Newstrack Special: स्टारलिंक सिर्फ इंटरनेट नहीं, अमेरिका की सैन्य ताकत भी! जानिए स्टारशील्ड का काम

Starlink vs Starshield: स्टारलिंक और स्टारशील्ड में क्या अंतर है? जानिए एलन मस्क की स्पेसएक्स तकनीक कैसे दुनिया को इंटरनेट देती है और अमेरिकी सेना तथा खुफिया एजेंसियों के लिए सुरक्षित संचार और निगरानी का काम करती है।

Yogesh Mishra
Published on: 31 Oct 2026 2:30 PM IST
Newstrack Special: स्टारलिंक सिर्फ इंटरनेट नहीं, अमेरिका की सैन्य ताकत भी! जानिए स्टारशील्ड का काम
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Starlink vs Starshield: एलन मस्क की कंपनी 'स्पेसएक्स' ने अंतरिक्ष में उपग्रहों का ऐसा नेटवर्क तैयार किया है, जिसका इस्तेमाल दो अलग-अलग कामों के लिए किया जा रहा है। 'स्टारलिंक' आम लोगों, कंपनियों, जहाजों और विमानों को इंटरनेट उपलब्ध कराता है। वहीं, 'स्टारशील्ड' अमेरिकी सरकार और उसकी रक्षा एजेंसियों की जरूरतों के लिए बनाया गया है। इसका इस्तेमाल सुरक्षित सैन्य संचार, पृथ्वी की निगरानी और सरकारी उपकरणों को अंतरिक्ष में स्थापित करने जैसे कामों में हो सकता है।

दोनों प्रणालियाँ एक ही कंपनी की तकनीक पर आधारित हैं, लेकिन उनके उद्देश्य और ग्राहक अलग हैं। इसी वजह से कुछ अहम सवाल उठते हैं। क्या किसी निजी कंपनी के पास युद्ध के दौरान किसी देश का संचार सीमित करने की ताकत होनी चाहिए? क्या विदेशी उपग्रह नेटवर्क पर निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है? और क्या आम लोगों को इंटरनेट देने वाली तकनीक का इस्तेमाल सैन्य और खुफिया कामों में भी हो सकता है?

अक्टूबर 2026 में यूक्रेन में स्टारलिंक और स्टारशील्ड की सेवाओं को लेकर हुए विवाद ने इन सवालों को और गंभीर बना दिया है। भारत के लिए भी यह मुद्दा अहम है, क्योंकि स्टारलिंक को देश में जरूरी दूरसंचार लाइसेंस मिल चुके हैं।

स्टारलिंक क्या है और यह इंटरनेट कैसे पहुँचाता है?

स्टारलिंक स्पेसएक्स की उपग्रह आधारित इंटरनेट सेवा है। इसका मकसद उन जगहों तक इंटरनेट पहुँचाना है, जहाँ मोबाइल टावर या फाइबर नेटवर्क लगाना मुश्किल या बहुत महँगा होता है।

आमतौर पर घरों और दफ्तरों तक इंटरनेट पहुँचाने के लिए फाइबर केबल या दूसरी तार वाली व्यवस्था की जरूरत होती है। मोबाइल इंटरनेट के लिए आसपास मोबाइल टावर और उससे जुड़ा नेटवर्क होना चाहिए। लेकिन पहाड़ों, द्वीपों, दूरदराज के गाँवों और समुद्र में चलने वाले जहाजों तक ऐसी सुविधाएँ पहुँचाना आसान नहीं होता।

स्टारलिंक इस समस्या का समाधान पृथ्वी के आसपास निचली कक्षा में बड़ी संख्या में उपग्रह स्थापित करके करता है। यूजर अपने घर या दफ्तर में एक खास एंटीना लगाते हैं। यह एंटीना उपग्रहों से संपर्क करके इंटरनेट उपलब्ध कराता है। उपग्रहों के बीच लेजर के जरिए भी डेटा भेजा जा सकता है।

परंपरागत भूस्थिर संचार उपग्रह पृथ्वी से करीब 35,786 किलोमीटर ऊपर होते हैं। इसके मुकाबले स्टारलिंक के कई उपग्रह लगभग 550 किलोमीटर की ऊँचाई पर काम करते हैं। कम दूरी होने के कारण डेटा भेजने और उसका जवाब मिलने में कम समय लगता है। इसे तकनीकी भाषा में लेटेंसी कहते हैं।

कम लेटेंसी के कारण स्टारलिंक पर वीडियो कॉल, ऑनलाइन काम और ऐसी दूसरी सेवाएँ इस्तेमाल की जा सकती हैं, जिनमें तेजी से जवाब मिलना जरूरी होता है। हालांकि, इंटरनेट की वास्तविक गति और गुणवत्ता जगह, मौसम, नेटवर्क पर उपयोगकर्ताओं की संख्या और उपलब्ध क्षमता पर निर्भर करती है।

स्टारलिंक का नेटवर्क कितना बड़ा है?

कुछ ही वर्षों में स्टारलिंक दुनिया के सबसे बड़े उपग्रह इंटरनेट नेटवर्कों में शामिल हो गया है। अमेरिकी संघीय संचार आयोग के अगस्त 2026 के दस्तावेज के अनुसार, जून 2026 तक स्टारलिंक के 10,200 से अधिक ब्रॉडबैंड और मोबाइल उपग्रह अंतरिक्ष में थे। इसी अवधि में दुनिया भर में इसके करीब 1.2 करोड़ ग्राहक थे।

इस विस्तार में स्पेसएक्स के फाल्कन-9 रॉकेट की बड़ी भूमिका है। इन रॉकेटों के कुछ हिस्सों का दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे कंपनी को बार-बार उपग्रह लॉन्च करने में मदद मिलती है और लागत भी कम होती है।

प्राकृतिक आपदाओं के समय भी स्टारलिंक उपयोगी साबित हो सकता है। अगर बाढ़, भूकंप या तूफान से मोबाइल टावर और फाइबर नेटवर्क टूट जाएँ, तो बिजली और जरूरी उपकरण उपलब्ध होने पर उपग्रह इंटरनेट से संपर्क बहाल करने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि स्टारलिंक हर परिस्थिति में काम करता रहेगा। इसके लिए जमीन पर लगा टर्मिनल, बिजली, उपग्रहों से संपर्क और कंपनी का नेटवर्क चालू रहना जरूरी है। इसके अलावा सरकारी अनुमति और स्थानीय नियम भी लागू होते हैं।

स्टारशील्ड क्या है?

स्टारशील्ड स्पेसएक्स की वह प्रणाली है, जिसे अमेरिकी सरकार और उसकी सुरक्षा एजेंसियों की जरूरतों के लिए तैयार किया गया है। कंपनी के मुताबिक, इसके तीन मुख्य काम हैं। पहला, उपग्रहों पर लगे खास उपकरणों से पृथ्वी की निगरानी करना। दूसरा, सरकारी और सैन्य यूजर्स के बीच सुरक्षित संचार उपलब्ध कराना। तीसरा, विशेष सरकारी उपकरणों को उपग्रहों के जरिए अंतरिक्ष में स्थापित करना और उनका संचालन करना।

इन विशेष उपकरणों को तकनीकी भाषा में 'पेलोड' कहा जाता है।

'स्टारशील्ड' आम लोगों को घरों में इंटरनेट देने के लिए नहीं बनाया गया है। इसका इस्तेमाल अमेरिकी सरकार और उसके अधिकृत सुरक्षा भागीदारों के मिशनों में होता है।

'स्पेसएक्स' का कहना है कि स्टारशील्ड में स्टारलिंक की एन्क्रिप्शन व्यवस्था के अलावा गोपनीय सरकारी जानकारी और उपकरणों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त तकनीक भी शामिल है। कंपनी इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मिशनों के लिए तैयार नेटवर्क बताती है। इसलिए स्टारशील्ड को सिर्फ सैनिकों के लिए तेज इंटरनेट कहना सही नहीं होगा। इसमें सुरक्षित संचार के साथ निगरानी और दूसरे सरकारी अंतरिक्ष मिशन भी शामिल हो सकते हैं।

स्टारलिंक और स्टारशील्ड में क्या अंतर है?

दोनों प्रणालियाँ स्पेसएक्स की तकनीक और रॉकेट लॉन्च करने की क्षमता का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन उनके उद्देश्य अलग हैं। स्टारलिंक का मुख्य काम व्यावसायिक इंटरनेट सेवा देना है, जबकि स्टारशील्ड अमेरिकी सरकार और रक्षा एजेंसियों की जरूरतों को पूरा करता है।

यह समझना भी जरूरी है कि स्टारशील्ड के सभी उपग्रहों का मालिकाना हक और संचालन सीधे अमेरिकी सरकार के पास ही हो, ऐसा जरूरी नहीं है। इसमें स्पेसएक्स की तकनीक, उपग्रह और सेवाएँ सरकारी अनुबंधों के तहत इस्तेमाल हो सकती हैं। किसका कितना नियंत्रण होगा, यह संबंधित अनुबंध और मिशन पर निर्भर करता है।

क्या स्टारशील्ड अमेरिका का जासूसी उपग्रह नेटवर्क भी है?

स्टारशील्ड को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के लिए विकसित किए जा रहे उपग्रह नेटवर्क की है।

मार्च 2024 में रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से खबर दी थी कि स्पेसएक्स अमेरिकी नेशनल रिकॉनिसेंस ऑफिस यानी एनआरओ के लिए सैकड़ों निगरानी उपग्रहों का नेटवर्क विकसित कर रहा है। एनआरओ अमेरिका की सरकारी एजेंसी है, जो अंतरिक्ष से निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने वाली प्रणालियों से जुड़ी है।

रिपोर्ट के अनुसार, यह परियोजना 2021 में हुए करीब 1.8 अरब डॉलर के गोपनीय अनुबंध से जुड़ी थी। इसका मकसद कई उपग्रहों की मदद से पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों की निगरानी करना और उनसे मिली जानकारी तेजी से अमेरिकी एजेंसियों तक पहुँचाना था। इस कार्यक्रम की पूरी तकनीकी जानकारी सार्वजनिक नहीं है।

यहाँ एक जरूरी अंतर समझना चाहिए। स्टारलिंक के सामान्य इंटरनेट उपग्रहों के बारे में यह कहना सही नहीं है कि वे लगातार घरों और लोगों की तस्वीरें लेते रहते हैं। स्टारशील्ड के कुछ विशेष सरकारी उपग्रहों पर निगरानी के लिए सेंसर लगाए जा सकते हैं। दोनों प्रणालियों को एक जैसा मानना गलत होगा। फिर भी यह साफ है कि स्पेसएक्स की तकनीक अब केवल इंटरनेट सेवा तक सीमित नहीं है। वह अमेरिका की रक्षा और खुफिया व्यवस्था में भी भूमिका निभा रही है।

क्या स्टारशील्ड दूसरे देशों की सैन्य गतिविधियों पर नजर रख सकता है?

स्टारशील्ड के घोषित कामों में पृथ्वी का अवलोकन भी शामिल है। अगर किसी देश की खुफिया एजेंसी के पास अलग-अलग सेंसरों से लैस कई उपग्रह हों, तो वह सैन्य ठिकानों, जहाजों और दूसरी रणनीतिक गतिविधियों से जुड़ी जानकारी जुटा सकती है।

पुराने निगरानी उपग्रह किसी खास जगह के ऊपर तय समय पर गुजरते थे। इसलिए किसी स्थान की दोबारा तस्वीर लेने के लिए अगली उड़ान का इंतजार करना पड़ सकता था। कई उपग्रहों वाला नेटवर्क इस अंतराल को कम कर सकता है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि कोई उपग्रह हर व्यक्ति की गतिविधि हर पल देख सकता है। निगरानी की क्षमता कैमरे और सेंसर की गुणवत्ता, मौसम, बादलों, रोशनी, उपग्रह की कक्षा और डेटा का विश्लेषण करने वाली तकनीक पर निर्भर करती है।

भारत समेत दूसरे देशों के लिए चिंता यह है कि अंतरिक्ष से निगरानी की क्षमता बढ़ने के साथ सैन्य ठिकानों और रणनीतिक गतिविधियों की सुरक्षा के पुराने तरीके बदल सकते हैं। इसलिए देशों को अपनी रक्षा योजनाओं में अंतरिक्ष आधारित निगरानी को भी ध्यान में रखना होगा।

रूस-यूक्रेन युद्ध में स्टारलिंक क्यों अहम हो गया?

फरवरी 2022 में रूस के बड़े सैन्य हमले के बाद यूक्रेन की संचार व्यवस्था को भारी नुकसान पहुँचा। कई जगह मोबाइल और दूसरे दूरसंचार नेटवर्क बाधित हो गए। ऐसे समय में स्टारलिंक के टर्मिनलों ने यूक्रेन को संपर्क बनाए रखने में मदद की।

स्टारलिंक का इस्तेमाल नागरिकों, सरकारी संस्थाओं और राहत सेवाओं के साथ-साथ सैन्य संचार में भी होने लगा। सैनिक इकाइयों के बीच संपर्क, जानकारी का आदान-प्रदान और ड्रोन से जुड़े कुछ अभियानों में भी यह नेटवर्क अहम बन गया। यहीं से एक बड़ा सवाल उठा कि अगर किसी देश की सेना किसी निजी कंपनी के नेटवर्क पर निर्भर हो जाए, तो युद्ध के दौरान उस सेवा को सीमित करने का अधिकार किसके पास होना चाहिए? स्टारलिंक की उपयोगिता ने दिखाया कि व्यावसायिक तकनीक युद्ध में कितनी अहम हो सकती है। लेकिन इससे कंपनी और सरकार के बीच नियंत्रण तथा जवाबदेही को लेकर विवाद की आशंका भी बढ़ गई।

अक्टूबर 2026 में यूक्रेन में क्या विवाद हुआ?

अक्टूबर 2026 के मध्य में यूक्रेन ने शिकायत की कि स्टारलिंक और स्टारशील्ड की कुछ सेवाओं पर लगी पाबंदियों से उसके सैन्य अभियानों पर असर पड़ा है।यूक्रेनी अधिकारियों ने कहा कि तेज गति से चलने वाले सैन्य उपकरणों और ड्रोन पर लगे टर्मिनलों का संपर्क बाधित हुआ। कुछ मामलों में 100 मील प्रति घंटे यानी करीब 160 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की गति पर संपर्क बनाए रखने में परेशानी आई। यूक्रेन की एक सैन्य इकाई ने बताया कि कुछ संपर्क 10 से 20 सेकंड तक टूटे। इससे कुछ अभियानों को रद्द करना पड़ा या उनकी योजना बदलनी पड़ी।

15 अक्टूबर को नौ अमेरिकी सीनेटरों ने रक्षा विभाग के महानिरीक्षक से इस मामले की जाँच करने की माँग की। वे जानना चाहते थे कि सेवा में बदलाव किसने किया, क्या अमेरिकी अधिकारियों को इसकी पहले से जानकारी थी और क्या इस फैसले से यूक्रेन तथा अमेरिकी कर्मियों की सुरक्षा प्रभावित हुई।

22 अक्टूबर को अमेरिकी सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने स्पेसएक्स और अमेरिकी रक्षा विभाग के संबंधों की अलग संसदीय जाँच शुरू करने की घोषणा की। उन्होंने सवाल उठाया कि अमेरिकी करदाताओं के पैसे से हासिल की गई सैन्य संचार क्षमता को सीमित करने का अधिकार किसके पास है।

23 अक्टूबर को रॉयटर्स ने यूक्रेनी अधिकारियों के हवाले से बताया कि तेज गति से चलने वाले उपकरणों पर लगी पाबंदियाँ कुछ हद तक जारी थीं। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि सेवा बहाल कर दी गई है। दोनों बयानों में अंतर ने विवाद को और बढ़ा दिया।

28-29 अक्टूबर तक एक और घटनाक्रम सामने आया। अमेरिकी रक्षा विभाग के महानिरीक्षक ने सीनेटरों की माँग पर खुद जाँच शुरू करने से इनकार कर दिया और कहा कि इस मामले को देखने के लिए वायुसेना अधिक उपयुक्त संस्था हो सकती है। एसोसिएटेड प्रेस के अनुसार, एलन मस्क ने सेवा की गति सीमित किए जाने की बात स्वीकार की और यूक्रेन पर सेवा की शर्तों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। यूक्रेन ने इस आरोप से असहमति जताई।

ट्रंप ने पाबंदी लगाने का आदेश देने से इनकार किया, जबकि सरकारी अधिकारियों के बयानों से इस फैसले में अमेरिकी प्रशासन की भूमिका को लेकर सवाल बने रहे।इस विवाद का सबसे बड़ा सवाल अनसुलझा था कि सेवा सीमित करने का फैसला किसने लिया, उसका कानूनी और अनुबंध से जुड़ा आधार क्या था और अमेरिकी सरकार की इसमें कितनी भूमिका थी।

निजी कंपनी के हाथ में युद्ध का संचार: सबसे बड़ी चिंता

इस पूरे विवाद का सबसे अहम सबक यह है कि युद्ध के समय संचार व्यवस्था पर नियंत्रण कितना जरूरी होता है।

मान लीजिए किसी देश की सेना अपने सैनिकों, ड्रोन और दूसरे रक्षा उपकरणों को जोड़ने के लिए किसी विदेशी कंपनी के नेटवर्क पर निर्भर है। अगर युद्ध के बीच उस नेटवर्क की सेवा बंद हो जाए या उसकी गति सीमित कर दी जाए, तो सैन्य अभियान प्रभावित हो सकते हैं।

सेवा बाधित होने के कई कारण हो सकते हैं। कंपनी अपनी सेवा की शर्तों के आधार पर कुछ बदलाव कर सकती है, सरकार कोई आदेश दे सकती है, तकनीकी खराबी आ सकती है या दुश्मन देश साइबर और इलेक्ट्रॉनिक हमला कर सकता है। इसलिए किसी एक नेटवर्क पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिम भरा है।

स्टारशील्ड जैसी सरकारी व्यवस्था में विशेष अनुबंध और अतिरिक्त सुरक्षा उपाय हो सकते हैं। फिर भी अगर उसका कुछ तकनीकी आधार स्टारलिंक के साथ साझा है, तो दोनों प्रणालियों के बीच कुछ जोखिम भी साझा हो सकते हैं। इसीलिए किसी भी देश की सेना को संचार के कई विकल्प रखने चाहिए। उपग्रह, रेडियो, फाइबर और दूसरे सुरक्षित नेटवर्क जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे के विकल्प के रूप में काम आ सकते हैं।

क्या स्टारलिंक और स्टारशील्ड को हैक किया जा सकता है?

कोई भी डिजिटल नेटवर्क साइबर हमलों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। उपग्रह इंटरनेट में केवल अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रह ही नहीं, बल्कि जमीन पर लगे टर्मिनल, नेटवर्क को नियंत्रित करने वाली प्रणालियाँ, सॉफ्टवेयर और डेटा केंद्र भी शामिल होते हैं। इनमें से किसी हिस्से में कमजोरी पूरे नेटवर्क को प्रभावित कर सकती है।

उदाहरण के लिए, किसी उपयोगकर्ता का खाता हैक हो सकता है, टर्मिनल की सेटिंग में गड़बड़ी की जा सकती है या नेटवर्क के संचालन से जुड़ी प्रणाली पर हमला हो सकता है।

स्पेसएक्स का कहना है कि स्टारलिंक में उपयोगकर्ता डेटा की सुरक्षा के लिए एन्क्रिप्शन है और स्टारशील्ड में गोपनीय सरकारी मिशनों के लिए अतिरिक्त सुरक्षा दी जाती है। लेकिन कंपनी का यह दावा इस बात की गारंटी नहीं है कि नेटवर्क में कभी कोई कमजोरी नहीं आएगी।

सैन्य संचार में केवल तेज इंटरनेट काफी नहीं होता। यह भी जरूरी है कि जानकारी गोपनीय रहे, सही स्रोत से आए और जरूरत के समय उपलब्ध हो।

क्या दुश्मन उपग्रह इंटरनेट को जाम कर सकता है?

उपग्रह और जमीन पर लगे टर्मिनल रेडियो संकेतों के जरिए संपर्क करते हैं। युद्ध के दौरान विरोधी देश इन संकेतों को बाधित करने की कोशिश कर सकते हैं। इसे जैमिंग कहते हैं।

किसी प्रणाली को नकली या गलत संकेत देकर भ्रमित करने की कोशिश को स्पूफिंग कहा जाता है।

स्टारलिंक जैसे नेटवर्क में हजारों उपग्रह होने से कुछ तरह की तकनीकी खराबियों के बावजूद सेवा जारी रखने में मदद मिल सकती है। अगर एक उपग्रह से संपर्क टूट जाए, तो कुछ परिस्थितियों में दूसरा उपग्रह संपर्क उपलब्ध करा सकता है। लेकिन इससे हर तरह का खतरा खत्म नहीं होता। जमीन पर मौजूद टर्मिनल, रेडियो संपर्क और नेटवर्क के दूसरे हिस्से अब भी प्रभावित हो सकते हैं।

इसलिए स्टारशील्ड को पूरी तरह जैमिंग से सुरक्षित बताना ठीक नहीं होगा। उसकी वास्तविक क्षमता का आकलन स्वतंत्र परीक्षण और सैन्य अनुभव से ही किया जा सकता है। इसके कई तकनीकी विवरण सार्वजनिक भी नहीं हैं।

भारत के लिए डेटा सुरक्षा का सवाल क्यों अहम है?

अगर भारत में बड़ी संख्या में लोग किसी विदेशी कंपनी के उपग्रह इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि उनका डेटा किस रास्ते से गुजरता है, नेटवर्क का संचालन कहाँ से होता है और भारतीय कानून के तहत सरकार को किस तरह की जानकारी मिल सकती है।

इसका मतलब यह नहीं है कि इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनी उपयोगकर्ताओं के हर संदेश और बातचीत को सीधे पढ़ सकती है। वेबसाइटों, ऐप और मैसेजिंग सेवाओं में एन्क्रिप्शन हो सकता है। लेकिन इंटरनेट सेवा प्रदाता के पास नेटवर्क चलाने के लिए कुछ तकनीकी जानकारी और मेटाडेटा उपलब्ध हो सकता है।

भारत सरकार के लिए जरूरी है कि उपग्रह इंटरनेट कंपनियाँ देश के कानूनों और सुरक्षा शर्तों का पालन करें। इनमें नेटवर्क के संचालन, डेटा के रास्ते, कानूनी प्रक्रिया के तहत सरकारी निगरानी और जरूरत पड़ने पर सेवा को नियंत्रित करने से जुड़ी शर्तें शामिल हो सकती हैं। साथ ही नागरिकों की निजता का ध्यान रखना भी जरूरी है। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर निगरानी की व्यवस्था हो, तो उसके लिए स्पष्ट कानूनी आधार और जवाबदेही होनी चाहिए।

क्या स्टारशील्ड भारत की जासूसी कर सकता है?

स्टारशील्ड की पृथ्वी पर निगरानी करने की क्षमता को देखते हुए भारत के लिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियाँ अंतरिक्ष से दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों की जानकारी जुटाने के लिए उपग्रहों का इस्तेमाल करती रही हैं। भारत भी ऐसी निगरानी के दायरे में आ सकने वाले देशों में है। लेकिन यह दावा करना कि स्टारशील्ड ने भारत की किसी खास सैन्य गतिविधि की जासूसी की है, उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर सही नहीं होगा। ऐसी किसी खास घटना का प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।

भारत के लिए असली चुनौती यह है कि अंतरिक्ष से निगरानी की क्षमता लगातार बढ़ रही है। इसका जवाब केवल विदेशी तकनीक पर रोक लगाना नहीं है। भारत को अपनी निगरानी क्षमता, सुरक्षित संचार और संवेदनशील सैन्य जानकारी की सुरक्षा मजबूत करनी होगी। यह भी समझना जरूरी है कि भारत में स्टारलिंक को इंटरनेट सेवा का लाइसेंस मिलना, स्टारशील्ड को भारत में सैन्य या खुफिया काम करने की अलग अनुमति मिल जाना नहीं है। दोनों अलग प्रणालियाँ हैं और उन पर अलग नियम लागू होते हैं।

भारत में स्टारलिंक को अनुमति मिली है या नहीं?

भारत में स्टारलिंक को लेकर अक्सर यह भ्रम होता है कि अगर कंपनी को लाइसेंस मिल गया है, तो उसकी सेवा भी शुरू हो गई होगी। लेकिन दूरसंचार लाइसेंस मिलना और आम ग्राहकों को सेवा देना शुरू करना दो अलग बातें हैं।

भारत सरकार के अनुसार, दूरसंचार विभाग ने 6 जून 2025 को स्टारलिंक सैटेलाइट कम्युनिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड को यूनिफाइड लाइसेंस के तहत तीन तरह की अनुमति दी थी। इनमें जीएमपीसीएस, कमर्शियल वी-सैट और इंटरनेट सेवा प्रदाता श्रेणी की अनुमति शामिल थी। इन लाइसेंसों के साथ सुरक्षा संबंधी शर्तें भी जुड़ी थीं।

29 जनवरी 2026 को संचार मंत्रालय ने राज्यसभा में बताया कि जीएमपीसीएस सेवा के लिए स्टारलिंक, जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस और वनवेब इंडिया को लाइसेंस जारी किए गए हैं। सरकार ने यह भी कहा कि उपग्रह इंटरनेट दूरदराज, पहाड़ी, तटीय और सीमावर्ती इलाकों में संपर्क बढ़ाने में मदद कर सकता है।

हालांकि, लाइसेंस मिलने का मतलब यह नहीं है कि कंपनी को बिना किसी और प्रक्रिया के सेवा शुरू करने की पूरी छूट मिल गई। स्पेक्ट्रम आवंटन, तकनीकी परीक्षण और सुरक्षा संबंधी शर्तें भी पूरी करनी होती हैं।

भारत को स्टारलिंक की जरूरत क्यों पड़ सकती है?

भारत में मोबाइल नेटवर्क और फाइबर इंटरनेट का विस्तार हुआ है, लेकिन कई ऐसे इलाके अब भी हैं जहाँ सामान्य नेटवर्क पहुँचाना कठिन है।

हिमालयी क्षेत्र, दूरदराज के गाँव, द्वीप, जंगल और कुछ सीमावर्ती इलाके इसके उदाहरण हैं। इन जगहों पर फाइबर बिछाना या मोबाइल टावर लगाना महँगा और मुश्किल हो सकता है।

ऐसे स्थानों पर उपग्रह इंटरनेट उपयोगी विकल्प बन सकता है। प्राकृतिक आपदा में जब सामान्य संचार व्यवस्था टूट जाए, तब भी उपयुक्त उपकरण और बिजली उपलब्ध होने पर इससे संपर्क बहाल करने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, जहाँ अच्छी गुणवत्ता वाला फाइबर नेटवर्क मौजूद है, वहाँ उपग्रह इंटरनेट जरूरी नहीं कि उससे बेहतर या सस्ता हो। इसका सबसे बड़ा फायदा उन इलाकों में है जहाँ सामान्य नेटवर्क उपलब्ध नहीं है या भरोसेमंद नहीं है।

क्या भारतीय सेना के लिए यह तकनीक उपयोगी हो सकती है?

भारतीय सेना को पहाड़ी सीमाओं, दुर्गम इलाकों और समुद्री क्षेत्रों में सुरक्षित संचार की जरूरत होती है। ऐसे स्थानों पर सामान्य मोबाइल नेटवर्क पर निर्भर रहना हमेशा संभव नहीं होता।

स्टारशील्ड जैसी तकनीक दिखाती है कि भविष्य में कम ऊँचाई पर घूमने वाले कई उपग्रहों से तेज और लचीला सैन्य संचार नेटवर्क बनाया जा सकता है। लेकिन भारतीय सेना के लिए किसी विदेशी कंपनी की सेवा का इस्तेमाल केवल तकनीकी सुविधा का मामला नहीं होगा।

यह भी देखना होगा कि नेटवर्क पर नियंत्रण किसका है, डेटा कितना सुरक्षित है और युद्ध या संकट के समय सेवा जारी रहने की कितनी गारंटी है। विदेशी सरकार के फैसलों से सेवा प्रभावित होने का जोखिम भी ध्यान में रखना होगा।

इसलिए भारत के लिए अपनी सुरक्षित उपग्रह संचार व्यवस्था विकसित करना रणनीतिक रूप से जरूरी है। नागरिक इंटरनेट के लिए विदेशी कंपनी की सेवा लेना और देश की संवेदनशील सैन्य संचार व्यवस्था को विदेशी नेटवर्क पर निर्भर करना दो अलग फैसले हैं।

क्या भारत की सीमा पर बिना अनुमति स्टारलिंक इस्तेमाल किया जा सकता है?

किसी उपग्रह नेटवर्क का कवरेज देश की राजनीतिक सीमा पर अपने आप नहीं रुकता। लेकिन किसी देश में कानूनी रूप से सेवा देना वहाँ के दूरसंचार नियमों और कंपनी के नेटवर्क नियंत्रण पर निर्भर करता है।

उपग्रह इंटरनेट टर्मिनल की पहचान और उसकी लोकेशन पता करने के लिए तकनीकी तरीके इस्तेमाल किए जा सकते हैं। कंपनी इन्हीं के आधार पर कुछ इलाकों में सेवा चालू या बंद कर सकती है। इसे जियोफेंसिंग कहा जाता है। भारत के लिए चिंता यह है कि बिना अनुमति लाए गए टर्मिनलों का इस्तेमाल संवेदनशील इलाकों में न होने पाए। ऐसे उपकरणों की पहचान करना और अनधिकृत सेवा को रोकना सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा है। हालांकि, यह कहना भी सही नहीं होगा कि हर स्टारलिंक टर्मिनल भारत में कहीं भी बिना अनुमति काम कर सकता है। उसका संचालन टर्मिनल की स्थिति, कंपनी के नेटवर्क और लागू नियमों पर निर्भर करता है।

क्या अंतरिक्ष की ताकत निजी कंपनियों के हाथों में जा रही है?

पहले अंतरिक्ष में उपग्रह भेजना बहुत महँगा काम था। मुख्य रूप से सरकारें और कुछ बड़ी कंपनियाँ ही ऐसा कर पाती थीं। अब छोटे उपग्रहों और दोबारा इस्तेमाल होने वाले रॉकेटों ने इस क्षेत्र को बदल दिया है। स्पेसएक्स ने कम लागत पर रॉकेट लॉन्च करने और बड़ी संख्या में उपग्रह स्थापित करने की क्षमता विकसित की है। इसी वजह से उसकी व्यावसायिक सेवाओं के साथ अमेरिकी रक्षा और खुफिया एजेंसियों की निर्भरता भी बढ़ी है।

लेकिन जब किसी निजी कंपनी की तकनीक किसी देश की अहम सैन्य व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है, तो उसके नियंत्रण और जवाबदेही को लेकर सवाल उठते हैं। कंपनी के व्यावसायिक हित, सरकारी अनुबंध और राजनीतिक फैसले उसकी सेवाओं को प्रभावित कर सकते हैं।

यह मुद्दा केवल एलन मस्क तक सीमित नहीं है। अगर किसी दूसरी निजी कंपनी के पास भी ऐसी क्षमता हो, तो उससे जुड़े सवाल भी यही होंगे। सेवा बंद करने का अधिकार किसके पास है? सरकार की भूमिका क्या है? और संकट के समय जवाबदेही किसकी होगी?

हजारों उपग्रहों से अंतरिक्ष में क्या खतरे बढ़ते हैं?

स्टारलिंक जैसे नेटवर्क के विस्तार से पृथ्वी की निचली कक्षा में उपग्रहों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इससे अंतरिक्ष में टक्कर और मलबे का खतरा भी बढ़ सकता है।

उपग्रहों को अपनी कक्षा में दूसरी वस्तुओं से टकराने से बचाने के लिए लगातार निगरानी करनी पड़ती है। अंतरिक्ष में पहले से निष्क्रिय उपग्रहों, रॉकेट के हिस्सों और दूसरे मलबे की मौजूदगी इस चुनौती को और बढ़ाती है। अगर टक्कर होती है, तो उससे और मलबा पैदा हो सकता है।

बड़ी संख्या में उपग्रह खगोल विज्ञान पर भी असर डाल सकते हैं। वे दूरबीनों से ली जाने वाली तस्वीरों और कुछ रेडियो अवलोकनों में बाधा पैदा कर सकते हैं। कंपनियाँ इस असर को कम करने के उपाय करती हैं, लेकिन समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इसलिए उपग्रह इंटरनेट के विस्तार के साथ अंतरिक्ष में यातायात का प्रबंधन, मलबे पर नियंत्रण और देशों के बीच सहयोग भी जरूरी होता जा रहा है।

भारत को क्या नीति अपनानी चाहिए?

भारत के सामने सिर्फ दो विकल्प नहीं हैं कि स्टारलिंक को अनुमति दी जाए या उस पर रोक लगा दी जाए। जरूरत इस बात की है कि तकनीक का फायदा उठाते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को नियंत्रित किया जाए।

दूरदराज के इलाकों में इंटरनेट पहुँचाने के लिए उपग्रह सेवा उपयोगी हो सकती है। इससे उन जगहों पर भी संपर्क बढ़ सकता है जहाँ फाइबर या मोबाइल नेटवर्क पहुँचाना कठिन है।

लेकिन कंपनियों को भारतीय कानूनों और सुरक्षा शर्तों का पालन करना होगा। नेटवर्क का संचालन, डेटा की सुरक्षा, सरकारी निगरानी और संवेदनशील इलाकों में सेवा नियंत्रण से जुड़ी व्यवस्थाएँ साफ और जाँच के योग्य होनी चाहिए।

भारत को अपनी उपग्रह संचार और अंतरिक्ष निगरानी क्षमता भी बढ़ानी होगी। खास तौर पर सेना के लिए ऐसे सुरक्षित नेटवर्क जरूरी हैं जिनका संचालन और नियंत्रण देश के अपने हाथ में हो। किसी एक विदेशी कंपनी या एक ही तकनीक पर पूरी तरह निर्भर रहने से बचना चाहिए।

साथ ही, सुरक्षा के नाम पर नागरिकों की निजता और कानूनी अधिकारों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। मजबूत सुरक्षा व्यवस्था के साथ स्पष्ट नियम और जवाबदेही भी जरूरी हैं।

असली सवाल नियंत्रण का है

इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है कि भविष्य में केवल यह मायने नहीं रखेगा कि अंतरिक्ष में कितने उपग्रह हैं। उससे भी बड़ा सवाल होगा कि उन उपग्रहों से मिलने वाली सेवाओं और सूचनाओं पर अंतिम फैसला किसका है। जिस तकनीक से दूरदराज का विद्यार्थी इंटरनेट पर पढ़ाई कर सकता है, उसी तकनीकी आधार का इस्तेमाल युद्ध के मैदान में सैनिकों और रक्षा उपकरणों के बीच संपर्क के लिए भी हो सकता है। तकनीक अपने आप में उपयोगी है, लेकिन उसकी सुरक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि उस पर किसका नियंत्रण है और संकट के समय जवाबदेही किसकी होगी।

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Yogesh Mishra

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Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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