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Sonar Technology: समुद्र के अंधेरे में ध्वनि से कैसे देखती हैं पनडुब्बियां? जानिए पूरा विज्ञान
Sonar Technology: सोनार ध्वनि की मदद से समुद्र में छिपी वस्तुओं और पनडुब्बियों का पता कैसे लगाता है? जानिए एक्टिव-पैसिव सोनार, समुद्र की गहराई मापने की तकनीक और डॉल्फिन के प्राकृतिक बायोसोनार का विज्ञान।
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Sonar Technology: समुद्र की गहराई में सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता। हजारों मीटर नीचे इतना अंधेरा होता है कि शक्तिशाली कैमरों से भी दूर तक देखना संभव नहीं होता। इसके बावजूद आधुनिक जहाज समुद्र के तल पर मौजूद पहाड़ों, गहरी खाइयों और डूबे हुए जहाजों का नक्शा बना सकते हैं। पनडुब्बियाँ पानी के भीतर छिपी दूसरी पनडुब्बियों की आवाज पहचान सकती हैं। वैज्ञानिक गहरे समुद्र में मछलियों के समूह और समुद्री जीवों की गतिविधियों का पता लगा सकते हैं। यह सब 'सोनार' नामक तकनीक की सहायता से होता है। इसमें प्रकाश के बजाय ध्वनि का उपयोग किया जाता है। समुद्र में ध्वनि लगभग 1,500 मीटर प्रति सेकंड की गति से चलती है और अनुकूल परिस्थितियों में बहुत दूर तक पहुँच सकती है। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि मनुष्य के सोनार बनाने से लाखों वर्ष पहले डॉल्फिन और दाँत वाली व्हेल जैसे समुद्री जीव ध्वनि की प्रतिध्वनि से अपने आसपास की दुनिया पहचानने की क्षमता विकसित कर चुके थे। उनके मस्तिष्क को किसी कंप्यूटर स्क्रीन की आवश्यकता नहीं होती। वे लौटती हुई आवाज से शिकार की दूरी, दिशा और कई बार उसकी विशेषताओं तक का अनुमान लगा लेते हैं।
सोनार क्या है और यह रडार से कैसे अलग है?
सोनार का पूरा नाम 'साउंड नेविगेशन एंड रेंजिंग' है। इसका अर्थ है ध्वनि की सहायता से दिशा, स्थिति और दूरी का पता लगाना। सरल शब्दों में सोनार एक ऐसी तकनीक है जिसमें पानी के भीतर ध्वनि तरंगों का उपयोग करके किसी वस्तु की मौजूदगी, उसकी दूरी, दिशा, गति या समुद्र की गहराई के बारे में जानकारी प्राप्त की जाती है। यह समुद्री अनुसंधान, नौवहन, मछली पालन, सैन्य सुरक्षा और पानी के भीतर निर्माण जैसी गतिविधियों का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन, अर्थात 'नोआ' के अनुसार वैज्ञानिक सोनार की सहायता से समुद्र तल के मानचित्र तैयार करते हैं, जहाजों के लिए खतरनाक जलमग्न अवरोधों की पहचान करते हैं और डूबे हुए जहाजों सहित अनेक संरचनाओं का पता लगाते हैं। इसका उपयोग समुद्र के भीतर मौजूद जीवों और दूसरी वस्तुओं की पहचान में भी होता है।
सोनार को समझने का सबसे आसान तरीका उसकी तुलना रडार से करना है। रडार मुख्यतः विद्युतचुंबकीय तरंगों, विशेष रूप से रेडियो तरंगों, का उपयोग करता है। कोई विमान आसमान में उड़ रहा हो, तो रडार द्वारा भेजा गया संकेत उससे टकराकर वापस आ सकता है। लौटे हुए संकेतों से विमान की दिशा, दूरी और गति के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। लेकिन समुद्र के खारे पानी में अधिकांश रेडियो तरंगें बहुत तेजी से कमजोर हो जाती हैं। पानी की विद्युत चालकता और उसके विद्युतचुंबकीय गुण इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए सामान्य रडार की तरह समुद्र के भीतर दूर तक रेडियो संकेत भेजकर वस्तुओं को खोजना व्यावहारिक नहीं है। प्रकाश की भी सीमा है। साफ पानी में कुछ दूरी तक प्रकाश पहुँच सकता है। लेकिन समुद्र की गहराई तथा गंदले पानी में प्रकाश का प्रकीर्णन और अवशोषण उसकी उपयोगिता सीमित कर देता है। इसके विपरीत ध्वनि एक यांत्रिक तरंग है जो पानी के भीतर दबाव के छोटे-छोटे परिवर्तनों के रूप में आगे बढ़ती है। उसकी कुछ आवृत्तियाँ समुद्र में बहुत दूर तक पहुँच सकती हैं। यही कारण है कि पानी के भीतर दूर की वस्तुओं का पता लगाने के लिए सोनार अत्यंत उपयोगी है।
यहाँ एक सामान्य भ्रम दूर करना भी आवश्यक है। सोनार कोई ऐसा कैमरा नहीं है जो पानी के भीतर वस्तुओं को ठीक उसी तरह देखता हो जैसे हमारी आँखें प्रकाश की सहायता से देखती हैं। सोनार मूलतः ध्वनि से संबंधित जानकारी प्राप्त करता है। आधुनिक कंप्यूटर उस जानकारी को चित्र, नक्शे या त्रिआयामी मॉडल में बदल सकते हैं। इसलिए किसी जहाज की स्क्रीन पर समुद्र के तल का रंगीन चित्र दिखाई देना इस बात का प्रमाण नहीं है कि वहाँ पानी के भीतर किसी कैमरे ने वैसी ही तस्वीर खींची थी। कई बार वह चित्र हजारों या लाखों ध्वनि संकेतों के विश्लेषण से तैयार किया गया वैज्ञानिक मानचित्र होता है। सोनार की यही विशेषता उसे समुद्री दुनिया के अध्ययन में अत्यंत उपयोगी बनाती है।
सोनार का जन्म कब हुआ और उसके पीछे टाइटैनिक की क्या भूमिका थी?
सोनार के विकास का इतिहास बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में समुद्री दुर्घटनाओं और युद्ध से जुड़ा है। वर्ष 1912 में विशाल यात्री जहाज 'टाइटैनिक' के हिमखंड से टकराकर डूबने के बाद समुद्र में छिपी खतरनाक वस्तुओं का समय रहते पता लगाने की आवश्यकता पर अधिक ध्यान गया। इसी दौर में वैज्ञानिकों और आविष्कारकों ने पानी के भीतर ध्वनि की सहायता से अवरोधों तथा दूर की वस्तुओं को पहचानने की संभावनाओं पर काम किया। हालांकि यह कहना कि टाइटैनिक के डूबने के बाद किसी एक व्यक्ति ने सोनार का आविष्कार कर दिया, ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा। पानी में ध्वनि के व्यवहार और उसकी सहायता से दूरी मापने के प्रयोग पहले से होते रहे थे। टाइटैनिक की दुर्घटना ने इस अनुसंधान की उपयोगिता को अधिक स्पष्ट किया, जबकि प्रथम विश्वयुद्ध ने उसे तेज गति से विकसित करने के लिए सैन्य आवश्यकता पैदा की।
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जर्मन पनडुब्बियाँ मित्र राष्ट्रों के जहाजों के लिए गंभीर खतरा बन गई थीं। पानी की सतह के नीचे छिपी पनडुब्बी को दूर से पहचानना कठिन था। इसी समस्या से निपटने के लिए ब्रिटेन और फ्रांस में पानी के भीतर ध्वनि आधारित पहचान प्रणालियों पर काम हुआ। फ्रांसीसी भौतिक विज्ञानी पॉल लांजवां ने अल्ट्रासोनिक तरंगों और पायजोइलेक्ट्रिक तकनीक के उपयोग में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। ब्रिटेन में रॉबर्ट विलियम बॉयल और अल्बर्ट ब्यूमोंट वुड जैसे वैज्ञानिकों ने सक्रिय ध्वनि पहचान प्रणालियों के विकास में भूमिका निभाई। वर्ष 1917 के आसपास ब्रिटिश नौसेना के लिए विकसित प्रणालियाँ आगे चलकर 'एएसडीआईसी' के नाम से जानी गईं। ब्रिटिश साइंस म्यूजियम के अभिलेखों में 1917–18 के पायजोइलेक्ट्रिक क्रिस्टलों और प्रारंभिक सक्रिय जलमग्न ध्वनि पहचान उपकरणों का उल्लेख मिलता है।
द्वितीय विश्वयुद्ध तक यह तकनीक नौसैनिक युद्ध का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी थी। उस समय पनडुब्बियों के विरुद्ध युद्ध में जलमग्न लक्ष्यों को पहचानना और उनकी स्थिति का अनुमान लगाना अत्यंत आवश्यक था। ब्रिटेन में 'एएसडीआईसी' शब्द लंबे समय तक प्रचलित रहा, जबकि अमेरिका में 'सोनार' शब्द लोकप्रिय हुआ और बाद में व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रयोग में आ गया। युद्ध के बाद यही तकनीक नागरिक समुद्र विज्ञान में भी तेजी से विकसित हुई। वैज्ञानिकों ने समुद्र की गहराई मापने, समुद्री पर्वतमालाओं के नक्शे बनाने और मत्स्य संसाधनों का अध्ययन करने के लिए अधिक उन्नत सोनार प्रणालियाँ तैयार कीं। इस प्रकार जिस तकनीक का विकास नौसैनिक सुरक्षा की तत्काल आवश्यकता से तेज हुआ था, उसने आगे चलकर पृथ्वी के सबसे कम समझे गए क्षेत्र—महासागरों के गहरे भाग—के वैज्ञानिक अध्ययन को एक नया आधार दिया।
सोनार पानी में आवाज भेजकर दूरी कैसे मापता है?
सोनार के मूल सिद्धांत को समझने के लिए पहाड़ों में सुनाई देने वाली प्रतिध्वनि का उदाहरण उपयोगी है। यदि कोई व्यक्ति किसी ऊँची चट्टान के सामने जोर से आवाज लगाता है, तो कुछ समय बाद उसे अपनी ही आवाज वापस सुनाई दे सकती है। ऐसा इसलिए होता है कि ध्वनि तरंगें चट्टान से टकराकर परावर्तित होती हैं और वापस लौटती हैं। यदि ध्वनि की गति और लौटने में लगा समय मालूम हो, तो चट्टान की दूरी का अनुमान लगाया जा सकता है। सोनार ठीक इसी सामान्य सिद्धांत का उपयोग करता है। लेकिन अत्यंत संवेदनशील उपकरणों और जटिल गणनाओं के साथ। समुद्र में कोई जहाज विशेष उपकरण से ध्वनि का छोटा संकेत भेजता है। यह संकेत पानी में आगे बढ़ता है और समुद्र तल या किसी दूसरी वस्तु से टकराने पर उसका कुछ हिस्सा लौट आता है। उपकरण लौटे हुए संकेत को पहचानता है और भेजने तथा वापस प्राप्त होने के बीच का समय मापता है।
इस पूरी प्रक्रिया में एक विशेष उपकरण की भूमिका होती है जिसे 'ट्रांसड्यूसर' कहा जाता है। यह विद्युत ऊर्जा को ध्वनि ऊर्जा में और आवश्यकता के अनुसार ध्वनि को विद्युत संकेतों में बदलने का काम करता है। अनेक सोनार उपकरणों में पायजोइलेक्ट्रिक पदार्थों का उपयोग होता है। ऐसे पदार्थ विद्युत संकेत मिलने पर सूक्ष्म कंपन कर सकते हैं और ये कंपन पानी में ध्वनि तरंगें पैदा करते हैं। इसी प्रकार लौटती हुई ध्वनि से उत्पन्न कंपन को विद्युत संकेत में बदला जा सकता है। आधुनिक सोनार में कभी एक ट्रांसड्यूसर होता है और कभी अनेक ट्रांसड्यूसरों की पूरी श्रृंखला, जिसे 'ट्रांसड्यूसर एरे' कहा जाता है। जहाज के नीचे लगा यह उपकरण निर्धारित दिशा में ध्वनि भेज सकता है और लौटने वाली प्रतिध्वनि के आधार पर दूरी तथा दिशा की गणना कर सकता है।
दूरी की गणना का सिद्धांत बहुत सरल है। मान लीजिए किसी जहाज ने समुद्र तल की ओर ध्वनि संकेत भेजा और वह संकेत चार सेकंड बाद वापस आ गया। समुद्र के पानी में ध्वनि की औसत गति लगभग 1,500 मीटर प्रति सेकंड मानें, तो चार सेकंड में ध्वनि ने लगभग 6,000 मीटर की कुल यात्रा की। लेकिन यह समुद्र की गहराई नहीं है, क्योंकि ध्वनि पहले नीचे गई और फिर वापस ऊपर आई। इसलिए कुल दूरी को दो से भाग देना होगा। इस उदाहरण में समुद्र की अनुमानित गहराई 3,000 मीटर होगी।
यह सरल गणना तब उपयुक्त होती है जब ध्वनि लगभग सीधे रास्ते से गई हो और उसकी गति को एक औसत स्थिर मान से व्यक्त किया जा सके। वास्तविक समुद्री सर्वेक्षण में ध्वनि की गति विभिन्न गहराइयों पर बदल सकती है और उसका रास्ता मुड़ भी सकता है। इसलिए आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों में इन प्रभावों का सुधार किया जाता है।
यहाँ एक छोटी-सी बात अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यदि चार सेकंड के समय को बिना दो से भाग दिए दूरी में बदल दिया जाए, तो समुद्र की गहराई वास्तविक अनुमान की लगभग दोगुनी दिखाई देगी। सोनार की गणना में आने-जाने का समय और केवल एक दिशा की दूरी अलग रखने का यही कारण है। लेकिन किसी वस्तु की सटीक स्थिति निकालने के लिए केवल समय जानना पर्याप्त नहीं होता। उसकी दिशा, ध्वनि की वास्तविक गति और समुद्र की भौतिक परिस्थितियाँ भी महत्त्वपूर्ण होती हैं।
समुद्र में ध्वनि हवा की तुलना में इतनी तेज क्यों चलती है?
सामान्य कमरे के तापमान पर हवा में ध्वनि की गति लगभग 340 मीटर प्रति सेकंड होती है, जबकि समुद्री पानी में यह लगभग 1,500 मीटर प्रति सेकंड हो सकती है। अर्थात ध्वनि समुद्र में हवा की तुलना में लगभग साढ़े चार गुना तेजी से चल सकती है। इसके पीछे पानी की प्रत्यास्थता और घनत्व जैसे भौतिक गुणों का संयुक्त प्रभाव है। ध्वनि किसी माध्यम में दबाव से उत्पन्न विक्षोभ के रूप में आगे बढ़ती है। पानी सामान्य परिस्थितियों में हवा की तुलना में बहुत कम संपीड्य होता है। इस गुण के कारण उसमें दबाव संबंधी विक्षोभ अपेक्षाकृत तेजी से आगे बढ़ सकता है। लेकिन केवल यह कहना कि पानी अधिक घना है, इसलिए ध्वनि अधिक तेज चलती है, पर्याप्त वैज्ञानिक व्याख्या नहीं होगी। किसी माध्यम में ध्वनि की गति उसके प्रत्यास्थ गुणों और घनत्व दोनों से निर्धारित होती है।
समुद्र में ध्वनि की गति हर जगह बिल्कुल समान नहीं होती। पानी का तापमान, लवणता और दबाव इसे प्रभावित करते हैं। सामान्यतः तापमान बढ़ने से समुद्री पानी में ध्वनि की गति बढ़ती है। लवणता और दबाव में वृद्धि भी इसे प्रभावित कर सकती है। गहराई बढ़ने के साथ दबाव लगातार बढ़ता है, जबकि पानी का तापमान अलग-अलग समुद्री क्षेत्रों में अलग ढंग से बदलता है। कुछ स्थानों पर ऊपरी गर्म परत से नीचे उतरने पर पानी का तापमान तेजी से घटता है। इस बदलाव के कारण ध्वनि की गति भी बदल सकती है। आगे गहराई में जहाँ तापमान अपेक्षाकृत स्थिर होता है, दबाव बढ़ने का प्रभाव अधिक महत्त्वपूर्ण हो सकता है। इसीलिए वैज्ञानिक समुद्र में सोनार का उपयोग करते समय केवल एक अनुमानित गति पर निर्भर नहीं रहते। वे अलग-अलग गहराइयों पर ध्वनि की गति मापने के लिए विशेष उपकरण भी इस्तेमाल करते हैं।
क्या समुद्र के भीतर आवाज भी अपना रास्ता बदल सकती है?
हाँ, और सोनार के विज्ञान का यह सबसे रोचक हिस्सा है। हम सामान्यतः सोचते हैं कि आवाज किसी स्रोत से निकलकर चारों ओर फैलती है। लेकिन समुद्र में तापमान, लवणता और दबाव की अलग-अलग परतों के कारण ध्वनि की गति बदल सकती है। यदि किसी ध्वनि तरंग का एक हिस्सा दूसरे हिस्से की तुलना में अलग गति से चल रहा हो, तो तरंग का रास्ता मुड़ सकता है। इस घटना को 'अपवर्तन' कहा जाता है। प्रकाश के अपवर्तन की तरह ध्वनि का अपवर्तन भी तरंग की गति में परिवर्तन से जुड़ा होता है। यही कारण है कि समुद्र में भेजा गया सोनार संकेत हमेशा बिल्कुल सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़ता। कुछ परिस्थितियों में वह ऊपर या नीचे की ओर मुड़ सकता है और किसी विशेष क्षेत्र तक अपेक्षित मात्रा में नहीं पहुँच सकता।
समुद्र की सतह के नीचे कई बार पानी की ऐसी परत मिलती है जिसमें तापमान बहुत तेजी से बदलता है। इसे 'थर्मोक्लाइन' कहा जाता है। इस परत के आसपास ध्वनि की गति में होने वाला परिवर्तन सोनार संकेतों के मार्ग पर असर डाल सकता है। नौसैनिक तथा वैज्ञानिक उपयोग में इस स्थिति का महत्त्व बहुत अधिक है। यदि सोनार का संकेत किसी वस्तु तक पहुँचने से पहले दूसरी दिशा में मुड़ जाए, तो वस्तु मौजूद होने के बावजूद उसका पता लगाना कठिन हो सकता है। इसी तरह किसी दूर की वस्तु से आने वाली ध्वनि ऐसी परतों के कारण अप्रत्याशित रास्ते से सुनाई दे सकती है। इसलिए सोनार पर दिखाई देने वाली जानकारी की सही व्याख्या करने के लिए समुद्र के तापमान और ध्वनि की गति की संरचना को समझना आवश्यक है।
इस घटना का सबसे आश्चर्यजनक रूप समुद्र के भीतर मौजूद प्राकृतिक 'साउंड चैनल' है। कुछ महासागरीय क्षेत्रों में ऐसी गहराई होती है जहाँ ध्वनि की गति आसपास की परतों की तुलना में न्यूनतम होती है। ऊपर और नीचे की परतों में गति बढ़ने के कारण ध्वनि तरंगें मुड़कर इस क्षेत्र की ओर लौट सकती हैं। इससे ध्वनि का एक हिस्सा अपेक्षाकृत सीमित गहराई वाले मार्ग में बना रह सकता है और बहुत लंबी दूरी तक पहुँच सकता है। इस प्राकृतिक व्यवस्था को 'सोफार चैनल' से भी जोड़ा जाता है। अनुकूल परिस्थितियों में कम आवृत्ति की ध्वनि समुद्र के भीतर सैकड़ों या हजारों किलोमीटर तक पहुँच सकती है। लेकिन यह दूरी हमेशा एक जैसी नहीं होगी। समुद्र की संरचना, ध्वनि की आवृत्ति, आसपास की आवाजें और विभिन्न भौतिक परिस्थितियाँ परिणाम बदल सकती हैं।
यहाँ एक अद्भुत प्राकृतिक तथ्य सामने आता है। महासागर केवल पानी का विशाल भंडार नहीं है। उसके भीतर ऐसी ध्वनिक संरचनाएँ भी मौजूद हैं जो कुछ आवाजों को बहुत दूर तक पहुँचने में सहायता करती हैं। वैज्ञानिक इन्हीं गुणों का उपयोग दूरस्थ समुद्री ध्वनियों का अध्ययन करने के लिए करते हैं। व्हेल द्वारा उत्पन्न कुछ कम आवृत्ति की आवाजें भी उपयुक्त परिस्थितियों में बहुत दूर तक पहुँच सकती हैं। इससे समुद्र में ध्वनि केवल वस्तुओं का पता लगाने का उपकरण नहीं रहती, बल्कि लंबी दूरी के संचार और समुद्री पर्यावरण को समझने का माध्यम भी बन जाती है।
सक्रिय और निष्क्रिय सोनार में क्या अंतर है?
सोनार को सामान्यतः दो प्रमुख प्रकारों में बाँटा जाता है—'एक्टिव सोनार' अर्थात सक्रिय सोनार और 'पैसिव सोनार' अर्थात निष्क्रिय सोनार। सक्रिय सोनार स्वयं ध्वनि का संकेत पैदा करता है और उससे लौटने वाली प्रतिध्वनि का विश्लेषण करता है। यदि किसी जहाज को यह जानना हो कि उसके नीचे समुद्र का तल कितनी गहराई पर है, तो वह ध्वनि संकेत भेजकर लौटने में लगा समय माप सकता है। इसी तरह किसी पानी के भीतर मौजूद वस्तु की दूरी और दिशा का अनुमान भी सक्रिय सोनार से लगाया जा सकता है। सक्रिय सोनार का लाभ यह है कि वह ऐसी वस्तु का पता भी लगा सकता है जो स्वयं बहुत कम आवाज पैदा करती हो। लेकिन इसकी एक सीमा भी है। सोनार से भेजी गई आवाज दूसरे उपकरणों द्वारा भी पहचानी जा सकती है। इसलिए सैन्य परिस्थितियों में सक्रिय सोनार चलाने वाला जहाज या पनडुब्बी अपने आसपास मौजूद दूसरे पक्ष को अपनी उपस्थिति का संकेत दे सकता है।
निष्क्रिय सोनार का सिद्धांत इससे अलग है। वह स्वयं कोई ध्वनि संकेत नहीं भेजता, बल्कि पानी में पहले से मौजूद आवाजों को सुनता है। इसके लिए 'हाइड्रोफोन' नामक विशेष जलमग्न माइक्रोफोन का उपयोग किया जाता है। यदि समुद्र में किसी जहाज का इंजन, प्रोपेलर या दूसरी मशीनरी आवाज उत्पन्न कर रही हो, तो निष्क्रिय सोनार उन संकेतों को पकड़ने का प्रयास कर सकता है। आधुनिक प्रणालियाँ अलग-अलग आवृत्तियों और ध्वनि के पैटर्न का विश्लेषण करके स्रोत की पहचान करने में सहायता करती हैं। इसका बड़ा लाभ यह है कि सुनने वाला उपकरण स्वयं ध्वनि प्रसारित नहीं करता। लेकिन एक अकेले निष्क्रिय सोनार से किसी आवाज के स्रोत की सटीक दूरी तत्काल ज्ञात करना सामान्यतः संभव नहीं होता। इसके लिए अनेक सेंसर, अलग स्थानों से प्राप्त संकेत या समय के साथ स्रोत की गति से संबंधित गणनाएँ उपयोग की जा सकती हैं।
इस अंतर को सामान्य जीवन के उदाहरण से समझा जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति अंधेरे कमरे में खड़ा होकर जोर से आवाज लगाता है और लौटने वाली प्रतिध्वनि से दीवार की दूरी का अनुमान लगाता है, तो यह सक्रिय सोनार जैसा व्यवहार है। दूसरी ओर यदि वह बिना आवाज किए केवल किसी दूसरे व्यक्ति के पैरों की आहट सुनकर उसकी उपस्थिति और दिशा समझने का प्रयास करता है, तो यह निष्क्रिय सोनार जैसा है। दोनों स्थितियों में सुनने की क्षमता महत्त्वपूर्ण है, लेकिन सक्रिय व्यवस्था में अपना संकेत भेजा जाता है और निष्क्रिय व्यवस्था में किसी दूसरे स्रोत की आवाज सुनी जाती है।
पनडुब्बियाँ बिना दिखाई दिए दूसरी पनडुब्बियों का पता कैसे लगाती हैं?
आधुनिक पनडुब्बियों के लिए समुद्र एक अत्यंत जटिल ध्वनिक वातावरण है। पानी के भीतर जहाजों के इंजन, प्रोपेलर, समुद्री जीव, वर्षा, लहरें और प्राकृतिक भूगर्भीय गतिविधियाँ अलग-अलग प्रकार की आवाजें उत्पन्न कर सकती हैं। कोई पनडुब्बी यदि दूसरे जहाज या पनडुब्बी का पता लगाना चाहती है, तो उसे इस मिश्रित ध्वनिक वातावरण में उपयोगी संकेतों को पहचानना पड़ता है। इसके लिए निष्क्रिय सोनार बहुत उपयोगी है। विशेष हाइड्रोफोन और उनके समूह विभिन्न दिशाओं से आने वाली आवाजें प्राप्त करते हैं। कंप्यूटर उन संकेतों का विश्लेषण करके उनकी आवृत्ति, समय और परिवर्तन का अध्ययन कर सकते हैं। कुछ मशीनों की आवाजों में ऐसे नियमित घटक होते हैं जिनसे उनकी सामान्य प्रकृति या स्रोत के बारे में जानकारी मिल सकती है।
लेकिन आधुनिक पनडुब्बियों को इस तरह बनाया जाता है कि वे कम से कम आवाज उत्पन्न करें। इंजन, मशीनरी और पानी के भीतर गति से संबंधित ध्वनि को कम करने के प्रयास किए जाते हैं। यही कारण है कि निष्क्रिय सोनार के लिए शांत पनडुब्बी की पहचान कठिन हो सकती है। दूसरी ओर सक्रिय सोनार अपने संकेत से लौटने वाली प्रतिध्वनि के आधार पर अपेक्षाकृत शांत वस्तु को भी खोज सकता है। लेकिन उसका उपयोग करते समय अपनी स्थिति उजागर होने का जोखिम पैदा होता है। इसलिए नौसैनिक सोनार संचालन में किस परिस्थिति में किस प्रकार के संकेत का उपयोग करना है, यह एक जटिल रणनीतिक निर्णय होता है। इस तकनीक की प्रभावशीलता केवल उपकरण की शक्ति से निर्धारित नहीं होती। समुद्र का तापमान, गहराई, तल की बनावट, आसपास का शोर और लक्ष्य की दूरी भी महत्त्वपूर्ण हैं।
सोनार से किसी वस्तु की गति का अनुमान लगाने में 'डॉप्लर प्रभाव' भी उपयोगी हो सकता है। यदि ध्वनि का स्रोत या उसे परावर्तित करने वाली वस्तु गतिशील हो, तो प्राप्त ध्वनि की आवृत्ति में परिवर्तन दिखाई दे सकता है। सामान्य जीवन में यह प्रभाव उस समय अनुभव होता है जब कोई एंबुलेंस सायरन बजाते हुए हमारे पास से गुजरती है। उसके पास आने और दूर जाने के दौरान आवाज की सुनाई देने वाली आवृत्ति बदलती है। पानी के भीतर भी गतिशील वस्तु से जुड़े संकेतों में ऐसे परिवर्तन हो सकते हैं। आधुनिक ध्वनि प्रसंस्करण प्रणालियाँ इन परिवर्तनों का उपयोग वस्तु की गति का आकलन करने में कर सकती हैं। लेकिन वास्तविक सैन्य सोनार विश्लेषण इससे कहीं अधिक जटिल होता है, क्योंकि समुद्र की अनेक आवाजों और ध्वनि के बदलते रास्तों के बीच उपयोगी संकेत पहचानना पड़ता है।
समुद्र की दस हजार मीटर गहराई भी सोनार से कैसे मापी जाती है?
महासागरों की कुछ खाइयाँ दस हजार मीटर से भी अधिक गहरी हैं। ऐसी गहराइयों में पानी का दबाव असाधारण होता है और सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता। फिर भी सतह पर मौजूद अनुसंधान जहाज सोनार की सहायता से समुद्र तल की स्थिति का अनुमान लगा सकते हैं। इस कार्य में 'इको साउंडर' और आधुनिक 'मल्टीबीम सोनार' विशेष रूप से उपयोगी हैं। इको साउंडर सामान्यतः नीचे की ओर ध्वनि संकेत भेजता है और समुद्र तल से लौटने वाली प्रतिध्वनि मापता है। यदि किसी स्थान पर गहराई दस हजार मीटर हो और औसत ध्वनि गति 1,500 मीटर प्रति सेकंड मान ली जाए, तो ध्वनि को नीचे जाकर वापस आने में लगभग 13.3 सेकंड लगेंगे। यह केवल सरलीकृत गणना है। वास्तविक सर्वेक्षण में तापमान, लवणता, दबाव और ध्वनि के मार्ग में होने वाले परिवर्तन का सुधार करना पड़ता है।
एक और बात ध्यान देने योग्य है। समुद्र की गहराई बढ़ने से केवल ध्वनि को अधिक दूरी तय नहीं करनी पड़ती, बल्कि वापसी का संकेत कमजोर भी हो सकता है। पानी में यात्रा करते समय ध्वनि की ऊर्जा फैलती है और उसका कुछ हिस्सा अवशोषित होता है। समुद्र तल की सतह, मिट्टी, चट्टान और दूसरी संरचनाएँ भी लौटने वाली प्रतिध्वनि को प्रभावित करती हैं। इसलिए गहरे समुद्र के लिए उपयोग होने वाले सोनार की आवृत्ति, शक्ति और संकेत पहचानने की क्षमता का सावधानीपूर्वक चयन किया जाता है। यह आवश्यक नहीं कि अधिक तेज आवाज वाला सोनार हमेशा बेहतर परिणाम दे। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि किस प्रकार की जानकारी चाहिए और समुद्र की वास्तविक परिस्थितियाँ क्या हैं।
मल्टीबीम सोनार से समुद्र का त्रिआयामी नक्शा कैसे बनता है?
पहले समुद्र की गहराई मापने वाली प्रणालियाँ अक्सर जहाज के ठीक नीचे या सीमित क्षेत्र से जानकारी प्राप्त करती थीं। इससे विशाल महासागर का विस्तृत नक्शा बनाने में बहुत समय लगता था। आधुनिक 'मल्टीबीम सोनार' ने इस प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया है। इसमें अनेक ध्वनि संकेतों को पंखे के आकार में अलग-अलग दिशाओं में भेजा जाता है। जहाज के नीचे और उसके दोनों ओर फैले क्षेत्र से प्रतिध्वनियाँ लौटती हैं। उनकी सहायता से समुद्र तल के कई बिंदुओं की गहराई का अनुमान एक साथ लगाया जा सकता है। जहाज आगे बढ़ता है और बार-बार माप करता है। इन मापों को मिलाकर समुद्र तल की विस्तृत बनावट सामने आने लगती है। वैज्ञानिक इस तकनीक से जलमग्न पहाड़, घाटियाँ, समुद्री खाइयाँ, ढलानें और अन्य भूगर्भीय संरचनाएँ पहचान सकते हैं।
मल्टीबीम सोनार केवल गहराई का अनुमान नहीं देता। कई प्रणालियाँ लौटने वाली ध्वनि की तीव्रता से संबंधित जानकारी भी दर्ज करती हैं, जिसे 'बैकस्कैटर' कहा जाता है। समुद्र तल की अलग-अलग सतहें ध्वनि को अलग प्रकार से परावर्तित या बिखेर सकती हैं। उदाहरण के लिए कठोर चट्टानी तल और नरम तलछट से लौटने वाले संकेतों में अंतर हो सकता है। वैज्ञानिक इन संकेतों का उपयोग समुद्र तल की संभावित प्रकृति समझने में करते हैं। लेकिन केवल बैकस्कैटर से किसी वस्तु की संरचना के बारे में हमेशा निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। कई बार पुष्टि के लिए कैमरा, नमूने या दूसरी तकनीकों की आवश्यकता होती है। इस प्रकार आधुनिक सोनार समुद्र तल की बनावट और संभावित विशेषताओं का वैज्ञानिक मॉडल बनाने में सहायता करता है।
साइड-स्कैन सोनार डूबे हुए जहाजों को कैसे खोजता है?
समुद्र में डूबे हुए जहाज, विमान या ऐतिहासिक वस्तुएँ खोजने के लिए 'साइड-स्कैन सोनार' अत्यंत उपयोगी है। यह समुद्र तल की ओर केवल सीधा संकेत भेजने के बजाय दोनों तरफ ध्वनि की पट्टियाँ फैलाता है। जैसे कोई टॉर्च अंधेरे में अपने आसपास के क्षेत्र पर प्रकाश डालती है, उसी तरह सोनार ध्वनि के माध्यम से समुद्र तल के विस्तृत हिस्से की जाँच करता है। जब संकेत किसी उभरी हुई वस्तु से टकराता है, तो उसकी प्रतिध्वनि और वस्तु के पीछे बनने वाले ध्वनिक छाया क्षेत्र में अंतर दिखाई दे सकता है। कंप्यूटर इस जानकारी से ऐसे चित्र तैयार कर सकता है जिनमें जहाज का ढाँचा, चट्टानी आकृतियाँ या तल पर पड़ी बड़ी वस्तुएँ पहचानी जा सकती हैं।
साइड-स्कैन सोनार की एक सीमा यह है कि वह अपने आप प्रत्येक वस्तु की पहचान निश्चित नहीं कर देता। समुद्र तल पर कोई प्राकृतिक चट्टान और मानव निर्मित संरचना कभी-कभी संकेतों में मिलती-जुलती दिखाई दे सकती हैं। इसलिए वैज्ञानिक संभावित स्थल की पहचान करने के बाद पानी के भीतर कैमरा भेज सकते हैं या दूर से संचालित जलमग्न वाहन की सहायता ले सकते हैं। कम आवृत्ति वाला सोनार अधिक दूर तक जाँच करने में उपयोगी हो सकता है, जबकि अधिक आवृत्ति वाला सोनार अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र में अधिक सूक्ष्म विवरण प्रदान कर सकता है। इस तरह सोनार की आवृत्ति चुनना भी शोध के उद्देश्य से जुड़ा निर्णय है। जहाजों के मलबे की खोज, समुद्र तल के मानचित्रण और छोटी वस्तुओं की पहचान के लिए हमेशा एक ही प्रकार का सोनार सबसे उपयुक्त नहीं होता।
क्या सोनार समुद्र के नीचे दबे हुए रहस्य भी खोज सकता है?
कुछ विशेष सोनार प्रणालियाँ समुद्र तल की सतह के नीचे मौजूद संरचनाओं का अध्ययन भी कर सकती हैं। इन्हें 'सब-बॉटम प्रोफाइलर' कहा जाता है। ये ऐसी ध्वनि तरंगों का उपयोग करते हैं जिनकी कुछ ऊर्जा समुद्र तल की ऊपरी तलछट के भीतर प्रवेश कर सकती है। जब ध्वनि अलग-अलग तलछटी परतों के बीच की सीमा से टकराती है, तो उसका एक हिस्सा वापस लौटता है। इन प्रतिध्वनियों के विश्लेषण से समुद्र तल के नीचे की परतों का अनुमान लगाया जा सकता है। यह तकनीक भूगर्भीय अनुसंधान, तलछट की संरचना और कुछ जलमग्न पुरातात्त्विक स्थलों के अध्ययन में उपयोगी हो सकती है। लेकिन यह किसी जादुई मशीन की तरह समुद्र के नीचे हर चीज को स्पष्ट चित्र में दिखाने की क्षमता नहीं रखती। विभिन्न प्रकार की मिट्टी, चट्टान और तलछट ध्वनि के प्रवेश तथा प्रतिध्वनि को अलग-अलग रूप में प्रभावित करती हैं।
समुद्र तल के अध्ययन में ऐसी तकनीकों का महत्त्व इसलिए है क्योंकि पृथ्वी की सतह का बहुत बड़ा हिस्सा महासागरों से ढका है और उसके अनेक क्षेत्रों का विस्तृत प्रत्यक्ष अध्ययन कठिन है। जलमग्न पर्वतमालाएँ, प्राचीन समुद्री गतिविधियाँ और तलछटी संरचनाएँ पृथ्वी के भूगर्भीय इतिहास से संबंधित महत्त्वपूर्ण जानकारी दे सकती हैं। सोनार की सहायता से वैज्ञानिक उन स्थानों की पहचान कर सकते हैं जहाँ आगे विस्तृत शोध की आवश्यकता है। इस तरह सोनार केवल जहाजों की सुरक्षा या पनडुब्बियों की खोज तक सीमित तकनीक नहीं है। वह पृथ्वी की भूगर्भीय संरचना को समझने का भी एक महत्त्वपूर्ण साधन बन चुका है।
क्या समुद्र के जीव-जंतु भी सोनार का उपयोग करते हैं?
इस प्रश्न का उत्तर हाँ है, लेकिन एक महत्त्वपूर्ण अंतर के साथ। पशु किसी इलेक्ट्रॉनिक सोनार उपकरण का उपयोग नहीं करते। उनके शरीर और तंत्रिका तंत्र में ऐसी जैविक क्षमताएँ विकसित हुई हैं जिनसे वे ध्वनि उत्पन्न करके उसकी लौटने वाली प्रतिध्वनि के आधार पर आसपास की दुनिया के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रक्रिया को 'इकोलोकेशन' अर्थात प्रतिध्वनि द्वारा स्थिति की पहचान कहा जाता है। जब कोई जीव अपने आसपास ध्वनि भेजता है और उस ध्वनि के किसी वस्तु से टकराकर लौटने के समय, दिशा तथा स्वरूप का विश्लेषण करता है, तो वह वस्तु की स्थिति का अनुमान लगा सकता है। वैज्ञानिक इसे 'बायोसोनार' भी कहते हैं। यह प्रकृति में विकसित ऐसी व्यवस्था है जिसका मूल भौतिक सिद्धांत मानव निर्मित सक्रिय सोनार से मिलता-जुलता है।
समुद्र के भीतर बायोसोनार का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण डॉल्फिन है। डॉल्फिन दाँत वाली व्हेलों के समूह से संबंधित समुद्री स्तनधारी है। पानी में उसे भोजन खोजना, दूसरे जीवों से बचना और आसपास की संरचनाओं को पहचानना होता है। समुद्र का पानी कभी अत्यंत साफ होता है, तो कभी तलछट, लहरों और दूसरे कारणों से गंदला होता है। गहरे पानी में प्रकाश की कमी भी होती है। ऐसे वातावरण में केवल आँखों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं हो सकता। डॉल्फिन विशेष प्रकार की छोटी और तीव्र क्लिक जैसी आवाजें पैदा कर सकती है। ये आवाजें पानी में आगे जाती हैं और मछली या किसी अन्य वस्तु से टकराकर लौटती हैं। लौटे हुए संकेतों को डॉल्फिन का श्रवण तंत्र पहचानता है और उसका मस्तिष्क उनसे आसपास की वस्तुओं के बारे में जानकारी प्राप्त करता है।
डॉल्फिन के शरीर में इस कार्य के लिए कुछ विशेष जैविक संरचनाएँ विकसित हुई हैं। उसके सिर में 'फोनिक लिप्स' नामक विशेष ऊतक ध्वनि उत्पन्न करने में भूमिका निभाते हैं। इसके बाद माथे के क्षेत्र में मौजूद वसायुक्त संरचना, जिसे 'मेलन' कहा जाता है, आवाज को आगे की ओर केंद्रित करने में सहायता करती है। यह ध्वनि पानी में आगे बढ़ती है और किसी मछली या दूसरी वस्तु से टकराकर वापस आती है। लौटे हुए संकेतों को ग्रहण करने में डॉल्फिन के निचले जबड़े और उससे जुड़े विशेष वसायुक्त ऊतकों की भूमिका होती है। ये संकेत उसके श्रवण तंत्र तक पहुँचते हैं, जहाँ से मस्तिष्क उन्हें संसाधित करता है। इस प्रकार डॉल्फिन का माथा, जबड़ा, कान और मस्तिष्क मिलकर एक अत्यंत विकसित जैविक ध्वनि-पहचान प्रणाली बनाते हैं।
यहाँ एक रोचक तथ्य यह है कि डॉल्फिन केवल यह नहीं समझती कि सामने कोई वस्तु मौजूद है। उसके लौटने वाले संकेतों में ऐसी जानकारी भी हो सकती है जिनसे वह वस्तु की दूरी, आकार, दिशा और कुछ भौतिक विशेषताओं का अनुमान लगा सके। यह क्षमता उसे शिकार करने में सहायता करती है। उदाहरण के लिए किसी मछली का आकार, उसकी गति और आसपास के वातावरण की स्थिति लौटने वाली ध्वनि को प्रभावित कर सकती है। डॉल्फिन का मस्तिष्क इन सूक्ष्म संकेतों की व्याख्या करता है। लेकिन इस क्षमता को ऐसे नहीं समझना चाहिए कि डॉल्फिन किसी चिकित्सकीय एक्स-रे मशीन की तरह हर वस्तु का पूरा आंतरिक चित्र देख लेती है। वह प्रतिध्वनि के माध्यम से प्राप्त जानकारी के आधार पर वस्तुओं की विशेषताओं का अनुमान लगाती है। कुछ प्रयोगों में डॉल्फिनों ने ध्वनिक संकेतों की सहायता से जटिल वस्तु-भेद क्षमता दिखाई है, लेकिन यह क्षमता परिस्थितियों और प्रशिक्षण के अनुसार बदल सकती है।
डॉल्फिन अंधेरे पानी में मछली कैसे पकड़ लेती है?
जब डॉल्फिन भोजन खोज रही होती है, तो वह क्लिक संकेतों की एक श्रृंखला उत्पन्न कर सकती है। दूर की वस्तु खोजने के समय और उसके बिल्कुल निकट पहुँचने के समय संकेतों की गति तथा पैटर्न बदल सकते हैं। शिकार के करीब आते समय क्लिकों के बीच का अंतर घट सकता है और बहुत तेज श्रृंखला उत्पन्न हो सकती है। इससे डॉल्फिन को तेजी से बदलती दूरी और शिकार की स्थिति के बारे में लगातार जानकारी मिलती है। जिस प्रकार मनुष्य किसी चलती वस्तु पर नजर रखते समय बार-बार उसकी स्थिति देखता है, उसी तरह डॉल्फिन ध्वनि संकेतों के माध्यम से शिकार की बदलती स्थिति का आकलन करती रहती है। इस व्यवस्था की संवेदनशीलता इतनी विकसित हो सकती है कि वह गंदले पानी में भी भोजन खोजने में सक्षम रहती है।
लेकिन डॉल्फिन की सभी आवाजें शिकार खोजने के लिए नहीं होतीं। वह संचार के लिए भी विभिन्न प्रकार की आवाजें उत्पन्न करती है। डॉल्फिनों में सीटियों जैसे संकेत और क्लिक दोनों पाए जाते हैं। कुछ प्रजातियों में विशेष 'सिग्नेचर व्हिसल' का अध्ययन किया गया है, जिनका संबंध व्यक्तिगत पहचान और सामाजिक संचार से हो सकता है। इसलिए समुद्री जीवों की ध्वनि प्रणाली को केवल सोनार समझ लेना अधूरा होगा। आवाज उनके लिए संवाद, सामाजिक संबंध, दिशा पहचान और शिकार जैसे अनेक कार्यों का साधन है। ध्वनि की यही बहुउपयोगी भूमिका समुद्र के जैविक जीवन को समझने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
क्या सभी व्हेल सोनार का उपयोग कर
नहीं। व्हेलों को सामान्यतः दो बड़े समूहों में बाँटा जाता है—दाँत वाली व्हेल और बेलीन वाली व्हेल। दाँत वाली व्हेलों में डॉल्फिन, स्पर्म व्हेल, ऑर्का और कुछ दूसरी प्रजातियाँ शामिल हैं। इन जीवों में प्रतिध्वनि-आधारित स्थिति पहचानने की विकसित क्षमता पाई जाती है। दूसरी ओर ब्लू व्हेल और हंपबैक व्हेल जैसी बेलीन व्हेलें मुख्यतः अलग प्रकार की ध्वनि और भोजन संबंधी संरचनाओं के लिए जानी जाती हैं। वे बहुत कम आवृत्ति की आवाजों सहित अनेक ध्वनियाँ उत्पन्न कर सकती हैं और उनका उपयोग संचार में करती हैं। लेकिन इनके लिए दाँत वाली व्हेलों के समान विकसित सक्रिय इकोलोकेशन प्रणाली का प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए यह कहना कि हर व्हेल अपनी आवाज की प्रतिध्वनि से शिकार खोजती है, गलत होगा।
स्पर्म व्हेल इस विषय में विशेष रूप से रोचक उदाहरण है। यह दाँत वाली व्हेलों में शामिल है और समुद्र की बहुत गहराई तक जाकर स्क्विड जैसे जीवों का शिकार कर सकती है। ऐसे वातावरण में प्राकृतिक प्रकाश अत्यंत सीमित होता है। स्पर्म व्हेल अत्यंत शक्तिशाली क्लिक संकेत उत्पन्न कर सकती है और लौटने वाली प्रतिध्वनियों के आधार पर आसपास की वस्तुओं की पहचान करती है। लेकिन इस क्षमता के बारे में भी वैज्ञानिक अभी कई प्रश्नों का अध्ययन कर रहे हैं। उदाहरण के लिए अलग परिस्थितियों में क्लिकों की दिशा, ऊर्जा और सामाजिक उपयोग कैसे बदलते हैं, यह सक्रिय अनुसंधान का विषय है। इससे पता चलता है कि समुद्री स्तनधारियों की ध्वनि संबंधी दुनिया हमारी सामान्य कल्पना से कहीं अधिक विकसित और जटिल है।
चमगादड़ समुद्र में नहीं रहता, फिर वह सोनार कैसे इस्तेमाल करता है?
बायोसोनार का एक और प्रसिद्ध उदाहरण चमगादड़ है। यह समुद्र में नहीं रहता, लेकिन ध्वनि की सहायता से आसपास की वस्तुओं का पता लगाने का वही मूल सिद्धांत अपनाता है। अनेक चमगादड़ प्रजातियाँ ऐसी उच्च आवृत्ति की आवाजें पैदा करती हैं जिन्हें सामान्य मानव कान नहीं सुन सकता। इन ध्वनियों को 'अल्ट्रासाउंड' कहा जाता है। जब चमगादड़ अंधेरे में उड़ता है, तो वह आवाजें भेजता है। ये आवाजें कीटों, पेड़ों या दूसरी वस्तुओं से टकराकर वापस आती हैं। उसका श्रवण तंत्र लौटे हुए संकेतों का विश्लेषण करके वस्तु की दूरी तथा दिशा समझने में सहायता करता है। इससे वह रात में उड़ते हुए छोटे कीटों को पकड़ सकता है और रास्ते की बाधाओं से बच सकता है।
यहाँ एक सामान्य मिथक दूर करना जरूरी है। चमगादड़ अंधे नहीं होते। अनेक प्रजातियों में देखने की क्षमता मौजूद होती है। लेकिन उनके लिए इकोलोकेशन एक अतिरिक्त अत्यंत महत्त्वपूर्ण संवेदन प्रणाली है। चमगादड़ की विभिन्न प्रजातियों में ध्वनि संकेतों की आवृत्ति, अवधि और संरचना अलग हो सकती है। कुछ चमगादड़ मुँह से और कुछ नाक से ध्वनि उत्पन्न करते हैं। शिकार के करीब पहुँचने पर कुछ प्रजातियों में संकेतों की आवृत्ति और दोहराव बढ़ सकता है, जिसे वैज्ञानिक 'फीडिंग बज़' कहते हैं। इससे पता चलता है कि जैविक सोनार केवल समुद्र के लिए विकसित क्षमता नहीं है। विकासक्रम में अलग-अलग वातावरण वाले जीवों ने ध्वनि और प्रतिध्वनि के उपयोग की ऐसी प्रणालियाँ विकसित की हैं जिनसे वे प्रकाश की अनुपस्थिति या कमी में भी प्रभावी रूप से कार्य कर सकते हैं।
इस संबंध में एक और दिलचस्प बात है। चमगादड़ और डॉल्फिन का निकट साझा पूर्वज ऐसी विकसित आधुनिक इकोलोकेशन प्रणाली रखता था, इसका प्रमाण नहीं है। वैज्ञानिक अध्ययन संकेत देते हैं कि इन समूहों में प्रतिध्वनि-आधारित दिशा पहचानने की विशेष क्षमताएँ स्वतंत्र विकासक्रमों में विकसित हुईं। इसे 'कन्वर्जेंट इवोल्यूशन' कहा जाता है। इसका अर्थ है कि अलग-अलग जैविक वंशों में समान पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करने के लिए मिलती-जुलती कार्यात्मक क्षमताएँ विकसित हो सकती हैं। चमगादड़ के लिए समस्या अंधेरे में उड़ते कीटों को पहचानने की थी, जबकि डॉल्फिन के लिए पानी में तैरते शिकार और अवरोधों को पहचानना महत्त्वपूर्ण था। दोनों ने ध्वनि को अपने आसपास की दुनिया समझने का प्रभावी माध्यम बनाया। यह प्रकृति के विकासक्रम की अद्भुत विशेषताओं में से एक है।
क्या समुद्र की मछलियाँ भी सोनार का उपयोग करती हैं?
समुद्र में बहुत से जीव ध्वनि का उपयोग करते हैं, लेकिन ध्वनि सुनना और सक्रिय इकोलोकेशन करना एक ही बात नहीं है। अनेक मछलियाँ अपने आसपास उत्पन्न कंपन और ध्वनि को पहचान सकती हैं। उनके शरीर में विशेष संवेदन प्रणालियाँ मौजूद होती हैं जो पानी के प्रवाह और दबाव में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी देती हैं। मछलियों के शरीर पर मौजूद 'लेटरल लाइन' अर्थात पार्श्व रेखा प्रणाली आसपास के जल प्रवाह तथा स्थानीय कंपन को पहचानने में सहायता करती है। इससे उन्हें पास मौजूद दूसरी मछलियों की गति, शिकारियों और आसपास की कुछ बाधाओं के बारे में जानकारी मिल सकती है। लेकिन इस व्यवस्था को सीधे डॉल्फिन के सक्रिय सोनार के बराबर नहीं माना जाना चाहिए। डॉल्फिन स्वयं विशिष्ट क्लिक भेजकर उनकी लौटने वाली प्रतिध्वनि का विश्लेषण करती है, जबकि सामान्य मछलियों की पार्श्व रेखा आसपास के पानी की गति और स्थानीय यांत्रिक संकेतों को पहचानती है।
कुछ मछलियाँ ध्वनि उत्पन्न करके एक-दूसरे से संवाद भी करती हैं। दूसरी ओर समुद्री जीवों में सुनने की क्षमता की विविधता बहुत अधिक है। कुछ प्रजातियाँ कम आवृत्ति की ध्वनियों के प्रति संवेदनशील हो सकती हैं, जबकि कुछ दूसरी प्रजातियाँ अलग प्रकार के संकेतों को पहचानती हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक समुद्र की ध्वनिक दुनिया को समझने के लिए केवल डॉल्फिन और व्हेल का अध्ययन नहीं करते। मछलियाँ, समुद्री अकशेरुकी जीव और दूसरे जीव भी समुद्री ध्वनि वातावरण का हिस्सा हैं। लेकिन वर्तमान वैज्ञानिक समझ के अनुसार दाँत वाली व्हेलों तथा डॉल्फिनों में विकसित सक्रिय इकोलोकेशन की क्षमता को सभी समुद्री जीवों की सामान्य विशेषता नहीं माना जा सकता।
क्या मनुष्य के सोनार से डॉल्फिन और व्हेल को नुकसान पहुँच सकता है?
सोनार की उपयोगिता जितनी बड़ी है, उसके पर्यावरणीय प्रभावों का प्रश्न भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। समुद्र की अनेक प्रजातियाँ अपने अस्तित्व के लिए ध्वनि पर निर्भर करती हैं। वे आवाज के माध्यम से भोजन खोजती हैं, दूसरे जीवों को पहचानती हैं, समूह में संपर्क रखती हैं और खतरे से बचती हैं। यदि उनके वातावरण में अत्यधिक तीव्र या लगातार मानव-निर्मित ध्वनि पैदा हो, तो उनकी सामान्य गतिविधियाँ प्रभावित हो सकती हैं। जहाजों के इंजन, समुद्र के भीतर निर्माण, तेल और गैस की खोज में उपयोग होने वाले कुछ ध्वनिक उपकरण तथा सैन्य सोनार समुद्री ध्वनि प्रदूषण के स्रोत हो सकते हैं। लेकिन इनके प्रभाव को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा। ध्वनि की आवृत्ति, तीव्रता, अवधि, दूरी और संबंधित प्रजाति की संवेदनशीलता के अनुसार उसका प्रभाव बदल सकता है।
विशेष रूप से शक्तिशाली मध्य-आवृत्ति सैन्य सोनार और कुछ गहरे समुद्र में गोता लगाने वाली चोंचदार व्हेलों, अर्थात 'बीक्ड व्हेल्स', के बीच संबंध पर वैज्ञानिक अनुसंधान हुए हैं। कुछ घटनाओं में सैन्य सोनार गतिविधियों के आसपास व्हेलों के असामान्य रूप से समुद्र तट पर आ जाने के मामले दर्ज किए गए हैं। अमेरिकी नोआ के अनुसार 1960 के दशक के बाद ऐसी अनेक सामूहिक घटनाओं का दस्तावेजीकरण हुआ है जिनमें सोनार गतिविधियों के साथ संभावित संबंध पाया गया। शोधकर्ताओं ने यह संभावना व्यक्त की है कि तीव्र ध्वनि के कारण कुछ व्हेलें अपने सामान्य गोताखोरी व्यवहार में अचानक परिवर्तन कर सकती हैं। इससे उनके शरीर में दबाव संबंधी असामान्य प्रतिक्रियाएँ विकसित होने की संभावना पर भी अध्ययन हुआ है। लेकिन प्रत्येक घटना का कारण केवल सोनार ही था, ऐसा निर्णायक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इस संबंध की सटीक जैविक प्रक्रिया पर वैज्ञानिक शोध जारी है।
यहाँ समुद्री जीवों और मानव गोताखोरों के बीच एक रोचक संबंध दिखाई देता है। यदि कोई मानव गोताखोर अधिक गहराई से बहुत तेजी से ऊपर आता है, तो उसके शरीर में घुली गैसों के बुलबुले बनने और 'डीकम्प्रेशन सिकनेस' जैसी समस्या उत्पन्न होने का जोखिम हो सकता है। कुछ वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि शक्तिशाली सोनार से विचलित गहरे समुद्र में गोता लगाने वाली व्हेलों का व्यवहार बदलने पर उनमें भी कुछ दबाव संबंधी प्रक्रियाएँ प्रभावित हो सकती हैं। लेकिन व्हेलों की शारीरिक रचना और गोताखोरी संबंधी अनुकूलन मनुष्यों से अलग हैं। इसलिए उनके संभावित दबाव संबंधी नुकसान को मानव गोताखोरों की समस्या का बिल्कुल समान रूप नहीं मानना चाहिए। यह एक सक्रिय अनुसंधान क्षेत्र है।
आधुनिक नौसेनाएँ और समुद्री अनुसंधान संस्थान शक्तिशाली ध्वनिक प्रणालियों के उपयोग में समुद्री जीवों की सुरक्षा से संबंधित उपाय अपनाते हैं। उदाहरण के लिए अमेरिकी नौसेना ने सक्रिय सोनार के परीक्षण और अभ्यास के दौरान समुद्री स्तनधारियों की निगरानी, निर्धारित सुरक्षा क्षेत्रों में उनकी उपस्थिति की जाँच तथा आवश्यकता होने पर सोनार की शक्ति कम करने या उसे बंद करने जैसी प्रक्रियाओं का उल्लेख किया है। लेकिन इन उपायों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन परिस्थितियों के अनुसार किया जाना चाहिए। विशाल समुद्र में सभी जीवों का वास्तविक समय में पता लगाना आसान नहीं है। इसी कारण सोनार के सैन्य और वैज्ञानिक उपयोग तथा समुद्री पर्यावरण की रक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक नीति और अनुसंधान का विषय है।
क्या भविष्य में सोनार समुद्र की पूरी दुनिया दिखा सकेगा?
सोनार तकनीक में निरंतर सुधार हो रहे हैं। आधुनिक कंप्यूटर अधिक मात्रा में प्राप्त ध्वनि संकेतों का तेजी से विश्लेषण कर सकते हैं। उन्नत मल्टीबीम और सिंथेटिक अपर्चर सोनार जैसी प्रणालियाँ कुछ विशेष परिस्थितियों में अधिक सूक्ष्म विवरण प्राप्त करने में सहायता कर सकती हैं। स्वचालित जलमग्न वाहन और रोबोट ऐसे स्थानों पर पहुँच सकते हैं जहाँ मनुष्य के लिए जाना कठिन या जोखिमपूर्ण है। इन वाहनों पर लगे सोनार समुद्र तल के करीब जाकर विस्तृत सर्वेक्षण कर सकते हैं। इससे शोधकर्ताओं को ऐसे क्षेत्रों की अधिक जानकारी मिल सकती है जिनका पहले केवल सीमित मानचित्रण हुआ था। लेकिन आधुनिक तकनीक की क्षमता को भी समझदारी से देखना चाहिए। बहुत अधिक गहराई, जटिल तलछट, असामान्य ध्वनि प्रसार और समुद्र में मौजूद शोर कुछ परिस्थितियों में सोनार की गुणवत्ता सीमित कर सकते हैं।
इसका एक और महत्त्वपूर्ण उपयोग समुद्री जीवों के अध्ययन में हो सकता है। निष्क्रिय ध्वनि रिकॉर्डिंग से व्हेलों की गतिविधियों और आवाजों का अध्ययन किया जा सकता है। कुछ सोनार प्रणालियाँ मछलियों के समूहों की उपस्थिति या समुद्र में उनके वितरण का अनुमान लगाने में उपयोगी हो सकती हैं। लेकिन हर लौटती हुई प्रतिध्वनि से मछली की सटीक प्रजाति या संख्या पहचानना हमेशा संभव नहीं होता। इसके लिए दूसरे पर्यावरणीय और जैविक आँकड़ों की आवश्यकता पड़ सकती है। इसी तरह स्वचालित विश्लेषण समुद्र के भीतर असामान्य ध्वनिक घटनाओं की पहचान में सहायता कर सकता है, लेकिन किसी आवाज की प्रकृति का अंतिम निर्णय उसके संदर्भ और विश्वसनीय जाँच पर निर्भर करेगा।
सोनार की भविष्य की सबसे महत्त्वपूर्ण दिशा शायद केवल अधिक शक्तिशाली संकेत बनाने में नहीं, बल्कि कम ऊर्जा और अधिक संवेदनशीलता के साथ बेहतर जानकारी प्राप्त करने में होगी। यदि वैज्ञानिक कम तीव्रता वाली ध्वनि से उपयोगी जानकारी हासिल कर सकें, तो कुछ परिस्थितियों में समुद्री पर्यावरण पर प्रभाव कम किया जा सकता है। इसी तरह आधुनिक सिग्नल प्रोसेसिंग, सेंसरों के बेहतर संयोजन और रोबोटिक सर्वेक्षण से महासागर के ऐसे हिस्सों को समझना संभव हो सकता है जिन्हें आज भी विस्तार से नहीं देखा जा सका है। लेकिन समुद्र अत्यंत परिवर्तनशील वातावरण है। उसकी तापमान संबंधी परतें, लवणता, धाराएँ, जीव-जंतु और भूगर्भीय संरचनाएँ लगातार जटिल परिस्थितियाँ पैदा करती हैं। इसलिए किसी एक तकनीक से पूरे महासागर के सभी रहस्यों का समाधान हो जाना संभव नहीं दिखता।
समुद्र में जहाँ प्रकाश समाप्त होता है, वहाँ ध्वनि रास्ता दिखाती है
सोनार का विज्ञान एक अत्यंत सरल प्राकृतिक घटना से शुरू होता है—ध्वनि किसी वस्तु से टकराकर वापस लौट सकती है। मनुष्य ने इसी सिद्धांत को अत्याधुनिक उपकरणों, संवेदनशील सेंसरों और कंप्यूटर गणनाओं के साथ विकसित करके समुद्र के भीतर वस्तुओं का पता लगाने का प्रभावी साधन बनाया। आज सोनार की सहायता से जहाज समुद्र की गहराई मापते हैं, वैज्ञानिक जलमग्न पहाड़ों तथा खाइयों के मानचित्र बनाते हैं और नौसेनाएँ पानी के भीतर मौजूद खतरों की पहचान करती हैं। लेकिन इसकी वास्तविक वैज्ञानिक शक्ति केवल ध्वनि भेजने में नहीं है। वह लौटती हुई बेहद कमजोर प्रतिध्वनि से अर्थपूर्ण जानकारी निकालने में छिपी है।
इस तकनीक का एक और असाधारण पहलू यह है कि प्रकृति ने मनुष्य से बहुत पहले प्रतिध्वनि का उपयोग जीवन की आवश्यकताओं के लिए विकसित कर लिया था। डॉल्फिन और दाँत वाली व्हेलें गहरे समुद्र में आवाज के माध्यम से अपने आसपास की वस्तुओं को पहचान सकती हैं। चमगादड़ अंधेरे में उड़ते हुए छोटे कीटों को खोज सकते हैं। इनके शरीर में किसी इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर, स्क्रीन या आधुनिक ट्रांसड्यूसर की आवश्यकता नहीं होती। उनके जैविक अंग और तंत्रिका तंत्र ध्वनि की जानकारी को उपयोगी संवेदन अनुभव में बदलते हैं। इस प्रकार सोनार का विज्ञान मनुष्य की तकनीकी उपलब्धि होने के साथ प्रकृति के विकासक्रम की एक असाधारण कहानी भी है।
अंततः सोनार हमें यह समझाता है कि संसार को जानने के लिए केवल प्रकाश और आँखें ही आवश्यक नहीं हैं। समुद्र की गहराई में जहाँ सूर्य का प्रकाश लगभग समाप्त हो जाता है, वहाँ ध्वनि जानकारी का सबसे महत्त्वपूर्ण माध्यम बन सकती है। एक जहाज ध्वनि की प्रतिध्वनि से हजारों मीटर नीचे स्थित समुद्री पर्वत खोज सकता है और एक डॉल्फिन उसी मूल सिद्धांत की सहायता से पानी में तैरती छोटी मछली का पता लगा सकती है। अंतर केवल इतना है कि मनुष्य ने इस काम के लिए मशीन बनाई, जबकि प्रकृति ने जीवों के शरीर में लाखों वर्षों के विकासक्रम के दौरान यह क्षमता उत्पन्न की। सोनार की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उसने महासागरों के अंधकार को ज्ञान की सीमा नहीं रहने दिया। समुद्र अब भी अनेक रहस्यों से भरा है। लेकिन ध्वनि ने मनुष्य को उन्हें समझने का एक असाधारण रास्ता प्रदान किया है।


