मोबाइल का Compass बिना सुई के दिशा कैसे बताता है? फोन में छिपा है Magnetometer

स्मार्टफोन में बिना चुंबकीय सुई के कम्पास कैसे उत्तर-दक्षिण पहचानता है? जानिए Magnetometer, Accelerometer, Gyroscope और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का पूरा विज्ञान।

Yogesh Mishra
Published on: 5 Oct 2026 9:01 PM IST
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 Mobile Compass Smartphone Compass Explained in Hindi 

Mobile Compass: पुराने ज़माने का कम्पास खोलकर देखें तो उसका सिद्धांत सामने दिख जाता है। बीच में एक छोटी चुंबकीय सुई आज़ादी से घूमती है। पृथ्वी खुद एक विशाल चुंबकीय क्षेत्र बनाती है, इसलिए सुई उसके हिसाब से घूमकर लगभग उत्तर-दक्षिण में टिक जाती है।

लेकिन स्मार्टफोन में कम्पास खोलें तो न कोई घूमती सुई दिखती है, न कोई छोटा चुंबक। फिर भी फोन घुमाते ही स्क्रीन की सुई घूम जाती है और उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम बता देती है। वजह यह है कि मोबाइल ने चुंबकीय सुई को हटाया नहीं, उसका काम इलेक्ट्रॉनिक बना दिया। फोन के अंदर एक बहुत छोटा चुंबकीय क्षेत्र नापने वाला सेंसर लगा होता है, जिसे मैग्नेटोमीटर (magnetometer) कहते हैं। वह पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र नापता है, और फोन उन आंकड़ों से दिशा निकालकर स्क्रीन पर डिजिटल कम्पास बना देता है।

पृथ्वी एक विशाल चुंबक की तरह काम करती है

मोबाइल कम्पास समझने के लिए पहले पृथ्वी को समझना होगा। पृथ्वी के बाहरी कोर में मुख्य रूप से पिघला हुआ लोहा और निकेल है। वहां गर्म, बिजली चलाने वाले तरल की जटिल हलचल और पृथ्वी के घूमने से जियोडायनेमो (geodynamo) नाम की प्रक्रिया चलती है, जिससे पृथ्वी का विशाल चुंबकीय क्षेत्र बनता है। यह क्षेत्र अंतरिक्ष में दूर तक फैला है। पुराने कम्पास की सुई इसी क्षेत्र के साथ खुद को सीध में कर लेती है। मोबाइल भी इसी चुंबकीय क्षेत्र का इस्तेमाल करता है। फर्क बस इतना है कि पुराना कम्पास क्षेत्र को महसूस करके सुई घुमाता था, जबकि स्मार्टफोन क्षेत्र को नापकर संख्याओं में बदल देता है। फोन के अंदर का मैग्नेटोमीटर बता सकता है कि फोन की अपनी तीन दिशाओं के हिसाब से चुंबकीय क्षेत्र कितना है। यहीं से डिजिटल कम्पास की कहानी शुरू होती है।

फोन के अंदर असल में क्या लगा होता है?

आज के स्मार्टफोन में बहुत छोटे सेंसर लगे होते हैं, जिन्हें मेम्स (MEMS, यानी सूक्ष्म बिजली-यांत्रिक सेंसर) कहते हैं। इनमें एक्सेलेरोमीटर (accelerometer), जाइरोस्कोप (gyroscope) और मैग्नेटोमीटर शामिल हो सकते हैं। कम्पास के लिए मुख्य सेंसर मैग्नेटोमीटर है। यह इतना छोटा होता है कि खोलकर देखने पर भी इसमें किसी पुराने कम्पास जैसी चीज़ नहीं मिलेगी। इसमें कोई बड़ी घूमने वाली चुंबकीय सुई नहीं होती। इसमें अर्धचालक (semiconductor) और चुंबकीय पदार्थों के बिजली वाले गुण चुंबकीय क्षेत्र से बहुत थोड़े बदल जाते हैं, और उसी बदलाव को नापकर दिशा की जानकारी मिलती है। अलग-अलग कंपनियां इसके लिए अलग तकनीक इस्तेमाल कर सकती हैं, जैसे हॉल इफेक्ट (Hall effect) या मैग्नेटोरेसिस्टेंस (magnetoresistance)। इसलिए हर फोन के मैग्नेटोमीटर की अंदरूनी बनावट एक जैसी हो, यह ज़रूरी नहीं। पर काम सबका यही है: आसपास के चुंबकीय क्षेत्र की दिशा और ताकत नापना।

फोन तीन दिशाओं में नापता है

यह इसकी सबसे दिलचस्प बात है। फोन का मैग्नेटोमीटर आम तौर पर चुंबकीय क्षेत्र को तीन अक्षों (axis) पर नापता है:

- X एक्सिस: फोन के दाएं-बाएं की दिशा में

- Y एक्सिस: फोन के ऊपर-नीचे की दिशा में

- Z एक्सिस: स्क्रीन के आर-पार की दिशा में

मान लीजिए आपके फोन के अंदर तीन अदृश्य पैमाने लगे हैं, जो तीन अलग दिशाओं में पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का हिस्सा नाप रहे हैं। पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र सिर्फ ज़मीन के समानांतर नहीं होता, जगह के हिसाब से वह ज़मीन की ओर झुका भी होता है। इसलिए सिर्फ दो दिशाओं का नाप काफी नहीं होगा, खासकर तब जब फोन पूरी तरह समतल न रखा हो। तीनों दिशाओं के नाप से फोन चुंबकीय क्षेत्र की पूरी तस्वीर (तीन आयामों में) बना लेता है, यानी उसे पता चल जाता है कि चुंबकीय क्षेत्र उसके अपने शरीर के हिसाब से किस ओर है।

फोन को यह कैसे पता कि आपने उसे कैसे पकड़ा है?

यहीं अकेला मैग्नेटोमीटर काफी नहीं रहता। आप फोन को मेज़ पर सीधा रख सकते हैं, हाथ में तिरछा पकड़ सकते हैं, लगभग खड़ा कर सकते हैं या घुमा सकते हैं। अगर फोन सिर्फ चुंबकीय क्षेत्र नापे और अपना झुकाव न जाने, तो कम्पास गलत हो सकता है। इसलिए फोन कई सेंसरों की जानकारी आपस में मिलाता है:

- एक्सेलेरोमीटर गुरुत्वाकर्षण की दिशा पहचानता है। इससे फोन समझता है कि "नीचे" किधर है और वह कितना झुका है।

- जाइरोस्कोप फोन के घूमने की रफ्तार नापता है, यानी आपने उसे कितनी तेज़ी से और किस धुरी पर घुमाया।

- मैग्नेटोमीटर पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की दिशा बताता है।

इन तीनों की जानकारी जोड़कर फोन अपनी स्थिति और दिशा का कहीं बेहतर अंदाज़ा लगाता है। इस प्रक्रिया को सेंसर फ्यूज़न (sensor fusion), यानी सेंसरों का मेल, कहते हैं। इसलिए स्क्रीन पर घूमता कम्पास सिर्फ मैग्नेटोमीटर की सीधी तस्वीर नहीं है, उसके पीछे कई सेंसरों और गणनाओं का मिला-जुला नतीजा है।

क्या मोबाइल कम्पास जीपीएस से उत्तर पता करता है?

बुनियादी कम्पास के लिए जीपीएस ज़रूरी नहीं है। यह बहुत आम गलतफहमी है। जीपीएस और कम्पास दो अलग सवालों का जवाब देते हैं। जीपीएस बताता है कि आप पृथ्वी पर कहां हैं। मैग्नेटोमीटर वाला कम्पास बताता है कि फोन किस ओर मुंह किए है। अगर आप एक जगह खड़े होकर फोन को उत्तर से पूर्व की ओर घुमाएं, तो जीपीएस में आपकी जगह लगभग वही रहेगी, पर कम्पास की दिशा बदल जाएगी। इसके उलट, कार चल रही हो तो जीपीएस लगातार बदलती जगहों से बता सकता है कि गाड़ी किस दिशा में बढ़ रही है। पर ज़रूरी नहीं कि फोन का ऊपरी हिस्सा भी उसी ओर हो। मान लीजिए कार उत्तर की ओर जा रही है, पर आपने फोन हाथ में पूर्व की ओर मोड़ रखा है। जीपीएस आपकी यात्रा की दिशा उत्तर बताएगा, जबकि फोन का कम्पास बताएगा कि फोन पूर्व की ओर देख रहा है। यानी आप किधर जा रहे हैं और फोन किधर देख रहा है, ये दो अलग बातें हैं।

नक्शे में नीला तीर इतनी आसानी से कैसे घूमता है?

गूगल मैप्स, एप्पल मैप्स जैसे ऐप कई तरह की जानकारी साथ इस्तेमाल करते हैं: जीपीएस से जगह और रफ्तार, मैग्नेटोमीटर से दिशा, एक्सेलेरोमीटर और जाइरोस्कोप से फोन की हलचल और झुकाव, और कभी-कभी दूसरे संकेत भी। इन सबको मिलाकर ज़्यादा स्थिर अंदाज़ा बनता है। इसीलिए चलती गाड़ी में दिशा काफी स्थिर दिखती है, जबकि कमरे में खड़े होकर फोन घुमाने पर कम्पास की भूमिका साफ दिखती है। आधुनिक फोन की यही खूबी है कि वह किसी एक सेंसर पर पूरी तरह टिके रहने के बजाय कई अधूरी जानकारियों को जोड़कर बेहतर अंदाज़ा लगाता है।

मोबाइल कम्पास कभी-कभी गलत दिशा क्यों दिखाने लगता है?

ऐसा इसलिए क्योंकि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र बहुत ताकतवर नहीं है। फोन के आसपास के चुंबकीय और बिजली के स्रोत उसे आसानी से प्रभावित कर सकते हैं। फोन को बड़े स्पीकर या मज़बूत चुंबक के पास ले जाएं, या ऐसी धातु की बनावट के पास इस्तेमाल करें जो आसपास का चुंबकीय क्षेत्र बिगाड़ती हो, तो मैग्नेटोमीटर पृथ्वी के क्षेत्र के साथ उस स्थानीय असर को भी नाप लेता है। फोन यह नहीं जानता कि कौन-सा क्षेत्र पृथ्वी का है और कौन-सा आपके पास रखे चुंबक का। उसके सेंसर के लिए दोनों चुंबकीय क्षेत्र ही हैं। इसीलिए लिफ्ट, कार, लोहे की बड़ी बनावट, चुंबकीय फोन कवर, स्पीकर या दूसरी इलेक्ट्रॉनिक चीज़ों के पास कम्पास में गड़बड़ी दिख सकती है।

फोन को आठ (8) के आकार में क्यों घुमाने को कहा जाता है?

कभी-कभी कम्पास ठीक काम नहीं करता तो स्क्रीन पर निर्देश आता है कि फोन को हवा में 8 की आकृति में घुमाइए। यह कोई अंधविश्वास या कंपनी की अजीब रस्म नहीं है। इसका मकसद अंशांकन (कैलिब्रेशन, calibration) में मदद करना है। फोन के अपने पुर्ज़ों, आसपास के स्थायी चुंबकीय असर और दूसरी वजहों से मैग्नेटोमीटर के नाप में कुछ बंधी-बंधाई गड़बड़ियां आ सकती हैं। जब फोन को कई दिशाओं और कोणों में घुमाया जाता है, तो उसे अलग-अलग तरह के नाप मिलते हैं। उनसे वह अंदाज़ा लगा लेता है कि नाप में कितनी गड़बड़ी है और उसे कैसे ठीक करना है।

इसे आसान उदाहरण से समझिए। मान लीजिए आपकी तौलने की मशीन हर चीज़ का वज़न दो किलो ज़्यादा बताती है। यह गड़बड़ी पता चल जाए तो असली वज़न निकालना आसान हो जाएगा। मैग्नेटोमीटर का कैलिब्रेशन इससे कहीं ज़्यादा जटिल है, पर मूल विचार यही है: सेंसर की अपनी गड़बड़ी पहचानकर नाप को सुधारना।

कम्पास जिस उत्तर को बताता है, ज़रूरी नहीं कि वह नक्शे वाला उत्तर हो

पृथ्वी के दो अहम "उत्तर" हैं। पहला है भौगोलिक उत्तर (true north), यानी पृथ्वी के घूमने की धुरी से तय असली उत्तरी ध्रुव। दूसरा है चुंबकीय उत्तर, जिधर चुंबकीय कम्पास इशारा करता है। दोनों एक ही जगह पर नहीं हैं। यही नहीं, पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र हमेशा एक जैसा भी नहीं रहता। बाहरी कोर में पिघली धातुओं की हलचल बदलने से चुंबकीय ध्रुव और क्षेत्र समय के साथ बदलते रहते हैं। इसीलिए वैज्ञानिक वर्ल्ड मैग्नेटिक मॉडल (World Magnetic Model) जैसे मॉडल समय-समय पर अपडेट करते हैं। किसी जगह पर भौगोलिक उत्तर और चुंबकीय उत्तर के बीच जो कोण होता है, उसे चुंबकीय विचलन (magnetic declination) कहते हैं। अगर स्मार्टफोन को अपनी जगह पता हो, तो वह चुंबकीय नाप और पृथ्वी के चुंबकीय मॉडल की मदद से इस फर्क को ठीक करके असली उत्तर दिखा सकता है। इसी वजह से डिजिटल कम्पास साधारण चुंबकीय सुई से कहीं ज़्यादा जानकारी संभाल लेता है।

इंटरनेट बंद कर दें तो क्या कम्पास बंद हो जाएगा?

आम तौर पर नहीं। फोन में मैग्नेटोमीटर है तो पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र नापने के लिए इंटरनेट नहीं चाहिए, क्योंकि चुंबकीय क्षेत्र इंटरनेट से नहीं आता। हां, कोई खास नक्शे वाला ऐप नक्शा डाउनलोड करने या ऑनलाइन सेवाओं के लिए इंटरनेट मांग सकता है। पर चुंबकीय दिशा नापने का मूल काम फोन के अंदर का सेंसर करता है। इसीलिए सही ऐप होने पर मोबाइल नेटवर्क से दूर जगहों पर भी डिजिटल कम्पास दिशा बता सकता है।

क्या फोन में सच में कोई चुंबक नहीं होता?

आज के फोन में असल में चुंबक हो सकते हैं: स्पीकर, वाइब्रेशन वाले पुर्ज़े, चुंबकीय चार्जिंग या एक्सेसरी जोड़ने वाली व्यवस्था में उनका इस्तेमाल होता है। पर दिशा दिखाने के लिए पुराने कम्पास जैसी खुली घूमने वाली सुई की ज़रूरत नहीं होती। उलटे, फोन बनाने वाली कंपनियों के सामने उलटी समस्या होती है: फोन के अपने चुंबकीय हिस्से मैग्नेटोमीटर को भ्रमित न करें। इसलिए फोन की बनावट और गणनाओं वाले कैलिब्रेशन में इन असरों का ध्यान रखना पड़ता है।

असली कमाल चुंबकीय क्षेत्र को संख्या में बदलने में है

पुराने और मोबाइल कम्पास के बीच की पूरी तकनीकी यात्रा इस एक बात में समझी जा सकती है: पुराना कम्पास पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को यांत्रिक हलचल में बदलता है, जबकि स्मार्टफोन उसी क्षेत्र को बिजली के संकेत और फिर संख्याओं में बदलता है। पुराने कम्पास में पृथ्वी का क्षेत्र सुई पर ज़ोर लगाता है और सुई घूम जाती है, जिसे हम आंख से पढ़ लेते हैं। मोबाइल में पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र एक नन्हे सेंसर के बिजली वाले गुणों को थोड़ा बदल देता है। इलेक्ट्रॉनिक सर्किट उस छोटे बदलाव को नापता है, और फोन उसे X, Y, Z अक्षों की संख्याओं में बदल लेता है। एक्सेलेरोमीटर बताता है कि गुरुत्वाकर्षण किधर है, जाइरोस्कोप बताता है कि फोन कैसे घूम रहा है, गणना करने वाली व्यवस्था इन सबको जोड़ती है, और आखिर में स्क्रीन पर एक सुंदर कम्पास की सुई बना देती है। वह सुई असल में फोन के अंदर कहीं नहीं है, स्क्रीन पर घूमती सुई सिर्फ एक तस्वीर है। पर जिस अदृश्य ताकत को वह दिखा रही है, वह बिल्कुल असली है: पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र। इसीलिए करीब डेढ़ सौ ग्राम का स्मार्टफोन बिना किसी घूमती चुंबकीय सुई के यह जान लेता है कि उत्तर किधर है। तकनीक ने कम्पास का मूल सिद्धांत नहीं बदला। पृथ्वी आज भी वही काम कर रही है जो सदियों पहले के कम्पास के साथ करती थी। हमने बस उस चुंबकीय संकेत को पढ़ने का तरीका बदल दिया है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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