How SSD Stores Data: बिजली बंद होने पर भी SSD डेटा नहीं भूलती, आखिर कैसे काम करती है यह तकनीक?

How SSD Stores Data Explained: SSD में बिना घूमती डिस्क के डेटा कैसे स्टोर होता है? जानिए NAND फ्लैश मेमोरी, बिजली बंद होने पर डेटा सुरक्षित रहने का विज्ञान, SSD की उम्र और पेन ड्राइव से इसका अंतर।

Yogesh Mishra
Published on: 21 Oct 2026 1:54 PM IST
How SSD Stores Data Explained in Hindi | Newstrack Latest Hindi News | Breaking News India
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How SSD Stores Data Explained: कंप्यूटर की दुनिया में एक बड़ा बदलाव चुपचाप हो चुका है। कभी हार्ड डिस्क के अंदर तेज़ी से घूमती चुंबकीय प्लेटों पर हमारी तस्वीरें, दस्तावेज़ और वीडियो रखे जाते थे। अब एक छोटे-से इलेक्ट्रॉनिक उपकरण में बिना किसी घूमते पुर्ज़े के भारी मात्रा में डेटा रखा जा सकता है। इसे सॉलिड स्टेट ड्राइव (एसएसडी) कहते हैं। पर जब इसमें न घूमती डिस्क है, न चुंबकीय रिकॉर्डिंग, तो डेटा कहाँ और कैसे रखा जाता है? बिजली बंद होने पर भी इसे सब याद कैसे रहता है? क्या एसएसडी कभी खराब नहीं होती? और अगर पेन ड्राइव भी फ़्लैश मेमोरी से बनी है, तो दोनों में असली फ़र्क क्या है?

पहले एक बुनियादी समानता समझ लें। एसएसडी और आम पेन ड्राइव, दोनों में अक्सर नैंड फ़्लैश मेमोरी होती है, यानी डेटा रखने का मूल सिद्धांत एक ही हो सकता है। फ़र्क मेमोरी चिप की गुणवत्ता, कंट्रोलर (चिप का दिमाग) की क्षमता, गति, कंप्यूटर से जुड़ने के इंटरफ़ेस, गर्मी संभालने और लगातार काम करने के डिज़ाइन में होता है। यानी हर एसएसडी फ़्लैश पर चलती है, पर हर फ़्लैश ड्राइव तेज़ एसएसडी के बराबर नहीं होती।

हार्ड डिस्क और एसएसडी में मूल फ़र्क

हार्ड डिस्क (एचडीडी) में चुंबकीय प्लेटें घूमती हैं और एक यांत्रिक हेड उन पर जानकारी लिखता-पढ़ता है। फ़ाइल माँगने पर प्लेट के घूमने और हेड के सही जगह पहुँचने का इंतज़ार करना पड़ता है। इसीलिए पुरानी हार्ड डिस्क वाले कंप्यूटर में सिस्टम शुरू होने, बड़े सॉफ़्टवेयर खुलने और ढेर सारी छोटी फ़ाइलें पढ़ने में ज़्यादा समय लगता है।

एसएसडी में कोई घूमती प्लेट या चलता हेड नहीं होता। वह चिपों के अंदर बनी इलेक्ट्रॉनिक मेमोरी सेल से सीधे जानकारी पढ़ती है, इसलिए डेटा तक पहुँचने का समय बहुत कम होता है। खासकर अलग-अलग जगहों से कई छोटी फ़ाइलें पढ़ने में फ़ायदा साफ़ दिखता है। पर गति हर एसएसडी में एक जैसी नहीं होती। पुरानी साटा एसएसडी, नई एनवीएमई एसएसडी और सर्वर वाली एसएसडी की क्षमता अलग-अलग है। सिर्फ़ "एसएसडी" लिखा होना तेज़ होने की गारंटी नहीं।

डेटा असल में कहाँ रखा जाता है?

डेटा नैंड फ़्लैश की बेहद छोटी कोशिकाओं (सेल) में रहता है। हर सेल एक खास ट्रांजिस्टर पर बनी होती है, जिसमें बिजली का आवेश (चार्ज) कैद करके रखने की व्यवस्था होती है। जब कंट्रोलर सेल को पढ़ता है, तो वह जाँचता है कि उस ट्रांजिस्टर को चालू करने के लिए कितना वोल्टेज चाहिए। अलग-अलग वोल्टेज अवस्थाओं को वह डिजिटल जानकारी (0 और 1) के रूप में समझता है।

हर सेल सिर्फ़ एक बिट रखे, यह ज़रूरी नहीं। एक बिट वाली सेल को एसएलसी कहते हैं। आज की आम उपभोक्ता एसएसडी में एक सेल में दो, तीन या चार बिट तक रखे जाते हैं (एमएलसी, टीएलसी, क्यूएलसी)। इससे क्षमता बढ़ती है और प्रति जीबी कीमत घटती है, पर आवेश की अवस्थाएँ एक-दूसरे के बहुत करीब आ जाती हैं। नतीजतन गलतियाँ, घिसावट और डेटा टिकाए रखने की चुनौतियाँ बढ़ती हैं। इसीलिए कंट्रोलर और त्रुटि सुधारने की तकनीक और भी अहम हो गई है।

बिजली बंद होने पर भी डेटा कैसे याद रहता है?

कंप्यूटर की रैम को लगातार बिजली चाहिए, बंद होते ही उसका डेटा चला जाता है। नैंड फ़्लैश नॉन-वोलेटाइल मेमोरी है, यानी उसे डेटा रखने के लिए बिजली नहीं चाहिए। सेल के अंदर इन्सुलेटिंग परतें इलेक्ट्रॉनों को कैद रखती हैं। डेटा लिखते समय नियंत्रित विद्युत क्षेत्र से इलेक्ट्रॉन इस कैद में पहुँचाए या वहाँ से निकाले जाते हैं (क्वांटम यांत्रिकी के "टनलिंग" प्रभाव से)। सामान्य हालात में इन्सुलेटिंग परत उन्हें आसानी से बाहर नहीं जाने देती, इसलिए बिजली बंद होने पर भी अवस्था बनी रहती है।

पर एक सीमा है: इलेक्ट्रॉन हमेशा के लिए बंद नहीं रहते। समय, तापमान, निर्माण की गुणवत्ता और घिसावट से आवेश धीरे-धीरे बदल सकता है। अगर बदलाव इतना हो जाए कि कंट्रोलर दो अवस्थाओं में फ़र्क न कर पाए, तो डेटा पढ़ने में गड़बड़ी होगी। इसलिए एसएसडी को बिना बिजली के अनिश्चित काल तक डेटा रखने वाली तिजोरी न समझें। ज़्यादा गर्मी और ज़्यादा घिस चुकी मेमोरी में डेटा टिकने की अवधि और घट जाती है।

लिखने और मिटाने की प्रक्रिया इतनी जटिल क्यों?

हमें लगता है कि फ़ाइल मिटाते ही जगह खाली हो गई और वहाँ नया डेटा लिखा जा सकता है। फ़्लैश में ऐसा सीधे नहीं होता। डेटा छोटी इकाइयों (पेज) में लिखा-पढ़ा जाता है, पर मिटाना बड़े टुकड़ों (ब्लॉक) में होता है। इसलिए कंट्रोलर पुराने डेटा के ऊपर सीधे नया नहीं लिख सकता। वह नया डेटा किसी दूसरे खाली पेज में लिखता है और पुराने को बेकार चिह्नित कर देता है। बाद में वह काम का डेटा समेटकर ऐसे ब्लॉक खाली करता है जिनमें बेकार डेटा ज़्यादा हो गया हो। इसे गार्बेज कलेक्शन कहते हैं।

यहीं कंट्रोलर की असली होशियारी दिखती है। वह डेटा की जगह, खाली ब्लॉक, गलतियों की संभावना और घिसावट, सब लगातार संभालता है। ऑपरेटिंग सिस्टम का भेजा ट्रिम कमांड कंट्रोलर को बताता है कि कौन-से ब्लॉक अब इस्तेमाल में नहीं हैं, ताकि वह उन्हें बाद में कुशलता से दोबारा तैयार कर सके। ट्रिम कोई जादू नहीं है जो खराब मेमोरी को नई बना दे, उसका काम बस गैर-ज़रूरी मशक्कत घटाना और गति बनाए रखना है।

बिना यांत्रिक पुर्ज़ों के भी एसएसडी घिसती क्यों है?

यह सोच गलत है कि घूमने वाला पुर्ज़ा नहीं है, इसलिए एसएसडी कभी खराब नहीं होगी। यांत्रिक घिसावट कम ज़रूर होती है, पर इलेक्ट्रॉनिक और भौतिक सीमाएँ रहती हैं। बार-बार डेटा लिखने-मिटाने से सेल की बारीक इन्सुलेटिंग परतों पर बिजली का तनाव पड़ता है। समय के साथ उनमें ऐसे दोष आ जाते हैं जो आवेश रोकने और वोल्टेज अवस्थाएँ पहचानने की क्षमता बिगाड़ते हैं। इसलिए हर सेल के लिखने-मिटाने की संख्या सीमित होती है।

इसे घटाने के लिए एसएसडी में कई तरकीबें हैं:

वियर लेवलिंग: अगर कंप्यूटर बार-बार एक ही फ़ाइल बदल रहा हो, तब भी कंट्रोलर लिखाई को पूरी मेमोरी में बाँटता है, ताकि कुछ ही हिस्से न घिसें।

ओवर-प्रोविजनिंग: कुछ क्षमता कमज़ोर पड़ने वाली सेलों की जगह लेने के लिए अलग रखी जाती है।

त्रुटि-सुधार कोड (ईसीसी): कुछ गलतियाँ पकड़कर सुधार देते हैं।

इनसे एसएसडी की उम्र बढ़ती है, पर असीमित नहीं हो जाती।

एसएसडी कितने साल चलती है?

इसका एक जवाब नहीं है। उम्र निर्माण, मेमोरी के प्रकार, तापमान, रोज़ लिखे जाने वाले डेटा, कंट्रोलर की गुणवत्ता और बिजली की आपूर्ति पर निर्भर है। कई एसएसडी के साथ टीबीडब्ल्यू (टेराबाइट्स रिटन) का आँकड़ा मिलता है। मान लें 300 टीबीडब्ल्यू लिखा है, तो इसका मतलब है कि निर्माता ने उस मॉडल के लिए कुल 300 टीबी डेटा लिखने तक की सहनशीलता (वारंटी का पैमाना) तय की है। यह ऐसा पल नहीं कि 300 टीबी पूरे होते ही ड्राइव बंद हो जाएगी। कुछ ड्राइव इससे आगे भी चलती हैं, तो कुछ कंट्रोलर या दूसरे इलेक्ट्रॉनिक पुर्ज़ों की खराबी से पहले भी जवाब दे सकती हैं।

एक मोटा हिसाब देखें: 300 टीबीडब्ल्यू की एसएसडी पर कोई रोज़ औसतन 50 जीबी लिखे, तो 300,000 ÷ 50 = करीब 6,000 दिन, यानी लगभग 16.4 साल। पर यह सिर्फ़ लिखने की सहनशीलता का गणित है, असली उम्र की गारंटी नहीं। तापमान, इलेक्ट्रॉनिक खराबी और वारंटी अवधि पहले ही असर दिखा सकती है। वहीं वीडियो एडिटिंग, बड़े डेटाबेस या लगातार रिकॉर्डिंग वाले सर्वर में रोज़ का लिखा डेटा बहुत ज़्यादा हो सकता है। इसलिए दो एक जैसी एसएसडी अलग इस्तेमाल में बहुत अलग समय तक चल सकती हैं।

क्या एसएसडी बिना चेतावनी अचानक खराब हो सकती है?

खराबी हमेशा धीरे-धीरे नहीं आती। कभी घिसावट बढ़ने पर पढ़ने-लिखने की गलतियाँ दिखती हैं, कंप्यूटर धीमा हो जाता है या ड्राइव सिर्फ़ पढ़ने वाली (रीड-ओनली) हालत में चली जाती है। पर कंट्रोलर की खराबी, फ़र्मवेयर की दिक्कत, बिजली में गड़बड़ी या किसी पुर्ज़े के फ़ेल होने से ड्राइव एकदम बंद भी हो सकती है। कभी कंप्यूटर उसे पहचानना ही बंद कर देता है, तो कभी वह पहचानी जाती है पर डेटा नहीं मिलता। इसलिए खराब होने से पहले चेतावनी ज़रूर देगी वाले भरोसे पर रहना सुरक्षित नहीं।

कई एसएसडी स्मार्ट (सेल्फ-मॉनिटरिंग, एनालिसिस एंड रिपोर्टिंग टेक्नोलॉजी) के ज़रिए अपनी सेहत की जानकारी देती हैं। नई एनवीएमई ड्राइव में इस्तेमाल का प्रतिशत, बची अतिरिक्त मेमोरी, तापमान और डेटा त्रुटियों जैसे संकेत मिल सकते हैं। पर यह जाँच भविष्य की खराबी का पक्का अनुमान नहीं देती। रिपोर्ट ठीक दिखे, तब भी अचानक खराबी संभव है। इसीलिए डेटा बचाने का सबसे भरोसेमंद तरीका अच्छी एसएसडी नहीं, बल्कि नियमित और अलग बैकअप है।

एसएसडी और आम पेन ड्राइव में फ़र्क

दोनों में अक्सर नैंड फ़्लैश होती है, पर मकसद अलग होता है। आम पेन ड्राइव मुख्य रूप से फ़ाइलें इधर से उधर ले जाने और थोड़ा-बहुत डेटा रखने के लिए बनती है। एसएसडी को ऑपरेटिंग सिस्टम, सॉफ़्टवेयर, बड़े डेटा और लगातार पढ़ने-लिखने के लिए डिज़ाइन किया जा सकता है। अच्छी एसएसडी में ज़्यादा ताक़तवर कंट्रोलर, बेहतर समानांतर डेटा प्रबंधन, उन्नत त्रुटि-सुधार, ज़्यादा असरदार वियर लेवलिंग और कभी-कभी अलग डीरैम कैश होता है। हालाँकि सभी एसएसडी में डीरैम नहीं होती और सभी पेन ड्राइव एक जैसी साधारण भी नहीं होतीं।

फ़र्क इस्तेमाल में दिखता है। कुछ फ़ोटो या दस्तावेज़ पेन ड्राइव पर कॉपी करना आसान है, पर उसी पर ऑपरेटिंग सिस्टम चलाने, हज़ारों छोटी फ़ाइलें बदलने या देर तक भारी डेटा लिखने पर उसकी गति बहुत गिर सकती है। अच्छी एसएसडी यह सब बेहतर संभाल लेती है। फिर भी बाज़ार में तेज़ यूएसबी फ़्लैश ड्राइव भी हैं और कम कीमत की सीमित गति वाली एसएसडी भी। सिर्फ़ नाम देखकर गति या टिकाऊपन का अंदाज़ा न लगाएँ।

बाहरी एसएसडी और यूएसबी फ़्लैश ड्राइव एक ही हैं?

फ़्लैश मेमोरी डेटा रखने की तकनीक है, जबकि यूएसबी कंप्यूटर से जुड़ने का इंटरफ़ेस है। इसलिए यूएसबी से जुड़ने वाली हर ड्राइव आम पेन ड्राइव नहीं होती। बाहरी एसएसडी में असली एसएसडी कंट्रोलर और फ़्लैश होती है, जिसे यूएसबी या थंडरबोल्ट के ज़रिए जोड़ा जाता है। पेन ड्राइव भी यूएसबी से जुड़ती है, पर उसके अंदर का कंट्रोलर और डिज़ाइन अलग हो सकता है।

बाहरी एसएसडी की असली गति सिर्फ़ फ़्लैश से तय नहीं होती। कंप्यूटर का यूएसबी पोर्ट, केबल, इंटरफ़ेस का संस्करण, कंट्रोलर और तापमान भी असर डालते हैं। तेज़ बाहरी एसएसडी को पुराने या धीमे पोर्ट में लगाएँगे, तो उसकी पूरी क्षमता नहीं मिलेगी। और सिर्फ़ यूएसबी-सी कनेक्टर होने से कोई ड्राइव तेज़ नहीं हो जाती। कनेक्टर सिर्फ़ आकार बताता है, असली डेटा गति अलग तकनीकी मानकों पर निर्भर करती है।

साटा और एनवीएमई एसएसडी में फ़र्क

साटा एसएसडी पुरानी हार्ड डिस्क के लिए बने साटा इंटरफ़ेस पर चलती है। साटा 6 जीबीपीएस पर व्यावहारिक गति लगभग 500 से 550 एमबी प्रति सेकंड रहती है। आधुनिक एनवीएमई एसएसडी आमतौर पर पीसीआई एक्सप्रेस इंटरफ़ेस इस्तेमाल करती है, जिसमें ज़्यादा बैंडविड्थ होती है और कई अनुरोध एक साथ बढ़िया ढंग से संभाले जा सकते हैं। तेज़ आधुनिक एनवीएमई मॉडल की क्रमवार पढ़ने की गति कई हज़ार एमबी प्रति सेकंड तक जा सकती है, हालाँकि असली नतीजे मॉडल, पीसीआईई संस्करण और इस्तेमाल पर निर्भर करते हैं।

एक आम भ्रम यह भी है कि एम.2 और एनवीएमई एक ही चीज़ हैं। एम.2 भौतिक आकार और कनेक्टर का मानक है, जबकि एनवीएमई डेटा संचार का प्रोटोकॉल है। कुछ एम.2 एसएसडी साटा वाली होती हैं और कुछ एनवीएमई वाली। इसलिए नई एसएसडी लगाते समय सिर्फ़ आकार नहीं, उसका समर्थित इंटरफ़ेस और प्रोटोकॉल भी जाँच लें।

क्या एसएसडी ज़्यादा भर देने से उम्र घटती है?

एसएसडी को लगभग पूरा भर देने पर कुछ हालात में गति घट सकती है। फ़्लैश को नए डेटा के लिए खाली पेज चाहिए। खाली जगह बहुत कम रह जाए, तो कंट्रोलर को गार्बेज कलेक्शन और डेटा की उठा-पटक में ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है। इससे लगातार भारी लिखाई में गति गिर सकती है और अंदरूनी लिखाई बढ़ सकती है, जिसे राइट एम्प्लिफ़िकेशन कहते हैं। यानी कंप्यूटर ने जितना लिखने को कहा, ड्राइव को भीतर डेटा जमाने के लिए उससे ज़्यादा लिखना पड़ सकता है।

पर यह कहना भी ठीक नहीं कि एसएसडी हमेशा आधी खाली रखनी ही पड़ेगी। आधुनिक कंट्रोलर, ट्रिम और ओवर-प्रोविजनिंग जगह का प्रबंधन करते हैं। आम उपयोगकर्ता के लिए ठीक-ठाक खाली जगह रखना काफ़ी है, कोई एक तय प्रतिशत सब एसएसडी पर लागू होने वाला नियम नहीं है। बस ड्राइव को बार-बार पूरा भरकर भारी डेटा लिखने के लिए मजबूर न करें।

क्या एसएसडी को डीफ़्रैगमेंट करना चाहिए?

हार्ड डिस्क में किसी फ़ाइल के टुकड़े प्लेट पर दूर-दूर बिखरे हों, तो हेड को ज़्यादा जगह दौड़ना पड़ता है। डीफ़्रैगमेंटेशन इन टुकड़ों को समेटकर यह खोज-समय घटाता था। एसएसडी में घूमने वाला हेड नहीं है, इसलिए बार-बार पूरा डीफ़्रैग करने का वैसा फ़ायदा नहीं मिलता। उल्टा, बेवजह बड़े पैमाने पर दोबारा लिखाई फ़्लैश पर अतिरिक्त बोझ डालती है।

आधुनिक ऑपरेटिंग सिस्टम एसएसडी को पहचानकर अलग तरह का रखरखाव (जैसे ट्रिम) खुद कर लेते हैं। कुछ खास हालात में फ़ाइल सिस्टम के रखरखाव के लिए सीमित डीफ़्रैग भी होता है। इसलिए सिस्टम के स्वचालित ऑप्टिमाइज़ेशन पर भरोसा करें, पुरानी हार्ड डिस्क के नियम एसएसडी पर आँख मूँदकर न चलाएँ।

क्या एसएसडी से मिटाया डेटा वापस आ सकता है?

कभी-कभी, पर पक्का नहीं। हार्ड डिस्क पर फ़ाइल हटाने के बाद उसका असली डेटा तब तक मौजूद रह सकता है जब तक उस जगह पर नया डेटा न लिख दिया जाए। एसएसडी में ट्रिम और गार्बेज कलेक्शन की वजह से मामला पेचीदा है। ऑपरेटिंग सिस्टम किसी जगह को बेकार घोषित करता है, तो कंट्रोलर बाद में उस डेटा को मिटाना शुरू कर सकता है। उसके बाद रिकवरी मुश्किल या नामुमकिन हो सकती है।

अगर कंट्रोलर खराब हो जाए या ड्राइव में एन्क्रिप्शन चालू हो, तो रिकवरी और कठिन हो जाती है। कई आधुनिक एसएसडी में हार्डवेयर एन्क्रिप्शन होता है। कुछ खराबियों में मेमोरी चिप सही होने पर भी ज़रूरी कंट्रोलर जानकारी या एन्क्रिप्शन की चाबी न मिलने से डेटा पढ़ा नहीं जा सकता। इसलिए रिकवरी की उम्मीद को बैकअप का विकल्प न मानें।

क्या एसएसडी आगे हार्ड डिस्क को पूरी तरह खत्म कर देगी?

पर्सनल कंप्यूटर, लैपटॉप और कई तेज़ सर्वरों में एसएसडी ने हार्ड डिस्क की जगह बड़े पैमाने पर ले ली है। वजह सिर्फ़ गति नहीं, बल्कि कम एक्सेस टाइम, यांत्रिक हलचल का न होना, कम शोर और कई कामों में बेहतर ऊर्जा दक्षता भी है। पर हार्ड डिस्क पूरी तरह खत्म नहीं हुई। बहुत बड़ी मात्रा में डेटा सस्ते में रखने वाले डेटा सेंटर, बैकअप सिस्टम और कुछ अभिलेखीय कामों में वह आज भी चलती है, क्योंकि वहाँ प्रति टेराबाइट कीमत और क्षमता सबसे अहम है।

आगे फ़्लैश की परतें बढ़ाने, प्रति सेल ज़्यादा बिट रखने, बेहतर कंट्रोलर और नए इंटरफ़ेस से एसएसडी की क्षमता और गति बढ़ सकती है। पर ज़्यादा घनत्व का मतलब हमेशा ज़्यादा भरोसेमंद होना नहीं। इंजीनियरों को क्षमता, लागत, गति, बिजली की खपत और डेटा टिकाने की क्षमता के बीच संतुलन बनाना पड़ता है, और यही भविष्य की स्टोरेज तकनीक की सबसे बड़ी चुनौती है।

सबसे बड़ा सबक ये है कि डेटा बचाने के लिए तेज़ और महँगी ड्राइव खरीद लेना काफ़ी नहीं। एसएसडी हो, हार्ड डिस्क हो या पेन ड्राइव, हर स्टोरेज कभी न कभी खराब हो सकता है। इसलिए ज़रूरी फ़ाइलों की कम से कम एक अलग प्रति रखें, और आदर्श रूप से एक बैकअप किसी दूसरी जगह पर भी सुरक्षित रखें।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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