स्मार्टफोन के बाद क्या बदलेगा? स्मार्ट ग्लास और Neural Wristband ला रहे हैं स्क्रीन से आगे की दुनिया

Future of Smartphones: स्मार्ट ग्लास, AI और Neural Wristband कैसे स्मार्टफोन के इस्तेमाल का तरीका बदल सकते हैं? जानिए स्क्रीन-फ्री कंप्यूटिंग, EMG तकनीक, स्मार्ट ग्लास, AI और प्राइवेसी से जुड़े भविष्य के सवाल।

Neel Mani Lal
Published on: 28 Sept 2026 6:37 PM IST
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Future of Smartphones: सुबह उठते ही हाथ मोबाइल की तरफ जाता है। कोई मैसेज आया है या नहीं, रात में कितने मेल आए, मौसम कैसा है, रास्ते में कितना समय लगेगा, किसी शब्द का मतलब क्या है, सामने खड़ी इमारत कौन सी है, फोटो खींचनी है या किसी को जवाब देना है, इन छोटे-छोटे कामों के लिए भी हम जेब से स्मार्टफोन निकालते हैं। स्मार्टफोन ने दुनिया की लगभग हर डिजिटल चीज को एक छोटी सी चमकती स्क्रीन के पीछे समेट दिया है।

लेकिन तकनीक की अगली बड़ी छलांग शायद इसी स्क्रीन को हमारे सामने से हटाने की कोशिश कर रही है।

कल्पना कीजिए कि आप सड़क पर चल रहे हैं और रास्ता पूछने के लिए फोन निकालने की जरूरत नहीं है। चश्मे के सामने ही अगला मोड़ दिखाई दे जाए। किसी विदेशी भाषा का बोर्ड देखें तो उसका मतलब आपकी आंखों के सामने आ जाए। कोई संदेश आए तो चश्मा उसे बता दे। फोटो खींचनी हो तो फोन निकालने की जरूरत न पड़े। और अगर आपको किसी चीज को चुनना या स्क्रॉल करना हो, तो स्क्रीन छूने के बजाय कलाई पर उंगली का बहुत छोटा सा इशारा ही काफी हो।

यह विज्ञान कथा नहीं रह गई है। 2025 में Meta ने Ray-Ban Display के साथ Meta Neural Band पेश किया, जिसमें कलाई पर पहना जाने वाला ईएमजी बैंड मांसपेशियों से पैदा होने वाले बेहद छोटे विद्युत संकेतों को पढ़कर चश्मे के लिए डिजिटल आदेश में बदलता है। 2026 में Google और Samsung भी Android XR आधारित बुद्धिमान चश्मों को अगले मोबाइल इंटरफेस की दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं।

यानी भविष्य का सवाल शायद यह नहीं है कि “अगला फोन कैसा होगा?” बल्कि यह है कि क्या अगली पीढ़ी में फोन की स्क्रीन को देखने की जरूरत ही कम हो जाएगी?

फोन गायब नहीं होगा, लेकिन फोन देखने की आदत बदल सकती है

मौजूदा स्मार्ट ग्लास खुद फोन पर काफी हद तक निर्भर हैं। Google के Android XR ग्लास फोन के साथ मिलकर काम करते हैं और Meta के कई पहनने योग्य उपकरण भी मोबाइल और क्लाउड सेवाओं से जुड़े रहते हैं। सैमसंग ने भी साफ कहा है कि उसका उद्देश्य मोबाइल फोन को सीधे खत्म करना नहीं, बल्कि लोगों को फोन कम इस्तेमाल करने में मदद करना है। यानी फ़िलवक्त फोन जेब में रहेगा, लेकिन हर छोटे काम के लिए उसकी स्क्रीन खोलने की जरूरत नहीं होगी।

आज स्मार्टफोन एक साथ कैमरा, नक्शा, टीवी, रेडियो, किताब, बैंक, टिकट, संदेश बॉक्स, शब्दकोश और निजी सहायक है। लेकिन इनमें से बहुत सारे कामों के लिए वास्तव में बड़ी स्क्रीन की जरूरत नहीं होती। रास्ता बताने के लिए केवल अगला मोड़ जानना है। किसी संदेश का जवाब देने के लिए आवाज या छोटा इशारा काफी हो सकता है। मौसम जानने के लिए पूरा ऐप खोलने की जरूरत नहीं है। यहीं से स्क्रीन के बाद की कंप्यूटिंग की शुरुआत होती है।

स्मार्ट ग्लास असल में क्या बदलेंगे?

आज का स्मार्टफोन हमें दुनिया से हटाकर स्क्रीन के भीतर ले जाता है। आप सड़क पर हैं, लेकिन अचानक आपका ध्यान फोन की स्क्रीन पर चला जाता है। स्मार्ट ग्लास इसका उलटा मॉडल अपनाते हैं। जानकारी आपकी दुनिया के ऊपर एक छोटी डिजिटल परत की तरह आ सकती है।

गूगल एंड्रॉइड एक्सआर के लिए जिन चश्मों पर काम कर रहा है, उनमें कैमरा, माइक्रोफोन और स्पीकर के साथ वैकल्पिक लेंस डिस्प्ले की बात की गई है। जेमिनी जैसे एआई सहायक के साथ ये चश्मे उपयोगकर्ता के आसपास की चीजों को देखकर, सुनकर और संदर्भ समझकर मदद कर सकते हैं। गूगल ने इसके उदाहरणों में संदेश भेजना, दिशा बताना, फोटो लेना और वास्तविक समय में भाषा का अनुवाद दिखाया है।

मेटा का रास्ता भी इसी दिशा में है। रे बैन डिस्प्ले में चश्मे के लेंस में छोटा रंगीन डिस्प्ले है, जिसे जरूरत के समय देखा जा सकता है। कंपनी के अनुसार इसका उद्देश्य लगातार स्क्रीन देखते रहना नहीं, बल्कि छोटे-छोटे कामों के लिए फोन निकालने की जरूरत कम करना है। 2026 में इसमें हाथों से मुक्त दिशा-निर्देशन और दूसरी सुविधाएं भी जोड़ी गई हैं। यह फर्क बहुत बड़ा है। आज हम डिजिटल दुनिया में जाने के लिए फोन खोलते हैं। भविष्य के चश्मे में डिजिटल जानकारी हमारे आसपास की दुनिया में ही आ सकती है।

सबसे दिलचस्प चीज चश्मा नहीं, कलाई पर बंधा छोटा बैंड है

अगर स्क्रीन आंखों के सामने है तो अगला सवाल है, उसे नियंत्रित कैसे किया जाए? फोन में हम उंगली से स्क्रीन छूते हैं। लेकिन चश्मे को हर बार छूना असुविधाजनक होगा। आवाज से हर काम करना भी हमेशा संभव नहीं है। भीड़ में खड़े होकर कोई निजी संदेश बोलना अजीब हो सकता है। मीटिंग में बार-बार बोलकर चश्मे को आदेश देना भी व्यावहारिक नहीं होगा।

इस समस्या के लिए मेटा ने EMG यानी इलेक्ट्रोमायोग्राफी आधारित न्यूरल बैंड बनाया है। यह दिमाग को सीधे पढ़ने वाला उपकरण नहीं है। यह कलाई और हाथ की मांसपेशियों में होने वाली विद्युत गतिविधि को पढ़ता है। जब आप उंगली को बहुत हल्के से हिलाने या टैप करने की कोशिश करते हैं, तो मांसपेशियों में ऐसे संकेत बनते हैं जिन्हें सेंसर पहचान सकता है। मशीन लर्निंग इन संकेतों को डिजिटल आदेश में बदल देती है। यानी आप चश्मे के सामने दिखाई दे रहे विकल्पों को देखने के बाद कलाई पर बहुत हल्का इशारा कर सकते हैं और चयन हो सकता है।

इसे ऐसे समझिए: आंखें स्क्रीन बन रही हैं, कान आवाज का रास्ता बन रहे हैं और कलाई माउस तथा टचस्क्रीन का काम करने लगती है।

और यह तकनीक केवल सुविधा के लिए नहीं है। मेटा और कार्नेगी यूनिवर्सिटी इसके इस्तेमाल को उन लोगों के लिए भी तलाश रहे हैं जिन्हें हाथों की सामान्य गतिविधियों में कठिनाई होती है। EMG आधारित बैंड से कुछ ऐसे लोग भी डिजिटल उपकरणों को नियंत्रित कर सके जिनके हाथों की गति लंबे समय से सीमित थी।

इसे “न्यूरल” क्यों कहा जाता है?

“Neural Band” नाम सुनकर लग सकता है कि यह दिमाग की तरंगें पढ़ता है। लेकिन यह बैंड सीधे दिमाग से संकेत नहीं पढ़ता। यह सतह से मांसपेशियों की विद्युत गतिविधि यानी EMG को पढ़ता है। इसका मतलब यह है कि अभी हमें अपने विचारों को सीधे डिजिटल आदेश में बदलने के लिए कोई छोटा कलाई बैंड पहन लेने की जरूरत नहीं है।

फिर भी इसकी खासियत कम नहीं है। आपकी उंगली कोई बड़ा इशारा किए बिना हल्का सा हिलती है और मांसपेशियों में पैदा हुआ संकेत सेंसर तक पहुंच जाता है। कंप्यूटर उस संकेत को समझता है और चश्मे को बताता है कि आपने क्या करना चाहा। मेटा का कहना है कि उसका सिस्टम ऐसे सूक्ष्म संकेतों को भी पकड़ सकता है जो आंखों से दिखाई देने वाली बड़ी हरकत बनने से पहले ही पैदा हो जाते हैं। भविष्य में यही तकनीक डिजिटल उपकरणों को नियंत्रित करने का तरीका बदल सकती है।

असली बदलाव तब होगा जब एआई चश्मे को “समझने” लगेगा

स्मार्ट ग्लास का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शायद कैमरा या डिस्प्ले भी नहीं है। वह एआई है।

आज अगर आप किसी ऐतिहासिक इमारत के सामने खड़े हैं और उसके बारे में जानना चाहते हैं तो फोन निकालकर फोटो खींच सकते हैं, इंटरनेट खोल सकते हैं, नाम खोज सकते हैं और फिर जानकारी पढ़ सकते हैं।

भविष्य के एआई चश्मे में आप सिर्फ पूछ सकते हैं, “यह इमारत क्या है?”

चश्मा कैमरे से सामने की चीज देख सकता है, एआई उसे पहचान सकता है और जवाब कान में सुना सकता है। जरूरत हो तो छोटी जानकारी आंखों के सामने भी दिखाई जा सकती है।

गूगल पहले ही ऐसे उपयोग के उदाहरण दिखा चुका है, जिसमें जेमिनी चश्मे के कैमरे और माइक्रोफोन से आसपास के संदर्भ को समझकर मदद करता है। कंपनी ने वास्तविक दुनिया में अनुवाद और दिशा-निर्देशन जैसे प्रयोग भी दिखाए हैं। इसका अर्थ यह है कि इंटरनेट अब केवल ऐसी जगह नहीं रहेगा जहां हम जाते हैं। वह धीरे-धीरे उस वातावरण की परत बन सकता है जिसमें हम पहले से मौजूद हैं।

स्क्रीन की जगह “नजर” ले सकती है

स्मार्टफोन का पूरा डिजाइन एक छोटी आयताकार स्क्रीन के आसपास बना है। हम उसे जेब से निकालते हैं, नीचे देखते हैं, उंगली से छूते हैं और फिर वापस रख देते हैं।

स्मार्ट ग्लास इस प्रक्रिया को तोड़ देते हैं। आपको किसी ऐप को खोलने की जरूरत नहीं हो सकती। जरूरत के समय जानकारी सामने आ सकती है। रास्ता पूछने के लिए नक्शा खोलने की जरूरत नहीं, क्योंकि अगले मोड़ का संकेत आपकी नजर के सामने हो सकता है। भाषा समझने के लिए अनुवाद ऐप खोलने की जरूरत नहीं, क्योंकि सामने लिखे शब्दों का अर्थ उसी जगह दिखाई दे सकता है।

गूगल ने इंटेलिजेंट चश्मों के दो रूप बताए हैं: ऐसे चश्मे जो मुख्य रूप से आवाज के जरिए सहायता देंगे और ऐसे चश्मे जिनमें जानकारी दिखाने वाला डिस्प्ले होगा। यह बताता है कि कंपनियां एक ही रास्ते पर नहीं चल रही हैं। हर चीज को आंखों के सामने दिखाना जरूरी नहीं है। कई बार सबसे अच्छी स्क्रीन कोई स्क्रीन नहीं, बल्कि कान में सुनाई देने वाला छोटा जवाब हो सकता है।

क्या इससे मोबाइल की स्क्रीन की लत कम होगी?

स्मार्टफोन की समस्या सिर्फ स्क्रीन नहीं है। समस्या यह भी है कि उसमें अनगिनत सूचनाएं, वीडियो, सामाजिक प्रतिक्रियाएं और मनोरंजन लगातार हमारा ध्यान खींचते रहते हैं। अगर वही सब चीजें चश्मे पर आने लगीं तो स्क्रीन छोटी होने या गायब होने से ध्यान भटकना बंद नहीं होगा।

बल्कि खतरा उलटा भी हो सकता है। अगर एआई चश्मा हर समय हमारी आंखों के सामने सूचना देने लगे, हर बातचीत सुन सके, हर चीज देख सके और हर कुछ सेकंड में कोई सुझाव दे, तो हम स्क्रीन से तो दूर हो जाएंगे, लेकिन डिजिटल दुनिया से नहीं। इसलिए असली भविष्य कम तकनीक का नहीं बल्कि कम दिखाई देने वाली तकनीक का हो सकता है। फोन सामने नहीं होगा, लेकिन तकनीक हमारे आसपास हर समय मौजूद होगी।

सबसे बड़ा सवाल: आपकी जिंदगी में क्या रिकॉर्ड होगा?

अगर चश्मे में कैमरा है और वह लगातार आपके आसपास की दुनिया देख सकता है, तो सिर्फ उपयोगकर्ता की सुविधा का सवाल नहीं है। उसके सामने खड़े दूसरे लोगों की निजता का सवाल भी है। अगर आप किसी से बात कर रहे हैं और सामने वाला व्यक्ति चश्मा पहने हुए है, तो क्या वह बातचीत रिकॉर्ड कर रहा है? क्या कैमरा चालू है? क्या उसकी एआई प्रणाली उस बातचीत का अर्थ समझ रही है? क्या तस्वीरें या आवाज कहीं भेजी जा रही हैं?

मेटा ने अपने एआई चश्मे में कैमरा सक्रिय होने पर संकेत देने वाली सफेद लाइट जैसी व्यवस्था की है और कंपनी का कहना है कि इसे ढकने या निष्क्रिय करने पर कैमरा भी निष्क्रिय हो जाता है। फिर भी स्मार्ट ग्लास को लेकर निजता और सहमति की चिंताएं बढ़ रही हैं। इसलिए स्मार्ट ग्लास का भविष्य केवल बैटरी, वजन और एआई की क्षमता से तय नहीं होगा। लोगों का भरोसा भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।

भारत में इसका मतलब क्या हो सकता है?

भारत जैसे देश में स्मार्ट ग्लास की सबसे दिलचस्प उपयोगिता मनोरंजन से ज्यादा रोजमर्रा के कामों में दिखाई दे सकती है। कल्पना कीजिए कि आप किसी नए शहर में हैं। आपको भाषा नहीं आती। सामने दुकान का बोर्ड किसी दूसरी भाषा में है। चश्मा उसका अर्थ बता देता है। आप सड़क पर चल रहे हैं और अगला मोड़ आपकी आंखों के सामने दिखाई दे रहा है। किसी सरकारी दफ्तर में कोई कागज समझ नहीं आ रहा तो एआई उससे जुड़ी सामान्य जानकारी बता सकता है। किसी मशीन की मरम्मत करते समय उसके सामने खड़े होकर चरण-दर-चरण निर्देश सुने या देखे जा सकते हैं। शिक्षा में भी इसका इस्तेमाल दिलचस्प हो सकता है। छात्र किसी ऐतिहासिक इमारत, पौधे, मशीन या वैज्ञानिक मॉडल को देखकर उसके बारे में तुरंत जानकारी ले सकता है। लेकिन यहां भी एक सावधानी जरूरी है: एआई का जवाब सही है या नहीं, इसे हमेशा मान लेना खतरनाक होगा।

क्या चश्मा सचमुच स्मार्टफोन की जगह ले पाएगा?

फोन में बड़ी स्क्रीन है, लंबी बैटरी है, तेज कैमरा है, जटिल ऐप चलाने की सुविधा है और लंबे समय तक पढ़ने या लिखने के लिए वह ज्यादा आरामदायक है। स्मार्ट ग्लास का वजन, गर्मी, बैटरी, आंखों के सामने जानकारी दिखाने की सीमा और सामाजिक स्वीकार्यता जैसी समस्याएं अभी भी मौजूद हैं।

इसके अलावा हर व्यक्ति चश्मा पहनना नहीं चाहता। हर जगह कैमरा लगा चश्मा पहनना सामाजिक रूप से सहज होगा, यह भी तय नहीं है।

लेकिन किसी तकनीक को स्मार्टफोन की पूरी जगह लेने की जरूरत भी नहीं है। अगर वह हमारे रोज के 20 या 30 छोटे कामों में फोन निकालने की जरूरत खत्म कर देती है, तो उसका प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है।

यही कारण है कि गूगल, मेटा और सैमसंग जैसे बड़े खिलाड़ी इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। गूगल एंड्रॉयड एक्स आर को चश्मों और दूसरे पहनने योग्य उपकरणों के लिए एक नया मंच बना रहा है। सैमसंग इसे मोबाइल एआई के अगले इंटरफेस की दिशा में देख रहा है। मेटा पहले ही डिस्प्ले ग्लास और ईएमजी रिस्टबैंड को उपभोक्ता उत्पाद के रूप में आगे बढ़ा चुका है।

अगला कंप्यूटर शायद जेब में नहीं, शरीर पर होगा

कंप्यूटर का इतिहास देखें तो यह बदलाव अचानक नहीं आया। पहले कंप्यूटर एक कमरे जितने बड़े थे। फिर डेस्क पर आए। फिर लैपटॉप में बदल गए। स्मार्टफोन ने कंप्यूटर को जेब में डाल दिया। स्मार्टवॉच ने उसे कलाई तक पहुंचाया। अब एआई उसे चश्मे, कान और शरीर के दूसरे हिस्सों के और करीब ले जा रहा है।

अगला कदम शायद यह होगा कि कंप्यूटर किसी एक मशीन की तरह दिखाई ही न दे। चश्मा आपकी आंखों और कान से जुड़ा होगा। कलाई का बैंड आपके इशारों को समझेगा। एआई आपकी आवाज और आसपास की दुनिया को समझेगा। फोन शायद जेब में एक मुख्य कंप्यूटर की तरह मौजूद रहेगा, लेकिन उससे बातचीत करने का तरीका बदल जाएगा।

आज हम कंप्यूटर के सामने बैठकर काम करते हैं। फिर हम कंप्यूटर को जेब में लेकर चलने लगे। अगली अवस्था में संभव है कि कंप्यूटर हमारे साथ चले, लेकिन हमें उसे देखने की जरूरत कम से कम हो। और शायद यही स्मार्टफोन के बाद के दौर की असली पहचान होगी।

स्मार्टफोन अचानक गायब नहीं होगा। उसकी स्क्रीन भी अगले दिन से बेकार नहीं हो जाएगी। लेकिन अगर स्मार्ट ग्लास आसपास की दुनिया को समझने लगते हैं, एआई सही समय पर सही जानकारी देने लगता है और कलाई के छोटे से इशारे से डिजिटल दुनिया नियंत्रित होने लगती है, तो आने वाले वर्षों में हमारा फोन इस्तेमाल करने का सबसे बड़ा बदलाव फोन के अंदर नहीं, फोन को बार-बार देखने की जरूरत खत्म होने में दिखाई दे सकता है।

यानी स्मार्टफोन के बाद की दुनिया शायद ऐसी नहीं होगी जिसमें हमारे पास कोई फोन नहीं होगा। बल्कि ऐसी हो सकती है जिसमें फोन हमारे पास होगा, लेकिन हर काम के लिए हमें उसे हाथ में लेने की जरूरत नहीं होगी।

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