Indian Road Culture: थार, फार्च्यूनर और तमीज़दारी की शपथ, सड़क पर गाड़ी नहीं, सोच बड़ी है

Indian Road Culture: थार और फार्च्यूनर जैसी बड़ी गाड़ियों को लेकर सड़क पर दिखने वाली दादागीरी और तमीज़दारी की शपथ पर सवाल। क्या समस्या गाड़ी में है या ड्राइविंग और सड़क संस्कृति की सोच में?

Yogesh Mishra
Published on: 23 Sept 2026 4:43 PM IST
Indian Road Culture Thar Fortuner Road Culture Explained
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Indian Road Culture Thar Fortuner Road Culture Explained

Indian Road Culture: हमारे यहां कसम खिलवाने, शपथ दिलाने, हलफ उठाने, वादा करने की जागृत परंपरा है। बचपन से बुढ़ापे तक कोई न कोई, किसी न किसी तरह की कसम-शपथ दिलाता रहता है। कभी झूठ न बोलने की कसम तो कभी सच की कसम। सत्य निष्ठा की कसम तो कर्तव्य निर्वहन की शपथ। पढाए लिखाई से लेकर, प्रेम, नौकरी, हर जगह कसमें ही कसमें। अब ये कसमें शपथें कितनी असरदार होती है यह एक अलग मामला है जिसके बारे सब जानते हैं – कसमें खाने वाले भी और खिलवाने वाले भी

तो खैर, इन्हीं कसमों की श्रृंखला में अब जुड़ गई है ढंग से, कायदे से और तमीज़ से गाड़ी चलाने की कसम।

यह नई कसम है। लोगों ने शपथ ली है कि ढंग से ड्राइविंग करेंगे। सबकी सहूलियत का ख्याल रखेंगे। शुरुआत हुई है दमन से। एक छोटा सा जिला है दमन। वहां के जिला कलेक्टर सौरभ मिश्रा ने दो खास एसयूवी गाड़ियों के मालिकों को ड्राइविंग की 'दादागीरी' के खिलाफ तमीज़दारी की शपथ खिलाई।क़सम खाने वाले थे दो ‘बदनाम’ गाड़ियों - थार और फार्च्यूनर का मालिक व चालक।

इस का मार्फत दमन का और वहां के डीएम सौरभ मिश्रा का नाम इतिहास में दर्ज हो गया। दुनिया में शायद ही कहीं ऐसा कभी सुना देखा गया होगा कि सरकारी अमला गाड़ी मालिकों को तमीज़दारी की शपथ दिलवा रहा है। एक दो नहीं, पूरे डेढ़ सौ वाहन मालिकों ने शपथ ग्रहण की।

वैसे, दमन के डीएम की नायाब पहल के पहले हरियाणा के डीजीपी भी खासकर थार और बुलेट वालों पर कमेंट कर चुके हैं कि 'सारे बदमाश इन्हीं पर चलते हैं।' यही नहीं, राजस्थान पुलिस भी थार वालों के खिलाफ मुहिम छेड़ चुकी है।

जरा सोचिये दमन जैसे जिले में जहाँ की आबादी ही कोई दो लाख की है वहां डेढ़ सौ एसयूवी का किस कदर आतंक है कि कलेक्टर साहब को कसमें खिलवानी पड़ गईं हैं। और क्या कहें हरियाणा के डीजीपी ओपी सिंह को जो थार और बुलेट के खिलाफ बोलते बोलते रिटायर भी हो गए।

क्या आपको नहीं लगता कि धर्म, जाति, वर्ग में बंटे हमारे समाज में अब गाड़ियां भी ऊंच नीच हो गईं हैं? विशालकाय - ऊँची – डराती गाड़ी भी एक मैसेज देती है। हमें आगे जाने दो, हमें तवज्जो दो, हम कानून से परे हैं, हम सड़क के 'दादा' हैं। बेचारगी दिखाते-झेलते छोटी गाड़ी वाले तो सड़क पर हमेशा सहमे से रहते हैं, न जाने कब कहाँ किस मोड़ पर 'भाईगीरी' वाली गाड़ी आ जाये।

बात दरअसल न थार की है न बुलेट की और न फार्च्यूनर की। गाड़ी का क्या? वो तो मशीन है, जैसे आप चलायें वो चल देगी। जिसे आप चाहें उसे रौंद देगी। बात तो उसकी होनी चाहिए जिसके हाथ में स्टीयरिंग व्हील होती है। भाईगीरी, दादागीरी तो उसपर सवार है। गाड़ी का क्या कसूर? लेकिन यहाँ एक पेंच है। भाईगीरी वाला ड्राईवर जनता है कि उसकी भाईगीरी आल्टो में न चलने वाली, वैगन आर में रत्ती भर न जमने वाली। उसे अच्छी तरह पता है कि किस गाड़ी से पुलिस वाला भी किनारे रहता है, वो यह भी जानता है कि सड़क पर चलने वालों और सड़क की रखवाली का जिम्मा रखने वालों को भी ये बहुत अच्छी तरह पता है कि कौन सी गाड़ी वाला किस हैसियत का होता है, किसे रोकना-टोकना है और किसे नहीं।

ये मर्दानगी का मामला है। जहाँ बड़ी और आक्रामक गाड़ी मर्दानगी का लेबल हैं। मर्द को मर्दानगी दिखानी है, हर जगह और ख़ास कर सड़क पर। उसके सामने नजीर है कि नियम कानून सबके लिए बराबर नहीं चलते, लाल बत्ती सबके लिए बराबर नहीं होती।

वैसे, सड़क पर यह मर्दानगी सिर्फ स्पीड में नहीं दिखती। यह हॉर्न में भी दिखाई देती है, ओवरटेक करने के तरीके में भी, लाल बत्ती तोड़ने में भी और इस बात में भी कि सामने वाला कितनी जल्दी रास्ता छोड़ता है। कुछ लोगों के लिए सड़क पर हर दूसरा वाहन उनके रास्ते की रुकावट होता है। उन्हें लगता है कि उन्हें पहले निकलना चाहिए, उन्हें जगह मिलनी चाहिए और दूसरे को उनके सामने आने की हिम्मत नहीं करनी चाहिए। ऐसे लोगों के लिए सड़क हैसियत दिखाने की जगह हो जाती है।

सड़क पर दिखाई देने वाली यह अकड़ सिर्फ वहीं तक सीमित नहीं रहती बल्कि ये घर, दफ्तर और समाज में दिखाई देने वाली उसी हैसियत की नकल होती है। जिसे हावी होने और एंटाइटलमेंट ठोंकने की आदत है, वह स्टीयरिंग पर बैठते ही अचानक विनम्र नागरिक नहीं बन जाता। उलटे गाड़ी उसे अपनी ताकत का एक चलता फिरता मंच दे देती है। शीशे के पीछे बैठा आदमी दिखाई कम देता है। लेकिन उसकी गाड़ी उसकी हैसियत का ऐलान करती रहती है।

क्या इसकी वजह यह तो नहीं कि भारतीय सड़कें वो चाहती हैं जिसे हमने न सीखा, न सिखाया गया और न हमने उसकी नजीरें देखीं हैं, वो चीज जिसे अनजान लोगों के बीच समानता का नाम दिया जा सकता है। सिर्फ थार या फार्च्यूनर वाले ही क्यों? उसी दमन जिले के डीएम भी शायद सफ़ेद रंग की भरी भरकम गाड़ी से चलते होंगे जिसके आगे एस्कॉर्ट भी चलता होगा, सड़क खाली कराता हुआ। क्या इसे विनम्रता और समान कानून का इज़हार कहेंगे?

जब अफसर, मंत्री और बाहुबली सामान रूप से पब्लिक रोड को प्राइवेट प्रॉपर्टी मानते हैं तो कोई उन्हीं जैसों की गाड़ी लेकर उसी मर्दानगी को क्यों न दोहराए? कौन रोकेगा इन्हें?

यही वजह है कि लगातार अपने को और अपने चारों तरफ के लोगों के प्रति यह साबित करने का लगातार रवैया है कि हम वीआईपी हैं। और बाकी सब कमजोर, मामूली लोग हैं। यही माइंडसेट गाड़ियों में उतर आता है जो एक शोपीस बन जाती हैं। बान जाती हैं ताक़त दिखाने का जरिया, किसी पार्टी का झंडा लहराने का, काली फिल्म लगे शीशों का, आँखें फोड़ देने वाली सफ़ेद लेजर लाइटों का, नंबर प्लेट पर पद-प्रतिष्ठा और महकमे का नाम लिखवाने का। ये सब बैनर हैं यह बताने के कि – हम अलग हैं, हम असली मर्द हैं, हम तुमसे ऊपर हैं।

ये सब चीजें सिर्फ गाड़ी के मॉडल या गाड़ी के ऊपर चस्पां नहीं होतीं बल्कि दिमाग में चढ़ी होती हैं। और दिमाग को कतई मंजूर नहीं होता कि उसके लिए सड़क का कोई मामूली आदमी तनिक भी असुविधा का सबब बने। जरा सी असुविधा हुई, हॉर्न बजाते ही कोई किनारे न हुआ, बस ईगो आहत हो जाता है। और ईगो को ठेस पहुँची तो जवाब में कुछ भी हो सकता है। जान ली जा सकती है। और ली जातीं हैं।

एक पहलू और भी है। हम ट्रैफिक नियमों को सिर्फ चालान और जुर्माने की नजर से देखते हैं, जबकि सड़क दरअसल नागरिक बराबरी की सबसे बड़ी सार्वजनिक जगहों में से एक है। वहां हर आदमी को कुछ मिनट के लिए अपनी निजी पहचान, पद, पैसा और ताकत बाहर छोड़कर चलना चाहिए होता है। सड़क पर नियम का मतलब ही यही है कि सामने वाला कौन है, इससे फर्क नहीं पड़ेगा। वह मंत्री है या मजदूर, अफसर है या दुकानदार, थार में है या स्कूटी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। नियम उसके लिए वही होगा जो सबके लिए है।

अफ़सोस - यही बात हमारे यहां जम ही नहीं पाई है। हमारे लिए कानून अक्सर ऐसी चीज की तरह है जिसे कमजोर आदमी माने और ताकतवर आदमी अपनी सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल करे। इसलिए सड़क पर नियम तोड़ना सिर्फ यातायात की गलती नहीं रह जाता, वह सामाजिक संदेश भी बन जाता है। जब कोई ताकतवर व्यक्ति खुलेआम नियम तोड़ता दिखाई देता है और उसके साथ कुछ नहीं होता, तो बाकी लोगों को नियम मानना मूर्खता जैसा लगने लगता है। फिर सड़क पर वही चलता है जिसके पास ज्यादा जगह, ज्यादा ताकत, ज्यादा आवाज या ज्यादा रसूख है। इसलिए असली लड़ाई थार बनाम छोटी कार की नहीं है। असली लड़ाई उस सोच से है जिसमें सड़क पर दूसरे आदमी को बराबर का नागरिक नहीं, रास्ते की रुकावट समझा जाता है।

उपाय क्या है? शपथ दिलाना? ऐसी गाड़ियां ही बैन कर देना? दोनों से ही कुछ न होने वाला। जरूरत न शपथ की है न गाड़ियों को बदलने की बल्कि सड़क पर व्यवहार बदलने की है। और व्यवहार सिर्फ अपील से नहीं बदलता। वो कर के दिखाना दिखाना पड़ता है कि पालन कराने वाला भी वही करे जिसकी उम्मीद सबसे की जाती है। जिस दिन थार, ऑल्टो, फॉर्च्यूनर, स्कूटी और साइकिल सबको एक ही नियम के भीतर चलना पड़ेगा, उस दिन शायद गाड़ी की हैसियत भी कम हो जाएगी और उसके भीतर बैठे आदमी की अकड़ भी।

गाड़ी सड़क पर नहीं बल्कि आदमी के दिमाग में बड़ी होती है। सड़क पर असली ऊंचाई गाड़ी की छत से नहीं, इंसान के व्यवहार से तय होती है। इसलिए शपथ अगर लेनी ही है तो सिर्फ थार और फॉर्च्यूनर वालों से नहीं, हम सब से लेनी चाहिए। यह शपथ कि सड़क किसी एक की नहीं है। यहां हमसे छोटा, कमजोर या धीमा दिखने वाला आदमी भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना हम खुद। यही वह शपथ होगी जिसकी जरूरत इस देश की सड़कों को सबसे ज्यादा है। रोड कल्चर असल में तब ही बनेगा जब किसी की गाड़ी देखकर नियम का रंग न बदले। नहीं तो कितनी ही शपथ दिला दी जाए कुछ न होने वाला। कसम और शपथ तो बहुत हो चुकी हैं और इतना कहना काफी है – कसमें वादे.. वादों का क्या।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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