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QR Code History: QR कोड का काला-सफेद डिज़ाइन किसने बनाया? यह टोयोटा की एक समस्या से कैसे जन्मा
QR Code History: QR Code का आविष्कार कैसे हुआ? जानिए Toyota की फैक्ट्री की समस्या, Denso Wave के इंजीनियर Masahiro Hara, Go गेम और 1994 में बने QR Code की पूरी कहानी।
QR Code History
QR Code History: रेस्टोरेंट के मेन्यू से लेकर यूपीआई (UPI) पेमेंट तक, आज हर जगह वो छोटा-सा काला-सफेद चौकोर पैटर्न दिखता है। लेकिन इसकी कहानी न किसी स्मार्टफोन कंपनी से शुरू हुई, न किसी टेक स्टार्टअप से बल्कि टोयोटा की एक फैक्ट्री की एक बेहद रोज़मर्रा की समस्या से शुरू हुई थी, और इसका डिज़ाइन एक बोर्ड गेम खेलते वक्त दिमाग में कौंधा।
जब बारकोड फेल हो रहे थे
टोयोटा ग्रुप की सहायक कंपनी डेनसो वेव (Denso Wave) के औद्योगिक ग्राहकों जिनमें खुद पैरेंट कंपनी टोयोटा भी शामिल थी, को एक ऐसे मशीन-रीडेबल कोड की जरूरत थी जो पारंपरिक बारकोड से कहीं ज्यादा डेटा स्टोर कर सके। 1990 के दशक में एक ही तरह के प्रोडक्ट के बड़े पैमाने पर उत्पादन से हटकर ज्यादा लचीले उत्पादन की ओर बदलाव हो रहा था, जिसके चलते फैक्ट्रियों में ज्यादा बारीक और विस्तृत प्रोडक्शन कंट्रोल की जरूरत पड़ने लगी थी।
परंपरागत बारकोड सिर्फ करीब 20 अल्फान्यूमेरिक अक्षर ही स्टोर कर पाते थे। बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाली कंपनियों को किसी एक प्रोडक्ट की पूरी जानकारी स्टोर करने के लिए एक साथ कई-कई बारकोड इस्तेमाल करने पड़ते थे, जिससे स्कैनिंग की प्रक्रिया काफी धीमी हो जाती थी। इसके अलावा एक और बड़ी दिक्कत यह थी कि बारकोड अमेरिका में बनी तकनीक थी, इसलिए यह जापानी कांजी अक्षरों को सपोर्ट ही नहीं करती थी।
इंजीनियर मासाहिरो हारा को मिला यह चैलेंज
1992 में डेनसो (Denso) के डेवलपमेंट डिपार्टमेंट (जो बाद में Denso Wave बना) में इंजीनियर मासाहिरो हारा को ऑटोमोटिव पार्ट्स को कुशलता से ट्रैक करने के लिए एक नया 2D कोड बनाने का जिम्मा सौंपा गया। कुछ सूत्रों के मुताबिक हारा ने पहले मौजूदा बारकोड की क्षमता ही बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए।
एक लंच ब्रेक जिसने पूरा आइडिया बदल दिया
यहां आती है इस कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़। एक दिन लंच के समय गो (Go) नाम का बोर्ड गेम खेलते हुए हारा को यह अहसास हुआ कि काले और सफेद पत्थरों (काउंटर्स) का पैटर्न भी जानकारी को कोड कर सकता है। गो बोर्ड गेम की इसी इमेज ने QR कोड के मूल आइडिया की नींव रखी।
इसके बाद हारा ने नए कोड पर काम शुरू किया। इस बार यह किसी सीधी रेखा (बार) जैसा नहीं, बल्कि एक चौकोर आकार में था, जो गो के बोर्ड जैसे पिक्सेल-पैटर्न से भरा हुआ था।
रीडेबिलिटी की गहरी साइंस भी है इसके पीछे
क्यू आर (QR) कोड सिर्फ एक रैंडम काले-सफेद पैटर्न जैसा दिखता जरूर है, लेकिन इसके पीछे बारीक गणितीय सोच है। हारा ने यह भी शोध किया कि पोजीशन पैटर्न (जिससे मशीन कोड को सही से पहचानती है) के लिए किस अनुपात का इस्तेमाल किया जाए, ताकि उसे सटीक तरीके से पढ़ा जा सके। यह पोजीशन डिटेक्शन मार्कर का पैटर्न प्रिंटेड सामग्री पर सबसे कम इस्तेमाल होने वाले काले-सफेद क्रम को खोजकर तय किया गया, जो 1:1:3:1:1 का अनुपात निकला। यही अनोखा अनुपात है जो QR कोड के तीन कोनों में बने खास चौकोर निशान (finder pattern) बनाता है, जिससे कैमरा किसी भी एंगल से कोड को तुरंत पहचान लेता है।
हारा को उम्मीद थी कि 1D (एक-आयामी) कोड जल्द ही अपनी तकनीकी सीमा तक पहुंच जाएंगे, इसलिए उन्होंने ऐसा 2D (द्वि-आयामी) कोड बनाने का फैसला किया जिसे हाई-स्पीड में पढ़ा जा सके। डेढ़ साल की मेहनत के बाद, हारा और उनकी सिर्फ दो-सदस्यीय टीम ने 1994 में पूरी तरह तैयार क्विक रिस्पांस Quick Response (QR) कोड बना लिया।
QR कोड की ताकत, बारकोड से 100 गुना ज्यादा डेटा
यह छोटा-सा, दो-आयामी बारकोड पारंपरिक बारकोड के मुकाबले 100 गुना से भी ज्यादा डेटा स्टोर कर सकता था, किसी भी एंगल से पढ़ा जा सकता था, और गंदगी या मामूली नुकसान होने पर भी काम करता रहता था।क्योंकि इसमें रीड-सोलोमन एरर करेक्शन जैसी तकनीक शामिल थी, जो डैमेज होने पर भी डेटा को रिकवर कर लेती है।
QR कोड आज दुनिया भर में मुफ्त इस्तेमाल हो पाता है, इसकी वजह एक असाधारण फैसला है। Denso Wave को इसे मुनाफे के लिए पेटेंट कराने के बजाय, हारा और उनकी टीम ने इस तकनीक को सार्वजनिक रूप से जारी करने का फैसला किया, ताकि कोई भी इसे मुफ्त में इस्तेमाल कर सके। 2020 में द गार्डियन को दिए एक इंटरव्यू में हारा ने मज़ाक में कहा था - "हर बार QR कोड इस्तेमाल होने पर हमें कोई कमीशन नहीं मिलता, काश ऐसा होता"।
शुरुआत में सिर्फ फैक्ट्री तक सीमित था, आज हर जेब में है
शुरुआत में QR कोड सिर्फ ऑटोमोटिव इंडस्ट्री के लिए इन्वेंट्री मैनेजमेंट और पार्ट्स ट्रैकिंग तक सीमित था। यह 1994 में बनने के बाद 2000 के दशक के मध्य तक वैश्विक स्तर पर अपनाया जाने लगा, हालांकि इस बीच कई सालों तक इसे लेकर संदेह भी बना रहा। कोविड-19 महामारी ने इसे आखिरी बड़ा धक्का दिया — मेन्यू, पेमेंट और कॉन्टैक्ट-लेस वेरिफिकेशन के लिए QR कोड लगभग हर जगह जरूरी हो गया।
QR कोड को यह नाम 8 अगस्त को दिया गया था और दिलचस्प बात यह है कि यह तारीख खुद मासाहिरो हारा का जन्मदिन भी है।
आज जब आप किसी दुकान पर QR कोड स्कैन करके पेमेंट करते हैं, तो असल में आप 30 साल पुरानी एक कहानी का हिस्सा बन रहे होते हैं जहां टोयोटा की फैक्ट्री की एक रोज़मर्रा की समस्या, एक इंजीनियर का लंच ब्रेक में खेला गया बोर्ड गेम, और मुनाफे से ज्यादा सार्वजनिक भलाई को तरजीह देने का एक असाधारण फैसला - इन तीनों ने मिलकर आज की डिजिटल दुनिया के सबसे जरूरी टूल्स में से एक को जन्म दिया।


