TRENDING TAGS :
इमोजी को दुनिया भर में एक जैसा दिखने का नियम किसने बनाया: Unicode Consortium की अनसुनी कहानी
Emoji History : Unicode Consortium क्या है? जानिए इमोजी की शुरुआत, Unicode Standard, Apple-Google की भूमिका, नए Emoji कैसे बनते हैं और अलग-अलग फोन पर इमोजी अलग क्यों दिखते हैं।
Unicode Consortium Emoji History
Emoji History: रोज़ आप जो 😂, ❤️, 🙏 जैसे इमोजी भेजते हैं, वो iPhone से Android पर भले ही थोड़ा अलग दिखें पर सही सलामत क्यों पहुंच जाते हैं? इसका जवाब किसी बड़ी टेक कंपनी में नहीं, बल्कि कैलिफोर्निया के एक छोटे से नॉन प्रॉफिट संगठन में छिपा है जिसका नाम शायद ही कभी सुर्खियों में आता हो। ये संगठन है - Unicode Consortium।
शुरुआत हुई जापान से, पर बिना किसी नियम के
1999 में जापानी मोबाइल इंटरनेट सेवा आई मोड (i-mode) के लॉन्च के लिए एनटीटी डोकोमो (NTT DOCOMO) के लीड डेवलपर शिगेताका कुरिता ने 176 इमोजी डिज़ाइन किए थे। उस दौर में टेक्स्ट मैसेज सिर्फ 250 अक्षरों तक सीमित होते थे इसलिए इमोजी भावनाओं को रचनात्मक तरीके से व्यक्त करने का एक नया जरिया बन गए।
लेकिन शुरुआती सालों में इसमें एक बड़ी समस्या थी। मोबाइल डिवाइस में इमोजी का चलन जापान में शुरू तो हुआ और तेजी से लोकप्रिय भी हुआ.लेकिन इसकी उपयोगिता टेलीकॉम कैरियर कंपनियों के बीच असंगति की वजह से सीमित रह गई। वजह यह थी कि हर टेलीकॉम कंपनी अपने ही तरीके से कैरेक्टर एनकोड और आइकॉन डिज़ाइन करती थी। तीनों बड़ी जापानी टेलीकॉम कंपनियां एक ही इमोजी के लिए अलग-अलग नंबर इस्तेमाल करती थीं। यानी एक कंपनी के यूजर का भेजा इमोजी दूसरी कंपनी के यूजर तक बिल्कुल अलग या गलत दिखता था।
Unicode Consortium कौन है और इसे बनाया किसने
यहीं पर यूनिकोड कंसोर्टियम (Unicode Consortium) की भूमिका शुरू होती है। लेकिन ये भी दिलचस्प बात है कि यह संस्था इमोजी के लिए नहीं बल्कि एक बहुत बड़े मकसद के लिए बनी थी। Unicode Consortium की स्थापना 3 जनवरी 1991 को कैलिफोर्निया में जो बेकर, ली कॉलिन्स और मार्क डेविस ने की थी। यह एक नॉन प्रॉफिट संस्था है जिसका मकसद है टेक्स्ट को कंप्यूटर पर दर्शाने के लिए एक साझा मानक बनाना, ताकि डेटा अलग-अलग प्लेटफॉर्म, भाषाओं और देशों में बिना बिगड़े शेयर किया जा सके।
सीधे शब्दों में कहें तो Unicode वही व्यवस्था है जो सुनिश्चित करती है कि Windows पर टाइप किया गया अक्षर 'A' ठीक वैसा ही Mac पर भी दिखे। यह संस्था 1995 से ही पिक्टोग्राम (चित्र-संकेतों) को मानकीकृत करती आ रही है, जब पहले 76 पिक्टोग्राम को अपनाया गया था, और 1991 से ही इलेक्ट्रॉनिक टेक्स्ट प्रोसेसिंग के कैरेक्टर इन्वेंट्री की निगरानी कर रही है।
2010 का वो साल जब इमोजी वाकई 'वैश्विक' बने
2007 में Google और Apple, दोनों की टीमों ने अलग-अलग Unicode में इमोजी शामिल करने का प्रस्ताव जमा किया, जिस पर Unicode Consortium के सदस्यों ने कई सालों तक चर्चा की। आखिरकार 2010 में Unicode 6.0 रिलीज़ हुआ, जिसमें कुल 722 इमोजी शामिल किए गए — यह मानकीकरण इतना अहम था क्योंकि इसके बाद इमोजी अलग-अलग प्लेटफॉर्म और डिवाइस पर एक जैसे काम करने लगे।
असली वजह क्या थी: यह पूरा मानकीकरण असल में Apple और Google की मांग से प्रेरित था, जो जापानी बाजार में प्रवेश करना चाहते थे लेकिन प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए उन्हें इमोजी सपोर्ट देना जरूरी लग रहा था। यानी दो बड़ी टेक कंपनियों के व्यावसायिक हित ने ही इमोजी को दुनिया भर में एक मानक व्यवस्था दिलाई।
Unicode Consortium ने जो सबसे बड़ा काम किया, वह यह सुनिश्चित करना था कि जब iPhone से कोई 😂 भेजे और सामने वाला Android इस्तेमाल कर रहा हो, तो दोनों को एक जैसा कैरेक्टर ही मिले, भले ही उसकी विज़ुअल डिज़ाइन प्लेटफॉर्म के हिसाब से थोड़ी अलग क्यों न हो, यही मानकीकरण असली टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
हर फोन पर इमोजी अलग क्यों दिखते हैं, फिर भी 'सही' कैसे पहुंचते हैं
यहीं सबसे बड़ी उलझन सुलझती है। Unicode सिर्फ हर इमोजी को एक यूनिक कोड नंबर देता है। लेकिन उस कोड को असल में कैसा दिखाना है (रंग, शेप, स्टाइल), यह पूरी तरह हर कंपनी (Apple, Google, Samsung, Microsoft) पर छोड़ दिया जाता है। इसीलिए अलग-अलग प्लेटफॉर्म एक ही Unicode सिंबल को अलग तरह से दिखा सकते हैं। जैसे बर्गर इमोजी में Apple बन-लेट्यूस-टमाटर-चीज़-पैटी के क्रम में सजाता है, जबकि Microsoft लेट्यूस-टमाटर-चीज़-बन के क्रम में। यानी 'मीनिंग' तो सुरक्षित रहती है, पर 'लुक' हर कंपनी अपने हिसाब से तय करती है।
नया इमोजी बनता कैसे है?
इमोजी बनाने की प्रक्रिया जितनी दिलचस्प है, उतनी ही खुली भी। कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक रूप से Unicode Consortium को नया इमोजी प्रस्तावित कर सकता है। इसके बाद Unicode Emoji Subcommittee कुछ तय मापदंडों के आधार पर उस पर विचार करती है। जैसे क्या यह इमोजी कुछ ऐसा जोड़ता है जो मौजूदा इमोजी से नहीं कहा जा सकता, और क्या इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि बड़ी संख्या में लोग इसे इस्तेमाल करेंगे।
इस पूरी प्रक्रिया की अगुवाई करते हैं Unicode Consortium के सह-संस्थापक और अध्यक्ष मार्क डेविस, जो खुद गूगल (Google) में काम करते हैं। यह समूह मुख्य रूप से टेक कंपनियों के वालंटियर्स से बना है, जो हर साल नए इमोजी जोड़ने पर वोटिंग करते हैं। इसमें हजारों शब्दों के प्रस्ताव, कई राउंड की कमेटी वोटिंग, और सिलिकॉन वैली की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों के बीच एक दुर्लभ सहयोग शामिल होता है।
176 से 4,000 तक का सफर
2026 में Unicode वर्जन 17.0 के मुताबिक कुल 3,953 इमोजी मौजूद हैं। यानी कुरिता के मूल 176 पिक्सेल इमोजी से यह संख्या अब तक करीब 22 गुना बढ़ चुकी है और हर साल Unicode Consortium की सार्वजनिक प्रस्ताव प्रक्रिया के जरिए नए इमोजी जुड़ते रहते हैं। 2021 में इसमें अलग-अलग स्किन टोन जैसे विविधता भरे विकल्प भी शामिल किए गए।
इमोजी को दुनिया भर में एक जैसा दिखने का नियम किसने बनाया: Unicode Consortium की अनसुनी कहानी
'फेस विद टियर्स ऑफ जॉय' (😂) लगातार 10 सालों तक दुनिया भर में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला इमोजी रहा है, लेकिन जेन-Z यूजर्स के बीच अब इसकी जगह 'स्कल' (💀) इमोजी ने ले ली है जिसे अब हंसी के लिए मज़ाकिया, 'आयरनिक' अंदाज़ में इस्तेमाल किया जाता है, न कि उसके असली मतलब में।
अगली बार जब आप कोई नया इमोजी इस्तेमाल करें, तो याद रखिए उसके पीछे प्रस्तावों, कमेटी वोटिंग और महीनों की समीक्षा की एक पूरी कहानी छिपी है।


