Solar Panel Bird Deaths: जिस सौर ऊर्जा को स्वच्छ मानते हैं, क्या वही पक्षियों की जान ले रही है?

Solar Panel Bird Deaths: क्या सोलर पैनल पानी की झील जैसे दिखाई देते हैं? जानिए लेक इफेक्ट क्या है, पक्षियों की मौत के पीछे वैज्ञानिक कारण, गोडावण पर बिजली की तारों का खतरा और सौर ऊर्जा को पक्षियों के लिए सुरक्षित बनाने के उपाय।

Yogesh Mishra
Published on: 30 Oct 2026 5:57 PM IST
Solar Panels and Birds |Solar Panel Bird Deaths|Solar Energy Environmental Impact | Newstrack
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Solar Panels and Birds |Solar Panel Bird Deaths|Solar Energy Environmental Impact | Newstrack

Solar Panel Bird Deaths: सूरज की रोशनी से बिजली बनाना पर्यावरण संरक्षण की सबसे महत्त्वपूर्ण तकनीकों में शामिल है। सौर ऊर्जा से बिजली पैदा करते समय कोयले की तरह धुआँ नहीं निकलता और जलवायु परिवर्तन बढ़ाने वाली गैसों का प्रत्यक्ष उत्सर्जन भी बहुत कम होता है। लेकिन इसी स्वच्छ ऊर्जा का एक ऐसा पक्ष सामने आया है जिसने पक्षी वैज्ञानिकों को चिंतित किया है। अमेरिका के रेगिस्तानी क्षेत्रों में कुछ पक्षी विशाल सोलर पैनल संयंत्रों की ओर उतरते पाए गए हैं। वैज्ञानिकों को आशंका है कि पानी खोजने वाले कुछ पक्षी इनकी चमकती सतह को झील समझ सकते हैं। कुछ पक्षी पैनलों, तारों और बाड़ से टकराकर मर जाते हैं। अत्यधिक केंद्रित सूर्य की रोशनी से बिजली बनाने वाले विशेष सोलर टावरों के आसपास पक्षियों के पंख झुलसने की घटनाएँ भी दर्ज हुई हैं। भारत में एक और बड़ा संकट है। राजस्थान और गुजरात में सौर ऊर्जा परियोजनाओं से जुड़ी ऊँची बिजली की तारें संकटग्रस्त गोडावण पक्षी के लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं। लेकिन वैज्ञानिक अनुसंधान यह भी बताता है कि हर सोलर पैनल पक्षियों को नुकसान नहीं पहुँचाता और सभी पक्षियों के मरने का कारण एक जैसा नहीं होता। सवाल यह है कि स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार करते समय पक्षियों के जीवन और उनके प्राकृतिक आवास को कैसे सुरक्षित रखा जाए।

जिस सौर ऊर्जा को पर्यावरण का मित्र माना गया, वही पक्षियों के लिए समस्या क्यों बनी?

दुनिया में ऊर्जा उत्पादन का इतिहास बड़े पैमाने पर कोयले, तेल और प्राकृतिक गैस पर निर्भर रहा है। इन ईंधनों को जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड और दूसरे प्रदूषक पैदा होते हैं। वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के स्वरूप, तापमान, समुद्री पारिस्थितिकी और अनेक जीवों के प्राकृतिक आवास प्रभावित हो रहे हैं। पक्षियों के लिए भी यह परिवर्तन गंभीर चुनौती है। इसी कारण सौर और पवन ऊर्जा जैसी तकनीकों का विस्तार पर्यावरण संरक्षण के लिए आवश्यक माना गया है। लेकिन ऊर्जा के किसी स्रोत का जलवायु के लिए लाभकारी होना इस बात की गारंटी नहीं है कि उसे लगाने से स्थानीय प्रकृति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। सोलर पैनलों को बड़े पैमाने पर स्थापित करने के लिए जमीन चाहिए, उनके आसपास सड़कें और अन्य संरचनाएँ बनाई जाती हैं तथा पैदा हुई बिजली को दूर तक पहुँचाने के लिए विद्युत प्रसारण लाइनें बिछाई जाती हैं। इन सभी गतिविधियों का स्थानीय पशु-पक्षियों पर असर पड़ सकता है।

यहीं एक महत्त्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। सामान्य सोलर पैनल सूर्य के प्रकाश को सीधे बिजली में बदलते हैं। इस तकनीक को 'फोटोवोल्टाइक' या संक्षेप में 'पीवी' कहा जाता है। घरों की छतों और बड़े सौर ऊर्जा पार्कों में सामान्यतः इसी तकनीक का उपयोग होता है। इसके विपरीत कुछ विशेष संयंत्रों में हजारों दर्पण सूर्य की किरणों को एक केंद्रीय स्थान पर केंद्रित करते हैं। वहाँ अत्यधिक ताप पैदा होता है और उस ऊष्मा से बिजली उत्पादन की प्रक्रिया संचालित होती है। इसे 'कंसन्ट्रेटेड सोलर पावर' या 'सीएसपी' कहा जाता है। इन दोनों तकनीकों के पर्यावरणीय जोखिम समान नहीं हैं। सामान्य फोटोवोल्टाइक पैनल के आसपास उड़ता पक्षी केवल इसलिए झुलस नहीं जाता कि पैनल धूप में गर्म है। लेकिन विशेष सौर तापीय टावर के पास केंद्रित प्रकाश के अत्यधिक तीव्र क्षेत्र में पक्षी के पंख जलने या झुलसने का जोखिम हो सकता है। इसलिए सभी सोलर पैनलों को पक्षियों को जलाने वाली मशीन बताना वैज्ञानिक रूप से गलत होगा।

सौर ऊर्जा और पक्षियों के बीच संबंध की एक और जटिलता है। कुछ स्थानों पर सौर परियोजनाएँ ऐसे भूभाग में लगाई जाती हैं जहाँ पहले से पक्षियों का प्राकृतिक आवास मौजूद था। उस क्षेत्र में रहने वाले पक्षी जमीन पर घोंसले बनाते हों, घास के मैदानों में भोजन खोजते हों या मौसमी प्रवास के दौरान वहाँ रुकते हों, तो भूमि के उपयोग में परिवर्तन उनके जीवन को प्रभावित कर सकता है। दूसरी ओर किसी औद्योगिक भवन की छत पर पैनल लगाने से नया प्राकृतिक आवास नष्ट करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसलिए एक ही बिजली उत्पादन तकनीक के प्रभाव उसके स्थान, निर्माण की पद्धति और आसपास की जैव विविधता के अनुसार बहुत अलग हो सकते हैं। पक्षियों की सुरक्षा के लिए सौर ऊर्जा पर सामान्य प्रतिबंध लगाने के बजाय इन भिन्नताओं को समझना अधिक उपयोगी है।

सोलर पैनल पानी जैसे क्यों दिखाई दे सकते हैं?

पक्षियों पर सौर ऊर्जा के प्रभाव से जुड़ी सबसे रोचक वैज्ञानिक अवधारणा 'लेक इफेक्ट' अर्थात झील जैसा प्रभाव है। इसे समझने के लिए पहले यह जानना होगा कि पक्षी पानी की पहचान कैसे करते हैं। मनुष्य किसी झील को उसके रंग, आकार, आसपास की वनस्पति और दूसरी दृश्य विशेषताओं से पहचानता है। लेकिन कई पक्षियों और जलीय जीवों में प्रकाश के ऐसे गुणों को पहचानने की क्षमता भी पाई जाती है जिनकी सहायता से पानी की सतह का पता लगाने में मदद मिल सकती है। इनमें एक गुण है 'प्रकाश का ध्रुवण' या 'पोलराइजेशन'। सामान्य सूर्य प्रकाश की विद्युतचुंबकीय तरंगों के कंपन अनेक दिशाओं में हो सकते हैं। जब प्रकाश किसी विशेष सतह से परावर्तित होता है, तो उसके कंपन की दिशाओं का अनुपात बदल सकता है। इस घटना को ध्रुवण कहा जाता है।

पानी की सतह से परावर्तित प्रकाश में विशेष प्रकार का ध्रुवण दिखाई दे सकता है। कुछ जलीय कीट इस संकेत का उपयोग जलाशयों की पहचान के लिए करते हैं। पक्षियों के संदर्भ में भी ध्रुवित प्रकाश का व्यवहार वैज्ञानिक अध्ययन का विषय है। अब समस्या यह है कि बड़े फोटोवोल्टाइक पैनलों की चिकनी सतह से परावर्तित सूर्य प्रकाश में भी पानी से मिलते-जुलते ध्रुवण संकेत उत्पन्न हो सकते हैं। यदि विशाल रेगिस्तानी क्षेत्र में हजारों गहरे रंग के सोलर पैनल एक साथ लगे हों, तो ऊपर से उड़ने वाले कुछ पक्षियों को उनसे ऐसे दृश्य संकेत मिल सकते हैं जो सामान्यतः जलाशय की पहचान से जुड़े होते हैं। वैज्ञानिकों ने इसी संभावना को 'लेक इफेक्ट हाइपोथीसिस' कहा है।

इस परिकल्पना के अनुसार पानी खोजने वाला पक्षी सौर ऊर्जा संयंत्र को वास्तविक झील समझकर उसकी ओर उतर सकता है। लेकिन जब वह नीचे पहुँचता है, तो वहाँ पानी के बजाय ठोस पैनल, सूखी जमीन और दूसरी संरचनाएँ मौजूद होती हैं। इससे टकराव या अन्य जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं। विशेष रूप से ऐसे जलीय पक्षियों के लिए परिस्थिति कठिन हो सकती है जिन्हें उड़ान भरने और सुरक्षित उतरने के लिए पर्याप्त जल सतह की आवश्यकता होती है। कुछ पक्षी जमीन से आसानी से दोबारा उड़ान नहीं भर पाते। यदि वे सूखे रेगिस्तान में उतर जाएँ, तो शिकारियों, निर्जलीकरण और दूसरी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन यह केवल संभावित प्रक्रिया की व्याख्या है। हर पक्षी किसी पैनल को झील समझता है या प्रत्येक दुर्घटना इसी कारण होती है, ऐसा प्रमाण नहीं है।

वर्ष 2024 के वैज्ञानिक अध्ययन में क्या सामने आया?

अमेरिका के कैलिफोर्निया ऊर्जा आयोग ने जून 2024 में 'इन्वेस्टिगेटिंग द लेक इफेक्ट इन्फ्लुएंस ऑन एवियन बिहेवियर फ्रॉम कैलिफोर्नियाज यूटिलिटी-स्केल फोटोवोल्टाइक सोलर फैसिलिटीज' शीर्षक से एक विस्तृत अध्ययन प्रकाशित किया। इस अनुसंधान का उद्देश्य यह समझना था कि क्या बड़े सोलर पैनल संयंत्र ऐसे दृश्य संकेत उत्पन्न करते हैं जिनके कारण पक्षी उन्हें जलाशय समझकर उनकी ओर आकर्षित हो सकते हैं। शोधकर्ताओं ने ध्रुवित प्रकाश, पक्षियों के उड़ने के व्यवहार और सौर ऊर्जा संयंत्रों के आसपास पक्षियों की मृत्यु संबंधी जानकारी का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि विभिन्न प्रकार के सोलर पैनल पानी की सतह से मिलते-जुलते ध्रुवित प्रकाश संकेत पैदा कर सकते हैं। शोध में यह भी पाया गया कि कुछ परिस्थितियों में सौर परियोजनाओं के पास पहुँचने वाले उड़ते जीव नीचे उतरने का व्यवहार दिखाते थे। इसके अतिरिक्त कुछ सौर परियोजनाओं में आसपास के तुलना क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक पक्षी मृत पाए गए।

लेकिन इस अध्ययन का निष्कर्ष बहुत सावधानी से समझना चाहिए। शोधकर्ताओं ने कहा कि परिणाम 'लेक इफेक्ट' की परिकल्पना के अनुरूप हैं, लेकिन वे उसे अंतिम रूप से प्रमाणित नहीं करते। उदाहरण के लिए केवल यह देखना कि कोई पक्षी सौर ऊर्जा संयंत्र के ऊपर से गुजरते समय नीचे उतरा, इस बात का निर्णायक प्रमाण नहीं है कि उसने संयंत्र को पानी समझा। उसकी उड़ान में परिवर्तन के दूसरे कारण भी हो सकते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि सभी प्रकार के जलीय पक्षियों के लिए सौर पैनलों का आकर्षण समान नहीं होगा। सूर्य की स्थिति, पैनल का प्रकार, पक्षी की प्रजाति और उसकी तत्काल आवश्यकता जैसे कारक परिणाम बदल सकते हैं। इसीलिए वैज्ञानिक भाषा में 'लेक इफेक्ट' अभी ऐसी परिकल्पना है जिसके पक्ष में प्रमाण बढ़े हैं, लेकिन जिसकी सभी जैविक प्रक्रियाएँ और प्रभाव की सीमाएँ पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं।

इससे एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता है। यदि कोई वैज्ञानिक अध्ययन किसी परिकल्पना को संभावित बताता है, तो क्या उसके आधार पर सुरक्षा उपाय अपनाए जा सकते हैं? पर्यावरण संरक्षण में कई बार जोखिम को पूरी तरह सिद्ध होने से पहले भी कम करने का प्रयास उचित हो सकता है, विशेषकर जब किसी संकटग्रस्त प्रजाति का प्रश्न हो। लेकिन सुरक्षा उपायों की उपयोगिता भी वैज्ञानिक परीक्षण से जाँची जानी चाहिए। उदाहरण के लिए यदि पैनलों की सतह से परावर्तित ध्रुवित प्रकाश की मात्रा कम करने से पक्षियों का आकर्षण घट सकता है, तो ऐसी सतह विकसित करना उपयोगी अनुसंधान हो सकता है। मगर जब तक वास्तविक परीक्षण यह प्रमाणित न करें कि उससे पक्षियों की मृत्यु कम हुई है, तब तक उसे निश्चित समाधान घोषित नहीं करना चाहिए।

सोलर पैनलों से टकराकर कितने पक्षी मरते हैं?

इस प्रश्न का एक निश्चित वैश्विक उत्तर अभी उपलब्ध नहीं है। अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में कुछ बड़े सौर ऊर्जा संयंत्रों के आसपास मृत पक्षियों की खोज और निगरानी की गई है। लेकिन दुनिया के सभी संयंत्रों, सभी जलवायु परिस्थितियों और सभी पक्षी प्रजातियों के लिए एक समान मृत्यु दर निर्धारित नहीं की जा सकती। किसी संयंत्र में पक्षियों की मृत्यु का पता लगाना भी आसान नहीं है। छोटे पक्षियों के अवशेष जल्दी नष्ट हो सकते हैं या उन्हें दूसरे जीव उठा ले जा सकते हैं। कुछ पक्षी घायल होकर संयंत्र से दूर जा सकते हैं और बाद में उनकी मृत्यु हो सकती है। निगरानी करने वाले सभी मृत पक्षियों को पहचान पाएँ, यह भी आवश्यक नहीं है। इसलिए वैज्ञानिक अक्सर मृत पक्षियों की वास्तविक संख्या का अनुमान लगाते समय खोज की प्रभावशीलता और शवों के बने रहने की अवधि जैसे कारकों को ध्यान में रखते हैं।

वर्ष 2024 में आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन, अर्थात 'ओईसीडी', ने नवीकरणीय ऊर्जा अवसंरचना और जैव विविधता पर एक व्यापक रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें अमेरिका के कैलिफोर्निया और नेवादा स्थित दस फोटोवोल्टाइक परियोजनाओं के अध्ययनों का उल्लेख था। इन परियोजनाओं में सौर पैनल वाले क्षेत्रों के भीतर पक्षियों की अनुमानित वार्षिक मृत्यु दर अलग-अलग स्थानों पर प्रति मेगावाट लगभग 0.08 से 9.26 तक पाई गई। औसत लगभग 2.49 पक्षी प्रति मेगावाट प्रति वर्ष था। लेकिन इस संख्या को दुनिया के सभी सोलर पैनलों पर लागू करना गलत होगा। अध्ययन सीमित भौगोलिक क्षेत्रों और परियोजनाओं पर आधारित थे। इनमें दुर्घटना के वास्तविक कारणों को पहचानना भी कठिन था। लगभग 61 प्रतिशत मृत पक्षियों के मामले में मृत्यु का कारण निश्चित रूप से निर्धारित नहीं किया जा सका था। इसका अर्थ है कि सौर परियोजनाओं के भीतर पक्षियों की मृत्यु दर्ज हुई, लेकिन प्रत्येक मृत्यु को सीधे पैनल से टकराने का परिणाम कहना उचित नहीं है।

दक्षिण अफ्रीका के उत्तरी केप क्षेत्र में 96 मेगावाट की एक सौर परियोजना पर हुए अध्ययन में भी पक्षियों के व्यवहार और मृत्यु संबंधी परिणामों का मूल्यांकन किया गया। लगभग 180 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली इस परियोजना के तीन महीने के सर्वेक्षण के दौरान आठ मृत पक्षी मिले। उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर शोधकर्ताओं ने लगभग 435 पक्षियों की वार्षिक मृत्यु का अनुमान निकाला, जिसके आसपास सांख्यिकीय अनिश्चितता का बड़ा अंतर था। यह संख्या प्रति मेगावाट लगभग 4.5 पक्षी प्रतिवर्ष के बराबर थी। लेकिन अध्ययन में सभी मौतों के कारण निश्चित नहीं हो सके। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि सौर ऊर्जा परिसर के भीतर पक्षियों की प्रजातीय विविधता और घनत्व आसपास के कुछ क्षेत्रों की तुलना में कम थे। यह परिणाम संकेत देता है कि पक्षियों पर सौर ऊर्जा परियोजनाओं का प्रभाव केवल टकराव से होने वाली मृत्यु तक सीमित नहीं हो सकता। आवास में बदलाव के कारण उनके वितरण और व्यवहार में भी परिवर्तन संभव है।

इन अध्ययनों की तुलना करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी स्थान पर मृत पक्षियों का मिलना और वहाँ पक्षियों की कुल आबादी पर दीर्घकालिक असर होना भी अलग प्रश्न हैं। यदि किसी अत्यधिक सामान्य प्रजाति के कुछ पक्षी मरते हैं, तो उसका जनसंख्या पर प्रभाव किसी ऐसी दुर्लभ प्रजाति की एक मृत्यु से अलग हो सकता है जिसके कुल जीवित सदस्य बहुत कम बचे हैं। इसीलिए पक्षी संरक्षण में केवल मौतों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी प्रजाति, प्रजनन क्षमता, आबादी के आकार और प्रवास के स्वरूप को भी ध्यान में रखा जाता है। वर्ष 2022 में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण से जुड़े वैज्ञानिकों ने कैलिफोर्निया में पवन और सौर ऊर्जा परियोजनाओं से प्रभावित 23 महत्त्वपूर्ण पक्षी प्रजातियों का अध्ययन किया। उनके मॉडल ने संकेत दिया कि लगभग 48 प्रतिशत प्रजातियों की आबादी नवीकरणीय ऊर्जा और दूसरे स्रोतों से जुड़ी अतिरिक्त मृत्यु के संयुक्त प्रभावों के प्रति संवेदनशील हो सकती है। यह परिणाम स्पष्ट करता है कि किसी पक्षी की मृत्यु का प्रभाव उसके व्यापक पारिस्थितिक संदर्भ में समझना आवश्यक है।

क्या सोलर पैनलों की गर्मी पक्षियों को जला सकती है?

इस विषय में सबसे अधिक भ्रम सामान्य फोटोवोल्टाइक पैनलों और सौर तापीय टावरों के बीच होता है। सामान्य सोलर पैनल सूर्य के प्रकाश को अर्धचालक पदार्थों की सहायता से विद्युत ऊर्जा में बदलते हैं। इस प्रक्रिया में पैनल गर्म हो सकते हैं, लेकिन उन्हें पक्षियों को हवा में जलाने वाली व्यवस्था समझना गलत होगा। इसके विपरीत 'कंसन्ट्रेटेड सोलर पावर' की कुछ प्रणालियों में बड़ी संख्या में दर्पण सूर्य की किरणों को एक केंद्रीय रिसीवर की ओर मोड़ते हैं। इससे उस स्थान पर अत्यधिक ऊर्जा केंद्रित हो सकती है। यदि कोई पक्षी ऐसे तीव्र विकिरण वाले क्षेत्र से गुजरता है, तो उसके पंखों को गंभीर नुकसान पहुँच सकता है। कुछ मामलों में पंख झुलसने के कारण उसकी उड़ने की क्षमता कम हो सकती है और वह जमीन या किसी दूसरी संरचना से टकरा सकता है।

अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित 'इवानपाह सोलर इलेक्ट्रिक जनरेटिंग सिस्टम' से जुड़े अध्ययनों में ऐसी घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया गया है। इस संयंत्र में हजारों दर्पणों से सूर्य की किरणें केंद्रीय टावरों पर केंद्रित की जाती थीं। वैज्ञानिकों ने पाया कि कुछ पक्षियों की मृत्यु का संबंध उस क्षेत्र में मौजूद तीव्र सौर विकिरण से हो सकता था। अत्यधिक ऊर्जा वाले क्षेत्र से गुजरने पर पक्षियों के पंख झुलस सकते थे। इससे उनकी उड़ान प्रभावित होती थी और मृत्यु का जोखिम पैदा हो सकता था। अमेरिकी वन्यजीव सेवा तथा ओईसीडी दोनों ने सौर तापीय टावरों में इस विशेष जोखिम का उल्लेख किया है। लेकिन यह समस्या सभी सामान्य छतों पर लगे फोटोवोल्टाइक पैनलों की विशेषता नहीं है। इसीलिए किसी सोलर टावर के आसपास पक्षियों के पंख जलने की तस्वीर दिखाकर यह दावा करना कि घर की छत पर लगे सभी सोलर पैनल भी पक्षियों को जला देते हैं, भ्रामक होगा।

इस प्रकार के सौर तापीय संयंत्रों में पक्षियों के संरक्षण के लिए दर्पणों की दिशा, प्रकाश के केंद्रित होने का स्थान और संचालन की परिस्थितियाँ विशेष महत्त्व रखती हैं। यदि किसी समय बहुत अधिक दर्पणों से आने वाली रोशनी ऐसे क्षेत्र में केंद्रित हो रही हो जहाँ पक्षियों की उड़ान होती है, तो जोखिम बढ़ सकता है। अनुसंधान में दर्पणों की संचालन पद्धति और दूसरे तकनीकी उपायों से इस जोखिम को कम करने की संभावनाओं पर विचार किया गया है। लेकिन किसी एक संयंत्र में उपयोगी पाया गया उपाय दूसरे संयंत्र में समान रूप से प्रभावी होगा, इसकी पुष्टि अलग परीक्षणों से करनी होगी। यह सौर ऊर्जा के पर्यावरणीय प्रभावों को समझने का एक अच्छा उदाहरण है कि ऊर्जा उत्पादन की अलग तकनीकों के लिए अलग सुरक्षा उपाय आवश्यक होते हैं।

सबसे बड़ा खतरा पैनलों से नहीं, बिजली की तारों से भी हो सकता है

बड़े सौर ऊर्जा पार्कों के पक्षियों पर पड़ने वाले प्रभाव में एक और महत्त्वपूर्ण हिस्सा बिजली को संयंत्र से दूर ले जाने वाली प्रसारण लाइनों का है। सोलर पैनलों से बिजली बनने के बाद उसे विद्युत तंत्र से जोड़ना आवश्यक होता है। इसके लिए स्थानीय केबलों, सबस्टेशनों और ऊँची विद्युत प्रसारण लाइनों का उपयोग किया जा सकता है। बड़े पक्षियों को उड़ान के दौरान इन तारों को पहचानने में कठिनाई हो सकती है। विशेष रूप से बहुत पतली, दूर से कम दिखाई देने वाली तारें टकराव का खतरा पैदा करती हैं। कुछ पक्षी अपनी शारीरिक संरचना और उड़ने की शैली के कारण इस जोखिम के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ विद्युत संरचनाओं के संपर्क में आने से पक्षियों को करंट लगने की आशंका भी हो सकती है। लेकिन टकराव और करंट लगने की घटनाएँ अलग हैं। हर मृत पक्षी की मौत बिजली के झटके से नहीं होती; कई बार उड़ते हुए तार से टकराने के कारण गंभीर चोट लग जाती है।

भारत के संदर्भ में यह अंतर विशेष महत्त्वपूर्ण है क्योंकि देश में सौर ऊर्जा का बड़ा विस्तार राजस्थान और गुजरात जैसे क्षेत्रों में हो रहा है। ये क्षेत्र प्रचुर सूर्य प्रकाश के कारण बिजली उत्पादन के लिए उपयुक्त हैं, लेकिन इनके कुछ हिस्से महत्त्वपूर्ण पक्षी आवास भी हैं। यदि कोई सौर परियोजना ऐसे इलाके में विकसित होती है जहाँ दुर्लभ पक्षी नियमित रूप से भोजन खोजते या उड़ान भरते हैं, तो बिजली की नई तारें उनके लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं। इस स्थिति में यह कहना कि सोलर पैनल ने पक्षी को मार दिया, तकनीकी रूप से गलत हो सकता है, क्योंकि वास्तविक कारण बिजली की प्रसारण लाइन है। लेकिन यह भी सही है कि उस लाइन का निर्माण सौर ऊर्जा परियोजना के विस्तार से जुड़ा हो सकता है। इसलिए पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन केवल पैनल की सतह पर समाप्त नहीं होना चाहिए। उसमें परियोजना की सड़क, बाड़, तारें और भूमि उपयोग से संबंधित परिवर्तन भी शामिल होने चाहिए।

गोडावण : भारत का वह पक्षी जिसके लिए सौर ऊर्जा विस्तार चुनौती बन गया

राजस्थान के शुष्क घास के मैदानों में रहने वाला गोडावण, जिसे अंग्रेजी में 'ग्रेट इंडियन बस्टर्ड' कहा जाता है, भारत के सबसे संकटग्रस्त पक्षियों में शामिल है। यह एक बड़ा और भारी पक्षी है तथा जमीन पर रहने और खुले घास के मैदानों में जीवन बिताने के लिए अनुकूलित है। इसके सिर, शरीर और दृष्टि से संबंधित विशेषताएँ ऐसी हैं कि उड़ान के दौरान सामने मौजूद कुछ पतली बिजली की तारों को समय रहते पहचानना कठिन हो सकता है। गोडावण की आबादी पहले ही बहुत कम रह गई है। ऐसे में एक वयस्क पक्षी की मृत्यु भी संरक्षण की दृष्टि से गंभीर हो सकती है। राजस्थान और गुजरात के कुछ क्षेत्रों में सौर तथा पवन ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार के साथ नई विद्युत प्रसारण लाइनों का निर्माण हुआ, जिससे गोडावण के संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ी।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस संकट को गंभीरता से लिया। 'एम. के. रणजीतसिंह बनाम भारत संघ' मामले में 19 अप्रैल 2021 को अदालत ने गोडावण और लेसर फ्लोरिकन की सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण निर्देश दिए। उस आदेश में राजस्थान और गुजरात के लगभग 99 हजार वर्ग किलोमीटर तक फैले प्राथमिक तथा संभावित आवास क्षेत्रों में विद्युत लाइनों से संबंधित प्रतिबंध और भूमिगत केबल बिछाने जैसे उपायों पर जोर दिया गया था। इसके साथ मौजूदा तारों पर 'बर्ड फ्लाइट डायवर्टर' लगाने की व्यवस्था का भी उल्लेख था। इन उपकरणों का उद्देश्य तारों को उड़ते पक्षियों के लिए अधिक दिखाई देने योग्य बनाना है। लेकिन इस व्यापक आदेश को लागू करने में तकनीकी और व्यावहारिक कठिनाइयाँ सामने आईं। विशेष रूप से उच्च वोल्टेज वाली बिजली की तारों को बहुत बड़े क्षेत्र में भूमिगत करना आसान नहीं था।

यहाँ एक बड़ा प्रश्न पैदा हुआ। जिस सौर ऊर्जा की सहायता से भारत जलवायु परिवर्तन का सामना करना चाहता है, उसी के विस्तार से यदि किसी अत्यंत दुर्लभ पक्षी का अस्तित्व खतरे में पड़ता है, तो दोनों आवश्यकताओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए? यह केवल तकनीकी प्रश्न नहीं था। इसमें राष्ट्रीय ऊर्जा नीति, जैव विविधता, विद्युत अवसंरचना और संवैधानिक पर्यावरण संरक्षण के प्रश्न भी जुड़े थे। यही कारण है कि यह मामला भारत में स्वच्छ ऊर्जा और वन्यजीव संरक्षण के बीच संबंध की एक महत्त्वपूर्ण कानूनी मिसाल बन गया।

दिसंबर 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने क्या निर्णय दिया?

गोडावण संरक्षण और सौर ऊर्जा के बीच पैदा हुए इस विवाद में 19 दिसंबर 2025 का सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय विशेष महत्त्वपूर्ण है। इससे पहले 21 मार्च 2024 को न्यायालय ने अपने 2021 के व्यापक निर्देशों पर पुनर्विचार करते हुए एक बड़ी विशेषज्ञ समिति गठित की थी। इस समिति को यह अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी गई कि गोडावण के संरक्षण और नवीकरणीय ऊर्जा के विकास के बीच व्यावहारिक संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जा सकता है। समिति ने राजस्थान और गुजरात में पक्षियों के महत्त्वपूर्ण आवास, बिजली की तारों तथा ऊर्जा परियोजनाओं की स्थिति का मूल्यांकन किया। दिसंबर 2025 में न्यायालय ने विशेषज्ञ समिति की अधिकांश सिफारिशों को स्वीकार करते हुए संशोधित संरक्षण व्यवस्था लागू करने का निर्णय दिया। इसमें दोनों राज्यों के विशिष्ट प्राथमिक आवास क्षेत्रों की पहचान, बिजली की लाइनों के लिए निर्धारित गलियारों की व्यवस्था, कुछ नए ऊर्जा परियोजना विकास पर क्षेत्र-विशेष प्रतिबंध और पक्षियों की सुरक्षा के उपाय शामिल थे।

इस निर्णय की विशेषता यह थी कि न्यायालय ने सौर ऊर्जा के विकास को पूरी तरह रोकने के बजाय उन क्षेत्रों की पहचान पर जोर दिया जहाँ गोडावण की रक्षा विशेष रूप से आवश्यक है। विशेषज्ञ समिति ने राजस्थान में लगभग 14,013 वर्ग किलोमीटर और गुजरात में लगभग 740 वर्ग किलोमीटर के संशोधित प्राथमिक संरक्षण क्षेत्रों का प्रस्ताव रखा था। दिसंबर 2025 के निर्णय में इन क्षेत्रों के संबंध में विशेष संरक्षण उपायों को महत्त्व दिया गया। लेकिन इन संख्याओं को पूरे राजस्थान या गुजरात में सौर ऊर्जा परियोजनाओं पर सार्वभौमिक प्रतिबंध के रूप में नहीं समझना चाहिए। अलग-अलग क्षेत्रों और अलग प्रकार की परियोजनाओं के लिए अलग शर्तें लागू हो सकती हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऊर्जा उत्पादन और प्रसारण से जुड़ी संस्थाओं को संकटग्रस्त प्रजाति के संरक्षण की जिम्मेदारी से अलग नहीं रखा जा सकता।

जनवरी 2026 में इस निर्णय का ऊर्जा परियोजनाओं पर व्यावहारिक प्रभाव भी सामने आया। भारत के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने 12 जनवरी 2026 के आदेश में उन परियोजनाओं के लिए समय संबंधी राहत की व्यवस्था की जिनकी विद्युत प्रसारण लाइनों की अनुमति गोडावण संरक्षण से जुड़े न्यायिक निर्देशों और लंबित निर्णय के कारण प्रभावित हुई थी। मंत्रालय ने संबंधित परिस्थितियों को निर्धारित शर्तों के अंतर्गत नियंत्रण से बाहर की देरी के रूप में स्वीकार किया। इसका अर्थ यह नहीं था कि पक्षी संरक्षण से संबंधित सभी प्रतिबंध समाप्त कर दिए गए। बल्कि यह ऊर्जा परियोजनाओं की समयसीमा और न्यायालय द्वारा निर्धारित पर्यावरणीय शर्तों के बीच प्रशासनिक समन्वय का प्रयास था। यह प्रकरण स्पष्ट करता है कि अब भारत में बड़ी सौर ऊर्जा परियोजनाओं की योजना बनाते समय जैव विविधता का प्रश्न केवल बाद में जोड़ी जाने वाली औपचारिकता नहीं रह सकता।

सोलर पार्क लगाने से पक्षियों के घोंसले और भोजन के स्थान कैसे प्रभावित होते हैं?

सोलर पैनलों के कारण पक्षियों पर पड़ने वाला एक बड़ा प्रभाव प्रत्यक्ष मृत्यु के बिना भी विकसित हो सकता है। यदि किसी विशाल घास के मैदान को साफ करके वहाँ हजारों पैनल लगा दिए जाएँ, तो उस क्षेत्र की वनस्पति, छाया, तापमान और भूमि के उपयोग का स्वरूप बदल जाता है। पहले वहाँ रहने वाले पक्षियों को घोंसले बनाने, कीट पकड़ने और भोजन खोजने के लिए जो स्थान उपलब्ध थे, वे कम हो सकते हैं। कुछ प्रजातियाँ बदली हुई परिस्थितियों में भी रह सकती हैं, लेकिन दूसरी प्रजातियों के लिए वह क्षेत्र अनुपयुक्त हो सकता है। विशेष रूप से जमीन पर घोंसले बनाने वाले पक्षी, खुले मैदानों पर निर्भर प्रजातियाँ और कुछ प्रवासी पक्षी ऐसे परिवर्तनों के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं। इस समस्या को 'हैबिटैट लॉस' अर्थात प्राकृतिक आवास का नुकसान और 'हैबिटैट फ्रैगमेंटेशन' अर्थात आवास का विखंडन कहा जाता है।

आवास का विखंडन इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि किसी पक्षी को केवल एक छोटा घोंसला बनाने का स्थान नहीं चाहिए होता। उसे भोजन खोजने, बच्चों को पालने, शिकारियों से बचने और दूसरे पक्षियों के साथ संपर्क बनाए रखने के लिए पर्याप्त क्षेत्र की आवश्यकता हो सकती है। यदि किसी बड़े घास के मैदान के बीच में सड़कें, विद्युत संरचनाएँ और पैनलों की लंबी कतारें बन जाएँ, तो वह पहले जैसा खुला आवास नहीं रह जाता। कुछ प्रजातियों के लिए इस परिवर्तन से समस्या पैदा हो सकती है, भले ही किसी पक्षी की सीधे पैनल से टकराकर मृत्यु न हुई हो। यही कारण है कि पर्यावरणीय प्रभाव का सही अध्ययन परियोजना बनने के बाद मिलने वाले मृत पक्षियों की संख्या से कहीं अधिक व्यापक होना चाहिए।

लेकिन इस संबंध में सभी सौर परियोजनाओं को एक जैसा मानना भी गलत होगा। यदि पैनल ऐसी पहले से विकसित भूमि पर लगाए जाएँ जहाँ प्राकृतिक जैव विविधता का महत्त्व कम है, तो उनका प्रभाव किसी समृद्ध प्राकृतिक घास के मैदान को बदलने की तुलना में कम हो सकता है। कुछ परियोजनाओं में पैनलों के बीच स्थानीय घास और वनस्पति बनाए रखने से कुछ कीटों तथा पक्षियों को लाभ मिल सकता है। सौर ऊर्जा और कृषि या चराई के विशेष संयोजन, जिन्हें 'एग्रीवोल्टाइक' जैसी व्यवस्थाओं में देखा जाता है, कुछ परिस्थितियों में भूमि के संयुक्त उपयोग की संभावना भी प्रदान करते हैं। लेकिन यह लाभ हर पक्षी प्रजाति के लिए स्वतः उपलब्ध होगा, ऐसा नहीं है। उदाहरण के लिए गोडावण जैसे पक्षी को खुले प्राकृतिक घास के मैदान की आवश्यकता होती है। उसके आवास में पैनलों के नीचे कुछ हरियाली बनाए रखने से उसकी सभी पारिस्थितिक आवश्यकताएँ पूरी हो जाएँगी, यह दावा नहीं किया जा सकता।

क्या रात में भी सौर ऊर्जा संयंत्र पक्षियों को प्रभावित कर सकते हैं?

सौर पैनल मुख्यतः सूर्य के प्रकाश से बिजली बनाते हैं, लेकिन बड़े ऊर्जा परिसरों का प्रभाव केवल दिन में सीमित नहीं रहता। उनके आसपास सुरक्षा रोशनी, विद्युत संरचनाएँ, सड़कें और दूसरी गतिविधियाँ रात में भी मौजूद हो सकती हैं। अनेक प्रवासी पक्षी रात में उड़ान भरते हैं। ऐसे पक्षियों का व्यवहार कृत्रिम प्रकाश से प्रभावित हो सकता है। अत्यधिक या गलत दिशा में लगाई गई रोशनी कुछ परिस्थितियों में पक्षियों को आकर्षित या भ्रमित कर सकती है। इससे उनके उड़ने के रास्ते बदल सकते हैं अथवा संरचनाओं से टकराव का जोखिम बढ़ सकता है। लेकिन किसी विशेष संयंत्र में कितनी रात की रोशनी है और उससे कौन-सी प्रजातियाँ प्रभावित होंगी, इसका मूल्यांकन स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर करना आवश्यक है। सभी सोलर संयंत्र रात में समान मात्रा में प्रकाश नहीं फैलाते।

एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रवासी पक्षियों की यात्राएँ कभी-कभी हजारों किलोमीटर लंबी होती हैं। वे विभिन्न देशों, जलाशयों, घास के मैदानों और तटीय क्षेत्रों से होकर गुजरते हैं। ऐसे में किसी दूरस्थ रेगिस्तानी क्षेत्र में विकसित ऊर्जा परियोजना भी उन पक्षियों को प्रभावित कर सकती है जो वर्ष के केवल कुछ दिनों के लिए वहाँ से गुजरते हैं। इसलिए किसी परियोजना की योजना बनाते समय केवल स्थायी स्थानीय पक्षियों की गिनती पर्याप्त नहीं होगी। मौसमी प्रवास, वर्षा ऋतु के दौरान गतिविधियाँ और प्रवासी पक्षियों के ठहरने वाले स्थान भी महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं। यही कारण है कि सौर ऊर्जा परियोजनाओं से संबंधित कुछ अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देश निर्माण से पहले विभिन्न ऋतुओं में जैव विविधता का आकलन करने पर जोर देते हैं।

क्या तालाबों और जलाशयों पर तैरते सोलर पैनल भी पक्षियों के लिए खतरा हैं?

सौर ऊर्जा उत्पादन की एक नई दिशा जलाशयों पर तैरने वाले पैनलों से जुड़ी है। इन्हें 'फ्लोटिंग फोटोवोल्टाइक' या तैरते सोलर पैनल कहा जाता है। इस तकनीक में पैनलों को विशेष संरचनाओं पर लगाकर जलाशय की सतह पर रखा जाता है। इसका एक लाभ यह हो सकता है कि बिजली उत्पादन के लिए अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता कम पड़े। कुछ परिस्थितियों में पानी के वाष्पीकरण को कम करने और पैनलों के तापमान संबंधी प्रदर्शन में सुधार की संभावना भी होती है। लेकिन जलाशय केवल खाली पड़ी सतह नहीं होता। वह मछलियों, जलीय पौधों, कीटों और अनेक पक्षियों के जीवन से जुड़ा पारिस्थितिक तंत्र होता है। यदि उसका बड़ा हिस्सा पैनलों से ढक दिया जाए, तो पानी तक सूर्य प्रकाश की पहुँच, जलीय वनस्पति और पक्षियों के भोजन तथा विश्राम की परिस्थितियाँ प्रभावित हो सकती हैं।

दिसंबर 2025 में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण से जुड़े वैज्ञानिकों ने तैरते सोलर पैनलों और पक्षियों के संभावित संबंधों पर अध्ययन प्रकाशित किया। इसमें अमेरिका के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों के जलाशयों से संबंधित 291 पक्षी प्रजातियों की संभावित संवेदनशीलता का मूल्यांकन किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि कुछ जलाशयों में तैरते सौर संयंत्रों का जोखिम अधिक हो सकता है, विशेष रूप से जहाँ पक्षियों की संरक्षण संबंधी चिंता और जलाशय के उपयोग की परिस्थितियाँ महत्त्वपूर्ण हों। अध्ययन में उच्च जोखिम वाले जलाशयों का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा अपेक्षाकृत छोटे जलाशयों की श्रेणी में था। लेकिन यह मुख्यतः संभावित संवेदनशीलता और स्थान संबंधी जोखिम का विश्लेषण था, न कि 291 प्रजातियों पर वास्तविक नुकसान सिद्ध करने वाला प्रत्यक्ष परीक्षण। इससे संकेत मिलता है कि जलाशयों पर पैनल लगाने से पहले वहाँ मौजूद पक्षियों और दूसरे जलीय जीवों की आवश्यकताओं का अध्ययन आवश्यक है।

भारत के लिए यह प्रश्न भविष्य में अधिक महत्त्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि यहाँ जलाशयों, बाँधों और दूसरी जल संरचनाओं पर सौर ऊर्जा विकसित करने की संभावनाएँ मौजूद हैं। यदि किसी जलाशय का उपयोग सर्दियों में हजारों प्रवासी जलपक्षी करते हों, तो उसके बड़े हिस्से पर तैरते पैनल लगाने का प्रभाव किसी ऐसे जलाशय से अलग हो सकता है जहाँ पक्षियों की गतिविधि बहुत कम है। इसलिए जलाशय की कुल सतह में कितना हिस्सा पैनलों से ढका जाएगा, पक्षियों के उतरने और उड़ान भरने के लिए कितना खुला क्षेत्र बचेगा और जलीय जीवन में क्या परिवर्तन होंगे, इन प्रश्नों की जाँच आवश्यक है। पानी के ऊपर बिजली पैदा करना भूमि बचाने की तकनीक हो सकती है, लेकिन उससे जलाशय के पारिस्थितिक महत्त्व की अनदेखी नहीं की जा सकती।

पक्षियों की सुरक्षा के लिए सोलर पैनलों में क्या बदलाव किए जा सकते हैं?

पक्षियों के लिए सौर ऊर्जा को सुरक्षित बनाने की पहली आवश्यकता स्वयं पैनलों के डिजाइन को बेहतर करना है। यदि किसी पैनल की सतह से परावर्तित ध्रुवित प्रकाश कुछ जलीय पक्षियों को आकर्षित करने में भूमिका निभाता है, तो वैज्ञानिक ऐसी सतहें विकसित कर सकते हैं जिनसे यह प्रभाव कम हो। इस दिशा में 'एंटी-रिफ्लेक्टिव कोटिंग' और प्रकाश के ध्रुवण को प्रभावित करने वाली विशेष सतहों पर अनुसंधान उपयोगी हो सकता है। लेकिन यहाँ एक तकनीकी चुनौती है। सोलर पैनल का उद्देश्य अधिक से अधिक सूर्य प्रकाश को अवशोषित करके बिजली बनाना है। इसलिए कोई ऐसा उपाय अपनाना उपयुक्त नहीं होगा जिससे पक्षियों का जोखिम तो कम हो, लेकिन पैनल की दक्षता बहुत अधिक घट जाए। आदर्श तकनीक वह होगी जो बिजली उत्पादन बनाए रखते हुए पक्षियों को भ्रमित करने वाले दृश्य संकेतों को कम कर सके।

कैलिफोर्निया ऊर्जा आयोग के 2024 के अध्ययन ने इसी दिशा में अनुसंधान की संभावना बताई थी। रिपोर्ट में कहा गया कि कुछ विशेष एंटी-रिफ्लेक्टिव सतहें पैनलों से उत्पन्न ध्रुवित प्रकाश की मात्रा कम कर सकती हैं। लेकिन यह प्रमाणित करना बाकी है कि इससे वास्तविक परिस्थितियों में पक्षियों का आकर्षण और मृत्यु कितनी कम होगी। पैनलों की सतह का रंग, बनावट, उनके समूह का आकार और आसपास का वातावरण भी महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं। इसलिए भविष्य में पक्षी-सुरक्षित पैनलों का विकास केवल एक नई कोटिंग लगाने की समस्या नहीं होगा। उसके लिए प्रकाशिकी, पक्षियों के व्यवहार और ऊर्जा उत्पादन के विज्ञान को एक साथ समझना आवश्यक होगा।

इस विषय में एक और सम्भावना पैनलों के बीच और आसपास की भूमि के प्रबंधन से जुड़ी है। यदि किसी परियोजना में जल निकासी, स्थानीय वनस्पति और खुले स्थानों की योजना वैज्ञानिक ढंग से बनाई जाए, तो कुछ प्रजातियों के लिए जोखिम कम किए जा सकते हैं। लेकिन संरक्षण का उद्देश्य प्रत्येक सौर पार्क को पक्षियों के लिए आकर्षक स्थान बनाना नहीं होना चाहिए। यदि कोई ऐसी प्रजाति बार-बार पैनलों के पास आती है जिसके टकराने या घायल होने का जोखिम अधिक है, तो उसे उस क्षेत्र की ओर आकर्षित करना उलटा हानिकारक हो सकता है। इसलिए किसी परियोजना के लिए यह समझना आवश्यक है कि किन प्रजातियों को उपयुक्त आवास देना लाभकारी होगा और किन्हें सुरक्षित दूरी पर रहने के लिए प्राकृतिक विकल्प उपलब्ध कराने चाहिए।

बिजली की तारों से पक्षियों को कैसे बचाया जा सकता है?

सौर ऊर्जा परियोजनाओं से जुड़े पक्षी जोखिम को कम करने में बिजली की तारों की व्यवस्था सबसे व्यावहारिक और महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है। अमेरिकी वन्यजीव सेवा के अनुसार जहाँ संभव हो, सौर पैनलों से संबंधित कुछ स्थानीय संग्रहण केबलों को भूमिगत रखने से पक्षियों के टकराने का जोखिम कम हो सकता है। लंबी नई प्रसारण लाइनों की संख्या और लंबाई कम करना भी उपयोगी है। यदि ऊर्जा परियोजना को पहले से मौजूद विद्युत गलियारों से जोड़ा जा सके, तो कुछ परिस्थितियों में नए आवासों को प्रभावित करने की आवश्यकता कम हो सकती है। लेकिन उच्च वोल्टेज वाली लंबी प्रसारण लाइनों को भूमिगत करना तकनीकी और आर्थिक दृष्टि से कठिन हो सकता है। इसलिए प्रत्येक स्थान पर एक ही व्यवस्था लागू करना व्यावहारिक नहीं होगा।

जहाँ तारों को भूमिगत करना संभव नहीं है, वहाँ 'बर्ड फ्लाइट डायवर्टर' एक विकल्प हो सकते हैं। ये विशेष चिह्न या उपकरण तारों पर लगाए जाते हैं ताकि उड़ते हुए पक्षियों को वे अधिक स्पष्ट दिखाई दें। कुछ उपकरण हवा में घूमते हैं, कुछ प्रकाश परावर्तित करते हैं और कुछ को उनकी बनावट तथा रंग के कारण पहचानना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। लेकिन इनसे पक्षियों की मृत्यु पूरी तरह समाप्त हो जाएगी, यह गारंटी नहीं है। उनकी प्रभावशीलता पक्षी की प्रजाति, उपकरण के प्रकार, तार की ऊँचाई और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करती है। गोडावण जैसे अत्यंत संकटग्रस्त पक्षी के मामले में जहाँ मृत्यु का जोखिम अधिक है, केवल तारों पर चिह्न लगाना पर्याप्त होगा या अधिक कठोर उपाय आवश्यक होंगे, इसका निर्णय वैज्ञानिक तथा नियामकीय मूल्यांकन से करना पड़ता है।

विद्युत संरचनाओं का डिजाइन भी महत्त्वपूर्ण है। कुछ पक्षी बिजली के खंभों पर बैठते हैं। यदि खंभे पर विद्युत संपर्कों की दूरी और संरचना सुरक्षित न हो, तो पक्षी के शरीर से दो अलग विद्युत बिंदुओं या किसी सक्रिय तार और धरती से जुड़े हिस्से के बीच संपर्क बन सकता है। इससे करंट लगने की दुर्घटना हो सकती है। इसलिए पक्षी-सुरक्षित खंभों का डिजाइन, उचित दूरी और जहाँ आवश्यक हो वहाँ विद्युत हिस्सों का इन्सुलेशन जोखिम कम कर सकता है। अमेरिकी वन्यजीव सेवा ने नई विद्युत लाइनों में पक्षियों के लिए सुरक्षित खंभों के उपयोग पर जोर दिया है। यह दिखाता है कि सौर ऊर्जा परियोजना में पक्षियों की सुरक्षा के लिए केवल पैनलों के डिजाइन पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। पूरी विद्युत अवसंरचना को ध्यान में रखना होगा।

सोलर पार्क कहाँ लगाए जाएँ, यह निर्णय सबसे महत्त्वपूर्ण क्यों है?

किसी बड़े सौर ऊर्जा संयंत्र से पक्षियों को होने वाले नुकसान को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका कई बार परियोजना निर्माण से पहले ही अपनाया जा सकता है। यदि उसका स्थान ऐसे भूभाग में चुना जाए जहाँ संकटग्रस्त पक्षियों का महत्त्वपूर्ण आवास नहीं है, तो अनेक समस्याओं को शुरू में ही कम किया जा सकता है। इसके विपरीत किसी ऐसे खुले घास के मैदान में विशाल सोलर पार्क बना देना जहाँ दुर्लभ प्रजातियाँ प्रजनन करती हों, बाद में कुछ सुरक्षा चिह्न लगाने के बावजूद नुकसान पहुँचा सकता है। इसी कारण पर्यावरण संरक्षण में 'अवॉइडेंस' अर्थात नुकसान पैदा करने वाली जगह से बचना एक बुनियादी सिद्धांत माना जाता है। यह विचार बताता है कि किसी जोखिम को उत्पन्न होने के बाद कम करने की तुलना में कुछ परिस्थितियों में उसे शुरू से टाल देना अधिक उपयोगी होता है।

भारत में राजस्थान और गुजरात के गोडावण आवासों से संबंधित न्यायिक निर्णय इसी सिद्धांत की व्यावहारिक प्रासंगिकता दिखाते हैं। किसी क्षेत्र में बहुत अधिक सूर्य प्रकाश उपलब्ध होना उसे हर प्रकार की सौर ऊर्जा परियोजना के लिए स्वतः उपयुक्त नहीं बनाता। वहाँ पहले से मौजूद पक्षी प्रजातियों, उनके प्रजनन क्षेत्रों, प्रवास मार्गों और विद्युत अवसंरचना की स्थिति को भी देखना आवश्यक है। कई स्थानों पर पहले से विकसित औद्योगिक जमीन, भवनों की छतें, पार्किंग क्षेत्र और दूसरी उपलब्ध संरचनाएँ सौर ऊर्जा के लिए वैकल्पिक स्थान प्रदान कर सकती हैं। लेकिन इनके तकनीकी तथा आर्थिक पहलुओं का भी अध्ययन आवश्यक है। उदाहरण के लिए छत पर लगे पैनल का उत्पादन, रखरखाव और विद्युत तंत्र से जुड़ाव विशाल सौर पार्क से अलग हो सकता है। इसलिए पक्षियों की सुरक्षा और ऊर्जा की आवश्यकता के बीच संतुलन के लिए व्यापक योजना बनानी होगी।

यहाँ एक और सवाल है। क्या पक्षियों के आवास के आसपास लगाए गए प्रत्येक सौर संयंत्र को हटाना ही समाधान है? आवश्यक नहीं। कुछ परियोजनाओं में तकनीकी बदलाव, विद्युत तारों की पुनर्व्यवस्था, वनस्पति प्रबंधन और वैज्ञानिक निगरानी से जोखिम कम किया जा सकता है। लेकिन अत्यंत संवेदनशील क्षेत्रों में परियोजना को दूसरी जगह स्थापित करना अधिक उचित विकल्प हो सकता है। निर्णय इस आधार पर होना चाहिए कि संबंधित प्रजाति के लिए जोखिम कितना गंभीर है और उपलब्ध विकल्प कितने प्रभावी हैं। संकटग्रस्त पक्षी के अंतिम बचे प्रजनन क्षेत्रों की सुरक्षा और किसी सामान्य औद्योगिक परिसर के आसपास पाए जाने वाले पक्षियों की स्थिति को एक समान मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा।

क्या घरों की छतों पर लगे सोलर पैनल भी पक्षियों के लिए खतरनाक हैं?

घरों और व्यावसायिक भवनों की छतों पर लगे सोलर पैनलों की स्थिति बड़े रेगिस्तानी सौर पार्कों से काफी अलग होती है। सामान्यतः छत पर स्थापित पैनलों से विशाल झील जैसी दृश्य संरचना पैदा नहीं होती। लेकिन इनके नीचे कुछ पक्षियों को घोंसला बनाने और रहने के लिए सुरक्षित स्थान मिल सकता है। कबूतर और कुछ दूसरी प्रजातियाँ छत तथा पैनल के बीच बनी खाली जगह में शरण ले सकती हैं। यह स्थान उन्हें बारिश, धूप और कुछ शिकारियों से आंशिक सुरक्षा प्रदान कर सकता है। लेकिन पक्षियों के घोंसलों और उनके मल के जमा होने से पैनलों की कार्यक्षमता, तारों की सुरक्षा और भवन की स्वच्छता प्रभावित हो सकती है। कुछ परिस्थितियों में सूखे घोंसले या दूसरी सामग्री विद्युत उपकरणों के आसपास आग के जोखिम से भी जुड़ सकती है। हालांकि हर घोंसला आग का कारण बनेगा, ऐसा दावा करना उचित नहीं होगा।

इस स्थिति से निपटने के लिए कुछ स्थानों पर पैनलों की परिधि के आसपास विशेष जाली लगाई जाती है जिससे पक्षी उनके नीचे प्रवेश नहीं कर पाते। लेकिन यहाँ एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। यदि किसी पैनल के नीचे पहले से पक्षियों का सक्रिय घोंसला है और उसमें अंडे या बच्चे मौजूद हैं, तो अचानक उसे बंद कर देना पक्षियों को फँसा सकता है। इससे उनकी मृत्यु भी हो सकती है। इसलिए ऐसी सुरक्षा व्यवस्था लगाने से पहले घोंसलों की स्थिति देखनी चाहिए और वन्यजीव संरक्षण से संबंधित लागू नियमों का पालन करना चाहिए। पैनलों पर ऐसे रसायन, चिपचिपे पदार्थ या खतरनाक नुकीली संरचनाएँ लगाना उचित नहीं होगा जो पक्षियों को घायल कर दें। सामान्य आवासीय सोलर पैनलों के मामले में पक्षियों से होने वाली गंदगी या रखरखाव की समस्या का समाधान मानवीय और सुरक्षित तरीके से किया जा सकता है।

सौर ऊर्जा संयंत्रों में पक्षियों की निगरानी क्यों जरूरी है?

किसी परियोजना के निर्माण से पहले पक्षियों की संख्या और उनकी प्रजातियों का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है, लेकिन काम केवल वहीं समाप्त नहीं होना चाहिए। निर्माण के बाद भी नियमित निगरानी आवश्यक हो सकती है। इससे यह जानकारी मिलती है कि पहले जिन पक्षियों की उपस्थिति दर्ज की गई थी, क्या वे अब भी क्षेत्र का उपयोग करते हैं, उनके आवागमन में क्या बदलाव आया है और किन स्थानों पर दुर्घटनाएँ अधिक हो रही हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी सौर परियोजना की एक विशेष सीमा के आसपास बार-बार पक्षियों के टकराने की घटनाएँ दर्ज होती हैं, तो वहाँ सुरक्षा व्यवस्था बदलने की आवश्यकता हो सकती है। इसी तरह यदि किसी विशेष ऋतु में प्रवासी पक्षियों की संख्या बढ़ती है, तो उस अवधि के जोखिम को अलग ढंग से समझना आवश्यक होगा।

इस निगरानी में वैज्ञानिक पद्धति का विशेष महत्त्व है। यदि किसी संयंत्र के कर्मचारियों को एक वर्ष में पाँच मृत पक्षी मिले और अगले वर्ष दस मिले, तो केवल इन संख्याओं के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मृत्यु दर दोगुनी हो गई है। पहले वर्ष में कितनी बार खोज की गई, दूसरे वर्ष में खोज की विधि क्या थी और मृत पक्षियों के अवशेष कितनी जल्दी हट गए, इन सबका प्रभाव हो सकता है। इसलिए विश्वसनीय अध्ययन में व्यवस्थित सर्वेक्षण, प्रजातियों की पहचान और उपयुक्त सांख्यिकीय विधियों की आवश्यकता होती है। इस प्रकार निगरानी केवल पर्यावरण विभाग के अभिलेख भरने का काम नहीं, बल्कि वास्तविक जोखिम पहचानने और उसे कम करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया है।

क्या सोलर पैनलों पर रोक लगाना पक्षियों की रक्षा का समाधान होगा?

सौर ऊर्जा से जुड़े जोखिम सामने आने के बाद यह प्रश्न उठ सकता है कि यदि पक्षियों की मृत्यु हो रही है, तो क्या सौर परियोजनाओं का विस्तार रोक देना चाहिए। लेकिन पर्यावरण संरक्षण का यह प्रश्न सीधा नहीं है। जलवायु परिवर्तन स्वयं पक्षियों और उनके प्राकृतिक आवासों के लिए गंभीर खतरा है। जीवाश्म ईंधन से होने वाला प्रदूषण और तापमान वृद्धि विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों को प्रभावित करते हैं। इसलिए सौर ऊर्जा जैसी कम-कार्बन तकनीकों के विस्तार का दीर्घकालिक पर्यावरणीय महत्त्व है। अमेरिकी वन्यजीव सेवा भी यह स्वीकार करती है कि सौर ऊर्जा जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने में योगदान देकर पक्षियों और उनके आवासों को जलवायु परिवर्तन से संबंधित जोखिमों से बचाने में अप्रत्यक्ष सहायता कर सकती है।

लेकिन दूसरी ओर केवल जलवायु के लाभ के आधार पर किसी भी सौर परियोजना के स्थानीय पर्यावरणीय नुकसान की अनदेखी नहीं की जा सकती। यदि किसी अत्यंत संकटग्रस्त पक्षी का महत्त्वपूर्ण आवास नष्ट हो जाए, तो उस नुकसान की भरपाई दूसरी जगह अधिक बिजली पैदा करके स्वतः नहीं हो जाएगी। इसलिए सही प्रश्न यह नहीं है कि सौर ऊर्जा अच्छी है या बुरी। वास्तविक प्रश्न यह है कि उसे कहाँ, किस पैमाने पर और किस प्रकार विकसित किया जाए। ऊर्जा की आवश्यकता तथा जैव विविधता की रक्षा परस्पर विरोधी उद्देश्य होना अनिवार्य नहीं है। लेकिन दोनों के बीच संतुलन बनाने के लिए वैज्ञानिक जानकारी, उचित नियमन और पर्यावरणीय संवेदनशीलता आवश्यक है।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के दिसंबर 2025 के निर्णय का व्यापक महत्त्व भी इसी संदर्भ में है। उसमें संकटग्रस्त गोडावण के संरक्षण की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए नवीकरणीय ऊर्जा के विकास के व्यावहारिक प्रश्नों पर विचार किया गया। यह इस बात का उदाहरण है कि स्वच्छ ऊर्जा से संबंधित राष्ट्रीय लक्ष्य और किसी प्रजाति का अस्तित्व, दोनों को गंभीरता से समझना आवश्यक है। केवल एक उद्देश्य को सर्वोपरि मानकर दूसरे की अनदेखी करने से दीर्घकालिक और टिकाऊ समाधान विकसित करना कठिन हो सकता है।

निष्कर्ष : बिजली भी चाहिए और पक्षियों के लिए सुरक्षित आकाश भी

सोलर पैनलों और पक्षियों के संबंध में अब तक हुए अध्ययनों से एक महत्त्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। स्वच्छ ऊर्जा की तकनीक भी स्थानीय प्रकृति पर प्रभाव डाल सकती है। कुछ बड़े फोटोवोल्टाइक संयंत्रों में पक्षियों के टकराने की घटनाएँ दर्ज हुई हैं। कुछ वैज्ञानिक प्रमाण संकेत देते हैं कि पानी खोजने वाले पक्षियों को पैनलों की ध्रुवित रोशनी आकर्षित कर सकती है। लेकिन 'लेक इफेक्ट' की पूरी प्रक्रिया और उसका विभिन्न प्रजातियों पर प्रभाव अभी अनुसंधान का विषय है। विशेष सौर तापीय टावरों में अत्यधिक केंद्रित सूर्य प्रकाश से पक्षियों के पंख झुलसने का अलग जोखिम है। इसके अतिरिक्त विद्युत प्रसारण लाइनें, बाड़ और प्राकृतिक आवास में परिवर्तन भी पक्षियों को प्रभावित कर सकते हैं।

भारत में गोडावण का संकट बताता है कि किसी अत्यंत दुर्लभ पक्षी के लिए एक ऊँची बिजली की तार भी गंभीर खतरा बन सकती है। दूसरी ओर उचित स्थान पर लगाए गए सोलर पैनल जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने में योगदान दे सकते हैं। इसलिए पक्षियों की सुरक्षा का रास्ता सौर ऊर्जा के विरोध में नहीं, बल्कि उसके अधिक जिम्मेदार विकास में खोजा जाना चाहिए। संवेदनशील आवासों की पहचान, उपयुक्त स्थानों का चयन, बिजली की तारों को सुरक्षित बनाना, पैनलों के डिजाइन में सुधार और निर्माण के बाद वैज्ञानिक निगरानी, इन सभी उपायों की अपनी भूमिका है।

अंततः सौर ऊर्जा का वास्तविक उद्देश्य केवल बिना धुआँ पैदा किए बिजली बनाना नहीं होना चाहिए। उसे ऐसी ऊर्जा व्यवस्था विकसित करने में योगदान देना चाहिए जो पृथ्वी के व्यापक पर्यावरण को सुरक्षित रख सके। यदि सूर्य की रोशनी से बिजली बनाने के लिए ऐसे विशाल क्षेत्र तैयार किए जाएँ जिनमें पक्षियों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाएँ या उनकी उड़ान ही जोखिमपूर्ण बन जाए, तो पर्यावरण संरक्षण का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। वैज्ञानिक चुनौती यही है कि पैनलों की दक्षता बढ़ाने के साथ उनका प्रकृति पर प्रभाव कम किया जाए। सौर ऊर्जा और पक्षियों की सुरक्षा के बीच कोई अनिवार्य विरोध नहीं है। उचित योजना और प्रभावी संरक्षण उपायों से दोनों को साथ आगे बढ़ाया जा सकता है। पृथ्वी पर ऊर्जा की आवश्यकता मनुष्यों को है, लेकिन उसका आकाश केवल मनुष्यों का नहीं है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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