Social Media Fake Followers: नकली फॉलोअर्स खरीदकर कैसे बढ़ती है लोकप्रियता? एआई और बॉट्स का पूरा खेल

Instagram Fake Followers: सोशल मीडिया पर नकली फॉलोअर्स, लाइक और कमेंट से लोकप्रियता कैसे बढ़ाई जाती है?

Yogesh Mishra
Published on: 28 Oct 2026 9:30 PM IST
Social Media Fake Followers: नकली फॉलोअर्स खरीदकर कैसे बढ़ती है लोकप्रियता? एआई और बॉट्स का पूरा खेल
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Instagram Fake Followers: सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति के दस लाख फॉलोअर्स हैं। उसकी पोस्ट पर कुछ ही मिनटों में हजारों लाइक आ जाते हैं। कमेंट बॉक्स में तारीफ करने वालों की भीड़ दिखाई देती है। बड़ी कंपनियां उसे अपने उत्पादों के प्रचार के लिए चुनने लगती हैं। देखने वालों को लगता है कि यह व्यक्ति बेहद लोकप्रिय है और उसकी बात पर लाखों लोग भरोसा करते हैं। लेकिन क्या यह लोकप्रियता सचमुच असली है? क्या संभव है कि इन फॉलोअर्स में बड़ी संख्या ऐसे खातों की हो, जिन्हें असली लोग नहीं, बल्कि कंप्यूटर प्रोग्राम चला रहे हों?

इसका जवाब है - हां। सोशल मीडिया पर ऐसे ऑटोमेटेड एकाउंट्स और प्रोग्रामों को बॉट्स कहा जाता है। इनकी मदद से किसी पोस्ट पर लाइक, कमेंट, शेयर और फॉलोअर्स की संख्या कृत्रिम रूप से बढ़ाई जा सकती है। इससे किसी व्यक्ति, उत्पाद या विचार की लोकप्रियता वास्तविकता से कहीं ज्यादा दिखाई दे सकती है।

हालांकि, हर बॉट गलत काम के लिए नहीं बनाया जाता। कुछ बॉट समाचारों की जानकारी देते हैं, मौसम के अपडेट साझा करते हैं या लोगों के सामान्य सवालों का जवाब देते हैं। समस्या तब होती है, जब इनका इस्तेमाल लोगों को गुमराह करने, कंपनियों से ज्यादा पैसे लेने या किसी विचार के समर्थन में झूठी भीड़ दिखाने के लिए किया जाता है।

दिसंबर 2025 में सामने आई मेटा की एक रिपोर्ट ने भी इस समस्या की गंभीरता दिखाई। कंपनी ने भारत से संचालित एक ऐसे नेटवर्क के 59 फेसबुक खाते, 11 फेसबुक पेज और 152 इंस्टाग्राम खाते हटाने की जानकारी दी, जिसमें एआई की मदद से नकली पहचान बनाई गई थी। इन खातों के जरिए पोस्ट पर कृत्रिम रूप से लोगों की प्रतिक्रिया बढ़ाने की कोशिश भी की जा रही थी।

आखिर बॉट्स काम कैसे करते हैं? इन्फ्लुएंसर इनका इस्तेमाल क्यों करते हैं? इससे कंपनियों और आम लोगों को क्या नुकसान हो सकता है? और किसी खाते की लोकप्रियता असली है या नकली, इसका अंदाजा कैसे लगाया जा सकता है?

बॉट क्या होता है और सोशल मीडिया पर कैसे काम करता है?

बॉट एक कंप्यूटर प्रोग्राम होता है, जिसे कुछ काम अपने आप करने के लिए बनाया जाता है। इसे हर बार इंसान की तरह निर्देश देने की जरूरत नहीं होती। प्रोग्राम में पहले से तय निर्देशों के आधार पर यह किसी काम को अपने आप कर सकता है।

उदाहरण के लिए, कोई समाचार वेबसाइट नई खबर प्रकाशित करे तो एक स्वचालित प्रोग्राम उस खबर का लिंक सोशल मीडिया पर साझा कर सकता है। कोई ग्राहक किसी कंपनी के खाते पर संदेश भेजे तो बॉट उसे कार्यालय के समय या उत्पाद की जानकारी दे सकता है।

ऐसे काम उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन इसी तकनीक का गलत इस्तेमाल करके नकली लोकप्रियता भी बनाई जा सकती है।

मान लीजिए, किसी व्यक्ति के पास हजारों ऐसे खाते हैं जिन्हें वह खुद या किसी सेवा के जरिए नियंत्रित कर सकता है। अगर इन खातों से किसी एक व्यक्ति को फॉलो किया जाए, उसकी पोस्ट को लाइक किया जाए और उसके समर्थन में कमेंट किए जाएं, तो उसकी लोकप्रियता वास्तविकता से ज्यादा दिखाई देने लगेगी।

इस तरह की गतिविधि में सभी खाते कंप्यूटर प्रोग्राम से ही चलें, यह जरूरी नहीं है। कुछ खाते स्वचालित होते हैं, कुछ को लोग पैसे लेकर चलाते हैं और कुछ वास्तविक लोगों के खातों का गलत इस्तेमाल करके बनाए गए नेटवर्क का हिस्सा हो सकते हैं।

इसलिए बॉट और नकली खाते एक ही चीज नहीं हैं। बॉट एक तकनीक है, जबकि नकली खाता ऐसी पहचान है जो किसी वास्तविक व्यक्ति या गतिविधि के बारे में गलत धारणा पैदा कर सकती है।

इन्फ्लुएंसर नकली फॉलोअर्स क्यों खरीदते हैं?

सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर की कमाई का एक बड़ा जरिया विज्ञापन और कंपनियों के साथ साझेदारी है। कंपनियां ऐसे लोगों को अपने उत्पादों का प्रचार करने के लिए चुनती हैं, जिनकी बात ज्यादा से ज्यादा संभावित ग्राहकों तक पहुंच सकती है।

यहीं से नकली लोकप्रियता का खेल शुरू होता है। मान लीजिए, दो इन्फ्लुएंसर हैं। पहले के 50 हजार फॉलोअर्स हैं और उसकी पोस्ट पर वास्तव में बड़ी संख्या में लोग प्रतिक्रिया देते हैं। दूसरे के दस लाख फॉलोअर्स दिखाई देते हैं, लेकिन उनमें बड़ी संख्या निष्क्रिय या नकली खातों की है। अगर कोई कंपनी केवल फॉलोअर्स की संख्या देखकर फैसला करती है, तो दूसरा व्यक्ति उसे ज्यादा प्रभावशाली लग सकता है। वह उसे विज्ञापन के लिए चुन सकती है और ज्यादा पैसे भी दे सकती है।

नकली लोकप्रियता बढ़ाने के पीछे कुछ मुख्य कारण होते हैं: ज्यादा फॉलोअर्स दिखाकर बड़ी कंपनियों का ध्यान खींचना। यह दिखाना कि उनकी पोस्ट लाखों लोगों तक पहुंचती है। वास्तविक दर्शक बनाने में लगने वाले समय और मेहनत से बचना। किसी उत्पाद या विचार को लोकप्रिय दिखाकर दूसरे लोगों को प्रभावित करना।

हालांकि, फॉलोअर्स कम होने या पोस्ट पर कम लाइक आने का मतलब यह नहीं कि कोई व्यक्ति नकली लोकप्रियता खरीद रहा है। असली लोकप्रियता और नकली गतिविधि के बीच अंतर करने के लिए ठोस जानकारी जरूरी है।

नकली फॉलोअर्स, लाइक और कमेंट का कारोबार कैसे चलता है?

नकली लोकप्रियता बढ़ाने वाली कुछ सेवाएं पैसे लेकर किसी सोशल मीडिया खाते के फॉलोअर्स, लाइक, कमेंट या व्यू बढ़ाने का दावा करती हैं। इन सेवाओं के पीछे अलग-अलग तरीके हो सकते हैं। कुछ स्वचालित खाते इस्तेमाल करती हैं। कुछ लोग बड़ी संख्या में खातों को खुद चलाते हैं। कुछ जगह वास्तविक लोगों को मामूली भुगतान देकर किसी पोस्ट को लाइक या साझा करने के लिए कहा जाता है। इसके अलावा, चोरी किए गए या बिना अनुमति इस्तेमाल किए गए खातों का भी दुरुपयोग हो सकता है।

इस कारोबार में आम तौर पर तीन पक्ष हो सकते हैं: सेवा देने वाला: जो फॉलोअर्स, लाइक या कमेंट बढ़ाने के बदले पैसे लेता है। सेवा खरीदने वाला: जो अपने खाते की लोकप्रियता बढ़ाना चाहता है। दर्शक या विज्ञापनदाता: जो दिखाई देने वाले आंकड़ों को असली लोकप्रियता मान सकता है।

उदाहरण के लिए, कोई इन्फ्लुएंसर अपने खाते के लिए नकली फॉलोअर्स खरीदता है। बाद में वह किसी कंपनी को बताता है कि उसके लाखों दर्शक हैं। कंपनी उसकी बात पर भरोसा करके विज्ञापन दे देती है। अगर वास्तविक दर्शक बहुत कम हैं, तो कंपनी को अपने पैसे के बदले अपेक्षित फायदा नहीं मिलता।

हजारों लाइक से लोकप्रियता का भ्रम कैसे पैदा होता है?

इंसान अक्सर किसी चीज की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाता है कि दूसरे लोग उसे कितना पसंद कर रहे हैं। मनोविज्ञान में इसे सोशल प्रूफ कहा जाता है। आसान भाषा में इसका मतलब है - जब हम देखते हैं कि बहुत से लोग किसी चीज को पसंद कर रहे हैं, तो हम भी उसे अच्छा या भरोसेमंद मानने लग सकते हैं। सोशल मीडिया पर लाइक, कमेंट और शेयर इसी तरह असर डाल सकते हैं।

मान लीजिए, आपने किसी इन्फ्लुएंसर का वीडियो पहली बार देखा। उसके नीचे 50 हजार लाइक और हजारों तारीफ वाले कमेंट हैं। आप सोच सकते हैं कि वीडियो बहुत उपयोगी होगा, तभी इतने लोग इसे पसंद कर रहे हैं।

लेकिन अगर इनमें से बड़ी संख्या कृत्रिम गतिविधि से पैदा हुई है, तो यह धारणा गलत हो सकती है। नकली लोकप्रियता का असर केवल इन्फ्लुएंसर तक सीमित नहीं रहता। इससे किसी उत्पाद की मांग, किसी व्यक्ति की छवि या किसी विचार के समर्थन को लेकर भी गलत धारणा बन सकती है। हालांकि, ज्यादा लाइक होने का मतलब यह नहीं कि वे नकली हैं। किसी रोचक वीडियो या बड़ी खबर पर वास्तविक लोग भी तेजी से प्रतिक्रिया दे सकते हैं। इसलिए आंकड़ों को अकेले देखकर निष्कर्ष निकालना सही नहीं है।

बॉट्स कमेंट बॉक्स में क्या करते हैं?

किसी पोस्ट के नीचे बड़ी संख्या में प्रशंसात्मक टिप्पणियां दिखाई देना भी लोकप्रियता का आभास पैदा कर सकता है। ऐसे कमेंट असली लोग भी कर सकते हैं। लेकिन यदि बहुत सारे खातों से एक जैसी टिप्पणियां असामान्य रूप से कम समय में आने लगें, तो यह जांचने लायक संकेत हो सकता है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई की मदद से अलग-अलग भाषा और अंदाज में कमेंट लिखना भी आसान हो गया है। इससे नकली टिप्पणियां पहले के मुकाबले ज्यादा स्वाभाविक दिखाई दे सकती हैं। कुछ नेटवर्क केवल तारीफ करने तक सीमित नहीं रहते। वे किसी पोस्ट की आलोचना को दबाने या किसी खास विचार के समर्थन में ज्यादा लोगों की सहमति दिखाने की कोशिश भी कर सकते हैं।

मान लीजिए, किसी उत्पाद के बारे में लोग शिकायत कर रहे हैं। उसी पोस्ट के नीचे अचानक बड़ी संख्या में सकारात्मक टिप्पणियां आने लगें, तो असली शिकायतें कम दिखाई दे सकती हैं। इससे दूसरे ग्राहक उत्पाद के बारे में गलत राय बना सकते हैं। फिर भी, केवल एक जैसे कमेंट देखकर किसी खाते को बॉट कहना ठीक नहीं है। किसी घटना पर वास्तविक लोग भी एक जैसी भाषा इस्तेमाल कर सकते हैं। जरूरी यह देखना है कि खाते किस तरह व्यवहार कर रहे हैं और क्या उनके बीच किसी तरह का साझा नियंत्रण दिखाई देता है।

क्या बॉट्स किसी विषय को ट्रेंड करा सकते हैं?

सोशल मीडिया पर कोई विषय तब ज्यादा दिखाई देने लगता है, जब उस पर बड़ी संख्या में लोग पोस्ट करते हैं, उसे साझा करते हैं या उसके बारे में चर्चा करते हैं। कुछ नकली नेटवर्क इसी गतिविधि का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। वे किसी खास विषय पर बार-बार पोस्ट कर सकते हैं, एक-दूसरे की सामग्री साझा कर सकते हैं या किसी हैशटैग से जुड़ी गतिविधि को कृत्रिम रूप से बढ़ा सकते हैं। इसका मकसद किसी विषय को वास्तविकता से ज्यादा चर्चित दिखाना हो सकता है।

लेकिन किसी विषय का ट्रेंड करना अपने आप में बॉट गतिविधि का प्रमाण नहीं है। क्रिकेट मैच, चुनाव परिणाम, बड़ी फिल्म या किसी बड़ी घटना के समय वास्तविक लोग भी एक साथ बहुत ज्यादा पोस्ट कर सकते हैं। यह भी जरूरी है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म केवल लाइक की संख्या के आधार पर ही पोस्ट को आगे नहीं बढ़ाते। अलग-अलग प्लेटफॉर्म सामग्री की प्रासंगिकता, दर्शकों की रुचि और अन्य संकेतों को भी ध्यान में रख सकते हैं। इनके सभी नियम सार्वजनिक नहीं होते और समय के साथ बदलते रहते हैं।

एआई ने नकली खातों का खेल कैसे बदल दिया?

पहले कई नकली खातों की पहचान करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता था। उनकी प्रोफाइल अधूरी होती थी, तस्वीर नहीं होती थी या वे बार-बार एक जैसे कमेंट करते थे। लेकिन एआई की मदद से अब नकली पहचान को ज्यादा विश्वसनीय रूप दिया जा सकता है। इस तकनीक से ऐसी प्रोफाइल तस्वीरें बनाई जा सकती हैं जो किसी वास्तविक व्यक्ति जैसी दिखें। नकली खाते के लिए परिचय, रुचियां, पोस्ट और टिप्पणियां भी तैयार की जा सकती हैं। कुछ खाते सामान्य जीवन से जुड़ी बातें साझा करते हैं, ताकि वे किसी असली व्यक्ति के खाते जैसे दिखाई दें। मेटा की 2025 की रिपोर्ट में भारत से जुड़े जिस नेटवर्क का उल्लेख किया गया, उसमें एआई से तैयार तस्वीरों, परिचय और टिप्पणियों का इस्तेमाल किया गया था। कंपनी के मुताबिक, इन खातों से रोजमर्रा के विषयों पर भी पोस्ट की जाती थीं, ताकि वे वास्तविक उपयोगकर्ताओं जैसे लगें। इसी नेटवर्क में कुछ खाते दूसरी पोस्टों पर कृत्रिम रूप से प्रतिक्रिया बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे थे।

इस उदाहरण से साफ है कि अब नकली खातों को पहचानने के लिए सिर्फ उनकी तस्वीर या भाषा देखना पर्याप्त नहीं है। यह देखना भी जरूरी है कि वे कब सक्रिय होते हैं, किन खातों के साथ बार-बार प्रतिक्रिया देते हैं और उनका पूरा व्यवहार कैसा है। हालांकि, एआई से पोस्ट लिखना या तस्वीर बनाना अपने आप में गलत नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या इस तकनीक का इस्तेमाल लोगों को गुमराह करने और नकली जनसमर्थन दिखाने के लिए किया जा रहा है।

किसी इन्फ्लुएंसर के फॉलोअर्स असली हैं या नकली, कैसे पहचानें?

किसी खाते की लोकप्रियता जांचने के लिए कोई एक ऐसा संकेत नहीं है, जो हर बार सही नतीजा दे। फिर भी कुछ बातों पर ध्यान देकर असामान्य गतिविधि का अंदाजा लगाया जा सकता है।

फॉलोअर्स की संख्या और लोगों की प्रतिक्रिया में बड़ा अंतर: यदि किसी खाते के लाखों फॉलोअर्स हैं, लेकिन उसकी पोस्ट पर बहुत कम प्रतिक्रिया आती है, तो यह जांचने लायक बात हो सकती है। हालांकि, इससे नकली फॉलोअर्स होना साबित नहीं होता।

बहुत कम समय में असाधारण बढ़ोतरी: यदि फॉलोअर्स की संख्या अचानक बहुत तेजी से बढ़े और उस बढ़ोतरी का कोई स्पष्ट कारण न दिखे, तो अधिक जानकारी लेना उचित होगा।

एक जैसे कमेंट: कई खातों से बार-बार लगभग एक जैसी टिप्पणियां आना समन्वित गतिविधि का संकेत हो सकता है।

खातों की संदिग्ध गतिविधि: कुछ खातों पर अपनी पोस्ट या सामान्य बातचीत बहुत कम हो, लेकिन वे लगातार किसी एक व्यक्ति की पोस्टों पर प्रतिक्रिया देते हों, तो उनके व्यवहार को ध्यान से देखना उपयोगी हो सकता है।

वास्तविक दर्शकों की भागीदारी: यह भी देखें कि क्या लोग पोस्ट के बारे में सवाल पूछते हैं, अपने अनुभव साझा करते हैं और विषय पर सार्थक बातचीत करते हैं।

नकली लोकप्रियता से कंपनियों को कितना नुकसान हो सकता है?

कंपनियां सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों को अपने उत्पादों का प्रचार करने के लिए पैसे देती हैं। उनका उद्देश्य संभावित ग्राहकों तक पहुंचना और बिक्री बढ़ाना होता है।अगर कंपनी केवल फॉलोअर्स और लाइक की संख्या देखकर इन्फ्लुएंसर चुनती है, तो वह गलत फैसला कर सकती है। उदाहरण के लिए, किसी कंपनी ने दस लाख फॉलोअर्स वाले इन्फ्लुएंसर को विज्ञापन दिया। लेकिन यदि उसके बहुत कम फॉलोअर्स वास्तव में सक्रिय हैं, तो विज्ञापन कंपनी की अपेक्षा के मुताबिक लोगों तक नहीं पहुंचेगा। इससे कंपनी के पैसे का सही इस्तेमाल नहीं हो पाएगा। इसके अलावा, यदि दर्शकों को पता चलता है कि लोकप्रियता कृत्रिम थी, तो विज्ञापन देने वाली कंपनी की छवि पर भी असर पड़ सकता है। इसीलिए कंपनियों को केवल फॉलोअर्स की संख्या नहीं देखनी चाहिए। उन्हें यह भी जांचना चाहिए कि सामग्री कितने वास्तविक लोगों तक पहुंचती है, दर्शक उससे कितनी रुचि लेते हैं और विज्ञापन से वास्तव में क्या परिणाम मिलते हैं। लाइक, व्यू, भरोसा और बिक्री चार अलग-अलग चीजें हैं। किसी पोस्ट पर लाखों व्यू होने का अर्थ यह नहीं कि लाखों लोगों ने उसे ध्यान से देखा या वे उत्पाद खरीदने के लिए तैयार हैं।

अमेरिका में नकली फॉलोअर्स को लेकर क्या नियम है?

अमेरिका की संघीय व्यापार आयोग यानी एफटीसी ने नकली समीक्षाओं और सोशल मीडिया की झूठी लोकप्रियता से जुड़े कुछ व्यावसायिक तरीकों पर प्रतिबंध लगाने वाला नियम बनाया। यह नियम 21 अक्टूबर 2024 से लागू हुआ। इसके तहत नकली फॉलोअर्स, व्यू या दूसरे सोशल मीडिया संकेतकों को बेचना या खरीदना कुछ परिस्थितियों में प्रतिबंधित है। इसमें उन मामलों पर ध्यान दिया गया है, जहां खरीदार या विक्रेता को पता हो, या उसे पता होना चाहिए, कि ये संकेतक नकली हैं और उनका इस्तेमाल व्यावसायिक प्रभाव को गलत तरीके से दिखाने के लिए किया जा रहा है। इसका मतलब यह नहीं कि किसी खाते पर नकली फॉलोअर्स पाए जाने भर से उसके मालिक को अपने आप दोषी मान लिया जाएगा। मामले की परिस्थितियां और उपलब्ध प्रमाण महत्त्वपूर्ण होते हैं। यह अमेरिकी नियम है, भारत का कानून नहीं। इसलिए इसे भारत में सीधे लागू नियम बताना गलत होगा। फिर भी यह दिखाता है कि नकली लोकप्रियता को केवल सोशल मीडिया की तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि संभावित व्यावसायिक धोखे के रूप में भी देखा जा रहा है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसे खातों पर क्या कार्रवाई करते हैं?

इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म नकली खातों और कृत्रिम गतिविधियों को रोकने के लिए अपनी नीतियां बनाते हैं। यूट्यूब की नीति के अनुसार, व्यू, लाइक, कमेंट या दूसरे आंकड़ों को कृत्रिम रूप से बढ़ाना स्वीकार्य नहीं है। नियमों का उल्लंघन करने पर नकली गतिविधि हटाई जा सकती है और गंभीर मामलों में वीडियो या चैनल पर कार्रवाई हो सकती है। यदि कोई क्रिएटर किसी बाहरी एजेंसी से अपने चैनल का प्रचार कराता है और वह एजेंसी नियमों का उल्लंघन करती है, तो इसका असर क्रिएटर के चैनल पर भी पड़ सकता है।

मेटा ने भी नकली खातों और समन्वित गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई की है। भारत से जुड़े 2025 के मामले में कंपनी ने कई फेसबुक और इंस्टाग्राम खाते हटाए थे।

हालांकि, इन प्लेटफॉर्मों की पहचान प्रणाली पूरी तरह त्रुटिहीन नहीं होती। कुछ नकली खाते बच सकते हैं और कुछ वास्तविक खातों की गतिविधि भी असामान्य दिखाई दे सकती है। इसलिए यदि किसी इन्फ्लुएंसर के फॉलोअर्स अचानक कम हो जाएं, तो इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि उसने नकली फॉलोअर्स खरीदे थे। प्लेटफॉर्म स्पैम और दूसरे नियमों का उल्लंघन करने वाले खातों को भी हटाते रहते हैं।

भारत में इन्फ्लुएंसरों के विज्ञापनों पर क्या नियम हैं?

भारत में विज्ञापन मानक परिषद यानी एएससीआई ने सोशल मीडिया पर विज्ञापन करने वाले इन्फ्लुएंसरों के लिए दिशानिर्देश बनाए हैं। इनका एक प्रमुख उद्देश्य यह है कि दर्शकों को पता चल सके कि कोई पोस्ट विज्ञापन है या इन्फ्लुएंसर की अपनी सामान्य राय। यदि किसी ब्रांड ने इन्फ्लुएंसर को पैसे दिए हैं, मुफ्त उत्पाद भेजा है या कोई अन्य लाभ दिया है और उसके बदले उत्पाद का प्रचार किया जा रहा है, तो लागू दिशानिर्देशों के अनुसार इस संबंध की जानकारी स्पष्ट रूप से देना जरूरी हो सकता है। इसके लिए पोस्ट में विज्ञापन, स्पॉन्सर्ड या सहयोग जैसे उपयुक्त संकेत इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

लेकिन विज्ञापन का खुलासा करना और नकली फॉलोअर्स खरीदना अलग-अलग मुद्दे हैं। कोई इन्फ्लुएंसर असली दर्शकों के सामने विज्ञापन करे, तो भी उसे विज्ञापन से जुड़े नियमों का पालन करना पड़ सकता है। दूसरी ओर, कोई व्यक्ति अपनी सामान्य पोस्ट की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए नकली फॉलोअर्स खरीद सकता है। यदि नकली लोकप्रियता का इस्तेमाल विज्ञापनदाता या उपभोक्ता को गुमराह करने के लिए किया जाता है, तो परिस्थितियों के आधार पर दूसरे नियम भी प्रासंगिक हो सकते हैं।

आम लोग नकली लोकप्रियता से कैसे बचें?

सोशल मीडिया पर किसी पोस्ट को देखकर तुरंत भरोसा करना जरूरी नहीं है। खासकर जब कोई इन्फ्लुएंसर स्वास्थ्य, निवेश, ऑनलाइन कमाई, नौकरी या किसी महंगे उत्पाद के बारे में दावा कर रहा हो, तो जानकारी की स्वतंत्र रूप से जांच करनी चाहिए।

इन बातों को ध्यान में रखें: किसी व्यक्ति के फॉलोअर्स की संख्या को उसकी विशेषज्ञता का प्रमाण न मानें। हजारों लाइक या कमेंट देखकर किसी उत्पाद को अपने आप भरोसेमंद न समझें। बड़े दावों की पुष्टि दूसरे विश्वसनीय स्रोतों से करें। किसी विज्ञापन या प्रायोजित पोस्ट को सामान्य सलाह समझने से बचें। संदिग्ध खाते या पोस्ट की शिकायत संबंधित प्लेटफॉर्म पर करें। बिना प्रमाण किसी व्यक्ति को बॉट इस्तेमाल करने वाला न कहें।

अगर कोई व्यक्ति दावा करता है कि उसका उत्पाद हजारों लोगों की समस्या हल कर चुका है, तो केवल उसके कमेंट बॉक्स पर भरोसा न करें। यह भी देखें कि उसके दावे के समर्थन में स्वतंत्र प्रमाण हैं या नहीं।

हर चमकती चीज सोना नहीं होती

सबसे जरूरी बात यह है कि लोकप्रियता और भरोसे को एक ही चीज न समझें। दस लाख फॉलोअर्स होने का मतलब दस लाख सक्रिय दर्शक नहीं है। हजारों कमेंट होने का मतलब हजारों स्वतंत्र लोगों की सहमति नहीं है। और किसी पोस्ट के वायरल होने से उसमें कही गई बात अपने आप सच नहीं हो जाती। सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति की असली ताकत उसके फॉलोअर्स की संख्या से ज्यादा इस बात में है कि उसके दर्शक कौन हैं, वे उसकी सामग्री में कितनी वास्तविक रुचि लेते हैं और उसकी बात पर भरोसा करने के लिए उनके पास क्या कारण हैं।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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