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62 साल की सेवा के बाद मिग‑21 विमानों का भविष्य क्या होगा - कबाड़, संग्रहालय या प्रशिक्षण केंद्र?
62 साल तक भारतीय वायुसेना की रीढ़ रहे मिग-21 विमान अब सेवा से रिटायर हो चुके हैं। जानिए इन विमानों का भविष्य – कबाड़, संग्रहालय या प्रशिक्षण केंद्र?
MiG-21 Retirement (Image Credit-Social Media)
MiG-21 Retirement: भारतीय वायुसेना में 1963 में शामिल हुए मिग‑21 लड़ाकू विमानों ने दशकों तक देश की सेवा की और 26 सितंबर को उनका औपचारिक सेवानिवृत्ति समारोह चंडीगढ़ में संपन्न हुआ। चंडीगढ़ में वायुसेना प्रमुख एपी सिंह ने अंतिम उड़ान भरी और इसके साथ ही मिग‑21 की महत्वपूर्ण सेवा की एक लंबी पारी का अंत हुआ। अब यह सवाल आमतौर पर लोगों के जहन में उठता है कि रिटायर हो चुके इन विमानों का आगे क्या होगा। क्या ये कबाड़ में जाएंगे, या उन्हें किसी संग्रहालय में रखा जाएगा, या फिर नए पायलटों के प्रशिक्षण के लिए इस्तेमाल किया जाएगा? इसके पीछे कई तकनीकी, ऐतिहासिक और शैक्षिक कारण हैं, जिन्हें समझना जरूरी है।
ये होती है विमानों की सेवानिवृत्ति की प्रक्रिया
जब कोई विमान वायुसेना की सेवा से मुक्त होता है, तो सबसे पहले उसका गहन निरीक्षण किया जाता है। मिग‑21 जैसे पुराने और ऐतिहासिक विमानों के मामले में यह निरीक्षण और भी महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इसके पुर्जे और उपकरणों का भविष्य में पुनः उपयोग हो सकता है। रडार, सेंसर, कॉकपिट इलेक्ट्रॉनिक्स और हथियार प्रणाली जैसी संवेदनशील चीज़ों को सावधानीपूर्वक अलग किया जाता है। जिन हिस्सों को दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है, उन्हें निकाला जाता है और बाकी का धातु और बाहरी संरचना कबाड़ के रूप में भेज दी जाती है। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य न केवल संसाधनों का पुनर्चक्रण करना है, बल्कि विमानों की सुरक्षा और ऐतिहासिक महत्व को भी ध्यान में रखना है।
संग्रहालयों और सार्वजनिक प्रदर्शन में भी होता है इन विमानों का इस्तेमाल
सभी विमानों को कबाड़ में नहीं भेजा जाता। कई मिग‑21 विमानों को संग्रहालयों और सार्वजनिक स्थलों में प्रदर्शनी के लिए रखा गया है ताकि जनता और आने वाली पीढ़ियां उनकी सेवा और तकनीकी महत्त्व को समझ सकें। उदाहरण के लिए चंडीगढ़ में भारतीय वायुसेना का हेरिटेज म्यूजियम, दिल्ली का वायुसेना संग्रहालय, बेंगलुरु का (HAL) हेरिटेज सेंटर और एयरोस्पेस म्यूजियम, कोलकाता का निको पार्क, ओडिशा का बिजू पटनायक एरोनॉटिक्स म्यूजियम और प्रयागराज का चंद्रशेखर पार्क ऐसे स्थान हैं जहां मिग‑21 विमानों को स्थाई तौर पर प्रदर्शन के रूप में रखा गया है। इन प्रदर्शनों का उद्देश्य केवल तकनीकी जानकारी देना नहीं बल्कि वायुसेना की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखना भी है।
प्रशिक्षण और शैक्षिक उपयोग के लिए भी होता है इनका इस्तेमाल
सेवानिवृत्त विमानों के पुर्जे और कॉकपिट उपकरणों का इस्तेमाल इंजीनियरिंग कॉलेजों और प्रशिक्षण संस्थानों में व्यावहारिक शिक्षा के लिए किया जा सकता है। इससे छात्रों को विमान प्रणालियों की कार्यप्रणाली और रखरखाव की तकनीक सीखने में मदद मिलती है। इसके अलावा पायलटों के लिए युद्ध स्थितियों का प्रशिक्षण भी संभव होता है, जिसमें उन्हें वास्तविक विमान उपकरण और प्रणाली का अनुभव मिलता है। अमेरिका के ड्रोन विकास के इतिहास से पता चलता है कि पुराने विमानों को ड्रोनों या प्रशिक्षण उपकरणों के रूप में लंबी अवधि तक इस्तेमाल किया जा सकता है। शीत युद्ध के दौरान, ड्रोनों को मानवयुक्त जासूसी विमानों के विकल्प के रूप में विकसित किया गया था, जिससे पायलटों की जान बचाई जा सके। इसके अलावा, अमेरिका ने कई वर्षों तक प्रीडेटर जैसे ड्रोन का उपयोग किया है, जो एक प्रकार का मानव रहित हवाई वाहन (UAV) है।
अमेरिका द्वारा पेश किए गए इन उदाहरण से भी पता चलता है कि पुराने विमानों का ड्रोन या प्रशिक्षण उपकरण के रूप में इस्तेमाल लंबे समय तक किया जा सकता है।
भविष्य में नई इकाइयों में उपयोग के लिए सुरक्षित रहेगी नंबर‑प्लेटिंग
मिग‑21 के अंतिम सक्रिय स्क्वाड्रन, जैसे नंबर 3 (Cobras) और नंबर 23 (Panthers), को सेवा से हटाने के बाद भी उनकी पहचान और प्रतीक चिन्ह संरक्षित किए जाएंगे। नंबर‑प्लेटिंग के माध्यम से इन स्क्वाड्रनों का नाम, संख्या और प्रतीक भविष्य में नई इकाइयों में उपयोग के लिए सुरक्षित रहेगा। इससे न केवल इतिहास की निरंतरता बनी रहेगी, बल्कि देश की वायुसेना की धरोहर का सम्मान भी किया जाएगा।
कबाड़ से शैक्षिक संस्थानों तक पहुंच
जिन विमानों के पुर्जे दोबारा इस्तेमाल के योग्य नहीं होते, उन्हें कबाड़ के रूप में बेचा जाता है। वहीं संग्रहालयों, विश्वविद्यालयों और सरकारी संस्थानों को स्थिर प्रदर्शन के लिए आवेदन करने का अवसर दिया जाता है। सरकारी संस्थानों के लिए यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल होती है, जबकि निजी संस्थाओं को इसके लिए कुछ शुल्क का भुगतान करना पड़ सकता है। इस तरह, विमानों का उपयोग सिर्फ कबाड़ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनका तकनीकी और शैक्षिक महत्व भी सुरक्षित रहता है।
सेवानिवृत्ति के बाद इंजन, हथियार प्रणाली, रडार और अन्य संवेदनशील उपकरण हटा लिए जाते हैं। इन पुर्जों को भविष्य में अन्य विमानों में इस्तेमाल करने या तकनीकी प्रशिक्षण के लिए सुरक्षित रखा जाता है। यह प्रक्रिया न केवल इनकी उपयोगिता सुनिश्चित करती है बल्कि संवेदनशील तकनीक की सुरक्षा को भी सुदृढ़ करती है।
सेवानिवृत्त विमानों की वर्तमान स्थिति
रिटायर हुए मिग‑21 विमानों में अंतिम सक्रिय स्क्वाड्रन नंबर 23 (Panthers) और नंबर 3 (Cobras) के विमान शामिल थे। इन्हें चंडीगढ़ से राजस्थान के नाल एयरबेस ले जाया जाएगा, जहां विस्तृत तकनीकी जांच होगी। जो पुर्जे इस्तेमाल योग्य होंगे उन्हें निकाला जाएगा और शेष विमान कबाड़ में भेजा जाएगा। इसके अलावा स्क्वाड्रन की विरासत को संरक्षित करने के लिए नंबर‑प्लेटिंग की जाएगी। इन विमानों को लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि स्थाई प्रदर्शन के लिए विमानों को मौसम और बाहरी दुष्प्रभावों से बचाना जरूरी होता है। बारिश, धूप और धूल से बचाने के लिए तम्बू और छत का इंतज़ाम होना चाहिए। संग्रहालयों और सार्वजनिक स्थलों पर प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा और शैक्षिक सामग्री का ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है। इच्छुक संस्थाओं को वायुसेना मुख्यालय से औपचारिक आवेदन करना होगा और रखरखाव की जिम्मेदारी भी सुनिश्चित करनी होगी। इसी प्रकार से उनके पुर्जों का पुनः उपयोग और स्क्वाड्रन नंबर‑प्लेटिंग के माध्यम से उनकी पहचान भी संरक्षित रहेगी। इस तरहमिग‑21 से जुड़े किस्से और उनकी सेवा का महत्व आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सकेगा।


