप्त हो गई हो, डोमेन से मेल न खाता हो या भरोसेमंद संस्था से जारी न हुआ हो, तो ब्राउज़र चेतावनी देता है।

यह व्यवस्था भी पूरी तरह अचूक नहीं है। दुनिया में अनेक प्रमाणपत्र प्राधिकरण संस्थाएँ हैं। यदि किसी संस्था से गलत प्रमाणपत्र जारी हो जाए या उसकी सुरक्षा टूट जाए, तो गंभीर समस्या हो सकती है। इसी जोखिम को कम करने के लिए Certificate Transparency जैसी सार्वजनिक व्यवस्था बनाई गई है, जिसमें जारी किए गए प्रमाणपत्रों का सार्वजनिक रिकॉर्ड रखा जाता है ताकि गलत या संदिग्ध प्रमाणपत्र पकड़े जा सकें।

एक और समस्या Mixed Content की होती है। मान लीजिए मुख्य वेबसाइट HTTPS पर खुलती है। लेकिन उसके भीतर कुछ चित्र, प्रोग्राम या अन्य सामग्री पुराने HTTP से आ रही है। ऐसी स्थिति में पेज पूरी तरह सुरक्षित नहीं रह सकता। विशेष रूप से यदि कोई प्रोग्राम फ़ाइल HTTP से लोड हो रही हो, तो रास्ते में हमलावर उसमें बदलाव कर सकता है। आधुनिक ब्राउज़र इसी कारण ऐसी असुरक्षित मिली-जुली सामग्री को रोकने या सुरक्षित रूप में खोलने की कोशिश करते हैं।

HTTPS की सुरक्षा समय के साथ मजबूत होती गई है। पुराने SSL 2.0 और SSL 3.0 में गंभीर कमजोरियाँ मिलीं और वे अब अप्रचलित हैं। TLS 1.0 और TLS 1.1 भी पुराने हो चुके हैं। आधुनिक इंटरनेट मुख्य रूप से TLS 1.2 और TLS 1.3 पर निर्भर करता है। TLS 1.3 ने पुरानी कमजोर कूटलेखन विधियाँ हटाईं और संपर्क स्थापित करने की प्रक्रिया को तेज और अधिक सुरक्षित बनाया। इसलिए केवल यह देखना कि वेबसाइट HTTPS पर है, तकनीकी रूप से पूरी तस्वीर नहीं बताता। वेबसाइट किस TLS संस्करण और किस कूटलेखन व्यवस्था का उपयोग कर रही है, यह भी महत्वपूर्ण है।

जब ब्राउज़र और सर्वर पहली बार जुड़ते हैं तो दोनों के बीच एक प्रारंभिक सुरक्षित समझौता होता है, जिसे TLS handshake कहा जाता है। इस दौरान सर्वर अपना प्रमाणपत्र देता है, ब्राउज़र उसकी जांच करता है और दोनों सुरक्षित संचार के लिए गुप्त कुंजियाँ तैयार करते हैं। इसके बाद आपके और वेबसाइट के बीच आने-जाने वाली सामग्री उन्हीं कुंजियों से कूटबद्ध होकर चलती है। यही प्रक्रिया इतनी तेजी से होती है कि सामान्य उपयोगकर्ता को इसका पता भी नहीं चलता।

इसलिए यदि किसी बैंक, ईमेल या भुगतान वेबसाइट पर ब्राउज़र ‘आपका कनेक्शन निजी नहीं है’ या ‘प्रमाणपत्र अमान्य है’ जैसी चेतावनी दिखाए, तो उसे सामान्य संदेश समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कारण कभी साधारण हो सकता है—जैसे वेबसाइट ने प्रमाणपत्र का नवीनीकरण नहीं किया या आपके उपकरण की तारीख गलत है—लेकिन यही चेतावनी किसी बीच के हमले का संकेत भी हो सकती है। संवेदनशील वेबसाइट पर ऐसी चेतावनी आए तो पासवर्ड या भुगतान जानकारी नहीं भरनी चाहिए।

पब्लिक वाई-फाई में इसका महत्त्व

सार्वजनिक Wi-Fi में HTTPS का महत्व सबसे आसानी से समझ आता है। पुराने HTTP दौर में खुले नेटवर्क पर बैठा कोई व्यक्ति कई बार नेटवर्क यातायात पढ़ सकता था। HTTPS ने ऐसी साधारण जासूसी को काफी हद तक समाप्त कर दिया। अब यदि आप सही HTTPS वेबसाइट खोल रहे हैं तो होटल या कैफे के नेटवर्क पर बैठा सामान्य हमलावर आपके पेज की वास्तविक सामग्री सीधे नहीं पढ़ सकता।

लेकिन HTTPS और VPN में भी फर्क है। VPN आपके उपकरण और VPN सर्वर के बीच व्यापक इंटरनेट यातायात को सुरक्षित सुरंग में भेजता है, जबकि HTTPS किसी विशेष वेबसाइट या सेवा के साथ संपर्क को कूटबद्ध करता है। दोनों अलग स्तरों पर काम करते हैं। इसलिए HTTPS होने पर VPN पूरी तरह बेकार नहीं हो जाता और VPN होने पर HTTPS की जरूरत समाप्त नहीं होती।

HTTPS एंटीवायरस भी नहीं है। कोई HTTPS वेबसाइट आपको संक्रमित फ़ाइल डाउनलोड करा सकती है। कोई नकली निवेश वेबसाइट HTTPS पर आपका पैसा ठग सकती है। कोई फर्जी क्रिप्टो वेबसाइट सुरक्षित कनेक्शन के माध्यम से आपकी निजी जानकारी ले सकती है। तकनीक यह तय नहीं करती कि उसका उपयोग अच्छा व्यक्ति कर रहा है या अपराधी।

यही कारण है कि आज सुरक्षा विशेषज्ञ ‘ताला देखकर भरोसा करो’ की जगह ‘डोमेन देखकर पहचान करो’ पर जोर देते हैं। वास्तविक बैंक का डोमेन और उससे मिलता-जुलता नकली डोमेन दोनों HTTPS हो सकते हैं। इसलिए वेबसाइट का नाम, उसकी वर्तनी और सही डोमेन देखना अधिक महत्वपूर्ण है। खासकर बैंक, भुगतान और सरकारी वेबसाइट खोलते समय संदेश या ईमेल में आए किसी संदिग्ध लिंक पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

ब्राउज़र कंपनियों ने इसी कारण सकारात्मक सुरक्षा संकेत कम किए हैं। पहले HTTPS वेबसाइट पर हरा रंग, Secure शब्द या ताला दिखाया जाता था। अब विचार यह है कि HTTPS सामान्य स्थिति होनी चाहिए। जैसे कार में ब्रेक होना कोई विशेष उपलब्धि नहीं। बल्कि मूल आवश्यकता है। वैसे ही वेबसाइट पर HTTPS होना अब सामान्य अपेक्षा है। चेतावनी तब दिखनी चाहिए जब सुरक्षा अनुपस्थित हो।

पासवर्ड की सुरक्षा

HTTPS आपके पासवर्ड को रास्ते में सुरक्षित रखता है। लेकिन यदि आपके फोन या कंप्यूटर में कोई हानिकारक प्रोग्राम पासवर्ड दर्ज करते समय उसे पढ़ रहा हो तो HTTPS उसे नहीं बचा सकता। इसी तरह यदि आपने पासवर्ड स्वयं नकली वेबसाइट पर भर दिया तो वह सुरक्षित कनेक्शन के जरिए सीधे ठग तक पहुँच जाएगा। यदि वही पासवर्ड आपने कई वेबसाइटों पर इस्तेमाल किया और किसी दूसरी वेबसाइट से वह चोरी हो गया, तो HTTPS यहाँ भी मदद नहीं करेगा। इसलिए अलग-अलग मजबूत पासवर्ड और दो-स्तरीय सुरक्षा अभी भी जरूरी हैं।


ऑनलाइन भुगतान में भी यही बात लागू होती है। HTTPS आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं। असली बैंक या भुगतान वेबसाइट, सही डोमेन, सुरक्षित प्रमाणीकरण, OTP और धोखाधड़ी पहचान जैसी अतिरिक्त परतें भी जरूरी हैं। यदि आपने सुरक्षित HTTPS कनेक्शन से ही किसी नकली व्यापारी को भुगतान कर दिया तो HTTPS ने लेनदेन को ईमानदार नहीं बनाया; उसने केवल भुगतान संबंधी जानकारी को उस नकली व्यापारी तक सुरक्षित पहुँचाया।

इसलिए HTTPS की सुरक्षा को दो हिस्सों में समझना चाहिए। कूटलेखन और रास्ते की सुरक्षा की दृष्टि से आधुनिक HTTPS बहुत मजबूत है। सही ढंग से लागू TLS सामान्य नेटवर्क जासूसी और रास्ते में डेटा बदलने जैसे हमलों के विरुद्ध अत्यंत प्रभावी है। दुनिया की बैंकिंग, सरकारी सेवाएँ, क्लाउड सेवाएँ और ई-कॉमर्स इसी पर निर्भर हैं। लेकिन वेबसाइट की विश्वसनीयता की दृष्टि से HTTPS बहुत सीमित गारंटी है। यह नहीं बताता कि वेबसाइट का मालिक ईमानदार है, वह आपका डेटा आगे नहीं बेचेगा, उसमें कोई वायरस नहीं है या उसका व्यापार वैध है।

अब कई जगह उपयोग

आज HTTPS केवल वेबसाइटों तक सीमित नहीं है। मोबाइल अनुप्रयोग, सरकारी सेवाएँ, बैंकिंग ऐप, क्लाउड सेवाएँ और अनेक स्मार्ट उपकरण भी सर्वर से संपर्क के लिए HTTPS/TLS का उपयोग करते हैं। कई बार उपयोगकर्ता को पता-पट्टी दिखाई नहीं देती, लेकिन पीछे वही तकनीक काम कर रही होती है।

फिर भी HTTP पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। कुछ पुराने उपकरण, स्थानीय नेटवर्क और छोटी वेबसाइटें अभी भी HTTP इस्तेमाल करती हैं। लेकिन सार्वजनिक इंटरनेट पर HTTPS अब व्यवहारतः सामान्य मानक बन चुका है। ब्राउज़र लगातार इस दिशा में बढ़ रहे हैं कि जहाँ संभव हो, HTTPS को प्राथमिकता दी जाए और HTTP पर स्पष्ट चेतावनी दिखाई जाए।

HTTPS रास्ता सुरक्षित करता है, मंजिल की ईमानदारी की गारंटी नहीं देता। आपके ब्राउज़र से वेबसाइट तक जाने वाली जानकारी कूटबद्ध रहती है, रास्ते में उसकी चोरी या छेड़छाड़ कठिन हो जाती है और ब्राउज़र संबंधित डोमेन के डिजिटल प्रमाणपत्र की जांच करता है। लेकिन जिस सर्वर तक वह सुरक्षित रास्ता पहुँच रहा है, वह ठग का भी हो सकता है, हैक हुआ भी हो सकता है या गलत जानकारी दे सकता है।

इसलिए ताले या HTTPS की सुरक्षा झूठी नहीं है। यह आधुनिक इंटरनेट की सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा तकनीकों में से एक है। इसके बिना ऑनलाइन बैंकिंग, खरीदारी, ईमेल, सरकारी सेवाओं और क्लाउड की कल्पना बेहद जोखिम भरी होती। लेकिन इसे ‘यह वेबसाइट पूरी तरह सुरक्षित है’ की तरह पढ़ना गलत है। इसका सही अर्थ है—“इस वेबसाइट तक आपका संचार सुरक्षित और कूटबद्ध तरीके से हो रहा है।”

और शायद HTTPS के पूरे इतिहास का सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि जो तकनीक कभी केवल बैंकिंग और भुगतान जैसी विशेष वेबसाइटों के लिए थी, वह आज इंटरनेट की सामान्य न्यूनतम आवश्यकता बन गई है। ताला अब सम्मान का प्रतीक नहीं, सुरक्षा की बुनियादी शर्त है। वेबसाइट की सच्चाई जानने के लिए आपको अब भी सही डोमेन, संस्था की पहचान और अपने विवेक की जरूरत पड़ती है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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