TCP-IP: इंटरनेट की वह तकनीक जिसके बिना दुनिया नहीं चल सकती

TCP-IP क्या है और इंटरनेट की पूरी दुनिया इसके बिना क्यों नहीं चल सकती? जानिए विंटन सर्फ और रॉबर्ट कान ने कैसे अलग-अलग नेटवर्क को जोड़ने वाली तकनीक विकसित की और TCP/IP कैसे काम करता है।

Neel Mani Lal
Published on: 19 Sept 2026 5:11 PM IST
What is TCP IP Explained in Hindi
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What is TCP IP Explained in Hindi 

What is TCP IP: हर दिन हम व्हाट्सएप पर मैसेज भेजते हैं। यूट्यूब पर वीडियो देखते हैं। यूपीआई से भुगतान करते हैं और ईमेल चेक करते हैं। यह सब कुछ इतनी सहजता से हो जाता है कि हम कभी यह सोचते ही नहीं कि इस पूरी दुनिया के पीछे एक बेहद बुनियादी तकनीक काम कर रही है। ऐसी तकनीक जिसके बिना इंटरनेट नाम की चीज असल में मौजूद ही नहीं होती। इस तकनीक का नाम है 'टीसीपी आईपी' (TCP IP), और इसे बनाने वाले दो इंसानों का नाम आज शायद ही एक प्रतिशत लोग भी जानते हों, जबकि उनके बनाए नियमों पर ही आज पूरी डिजिटल दुनिया टिकी हुई है।

नेटवर्क की असल समस्या क्या थी?

बात है 1960 और 1970 के दशक की, जब अमेरिका में सैन्य और शोध संस्थानों के लिए एक नेटवर्क बनाया गया था जिसे 'अरपानेट' कहा जाता था। यह उस दौर का एक क्रांतिकारी प्रयोग था जिसमें अलग अलग जगहों पर मौजूद कंप्यूटर आपस में जुड़ सकते थे। लेकिन जल्द ही एक बड़ी समस्या सामने आई। दुनियाभर में अलग अलग तरह के कई नेटवर्क बनने लगे थे और हर नेटवर्क का अपना अलग तकनीकी ढांचा और अपनी अलग भाषा थी। एक नेटवर्क से जुड़ा कंप्यूटर दूसरे नेटवर्क से जुड़े कंप्यूटर से बात ही नहीं कर पाता था। ठीक वैसे ही जैसे दो अलग अलग भाषा बोलने वाले लोग बिना किसी अनुवादक के आपस में बातचीत नहीं कर पाते। सवाल यह था कि इन अलग अलग नेटवर्क को आपस में जोड़ने वाली एक सर्वमान्य और साझा भाषा कैसे बनाई जाए, जो हर तरह के नेटवर्क पर काम कर सके।

दो लोगों की मुलाकात जिसने सब कुछ बदल दिया

इसी समस्या को सुलझाने का जिम्मा दो लोगों ने उठाया - विंटन सर्फ और रॉबर्ट कान। रॉबर्ट कान के पास संचार तकनीक से जुड़ा गहरा अनुभव था, जबकि विंटन सर्फ कंप्यूटर नेटवर्किंग की दुनिया से आते थे। 1973 में यह दोनों साथ मिलकर काम करने लगे। इनका लक्ष्य था एक ऐसा तरीका खोजना जिससे कोई भी दो कंप्यूटर, चाहे वे किसी भी तरह के नेटवर्क से क्यों न जुड़े हों, आपस में डेटा भेज और समझ सकें। दोनों ने मिलकर 1974 में एक शोध पत्र प्रकाशित किया, जिसका शीर्षक था पैकेट नेटवर्क इंटरकनेक्शन के लिए एक प्रोटोकॉल। इसी पत्र में पहली बार ट्रांसमिशन कंट्रोल प्रोटोकॉल यानी टीसीपी की पूरी रूपरेखा सामने रखी गई। आगे चलकर इसी तकनीक का एक और जरूरी हिस्सा जोड़ा गया, जिसे इंटरनेट प्रोटोकॉल यानी आईपी कहा गया, और दोनों को मिलाकर यह टीसीपी आईपी के नाम से मशहूर हो गया।

टीसीपी आईपी असल में करता क्या है

इस पूरी तकनीक को समझने का सबसे आसान तरीका है इसे डाक व्यवस्था से जोड़कर देखना। जब आप इंटरनेट पर कोई फोटो भेजते हैं, कोई वीडियो देखते हैं या कोई वेबसाइट खोलते हैं, तो वह पूरा डेटा एक साथ नहीं भेजा जाता। इसकी जगह टीसीपी उस डेटा को हजारों छोटे छोटे टुकड़ों में तोड़ देता है, जिन्हें पैकेट कहा जाता है। हर पैकेट पर यह जानकारी लिखी होती है कि वह कहां से आया है और कहां जाना है, ठीक वैसे ही जैसे किसी लिफाफे पर भेजने और पाने वाले का पता लिखा होता है। यह काम आईपी करता है, जो हर डिवाइस को एक खास पहचान नंबर देता है ताकि पैकेट सही जगह तक पहुंच सके। यह सारे पैकेट अलग अलग रास्तों से होते हुए अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं। वहां पहुंचकर टीसीपी का ही काम होता है कि वह इन सारे बिखरे हुए टुकड़ों को दोबारा सही क्रम में जोड़कर उसी फोटो, वीडियो या वेबपेज को वापस तैयार कर दे, जैसा वह भेजे जाने से पहले था। अगर बीच में कोई पैकेट खो जाए या खराब हो जाए, तो यह तकनीक खुद ही उसे दोबारा भेजने की मांग कर लेती है, जिससे डेटा हमेशा पूरा और सही ही पहुंचता है।

क्यों यह तकनीक आज की दुनिया की असली नींव है

आज जो कुछ भी हम इंटरनेट पर करते हैं, वह सब कुछ बिना किसी अपवाद के टीसीपी आईपी की इसी बुनियादी व्यवस्था पर चलता है। यह तकनीक इतनी लचीली साबित हुई कि इसने हर तरह के नेटवर्क, हर तरह के डिवाइस और हर तरह की तकनीक को आपस में जोड़ना संभव बना दिया, चाहे वह मोबाइल फोन हो, लैपटॉप हो, सैटेलाइट कनेक्शन हो या फाइबर केबल। यही वजह है कि टीसीपी आईपी को इंटरनेट की भाषा या इंटरनेट का व्याकरण भी कहा जाता है। क्योंकि इसके बिना अलग अलग डिवाइस और नेटवर्क कभी भी आपस में बात नहीं कर पाते।

फिर इनका नाम इतना अनजान क्यों रह गया

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब यह तकनीक इतनी बुनियादी है, तो इसे बनाने वालों का नाम आम लोगों तक क्यों नहीं पहुंचा। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि टीसीपी आईपी सीधे तौर पर आम इंसान की नजर के सामने कभी नहीं आता। जब हम इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं, तो हमारी नजर वेबसाइट, ऐप या स्क्रीन पर दिखने वाली चीजों पर होती है, न कि उस अदृश्य तकनीकी ढांचे पर जो पर्दे के पीछे यह सब कुछ मुमकिन बना रहा होता है। इसकी तुलना अक्सर बिजली या सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं से की जाती है। हम रोज बिजली इस्तेमाल करते हैं लेकिन शायद ही कभी यह सोचते हैं कि इसे पहली बार व्यावहारिक रूप से किसने संभव बनाया। इसके उलट वर्ल्ड वाइड वेब जैसी तकनीक, जिसे टिम बर्नर्स ली ने बनाया, लोगों के बीच थोड़ी ज्यादा जानी पहचानी है, क्योंकि वेब सीधे तौर पर वह चीज है जिसे हम ब्राउज़र के जरिए हर दिन देखते और इस्तेमाल करते हैं। लेकिन टीसीपी आईपी उससे भी एक परत नीचे काम करता है। यानी वेब खुद भी टीसीपी आईपी के ऊपर ही टिका हुआ है। इसलिए यह तकनीक आम लोगों की नजर से पूरी तरह ओझल रह जाती है, भले ही यह सबसे ज्यादा जरूरी हो।

इनकी मेहनत को मिली मान्यता

हालांकि आम जनता में भले ही यह नाम उतने मशहूर न हों, लेकिन तकनीकी और वैज्ञानिक जगत में विंटन सर्फ और रॉबर्ट कान को वह सम्मान जरूर मिला जिसके वे हकदार थे। 2004 में इन दोनों को कंप्यूटर विज्ञान का सबसे बड़ा सम्मान माना जाने वाला 'ट्यूरिंग अवार्ड' दिया गया, जिसे कंप्यूटर विज्ञान की दुनिया का नोबेल पुरस्कार भी कहा जाता है। इसके अलावा 2005 में अमेरिकी राष्ट्रपति ने इन दोनों को देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मानों में गिने जाने वाले 'प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम' से भी नवाजा। विंटन सर्फ आज भी तकनीकी जगत में सक्रिय हैं और गूगल में इंटरनेट से जुड़े मामलों पर काम करते हैं, जबकि रॉबर्ट कान एक गैर लाभकारी शोध संस्था के जरिए इंटरनेट से जुड़ी तकनीकों पर काम करना जारी रखे हुए हैं।

एक दिलचस्प तथ्य यह है कि विंटन सर्फ और रॉबर्ट कान ने जब पहली बार यह प्रोटोकॉल डिजाइन किया था, तब उन्होंने इसे इतनी दूरदर्शिता से बनाया कि इसमें एक साथ दो सौ छप्पन अलग अलग नेटवर्क को जोड़ने की कल्पना की गई थी, जो उस दौर के हिसाब से एक बेहद बड़ी संख्या मानी जाती थी। आज इसी तकनीक की मदद से दुनियाभर में अरबों डिवाइस एक साथ जुड़े हुए हैं। यह दिखाता है कि उनका बनाया ढांचा कितना लचीला और भविष्य के लिए तैयार था। एक और मजेदार बात यह है कि विंटन सर्फ अपनी खास पोशाक शैली के लिए भी जाने जाते हैं। वे अक्सर तकनीकी सम्मेलनों में तीन टुकड़ों वाला औपचारिक सूट पहनकर पहुंचते हैं, जो इस आमतौर पर बेहद अनौपचारिक कपड़ों वाली इंडस्ट्री में उन्हें थोड़ा अलग और खास पहचान देता है।

विंटन सर्फ और रॉबर्ट कान ने पचास साल पहले जो नियम लिखे थे, वे आज भी उतनी ही मजबूती से काम कर रहे हैं, भले ही उनका नाम सुर्खियों में न रहा हो। यह कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि कई बार सबसे बड़े बदलाव लाने वाले लोग पर्दे के पीछे ही रह जाते हैं, जबकि उनका बनाया काम दुनिया की रोजमर्रा की जिंदगी का इतना गहरा हिस्सा बन जाता है कि उसके बिना जीना अब लगभग नामुमकिन सा लगता है।

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