Phone Addiction: फोन की लत और जुए की लत, क्या सच में एक जैसी हैं?

Phone Addiction: क्या फोन की लत और जुए की लत एक जैसी हैं? जानिए डोपामिन, अनिश्चित इनाम, नोटिफिकेशन, अनंत स्क्रॉल और स्क्रीन टाइम के पीछे का मनोविज्ञान।

Yogesh Mishra
Published on: 16 Oct 2026 2:26 PM IST
Phone Addiction|Smartphone Addiction|Gambling Addiction|Latest Hindi News|Samachar Hindi Newstrack
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Phone Addiction|Smartphone Addiction|Gambling Addiction|Latest Hindi News|Samachar Hindi Newstrack

Phone Addiction: आपने फोन उठाया, बस यह देखने के लिए कि कोई मैसेज आया या नहीं। मैसेज नहीं था, पर आपने कोई सोशल मीडिया ऐप खोल लिया। एक वीडियो दिखा, फिर दूसरा, फिर तीसरा। फोन रखा, और कुछ ही मिनट बाद फिर हाथ में था। न कोई ज़रूरी काम था, न किसी का इंतज़ार। बस उठाने का मन कर रहा था। उधर जुआ खेलने वाला अगली बाज़ी से पहले जानता है कि हार भी सकता है। फिर भी 'शायद इस बार जीत जाऊँ' वाली उम्मीद उसे खींच लेती है। दोनों बातें अलग हैं, पर एक चीज़ साझा है: हर बार इनाम नहीं मिलता, लेकिन अगली बार कुछ अच्छा मिलने की संभावना आपको वापस खींचती रहती है।

पर यहाँ एक सावधानी ज़रूरी है। जुए की लत एक मान्यता प्राप्त मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। डब्लूएचओ की लिस्ट में जुए के विकार को व्यवहार से जुड़ा नशा माना गया है। फोन का ज़्यादा इस्तेमाल अपने आप में वैसी बीमारी नहीं है, और उसके लिए ऐसी कोई तय, सर्वमान्य चिकित्सकीय श्रेणी नहीं है। इसलिए हर ज़्यादा फोन चलाने वाले को जुआरी जैसा मान लेना ग़लत होगा। फिर भी दोनों में कुछ मनोवैज्ञानिक बातें मिलती-जुलती हैं: अनिश्चित इनाम, बार-बार मिलने वाले छोटे संकेत, तुरंत मिलने वाला रिस्पॉन्स, आदत बन जाना, कुछ छूट जाने का डर, और बुरी भावनाओं से बचने के लिए किसी चीज़ की तरफ़ लौटना। ऐप का डिज़ाइन भी इनका फ़ायदा उठा सकता है।

दिमाग का इनाम वाला सिस्टम क्या है?

हमारे दिमाग में कुछ हिस्से ऐसे हैं जो खाने, रिश्तों, सीखने और कामयाबी जैसी चीज़ों से जुड़े व्यवहार को दिशा देते हैं। इन्हें मिलाकर रिवॉर्ड सिस्टम कहा जाता है। इसमें वेंट्रल टेगमेंटल एरिया, न्यूक्लियस अकम्बेंस और प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स जैसे हिस्से शामिल हैं, जो मिलकर प्रेरणा, फ़ैसले और सीखने का काम संभालते हैं।

इसका एक अहम केमिकल मैसेंजर डोपामिन है। लोग अक्सर इसे "ख़ुशी वाला केमिकल" कह देते हैं, पर यह अधूरी बात है। डोपामिन सिर्फ़ मज़ा नहीं देता। वह प्रेरणा, किसी चीज़ की उम्मीद, सीखने और यह तय करने में भी भूमिका निभाता है कि कौन-सा संकेत कितना अहम है। इसलिए किसी चीज़ की तरफ़ बार-बार खिंचना इस बात का सबूत नहीं कि आपको उसमें हर बार ज़्यादा मज़ा आ रहा है।

मान लीजिए आपको अचानक कोई अच्छी ख़बर मिलती है। दिमाग का इनाम वाला सिस्टम सक्रिय हो सकता है। अगर बार-बार यही होता है कि किसी ख़ास संकेत के बाद अच्छी ख़बर मिलती है, तो दिमाग उस संकेत को ही अहम मानना सीख लेता है। फिर वह संकेत ख़ुद आपको कुछ करने के लिए उकसाने लगता है। फोन की नोटिफिकेशन टोन या ऐप पर लाल निशान ऐसे ही संकेत बन सकते हैं।

एक बात और: यही सिस्टम सामान्य सीखने और लक्ष्य पाने में भी काम आता है। इसलिए किसी चीज़ के दौरान डोपामिन का सक्रिय होना यह नहीं बताता कि वह चीज़ नशा बन रही है।

जुए में असली खिंचाव जीत का नहीं, जीत की संभावना का होता है

जुए की ख़ासियत है कि हर बार इनाम नहीं मिलता। कभी जीत, कभी हार, कभी लंबे समय तक कुछ नहीं। पर अगली बाज़ी में जीत की उम्मीद बनी रहती है। मनोवैज्ञानिक बी. एफ. स्किनर के प्रयोगों से पता चला था कि किसी काम के बाद मिलने वाला इनाम उस काम को दोहराने की संभावना को प्रभावित करता है।

इसमें सबसे असरदार तरीक़ा वह है जिसमें इनाम तय संख्या के बाद नहीं, बल्कि बदलती संख्या के प्रयासों के बाद मिलता है। जैसे पहली जीत तीन कोशिश में, दूसरी दस में, तीसरी दो में। इस अनिश्चितता से व्यवहार लगातार चलता रह सकता है। स्लॉट मशीनों में यही चीज़ काम करती है।

हालाँकि सब तरह के जुए में इनाम का तरीक़ा एक जैसा नहीं होता। लॉटरी, सट्टा, ताश और स्लॉट मशीन के नियम अलग हैं। और हर ऐप को स्लॉट मशीन कह देना भी ठीक नहीं। असली समानता सिर्फ़ इतनी है कि कभी-कभार और अनिश्चित रूप से मिलने वाले अच्छे नतीजे हमें वही काम दोहराने को प्रेरित कर सकते हैं।

अब फोन पर आइए। पहली बार सोशल मीडिया खोला तो आम चीज़ें दिखीं। दूसरी बार दोस्त का मैसेज मिला। तीसरी बार बहुत मज़ेदार वीडियो दिखा। चौथी बार आपकी फोटो पर तारीफ़ वाला कमेंट आया। हर बार इनाम एक जैसा नहीं था, पर अगली बार कुछ अच्छा मिलने की गुंजाइश बनी रही। कुछ लोगों में यही अनिश्चितता बार-बार ऐप खोलने की आदत पक्की कर सकती है। दोनों में समानता यही है कि आगे क्या मिलेगा, पता नहीं होता। पर दोनों के नतीजे, जोखिम और चिकित्सकीय अहमियत अलग हैं।

क्या हर नोटिफिकेशन पर डोपामिन का धमाका होता है?

सोशल मीडिया पर यह बात बहुत चलती है कि हर घंटी, लाइक या वीडियो पर दिमाग में डोपामिन का "विस्फोट" होता है। वैज्ञानिक नज़रिए से यह बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात है। डोपामिन दिमाग में कई हालात में सक्रिय रहता है और उसकी भूमिका जटिल है। किसी ख़ास नोटिफिकेशन से कितना डोपामिन बदलता है, इसका कोई सामान्य दावा नहीं किया जा सकता।

इस विषय का एक अहम वैज्ञानिक विचार है "रिवॉर्ड प्रेडिक्शन एरर", यानी जो हुआ और जो आपने उम्मीद की थी, उनके बीच का फ़र्क। अगर उम्मीद से बेहतर नतीजा मिले तो कुछ डोपामिन न्यूरॉन ज़्यादा सक्रिय हो सकते हैं। अगर उम्मीद का इनाम न मिले तो उनकी गतिविधि घट सकती है। और जब दिमाग इनाम का अंदाज़ा लगाना सीख लेता है, तो असर इनाम से हटकर इनाम से पहले आने वाले संकेत पर शिफ़्ट हो सकता है।

न्यूरोसाइंटिस्ट वोल्फ्राम शुल्ट्ज़ और उनके साथियों की रिसर्च ने इनाम से सीखने की इस प्रक्रिया को समझने में बड़ा योगदान दिया। पर इससे सीधे यह नतीजा निकाल लेना कि हर सोशल मीडिया ऐप दिमाग पर स्लॉट मशीन जैसा असर डालता है, सही नहीं होगा। डिजिटल व्यवहार में डोपामिन की भूमिका पर रिसर्च अभी जारी है। सही निष्कर्ष बस इतना है कि फोन पर मिलने वाले अप्रत्याशित सामाजिक या मनोरंजक नतीजे दिमाग की सामान्य "इनाम से सीखने" वाली प्रक्रिया से जुड़ सकते हैं। इससे यह साबित नहीं होता कि फोन का हर इस्तेमाल जुए जैसी जैविक लत बना रहा है।

फोन उठाने की आदत कैसे बनती है?

आदत बनने के तीन क़दम हैं: कोई संकेत मिलता है, आप कुछ करते हैं, और उसके बाद कोई नतीजा मिलता है। यह चक्र बार-बार दोहराया जाए तो संकेत और व्यवहार का रिश्ता मज़बूत हो सकता है।

मान लीजिए काम करते हुए हल्की ऊब हुई। आपने फोन उठाया और कुछ मज़ेदार देखा। थोड़ी देर ऊब कम हो गई। अगली बार ऊब होने पर फोन उठाने की संभावना बढ़ जाती है। धीरे-धीरे यह इतना अपने आप होने लगता है कि फोन खुलने के बाद ही ख़याल आता है, "मैंने इसे क्यों उठाया?"

यहाँ एक अहम बात है। हर आदत किसी बाहरी इनाम से नहीं बनती। कई बार हम किसी बुरी भावना से राहत पाने के लिए कोई काम दोहराते हैं। चिंता, अकेलापन, तनाव या ऊब में फोन देखने से थोड़ी राहत मिल जाती है। व्यवहार विज्ञान में इसे "नेगेटिव रीइन्फोर्समेंट" कहते हैं। इसका मतलब सज़ा नहीं है, बल्कि यह है कि किसी बुरे एहसास से राहत मिलने की वजह से वह काम दोहराने की संभावना बढ़ जाती है।

जुए में भी कुछ लोगों के लिए यही असली वजह हो सकती है। वे सिर्फ़ पैसा जीतने के लिए नहीं, बल्कि तनाव या निराशा से कुछ देर बचने के लिए जुआ खेलते हैं। हालाँकि हर किसी के कारण एक जैसे नहीं होते, और हर जुआरी की समस्या को सिर्फ़ तनाव से जोड़ देना भी ठीक नहीं।

अनंत स्क्रॉल: जब रुकने की जगह ही ग़ायब हो जाए

अख़बार या किताब का एक अंत होता है। आख़िरी पन्ने पर पहुँचकर या अध्याय पूरा होने पर रुकने का एक स्वाभाविक मौक़ा मिलता है। कई डिजिटल ऐप में ऐसा नहीं है। आप स्क्रीन ऊपर सरकाते हैं और अगला वीडियो, फोटो या पोस्ट सामने आ जाती है। इसे अनंत स्क्रॉल कहते हैं। इसमें आगे बढ़ने के लिए कोई साफ़ फ़ैसला नहीं लेना पड़ता और मेहनत बहुत कम लगती है। जब सामग्री लगातार आती रहे और अगला नतीजा अनिश्चित हो, तो कुछ लोगों के लिए रुकना मुश्किल हो सकता है। जिस चीज़ को जारी रखने में जितने कम क़दम लगें, वह उतनी आसान लगती है। और अगर बीच में कभी रुककर सोचना पड़े कि आगे बढ़ूँ या नहीं, तो अपना मक़सद याद करने का मौक़ा मिलता है। पर यह कहना सही नहीं कि अनंत स्क्रॉल हर किसी को आदी बना देता है। बहुत से लोग ऐसे ऐप का सीमित और सोच-समझकर इस्तेमाल करते हैं। असर आपकी आदतों, सामग्री, हालात और ऐप के बाकी डिज़ाइन पर निर्भर करता है।

ऑटोप्ले और छोटे वीडियो क्यों खींचते हैं?

ऑटोप्ले में एक वीडियो ख़त्म होते ही अगला अपने आप चल पड़ता है। देखने वाले को अगला वीडियो चुनने का अलग फ़ैसला नहीं लेना पड़ता। अगर वीडियो छोटे हों और हर बार विषय बदलता रहे, तो हर कुछ सेकंड में नई जानकारी, हँसी, संगीत या दृश्य मिलते रहते हैं।

इंसान का ध्यान नई और अप्रत्याशित चीज़ों की तरफ़ ज़्यादा जाता है। छोटे वीडियो इसी का फ़ायदा उठा सकते हैं, क्योंकि हर वीडियो में नया विषय और नया अनुभव होता है। पर यह कहना कि छोटे वीडियो दिमाग को हमेशा के लिए ख़राब कर देते हैं या ध्यान लगाने की ताक़त ख़त्म कर देते हैं, मौजूदा वैज्ञानिक सबूतों से साबित नहीं होता।

कई अध्ययनों में बहुत ज़्यादा या समस्या वाले डिजिटल इस्तेमाल और ध्यान की दिक़्क़तों के बीच संबंध मिला है। लेकिन संबंध होना और एक चीज़ का दूसरी की वजह होना अलग बातें हैं। हो सकता है पहले से ध्यान की दिक़्क़त वाले लोग ज़्यादा डिजिटल चीज़ों की तरफ़ खिंचते हों। यह भी हो सकता है कि ज़्यादा इस्तेमाल नींद, पढ़ाई या काम में रुकावट डालकर ध्यान की समस्या बढ़ाए। या दोनों बातें साथ-साथ हो सकती हैं। इसलिए किसी एक दिशा को पक्का कारण बताना वैज्ञानिक सावधानी के ख़िलाफ़ होगा।

लाइक, कमेंट और फॉलोअर इतने अहम क्यों लगने लगते हैं?

इंसान सामाजिक प्राणी है। दूसरों से स्वीकार्यता, सम्मान और जुड़ाव चाहना हमारे स्वभाव का हिस्सा है। असली ज़िंदगी में तारीफ़ और साथ हमारे अनुभव को प्रभावित करते हैं। डिजिटल ऐप ने इन्हीं चीज़ों को गिनती में बदल दिया है: कितने लाइक, कितने कमेंट, कितने नए फॉलोअर, कितने व्यूज़।

इस माहौल में आप सिर्फ़ कुछ पोस्ट नहीं करते, उसके बाद आने वाली प्रतिक्रिया का इंतज़ार भी करते हैं। कभी बहुत तारीफ़ मिलती है, कभी कम, और इसीलिए अगली प्रतिक्रिया देखने की उत्सुकता बनी रहती है। कुछ लोगों में यह बार-बार नंबर चेक करने की आदत बना देती है।

पर सामाजिक प्रतिक्रिया को जुए की आर्थिक जीत के बराबर नहीं रखा जा सकता। जुए में असली पैसा डूबने और आर्थिक संकट का जोखिम रहता है, जबकि सोशल मीडिया की तारीफ़ का स्वरूप भावनात्मक और सामाजिक होता है। इनाम की अनिश्चितता जैसी समानताएँ हो सकती हैं, पर नतीजे और जोखिम अलग हैं। और हर कोई लाइक-फॉलोअर के लिए ऐप पर नहीं आता। बहुत से लोग ख़बरें पढ़ने, दोस्तों से जुड़े रहने, काम करने, पढ़ाई करने या किसी समुदाय से जुड़ने के लिए इन्हें इस्तेमाल करते हैं। सिर्फ़ स्क्रीन टाइम देखकर किसी के व्यवहार की पूरी कहानी नहीं समझी जा सकती।

क्या ऐप जानबूझकर हमें रोके रखने के लिए बनते हैं?

कुछ डिजिटल सेवाओं का बिज़नेस मॉडल यूज़र के ध्यान और सक्रियता पर टिका होता है। विज्ञापन से कमाने वाले प्लेटफ़ॉर्म को फ़ायदा होता है जब लोग ज़्यादा देर कंटेंट देखें और बार-बार लौटें। इसलिए उनके लिए यह जानना काम का होता है कि कौन-सी सामग्री ज़्यादा देखी जाती है, किस नोटिफिकेशन पर लोग ऐप खोलते हैं और क्या चीज़ उन्हें वापस लाती है।

आज की सिफ़ारिश प्रणालियाँ आपकी पिछली गतिविधि के आधार पर अगला कंटेंट चुनती हैं। आपने कौन-सा वीडियो देर तक देखा, किस विषय पर रिएक्ट किया, किसे तुरंत छोड़ दिया, इन संकेतों से अगली सामग्री तय हो सकती है। हालाँकि हर प्लेटफ़ॉर्म का एल्गोरिद्म एक जैसा नहीं होता और उसकी पूरी कार्यप्रणाली हमेशा सार्वजनिक नहीं होती। डिज़ाइन में प्रयोग भी होते हैं, जैसे नोटिफिकेशन का रंग, जगह या समय बदलकर देखना कि यूज़र का व्यवहार बदलता है या नहीं। इससे सेवा ज़्यादा सुविधाजनक भी बन सकती है और यूज़र की सक्रियता भी बढ़ सकती है।

दिक़्क़त तब आती है जब यूज़र की असली भलाई और प्लेटफ़ॉर्म के कारोबारी हित में दूरी बढ़ने लगे। जैसे कोई रात को पूरी नींद लेना चाहता है, पर लगातार आता कंटेंट उसे देर तक जगाए रखता है। फिर भी सब प्लेटफ़ॉर्म या सब डिज़ाइनरों पर जानबूझकर लत लगाने का आरोप लगाना ठीक नहीं। बहुत सी डिज़ाइन सुविधाएँ उपयोगिता और संपर्क को बेहतर बनाने के लिए भी होती हैं।

"लगभग जीत" और "अगली बार कुछ अच्छा मिलेगा"

जुए के कुछ प्रकारों में "नियर-मिस" का अनुभव होता है। जैसे स्लॉट मशीन पर नतीजा ऐसा दिखे कि खिलाड़ी जीत के बिल्कुल पास था, पर असल में हार गया। कुछ प्रयोगों में पाया गया है कि ऐसे अनुभव खिलाड़ी की उत्तेजना और आगे खेलने की इच्छा को प्रभावित कर सकते हैं, हालाँकि असर की तीव्रता हर व्यक्ति और परिस्थिति में अलग होती है।

सोशल मीडिया पर इसकी हूबहू गणितीय बनावट नहीं होती, पर कभी-कभी यह एहसास हो सकता है कि अगला वीडियो ज़्यादा मज़ेदार होगा, अगली पोस्ट पर ज़्यादा रिस्पॉन्स मिलेगा या अगला मैसेज ज़रूरी निकलेगा। इसी उम्मीद में आप स्क्रॉल करते रहते हैं। यह तुलना एक सीमा तक ही काम की है। हर पोस्ट जुए की बाज़ी नहीं है और हर अनपेक्षित मैसेज इनाम नहीं। पर आगे कुछ अच्छा मिलने की उम्मीद दोनों में प्रेरणा का साझा तत्व हो सकती है।

क्या फोन की लत वाक़ई जुए जैसी बीमारी है?

जुए के विकार को मनोविकारों की लिस्ट में व्यवहार से जुड़ा नशा माना गया है। इसके मुख्य लक्षण हैं: जुए पर नियंत्रण घटना, बाकी चीज़ों से ऊपर जुए को तरजीह देना, और नुक़सान होने के बावजूद खेलते रहना। निदान के लिए ज़रूरी है कि इस व्यवहार का निजी, पारिवारिक, सामाजिक, पढ़ाई या काम की ज़िंदगी पर गंभीर बुरा असर पड़ा हो। आम तौर पर यह लंबे समय तक चलता है, हालाँकि गंभीर मामलों में कम अवधि भी मायने रख सकती है।

इसके उलट स्मार्टफोन का ज़्यादा इस्तेमाल जुए जैसी कोई अलग मान्यता प्राप्त लत की श्रेणी नहीं है। शोधकर्ता "समस्याग्रस्त स्मार्टफोन इस्तेमाल" और "समस्याग्रस्त सोशल मीडिया इस्तेमाल" का अध्ययन करते हैं, पर इनकी परिभाषा, सीमा और मापने के तरीक़ों पर वैज्ञानिकों में मतभेद हैं।

यह फ़र्क इसलिए मायने रखता है कि फोन एक बहुउद्देशीय औज़ार है। उसी से आप दफ़्तर का काम करते हैं, घरवालों से बात करते हैं, ख़बरें पढ़ते हैं, पढ़ाई करते हैं, पेमेंट करते हैं और मनोरंजन भी। इसलिए पूरे फोन को नशे का स्रोत मानने के बजाय यह देखना ज़्यादा काम का है कि कौन-सी ख़ास गतिविधि हाथ से निकल रही है और उसका ज़िंदगी पर क्या असर पड़ रहा है।

एक मिसाल लीजिए। एक पत्रकार दिन में आठ घंटे फोन पर ख़बरें पढ़ता और सहकर्मियों से बात करता है। दूसरा आदमी आठ घंटे ऑनलाइन गेम खेलता है और उसकी नौकरी, नींद और परिवार की ज़िम्मेदारियाँ बिगड़ रही हैं। दोनों का स्क्रीन टाइम बराबर हो सकता है, पर दोनों के व्यवहार का मतलब और जोखिम बिल्कुल अलग हैं। इसी तरह कोई दिन में कई बार फोन देखता है पर ज़रूरत पड़ने पर आराम से बंद कर देता है। दूसरा बार-बार कम करने का इरादा करता है, फिर भी नहीं कर पाता और उसकी ज़िंदगी में गंभीर दिक़्क़तें आ रही हैं। समस्या का अंदाज़ा लगाते वक़्त यही दूसरा फ़र्क ज़्यादा मायने रखता है।

क्या स्क्रीन टाइम से लत नापी जा सकती है?

स्क्रीन टाइम सिर्फ़ मात्रा बताता है, मक़सद, संदर्भ और नतीजे नहीं। छात्र को ऑनलाइन पढ़ाई के लिए घंटों स्क्रीन देखनी पड़ सकती है। डॉक्टर को डिजिटल रिकॉर्ड पर काम करना पड़ सकता है। बुज़ुर्ग के लिए वीडियो कॉल परिवार से जुड़ने का ज़रिया हो सकती है। सिर्फ़ ज़्यादा समय बिताने को बीमारी नहीं कहा जा सकता।

समस्या के ज़्यादा सटीक संकेत ये हो सकते हैं: आप इस्तेमाल को क़ाबू में नहीं रख पा रहे, तय समय से बार-बार ज़्यादा चला रहे हैं, ज़रूरी काम छोड़ रहे हैं, या बुरे नतीजों के बावजूद जारी रख रहे हैं। एक और संकेत यह है कि हर अप्रिय भावना, यानी ऊब, चिंता या अकेलेपन से बचने का इकलौता तरीक़ा फोन बन गया हो। अगर इस वजह से असली समस्याओं का हल लगातार टल रहा है, तो इस पर ध्यान देना चाहिए।

कई बार ज़्यादा फोन चलाना किसी और परेशानी का लक्षण भी होता है। जैसे अनिद्रा, डिप्रेशन, चिंता, अकेलापन या ध्यान की दिक़्क़त। तब सिर्फ़ "फोन कम करो" कहना काफ़ी नहीं, असली समस्या को समझना भी ज़रूरी है।

बच्चों और किशोरों पर असर की चर्चा ज़्यादा क्यों होती है?

बच्चों और किशोरों में सामाजिक रिश्ते, पहचान, भावनाएँ और ख़ुद पर क़ाबू रखने की क्षमता अभी विकसित हो रही होती है। किशोरावस्था में दोस्तों की स्वीकृति और प्रतिक्रिया ख़ास मायने रखती है। इसलिए ऑनलाइन तारीफ़, अनदेखी, तुलना और सामाजिक संकेत कुछ किशोरों के अनुभव को गहराई से प्रभावित कर सकते हैं।

पर यह कहना सही नहीं कि किशोरों में आत्मनियंत्रण होता ही नहीं या हर किशोर पर डिजिटल दुनिया का असर एक जैसा होता है। विकास धीरे-धीरे होता है और हर इंसान में काफ़ी फ़र्क होता है। परिवार, दोस्ती, पढ़ाई, नींद, पहले से मौजूद मानसिक परेशानियाँ और ऑनलाइन अनुभव की प्रकृति, सब मायने रखते हैं।

कुछ अध्ययनों में समस्या वाले सोशल मीडिया इस्तेमाल और चिंता, डिप्रेशन, नींद की दिक़्क़त और जीवन से संतुष्टि में कमी के बीच संबंध मिला है। पर इन संबंधों की दिशा और कारण हर अध्ययन में साफ़ नहीं हैं। जो किशोर पहले से अकेलापन या तनाव झेल रहे हैं, वे भी ज़्यादा ऑनलाइन जा सकते हैं। इसलिए सोशल मीडिया को हर मानसिक समस्या की जड़ बता देना ठीक नहीं। ऑनलाइन दुनिया सीखने, रचनात्मकता, दोस्ती और मदद पाने के मौक़े भी देती है। सही सवाल यह नहीं कि फोन अच्छा है या बुरा, बल्कि यह है कि कौन-सा इस्तेमाल किन हालात में फ़ायदेमंद या नुक़सानदेह है।

फोन दूर होने पर बेचैनी: क्या यह नशे की "विदड्रॉल" जैसी है?

कुछ लोग बताते हैं कि फोन पास न हो तो बेचैनी, चिड़चिड़ापन या बार-बार देखने की इच्छा होती है। समस्या वाले डिजिटल इस्तेमाल पर हुई कुछ स्टडीज़ में ऐसी प्रतिक्रियाओं का ज़िक्र मिलता है। पर इन्हें शराब या दूसरे नशों में दिखने वाले शारीरिक विदड्रॉल लक्षणों जैसा मानना ठीक नहीं।

इस बेचैनी की कई वजहें हो सकती हैं: किसी ज़रूरी मैसेज का इंतज़ार, काम की कोई सूचना छूटने की चिंता, किसी ग्रुप से कट जाने का एहसास, या फोन देखना इतनी पक्की आदत बन चुका हो कि उसका न होना अटपटा लगे। बेचैनी असली हो सकती है, पर उसका कारण समझना ज़रूरी है। हर बेचैनी नशे का सबूत नहीं होती।

"कुछ छूट न जाए" का डर

डिजिटल व्यवहार की स्टडी में एक जाना-माना शब्द है "फियर ऑफ़ मिसिंग आउट" (FOMO), यानी किसी अहम चीज़ या जानकारी से वंचित रह जाने का डर।

मान लीजिए दोस्त किसी ग्रुप में लगातार मैसेज भेज रहे हैं। आपको लगता है कि अभी नहीं देखा तो कोई ज़रूरी बात छूट जाएगी। या किसी पेशेवर को लगता है कि तुरंत जवाब नहीं दिया तो मौक़ा हाथ से निकल जाएगा। कुछ लोगों को दूसरों की गतिविधियाँ न देख पाने से सामाजिक दूरी महसूस होती है। यह डर बार-बार फोन देखने की आदत बढ़ा सकता है।

पर इसकी वजह हमेशा ऐप का डिज़ाइन नहीं होती। सामाजिक अपेक्षाएँ भी मायने रखती हैं। अगर दफ़्तर में हर मैसेज का तुरंत जवाब देने का चलन है, तो कर्मचारी को फोन बार-बार देखना ही पड़ेगा। ऐसे में सिर्फ़ उसके आत्मनियंत्रण को दोष देना ठीक नहीं। काम की जगह की संचार व्यवस्था और सामाजिक दबाव भी व्यवहार को प्रभावित करते हैं।

दोनों में सबसे बड़ा फ़र्क क्या है?

दोनों में अनिश्चित इनाम, व्यवहार का दोहराव, संकेतों के प्रति संवेदनशीलता और क़ाबू में कठिनाई जैसी समानताएँ हो सकती हैं। पर जुए में अक्सर पैसा दाँव पर लगता है और नतीजा संयोग पर निर्भर करता है। इससे आर्थिक नुक़सान, कर्ज़, पारिवारिक संकट और गंभीर मानसिक परेशानियाँ पैदा हो सकती हैं। जुआ विकार एक स्थापित चिकित्सकीय श्रेणी है।

फोन ख़ुद कोई एक व्यवहार नहीं है, वह कई गतिविधियों का ज़रिया है। फोन पर ख़बरें पढ़ना, घरवालों से बात करना, ऑनलाइन जुआ खेलना और रील्स देखना एक ही तरह की चीज़ें नहीं हैं। इनकी प्रेरणाएँ और जोखिम अलग हैं।

अगर कोई फोन पर असली पैसे का ऑनलाइन जुआ खेल रहा है, तो उसे जुए के मानकों पर ही परखना चाहिए। लेकिन जो सिर्फ़ छोटे वीडियो देखता रहता है, उसे अपने आप जुआ विकार की श्रेणी में डाल देना ग़लत होगा। डब्लूएचओ ने गेमिंग डिसऑर्डर को भी मान्यता दी है, पर गेमिंग डिसऑर्डर, जुआ विकार और सामान्य स्मार्टफोन इस्तेमाल तीन अलग अवधारणाएँ हैं, और इनका फ़र्क बनाए रखना ज़रूरी है।

क्या ऐप का डिज़ाइन बदलने से फ़र्क पड़ सकता है?

कुछ हद तक, हाँ। अगर कोई ऐप फालतू नोटिफिकेशन घटाए, कंटेंट ख़त्म होने का साफ़ संकेत दे, वीडियो अपने आप चलाने की जगह अगला चुनने का मौक़ा दे और इस्तेमाल का समय समझाने की सुविधा दे, तो यूज़र को अपने व्यवहार पर ज़्यादा पकड़ मिल सकती है। ऐसे डिज़ाइन को यूज़र के हित वाला डिज़ाइन कहा जा सकता है, जिसका मक़सद आपको देर तक रोकना नहीं, बल्कि काम पूरा करके आराम से बाहर निकलने देना है।

मान लीजिए आपने सिर्फ़ एक ज़रूरी मैसेज देखने के लिए ऐप खोला। अगर वह आपको बेवजह नए कंटेंट में बहा ले जाए, तो वह आपके मूल मक़सद से भटकाना है। अगर मैसेज देखकर आराम से बंद करने दे, तो आपकी अपनी मर्ज़ी बनी रहती है। हालाँकि एक डिज़ाइन बदलाव से सारी समस्या ख़त्म नहीं होती, क्योंकि आदतें, सामाजिक हालात और इस्तेमाल का मक़सद भी मायने रखते हैं। फिर भी तकनीक को ज़िम्मेदारी से पूरी तरह बरी नहीं किया जा सकता, ख़ासकर तब जब कमाई का मॉडल ज़्यादा से ज़्यादा ध्यान खींचने पर टिका हो।

फोन पर क़ाबू कैसे पाएँ?

पहला क़दम सिर्फ़ कुल समय देखना नहीं, यह समझना है कि फोन कब, क्यों और किस मक़सद से उठा रहे हैं। रोज़ सुबह उठते ही बिना ज़रूरत सोशल मीडिया खोलना एक बात है। काम के बीच हर नोटिफिकेशन पर ध्यान भटकना दूसरी बात। और रात को वीडियो देखते-देखते नींद कम होना तीसरी। हर हालत का हल उसी के हिसाब से होना चाहिए।

एक काम का तरीक़ा है फालतू संकेत घटाना। गैरज़रूरी ऐप की नोटिफिकेशन बंद कीजिए, काम के वक़्त फोन नज़र से दूर रखिए, और सोने से पहले एक तय समय पर डिजिटल गतिविधि बंद कर दीजिए। साथ ही जिस आदत को कम करना है, उसकी जगह कोई विकल्प रखिए। जैसे ऊब होने पर फोन उठाने की जगह थोड़ा टहल आना, किताब पढ़ना या किसी से बात करना। अगर फोन का इस्तेमाल मुख्यतः तनाव से बचने के लिए हो रहा है, तो तनाव की असली वजह पर काम करना होगा।

सिर्फ़ टाइम लिमिट लगा देना सबके लिए काफ़ी नहीं होता। कई लोग लिमिट आने पर उसे हटा देते हैं। ऐसे में ऐप को आसानी से उपलब्ध न रहने देना, फोन को बेडरूम से बाहर रखना या किसी ख़ास समय में सिर्फ़ ज़रूरी संचार वाले ऐप चालू रखना ज़्यादा काम आ सकता है। पर इन तरीक़ों का असर हर इंसान पर अलग होता है। इन्हें सबके लिए पक्का इलाज न समझें।

अगर डिजिटल इस्तेमाल की वजह से पढ़ाई, नौकरी, रिश्ते, नींद या मानसिक सेहत गंभीर रूप से बिगड़ रही है और बार-बार कोशिश के बावजूद आप क़ाबू नहीं कर पा रहे, तो किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से जाँच कराना अच्छा रहेगा। अगर साथ में डिप्रेशन, तेज़ चिंता, ख़ुद को नुक़सान पहुँचाने के विचार या असली पैसे का जुआ भी शामिल हो, तो पेशेवर मदद ज़रूर लीजिए।

कुछ समय डिजिटल चीज़ें कम करने से अपनी आदतें पहचानने, ध्यान भटकाने वाले संकेत घटाने और समय का बेहतर इस्तेमाल करने में मदद ज़रूर मिल सकती है। पर इसे दिमाग से डोपामिन निकालना कहना ग़लत है, और इसके असर के बारे में सबके लिए एक जैसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। ज़्यादा काम का तरीक़ा यह है कि आप अपने डिजिटल व्यवहार को समझें और उसमें टिकाऊ बदलाव करें। कुछ दिन फोन पूरी तरह छोड़कर फिर पुरानी आदतों में लौट आना हमेशा असरदार हल नहीं होता।

एआई इस समस्या को बढ़ाएगा या घटाएगा?

एआई वाली सिफ़ारिश प्रणालियाँ आपकी पसंद और गतिविधि को पढ़कर कंटेंट को ज़्यादा निजी बना सकती हैं। इससे आपको अपने काम की चीज़ें जल्दी मिल सकती हैं। लेकिन यही क्षमता ऐसी सामग्री परोसने में भी लग सकती है जिसे आप और देर तक देखना चाहें।

अगर किसी प्लेटफ़ॉर्म का मुख्य लक्ष्य यूज़र को ज़्यादा से ज़्यादा देर तक सक्रिय रखना है, तो उसकी सिफ़ारिश प्रणाली उसी लक्ष्य को आगे बढ़ाएगी। अगर लक्ष्य यूज़र की ज़रूरत पूरी करना, भरोसेमंद जानकारी देना और फालतू इस्तेमाल घटाना है, तो वही तकनीक ज़्यादा यूज़र-हितैषी अनुभव बना सकती है।

इसलिए आगे का असली सवाल यह नहीं होगा कि एल्गोरिद्म कितना चतुर है, बल्कि यह कि उसे किस मक़सद से बनाया और चलाया गया है। क्या वह आपको आपकी ज़रूरत तक पहुँचाकर रुकने देता है, या नया कंटेंट परोसता रहता है? क्या आपको यह समझने और नियंत्रित करने का हक़ है कि आपको कंटेंट किस आधार पर दिखाया जा रहा है? क्या बच्चों और किशोरों के लिए अलग सुरक्षा इंतज़ाम हैं? ये सवाल तकनीक के साथ-साथ सार्वजनिक नीति और उपभोक्ता अधिकारों से भी जुड़े हैं।

सबसे ज़रूरी बात: आज के समाज में फोन पूरी तरह छोड़ देना ज़्यादातर लोगों के लिए न मुमकिन है, न ज़रूरी। असली चुनौती ऐसी डिजिटल आदतें बनाने की है जिनमें तकनीक आपकी ज़िंदगी की मदद करे, आपके समय और ध्यान पर बेलगाम क़ब्ज़ा न जमाए।

जुए में इंसान अगली जीत की उम्मीद में लौटता है। फोन पर वह अगली नोटिफिकेशन, अगले मैसेज या अगले मज़ेदार वीडियो की उम्मीद में लौट सकता है। दोनों की यही मनोवैज्ञानिक समानता है। पर स्वस्थ डिजिटल ज़िंदगी का मतलब हर इनाम से भागना नहीं, बल्कि यह तय कर पाना है कि कब, क्यों और कितनी देर किसी चीज़ में लगना है, और यह फ़ैसला आप ख़ुद ले सकें।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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