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Internet History: घर-घर इंटरनेट पहुंचाने वाले वैज्ञानिक कौन थे? DSL, Ethernet और Wi-Fi की कहानी
Internet History Explained: इंटरनेट को घर-घर पहुंचाने के पीछे किन वैज्ञानिकों और इंजीनियरों का योगदान रहा? जानिए TCP/IP, Ethernet, DSL, Cable Modem, Wi-Fi और Web की पूरी कहानी।
Internet History Explained in Hindi
Internet History: आज घर में इंटरनेट होना उतना ही सामान्य है जितना बिजली या पानी का कनेक्शन। मोबाइल में वीडियो चलता है, टीवी पर फिल्म आती है, बच्चे ऑनलाइन पढ़ते हैं, ऑफिस का काम घर से होता है और कुछ ही सेकंड में दुनिया के किसी कोने में बैठे व्यक्ति से बात हो जाती है। लेकिन अगर आप करीब 30 साल पीछे जाएं तो तस्वीर बिल्कुल अलग थी। घर में इंटरनेट होना किसी खास सुविधा की तरह माना जाता था और ज्यादातर लोगों के लिए इंटरनेट का मतलब था कंप्यूटर, टेलीफोन की तार और एक ऐसी आवाज जो कनेक्शन बनते समय बहुत अजीब तरीके से सुनाई देती थी।
फिर कुछ ही वर्षों में सब बदल गया। पहले डायल-अप आया, फिर तेज इंटरनेट की सुविधा फोन की पुरानी तारों तक पहुंची, उसके बाद केबल और फाइबर आए और फिर वाई-फाई ने घर के भीतर इंटरनेट को तारों से आजाद कर दिया। आज हम मोबाइल लेकर घर के एक कमरे से दूसरे कमरे तक घूमते हैं और इंटरनेट हमारे साथ चलता है।
लेकिन इस पूरी यात्रा में कुछ ऐसे लोग थे जिनके नाम आमतौर पर इंटरनेट के इतिहास में बहुत पीछे छूट जाते हैं। कोई यह तय कर रहा था कि अलग-अलग कंप्यूटर एक-दूसरे से कैसे बात करेंगे, कोई ऐसी तकनीक बना रहा था जिससे पुरानी टेलीफोन तार से तेज इंटरनेट चल सके, कोई कंप्यूटरों को एक ही इमारत में जोड़ने का तरीका खोज रहा था और कोई रेडियो तरंगों के जरिए बिना तार के इंटरनेट पहुंचाने की कोशिश कर रहा था।
अगर आज इंटरनेट आपके घर की दीवारों के भीतर इतनी आसानी से पहुंचता है, तो उसके पीछे इन गुमनाम या कम चर्चित लोगों की लंबी कहानी है।
इंटरनेट और वेब एक ही चीज नहीं हैं
इंटरनेट दुनिया भर के कंप्यूटर और दूसरे उपकरणों को जोड़ने वाला विशाल नेटवर्क है। इसके ऊपर चलने वाली सेवाओं में वर्ल्ड वाइड वेब भी एक सेवा है। वेबसाइट खोलना, किसी लिंक पर क्लिक करना और वेब पेज देखना वेब का हिस्सा है। ईमेल, कई तरह की ऑनलाइन सेवाएं और दूसरे संचार माध्यम इंटरनेट पर चल सकते हैं, लेकिन वे खुद इंटरनेट नहीं हैं।
वर्ल्ड वाइड वेब बनाने का श्रेय टिम बर्नर्स-ली को दिया जाता है। उन्होंने 1989 में सीईआरएन में इसके लिए प्रस्ताव तैयार किया और 1990 तक पहला वेब सर्वर और ब्राउजर तैयार कर लिया था। 1993 में सीईआरएन ने वेब सॉफ्टवेयर को सार्वजनिक कर दिया, जिससे उसके तेजी से फैलने का रास्ता खुला। लेकिन वेब बनने से पहले भी इंटरनेट की नींव तैयार हो चुकी थी। और घरों तक इंटरनेट पहुंचाने के लिए उसके बाद भी बहुत काम होना बाकी था।
सबसे पहले समस्या थी, अलग-अलग नेटवर्क आपस में बात कैसे करें?
1970 के दशक में कंप्यूटर नेटवर्क तेजी से विकसित हो रहे थे। समस्या यह थी कि अलग-अलग नेटवर्क अपनी अलग भाषा और नियमों पर काम करते थे। एक नेटवर्क से दूसरे नेटवर्क तक जानकारी भेजना आसान नहीं था।
यहीं रॉबर्ट कान और विंट सर्फ का काम बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने 1970 के दशक में ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर काम किया जिससे अलग-अलग नेटवर्क आपस में जुड़ सकें। यही काम आगे चलकर टीसीपी/आईपी से जुड़ा, जो आधुनिक इंटरनेट की बुनियादी तकनीकों में से एक बना। 1977 में अलग-अलग नेटवर्कों को जोड़कर इसका व्यावहारिक प्रदर्शन भी किया गया।
इसे बहुत आसान भाषा में ऐसे समझिए। अगर दुनिया के अलग-अलग शहरों में अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोग हैं, तो किसी को ऐसा नियम बनाना होगा जिससे वे एक-दूसरे को समझ सकें। इंटरनेट के शुरुआती दौर में टीसीपी/आईपी ने कुछ ऐसा ही काम किया। लेकिन अभी एक बड़ी समस्या बाकी थी। कंप्यूटर एक-दूसरे से बात तो कर सकते थे, मगर घर के अंदर मौजूद कंप्यूटर को नेटवर्क से जोड़ेंगे कैसे?
बॉब मेटकॉफ और डेविड बोग्स ने कंप्यूटरों को कमरे के भीतर जोड़ने का रास्ता बनाया
1970 के दशक की शुरुआत में अमेरिका की जेरॉक्स कंपनी की रिसर्च प्रयोगशाला पीएआरसी में भविष्य के कंप्यूटर और ऑफिस की कल्पना की जा रही थी। वहां वैज्ञानिक चाहते थे कि एक ही इमारत में मौजूद कंप्यूटर आपस में जानकारी साझा कर सकें।
इस काम में बॉब मेटकॉफ और डेविड बोग्स का नाम सामने आता है। दोनों ने मिलकर ईथरनेट विकसित किया, जिसने एक ही जगह के भीतर मौजूद कंप्यूटरों को नेटवर्क से जोड़ने का व्यावहारिक तरीका दिया। कंप्यूटर हिस्ट्री म्यूजियम के अनुसार ईथरनेट आगे चलकर इंटरनेट की बुनियादी “पाइपलाइन” जैसी तकनीकों में बदल गया।
1973 में मेटकॉफ ने ईथरनेट से संबंधित अपना शुरुआती प्रस्ताव तैयार किया था। उस समय उनका काम मुख्य रूप से यह सुनिश्चित करना था कि एक इमारत में रखे कई कंप्यूटर आपस में तेजी से सूचना साझा कर सकें।
आज हम कंप्यूटर को राउटर से जोड़ते हैं और यह बात इतनी सामान्य लगती है कि इसके पीछे की तकनीक पर ध्यान ही नहीं जाता। लेकिन उस समय यह एक बड़ी समस्या थी। यही ईथरनेट आगे चलकर ऑफिस, स्कूल, विश्वविद्यालय और डेटा सेंटरों के नेटवर्क का महत्वपूर्ण आधार बना।
फिर सवाल आया, घर में इंटरनेट कैसे पहुंचे?
ऑफिस में कंप्यूटर जोड़ना एक बात थी, लेकिन करोड़ों घरों तक तेज इंटरनेट पहुंचाना बिल्कुल दूसरी चुनौती थी।
1990 के दशक के मध्य तक घरों में इंटरनेट का सबसे आम रास्ता डायल-अप था। कंप्यूटर में मॉडेम लगाया जाता था, वह टेलीफोन लाइन से जुड़ता था और इंटरनेट कनेक्शन बनाते समय फोन लाइन का इस्तेमाल करता था। अमेरिकी संचार नियामक एफसीसी के ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार 1994 में बहुत कम अमेरिकी घरों में इंटरनेट था और जिन घरों में था, वहां आमतौर पर 14 या 28 किलोबिट प्रति सेकंड वाला डायल-अप कनेक्शन होता था। यह बहुत धीमा था। एक फोन लाइन पर इंटरनेट चल रहा हो तो उसी समय सामान्य फोन कॉल करना भी संभव नहीं होता था। अब वैज्ञानिकों के सामने एक बेहद दिलचस्प चुनौती थी। क्या वही पुरानी तांबे की टेलीफोन तार, जिसे हम आवाज के लिए इस्तेमाल करते हैं, इंटरनेट का बहुत ज्यादा डेटा भी ले जा सकती है?
जॉन चियोफी ने पुरानी टेलीफोन तार में तेज इंटरनेट का रास्ता खोजा
इस कहानी में जॉन चियोफी का नाम खास तौर पर महत्वपूर्ण है। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय उन्हें डीएसएल का “पिता” कहता है। उनका काम उस तकनीक को विकसित करने में महत्वपूर्ण था जिसने सामान्य टेलीफोन लाइन को तेज डिजिटल डेटा भेजने के लिए इस्तेमाल करने का रास्ता खोला। यह विचार बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि इसके लिए हर घर में नई इंटरनेट तार बिछाने की जरूरत नहीं थी। घरों में पहले से मौजूद तांबे की फोन लाइन का इस्तेमाल किया जा सकता था।
1990 के दशक के मध्य से टेलीफोन कंपनियां डीएसएल सेवा देने लगीं। एफसीसी के दस्तावेज के अनुसार कुछ अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मदद से पुरानी टेलीफोन लाइन को तेज डेटा पहुंचाने के माध्यम में बदला जा सकता था। यानी जिस तार का इस्तेमाल दशकों से सिर्फ फोन करने के लिए होता था, वही तार इंटरनेट की तेज सड़क बन गई। जॉन चियोफी और उनके सहयोगियों ने आगे डीएसएल मॉडेम पर भी काम किया। स्टैनफोर्ड के अनुसार उनके समूह की तकनीक ने ऐसी गति हासिल की जो उस समय के लिए बहुत बड़ी छलांग थी।
आज जब घर में फाइबर लगा है और एक सेकंड में बड़ी फाइल डाउनलोड हो जाती है, तब यह कल्पना करना मुश्किल है कि कभी इंटरनेट के लिए फोन की तार को ही नई तकनीक की तरह इस्तेमाल किया गया था।
केबल टीवी की तार भी इंटरनेट की सड़क बन गई
इसी दौर में एक दूसरा रास्ता भी खुला। अमेरिका में करोड़ों घरों तक केबल टीवी की तार पहले से पहुंच चुकी थी। सवाल उठा कि अगर उस तार से टीवी चैनल आ सकते हैं तो क्या इंटरनेट भी आ सकता है?
जवाब फिर हां था। 1990 के दशक के मध्य में केबल कंपनियों ने इंटरनेट पहुंचाने के लिए केबल मॉडेम का इस्तेमाल शुरू किया। एफसीसी के रिकॉर्ड के अनुसार 1996 में केबल ऑपरेटर इंटरनेट सेवा और केबल टीवी को जोड़ने लगे थे और बड़ी संख्या में केबल मॉडेम के ऑर्डर दिए जा रहे थे।
इससे घर के इंटरनेट की दुनिया बदलने लगी। डायल-अप के मुकाबले तेज कनेक्शन उपलब्ध होने लगे और इंटरनेट धीरे-धीरे किसी प्रयोग या शौक की चीज से रोजमर्रा की सुविधा बनने लगा। लेकिन अभी भी घर के भीतर एक समस्या थी। इंटरनेट घर में आ तो गया, मगर कंप्यूटर को तार से जोड़ना पड़ता था।
फिर आए वे लोग जिन्होंने इंटरनेट की तार काट दी
आज वाई-फाई इतना सामान्य है कि घर में इंटरनेट का मतलब ही कई लोगों के लिए वाई-फाई हो गया है। लेकिन वाई-फाई भी अचानक पैदा नहीं हुआ।
वाई-फाई की नींव में कई अलग-अलग शोधकर्ताओं और तकनीकों का योगदान रहा। 1997 में IEEE ने 802.11 नाम का पहला वाई-फाई मानक प्रकाशित किया। शुरुआती संस्करण 2.4 गीगाहर्ट्ज रेडियो स्पेक्ट्रम पर काम करता था और उसकी अधिकतम सैद्धांतिक गति 2 मेगाबिट प्रति सेकंड थी।
इस कहानी में ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक जॉन ओ'सुलिवन और उनके सहयोगियों का नाम खास तौर पर आता है। कॉमनवेल्थ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च ऑर्गनाइजेशन यानी सीएसआईआरओ में उनकी टीम ने तेज वायरलेस नेटवर्क के लिए महत्वपूर्ण तकनीक विकसित की। जॉन ओ'सुलिवन के साथ डेविड स्केलन और टेरेंस पर्सिवल का काम भी इस विकास में महत्वपूर्ण था।
इन लोगों का काम उस तकनीक को विकसित करने में महत्वपूर्ण था जिसके कारण कंप्यूटर और बाद में मोबाइल उपकरण बिना तार के स्थानीय नेटवर्क से जुड़ सके। यानी आज आपका मोबाइल राउटर से बिना किसी तार के बात कर रहा है तो उसके पीछे दशकों का रेडियो और नेटवर्क अनुसंधान छिपा है।
हे़डी लैमर की कहानी भी इसी सफर का एक हिस्सा है
वाई-फाई के इतिहास में एक और बेहद दिलचस्प नाम आता है, हे़डी लैमर का। वह हॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री थीं, लेकिन उनके पास संचार तकनीक से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विचार भी था।
1942 में हे़डी लैमर और संगीतकार जॉर्ज एंथाइल ने “फ्रीक्वेंसी हॉपिंग” पर आधारित एक संचार प्रणाली का पेटेंट कराया था। उनका मूल उद्देश्य रेडियो नियंत्रित टॉरपीडो के संकेतों को दुश्मन द्वारा बाधित किए जाने से बचाना था। यह आज के वाई-फाई का सीधा आविष्कार नहीं था, लेकिन बाद की वायरलेस तकनीकों के विकास की लंबी कहानी में इसे एक महत्वपूर्ण पूर्ववर्ती विचार माना जाता है। IEEE के अनुसार शुरुआती 802.11 मानक ने भी फ्रीक्वेंसी-हॉपिंग तकनीक का इस्तेमाल किया था। सही बात यह है कि उनका काम आधुनिक वायरलेस संचार के इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी था।
और फिर वाई-फाई को घर तक पहुंचाने वालों की दूसरी टीम आई
किसी तकनीक को सफल होने के लिए एक समान मानक चाहिए। अलग-अलग कंपनियां अगर अलग-अलग तरीके से वायरलेस नेटवर्क बनातीं तो एक कंपनी का फोन दूसरे कंपनी के राउटर से ठीक से बात नहीं कर पाता।
यहीं IEEE 802.11 मानकों की भूमिका सामने आती है। इसके बाद अलग-अलग कंपनियों के उपकरणों को एक साझा नियम के तहत काम करने का रास्ता मिला। 1999 में 802.11b के आने से सैद्धांतिक गति 11 मेगाबिट प्रति सेकंड तक पहुंची और उसी साल एप्पल ने अपने एयरपोर्ट बेस स्टेशन और आईबुक में वाई-फाई को उपभोक्ता बाजार में जोर से आगे बढ़ाया। यहीं से वायरलेस इंटरनेट आम लोगों की जिंदगी में तेजी से दिखाई देने लगा।
असली कमाल किसी एक व्यक्ति का नहीं था
अब अगर इस पूरी कहानी को एक साथ देखें तो इंटरनेट घर तक पहुंचाने का काम किसी एक महान वैज्ञानिक ने नहीं किया।
एक समूह ने कंप्यूटरों के बीच जानकारी भेजने के नियम बनाए। दूसरे लोगों ने अलग-अलग नेटवर्कों को जोड़ने की व्यवस्था तैयार की। बॉब मेटकॉफ और डेविड बोग्स जैसे लोगों ने स्थानीय नेटवर्किंग के लिए ईथरनेट विकसित किया। जॉन चियोफी और उनके सहयोगियों ने पुरानी टेलीफोन तार पर तेज डिजिटल डेटा भेजने का रास्ता मजबूत किया। केबल कंपनियों और तकनीकी विशेषज्ञों ने टीवी नेटवर्क को इंटरनेट पहुंचाने के लिए इस्तेमाल किया। जॉन ओ'सुलिवन और उनके सहयोगियों ने तेज वायरलेस नेटवर्किंग के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। और फिर IEEE जैसे संगठनों ने अलग-अलग कंपनियों की तकनीकों को साझा मानकों में बदलने में मदद की। इसके ऊपर टिम बर्नर्स-ली ने वेब बनाया, जिससे इंटरनेट पर जानकारी को वेबसाइट और लिंक के रूप में देखना आसान हुआ।
घर का इंटरनेट असल में कई तकनीकों की सीढ़ी है
आज जब हम अपने घर में राउटर लगाते हैं तो हमें सिर्फ एक छोटा सा डिब्बा दिखाई देता है। लेकिन उस डिब्बे के भीतर और उसके पीछे कई दशक का विज्ञान छिपा है।
इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनी के नेटवर्क से डेटा आपके घर तक किसी फाइबर, केबल, वायरलेस लिंक या दूसरे माध्यम से पहुंच सकता है। घर का राउटर उस कनेक्शन को आपके फोन, टीवी, लैपटॉप और दूसरे उपकरणों तक पहुंचाता है। वाई-फाई रेडियो तरंगों के जरिए आपके उपकरण और राउटर के बीच जानकारी भेजता है।
इस पूरी प्रक्रिया में इंटरनेट का मूल ढांचा, स्थानीय नेटवर्क, डेटा भेजने के नियम, तारों के जरिए संचार, रेडियो संचार और वेब जैसी अलग-अलग परतें एक साथ काम करती हैं। यानी आपके फोन पर चल रहा एक छोटा सा वीडियो वास्तव में एक बहुत लंबी यात्रा कर रहा होता है।
इन वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या थी?
शायद सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं थी कि उन्होंने इंटरनेट को तेज बना दिया। सबसे बड़ा बदलाव यह था कि उन्होंने ऐसी तकनीकें बनाईं जो पहले से मौजूद चीजों का नया इस्तेमाल कर सकें। पुरानी टेलीफोन तार पहले आवाज के लिए थी, उसे डेटा की सड़क बनाया गया। केबल टीवी की तार पहले टीवी चैनल पहुंचाती थी, वही इंटरनेट की सड़क बन गई। कंप्यूटरों को जोड़ने वाली स्थानीय नेटवर्क तकनीक आगे चलकर दुनिया के विशाल नेटवर्क ढांचे का हिस्सा बनी।
रेडियो तरंगों का इस्तेमाल पहले से हो रहा था, लेकिन उन्हें इस तरह इस्तेमाल किया गया कि घर में मौजूद फोन और कंप्यूटर बिना तार के एक-दूसरे से जुड़ सकें।
यही कारण है कि इंटरनेट का इतिहास सिर्फ कंप्यूटर का इतिहास नहीं है। यह तार, रेडियो, गणित, इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर और मानकों के एक साथ विकसित होने की कहानी है।
शायद सबसे दिलचस्प बात यही है
आज इंटरनेट की दुनिया में सबसे ज्यादा दिखाई देने वाले नाम गूगल, एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा और दूसरी बड़ी कंपनियों के हैं। लेकिन जिस जमीन पर ये कंपनियां खड़ी हैं, वह कई ऐसे वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने तैयार की थी जिन्हें आम लोग शायद पहचानते भी नहीं।
किसी ने यह तय किया कि डेटा छोटे हिस्सों में भेजा जा सकता है। किसी ने अलग-अलग नेटवर्कों को जोड़ने का तरीका बनाया। किसी ने कंप्यूटरों को एक इमारत के भीतर जोड़ दिया। किसी ने सोचा कि पुरानी फोन की तार से इंटरनेट चल सकता है। किसी ने रेडियो तरंगों के जरिए तेज डेटा भेजने का तरीका खोजा। किसी ने इन तकनीकों के लिए ऐसे नियम बनाए कि दुनिया की अलग-अलग कंपनियों के उपकरण एक-दूसरे से बात कर सकें।
और फिर इन सभी तकनीकों के ऊपर वेब आया, जिसने इंटरनेट को आम इंसान के लिए समझने और इस्तेमाल करने लायक बना दिया। इसलिए जब अगली बार घर में वाई-फाई का संकेत कमजोर हो और हम राउटर को घूरते हुए कहें कि इंटरनेट फिर नहीं चल रहा, तो याद रखना चाहिए कि उस छोटे से राउटर के पीछे करीब आधी सदी की वैज्ञानिक मेहनत खड़ी है।


