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दूब और मुंजा घास बदलेंगी मैन्युफैक्चरिंग का भविष्य, IIT मुंबई का अनोखा आविष्कार
IIT Bombay Plastic Alternative 2026: IIT मुंबई का बड़ा आविष्कार! दूब और मुंजा घास से बनेगा प्लास्टिक का विकल्प, बदलेगा मैन्युफैक्चरिंग का भविष्य
IIT Bombay Plastic Alternative 2026
IIT Bombay Plastic Alternative 2026: एक समय में सुविधाओं का साथी बनते बनते प्लास्टिक अब प्रकृति से लेकर इंसान की सेहत का दुश्मन बन चुका है। एक लंबे समय से पूरी दुनिया प्लास्टिक प्रदूषण से जूझ रही है और अब इसके टिकाऊ विकल्प की तलाश तेज हो गई है। इसी दिशा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मुंबई के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो भविष्य की मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री की तस्वीर बदल सकती है। शोधकर्ताओं ने मुंजा और दूब जैसी देशज घासों को प्लास्टिक के साथ मिलाकर ऐसे नए पर्यावरण-अनुकूल कंपोजिट मैटेरियल तैयार किए हैं, जो हल्के, मजबूत, कम लागत वाले और आसानी से रीसाइकिल किए जा सकते हैं। खास बात यह है कि इनका इस्तेमाल ऑटोमोबाइल, 3D प्रिंटिंग, फर्नीचर, भवन निर्माण और पैकेजिंग जैसे कई क्षेत्रों में किया जा सकता है।
प्लास्टिक क्यों बन गया है दुनिया के लिए बड़ी चुनौती?
प्लास्टिक ने आधुनिक जीवन को आसान जरूर बनाया है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी समस्या इसका नष्ट न होना है। सामान्य प्लास्टिक को पूरी तरह खत्म होने में सैकड़ों साल लग सकते हैं। इस दौरान यह समुद्र, नदियों, खेतों और लैंडफिल में जमा होकर पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाता है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार हर साल करोड़ों टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। जिसका बड़ा हिस्सा दोबारा उपयोग नहीं हो पाता। यही वजह है कि दुनिया अब ऐसे विकल्पों की तलाश कर रही है जो पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाएं और प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग करें।
IIT मुंबई ने कैसे खोजा प्लास्टिक का नया विकल्प?
आईआईटी मुंबई की प्रोफेसर अपर्णा सिंह और उनके छात्र नितिन कुमार आर्य के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने देश में आसानी से मिलने वाली मुंजा और दूब घास को प्लास्टिक के साथ जोड़कर नए प्रकार के कंपोजिट मैटेरियल विकसित किए हैं।
इन कंपोजिट में हाई डेंसिटी पॉलीएथिलीन (HDPE), पॉलीप्रोपिलीन (PP), पॉलीलैक्टिक एसिड (PLA) और इपॉक्सी रेजिन जैसे पदार्थों के साथ प्राकृतिक घासों का इस्तेमाल किया गया है। इससे तैयार सामग्री पारंपरिक प्लास्टिक की तुलना में अधिक मजबूत, हल्की और पर्यावरण के अनुकूल बन गई है।
शोध दल का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में प्लास्टिक आधारित उद्योगों को अधिक टिकाऊ बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है।
मुंजा और दूब घास ही क्यों चुनी गई?
मुंजा और दूब भारत के कई हिस्सों में प्राकृतिक रूप से बड़ी मात्रा में उगती हैं। इन्हें अब तक सामान्य घास या खरपतवार माना जाता था, लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया कि इनके रेशे बेहद मजबूत होते हैं। इन घासों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें उगाने में अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत नहीं पड़ती। ये तेजी से बढ़ती हैं, आसानी से उपलब्ध रहती हैं और कम लागत में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की जा सकती हैं। यही कारण है कि शोधकर्ताओं ने इन्हें औद्योगिक उपयोग के लिए उपयुक्त माना।
बिना महंगे रसायनों के तैयार हुआ नया कंपोजिट
प्राकृतिक फाइबर और प्लास्टिक को जोड़ना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। अब तक इसके लिए महंगे रासायनिक कंपैटिबिलाइजर और बाइंडर का इस्तेमाल किया जाता था। आईआईटी मुंबई की टीम ने ऐसी तकनीक विकसित की है जिसमें मुंजा घास के बारीक रेशों को सीधे HDPE के साथ मिलाकर इंजेक्शन मोल्डिंग मशीन में प्रोसेस किया जाता है। इससे अतिरिक्त रसायनों की जरूरत काफी कम हो जाती है। इस तकनीक से तैयार उत्पाद हल्के होने के साथ-साथ काफी मजबूत भी होते हैं और उनकी उत्पादन लागत भी घट जाती है।
दूब घास से बढ़ी प्लास्टिक की मजबूती
शोध में दूब घास का भी सफल उपयोग किया गया। इसके लिए पहले घास को सोडियम हाइड्रॉक्साइड घोल से उपचारित किया गया ताकि उसकी सतह पर मौजूद प्राकृतिक मोम और अशुद्धियां हट सकें।
इसके बाद जब इसे HDPE के साथ मिलाया गया तो तैयार कंपोजिट की तन्य शक्ति (Tensile Strength) सामान्य HDPE की तुलना में काफी बेहतर पाई गई। इसका मतलब है कि यह सामग्री अधिक दबाव और खिंचाव सहने में सक्षम है।
3D प्रिंटिंग में भी मिली बड़ी सफलता
आज 3D प्रिंटिंग तेजी से बढ़ती तकनीक है, लेकिन HDPE प्लास्टिक से प्रिंटिंग करना आसान नहीं माना जाता क्योंकि ठंडा होने पर यह सिकुड़ जाता है और प्रिंट खराब हो जाता है।
आईआईटी मुंबई के वैज्ञानिकों ने 5 से 40 प्रतिशत तक मुंजा घास मिलाकर नया 3D प्रिंटिंग फिलामेंट तैयार किया। घास के रेशे तापमान के बदलाव से कम प्रभावित होते हैं, इसलिए वे प्लास्टिक को स्थिर बनाए रखते हैं।
इससे 3D प्रिंटिंग के दौरान सामग्री में विकृति नहीं आती और मजबूत तथा सटीक उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। यह तकनीक भविष्य में तेज और टिकाऊ प्रोटोटाइप बनाने में काफी उपयोगी साबित हो सकती है।
ऑटोमोबाइल से लेकर फर्नीचर तक कई क्षेत्रों में होगा इस्तेमाल
एक्सपर्ट्स के अनुसार इन प्राकृतिक कंपोजिट का उपयोग कई उद्योगों में किया जा सकता है।
ऑटोमोबाइल कंपनियां इससे डैशबोर्ड, बंपर, इंटीरियर पैनल और ईंधन टैंक जैसे हल्के पुर्जे बना सकती हैं। इससे वाहन का वजन कम होगा और ईंधन दक्षता भी बेहतर हो सकती है। भवन निर्माण क्षेत्र में इसका इस्तेमाल दीवार पैनल, अस्थायी सुरक्षा संरचनाएं और फर्नीचर बनाने में किया जा सकता है। प्राकृतिक तंतुओं से बने ये उत्पाद नमी और दीमक से भी बेहतर सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं। इसके अलावा पैकेजिंग उद्योग में एकल उपयोग वाले प्लास्टिक की जगह इन कंपोजिट का इस्तेमाल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है।
किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मिलेगा फायदा
मुंजा और दूब जैसी घासों की औद्योगिक मांग बढ़ने पर ग्रामीण क्षेत्रों में इनकी संग्रहण और प्रसंस्करण (Collection and Processing) से नए रोजगार पैदा हो सकते हैं। जो घास अब तक बेकार मानी जाती थी, वही किसानों और ग्रामीण समुदायों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकती है। इससे हरित अर्थव्यवस्था और चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) को भी मजबूती मिलेगी।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह शोध?
भारत में वाहन रीसाइक्लिंग और प्लास्टिक कचरे को लेकर लगातार सख्त नियम बनाए जा रहे हैं। आने वाले वर्षों में कंपनियों पर पर्यावरण-अनुकूल सामग्री अपनाने का दबाव और बढ़ेगा। ऐसे समय में आईआईटी मुंबई की यह तकनीक उद्योगों को ऐसा विकल्प देती है जो लागत भी कम रखता है और पर्यावरण की रक्षा भी करता है। यह शोध भारत के 'मेक इन इंडिया' और 'सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग' जैसे लक्ष्यों को भी गति दे सकता है। मुंजा और दूब जैसी साधारण दिखने वाली देशज घासें भविष्य में प्लास्टिक उद्योग का चेहरा बदल सकती हैं।


