WhatsApp चैट कोर्ट में सबूत बन सकती है क्या? सिर्फ स्क्रीनशॉट काफी है या नहीं

क्या WhatsApp चैट अदालत में सबूत बन सकती है? क्या सिर्फ स्क्रीनशॉट काफी है? जानिए डिजिटल सबूत की कानूनी अहमियत, भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 की धारा 63, मूल चैट, प्रमाणपत्र और अदालत में डिजिटल रिकॉर्ड पेश करने के जरूरी नियम।

Neel Mani Lal
Published on: 30 Aug 2026 1:30 PM IST
WhatsApp Chat as Evidence in Court
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WhatsApp Chat as Evidence in Court 

WhatsApp Chat as Evidence in Court: आज के समय में बहुत सी बातें कागज पर नहीं होतीं। लोग उधार की बात व्हाट्सएप (WhatsApp) पर करते हैं, नौकरी से जुड़ी जानकारी मैसेज में देते हैं, कारोबारी सौदे चैट में तय होते हैं और पति-पत्नी के बीच होने वाली बातचीत भी मोबाइल में दर्ज रहती है। धमकी, गाली, धोखाधड़ी, रिश्वत, ब्लैकमेल और कई दूसरे मामलों में भी मोबाइल की चैट महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। ऐसे में अक्सर लोग सोचते हैं कि अगर उन्होंने किसी व्हाट्सएप बातचीत का स्क्रीनशॉट ले लिया है तो उनके पास पक्का कानूनी सबूत आ गया।

लेकिन कानून की नजर में मामला इतना सीधा नहीं है।

WhatsApp चैट अदालत में सबूत बन सकती है, लेकिन केवल स्क्रीनशॉट होने से वह अपने आप पक्का और स्वीकार्य सबूत नहीं बन जाता। अदालत यह भी देख सकती है कि चैट असली है या नहीं, उसमें बदलाव तो नहीं किया गया, वह किस मोबाइल से निकली और उसे किस तरीके से अदालत के सामने पेश किया गया है।

यानी मोबाइल में मौजूद सच और अदालत में साबित किया जा सकने वाला सच, दोनों हमेशा एक जैसी चीज नहीं होते।

भारत में डिजिटल सबूतों के लिए अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 के प्रावधान लागू होते हैं। इसमें इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रिकॉर्ड को दस्तावेज और सबूत के रूप में मान्यता दी गई है, लेकिन उनकी स्वीकार्यता के लिए कानून में विशेष शर्तें भी रखी गई हैं। अधिनियम की धारा 61 कहती है कि किसी इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल रिकॉर्ड को केवल इस आधार पर अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह इलेक्ट्रॉनिक रूप में है, जबकि धारा 63 ऐसे रिकॉर्ड को साबित करने की प्रक्रिया से जुड़ी है।

WhatsApp की चैट कानूनी तौर पर क्या है?

कानून की नजर में WhatsApp संदेश केवल मोबाइल में लिखी हुई साधारण बातचीत नहीं है। वह एक इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल रिकॉर्ड है। इसी तरह ई-मेल, मोबाइल संदेश, वीडियो, आवाज की रिकॉर्डिंग, सीसीटीवी की रिकॉर्डिंग और कंप्यूटर में मौजूद जानकारी भी डिजिटल सबूत के रूप में सामने आ सकती है।

इसका मतलब यह है कि कोई व्यक्ति अदालत में यह कह सकता है कि उसके पास किसी घटना या बातचीत का डिजिटल रिकॉर्ड मौजूद है। लेकिन अगला सवाल तुरंत उठता है कि अदालत कैसे माने कि यह रिकॉर्ड असली है?

आज तस्वीर बदलना आसान है। किसी स्क्रीनशॉट को काटा जा सकता है। नाम बदला जा सकता है। संदेशों के बीच की बातें हटाई जा सकती हैं। नकली बातचीत बनाई जा सकती है। इसी वजह से अदालत केवल इतना देखकर फैसला नहीं कर सकती कि किसी व्यक्ति ने एक स्क्रीनशॉट पेश कर दिया है। अदालत को रिकॉर्ड की असलियत और उसकी विश्वसनीयता के बारे में भी संतुष्ट होना पड़ सकता है।

क्या केवल स्क्रीनशॉट दिखाना काफी है?

सामान्य जवाब है, हर मामले में नहीं। मान लीजिए दो लोगों के बीच WhatsApp पर कोई बातचीत हुई। एक व्यक्ति ने उसका स्क्रीनशॉट ले लिया और अदालत में कागज पर उसका प्रिंट निकालकर पेश कर दिया। दूसरा पक्ष कह सकता है कि यह तस्वीर बदली हुई है, पूरी बातचीत नहीं दिखाई गई है या इसे किसी दूसरे तरीके से तैयार किया गया है।

यहीं डिजिटल सबूत की सबसे बड़ी चुनौती सामने आती है। कागज पर लिखे किसी पुराने दस्तावेज और डिजिटल रिकॉर्ड में फर्क यह है कि डिजिटल चीजों में बदलाव करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। इसी कारण कानून में यह देखने की व्यवस्था है कि रिकॉर्ड कहां से आया, किस उपकरण से निकला और उसे किस तरीके से तैयार किया गया। विशेषज्ञों और कानूनी व्याख्याओं के अनुसार WhatsApp चैट को उसी मोबाइल के जरिए पेश करना, जिसमें वह वास्तव में मौजूद है, और चैट का स्क्रीनशॉट या प्रतिलिपि पेश करना, दोनों की कानूनी स्थिति अलग हो सकती है।

असली मोबाइल पेश करना और स्क्रीनशॉट देना, दोनों में क्या फर्क है?

मान लीजिए आपके मोबाइल में आज भी वही WhatsApp चैट मौजूद है। अगर मूल उपकरण और मूल डिजिटल रिकॉर्ड अदालत के सामने उपलब्ध कराया जाता है, तो उसकी स्थिति केवल एक कागजी स्क्रीनशॉट से अलग हो सकती है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के मूल रूप और उसकी प्रतिलिपि के बीच अंतर महत्वपूर्ण है। कानून में यह व्यवस्था है कि कुछ परिस्थितियों में मूल इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल रिकॉर्ड को प्राथमिक सबूत माना जा सकता है।

इसके उलट, अगर आप केवल चैट का स्क्रीनशॉट, उसका प्रिंट या किसी दूसरे माध्यम में निकाली गई प्रति पेश कर रहे हैं, तो उसकी असलियत साबित करने की प्रक्रिया ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है।

इसीलिए केवल स्क्रीनशॉट लेकर यह मान लेना कि मामला जीत लिया गया, गलत हो सकता है। स्क्रीनशॉट उपयोगी हो सकता है। वह किसी घटना की तरफ अदालत का ध्यान खींच सकता है। लेकिन अदालत में उसकी कानूनी स्वीकार्यता इस बात पर निर्भर कर सकती है कि उसे कानून के अनुसार कैसे साबित किया गया है।

धारा 63 क्या है और यह इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

भारत में इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की स्वीकार्यता से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रावधान भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63 है।

पुराने भारतीय साक्ष्य कानून में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के लिए धारा 65बी महत्वपूर्ण थी। नए कानून में इस विषय को धारा 63 के तहत रखा गया है।

सरल शब्दों में कहें तो जब किसी डिजिटल रिकॉर्ड की प्रति अदालत में पेश की जाती है तो केवल यह कहना काफी नहीं हो सकता कि “यह मेरे मोबाइल से निकाला गया है।” कानून रिकॉर्ड की पहचान और उसे तैयार करने के तरीके से जुड़ी जानकारी भी मांग सकता है।

धारा 63 के तहत निर्धारित प्रमाणपत्र का उद्देश्य यह बताना है कि डिजिटल रिकॉर्ड किस उपकरण या स्रोत से लिया गया, उसे किस तरीके से तैयार किया गया और उसके साथ छेड़छाड़ नहीं हुई है। कानून में डिजिटल रिकॉर्ड की पहचान के लिए उसकी विशेष डिजिटल पहचान, जिसे आम तौर पर हैश वैल्यू कहा जाता है, से जुड़ी व्यवस्था भी शामिल है।

हैश वैल्यू क्या होती है और इसका महत्व क्या है?

मान लीजिए आपके पास किसी डिजिटल फाइल की एक खास पहचान है। अगर उस फाइल में बहुत छोटा बदलाव भी किया जाए तो उसकी यह डिजिटल पहचान बदल सकती है। इसी तरह की व्यवस्था को हैश वैल्यू के माध्यम से समझा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने 2026 में धारा 63 से जुड़े एक मामले में कहा कि हैश वैल्यू को डिजिटल रिकॉर्ड की एक तरह की इलेक्ट्रॉनिक पहचान माना जा सकता है और इसका उद्देश्य रिकॉर्ड की असलियत तथा उसके साथ छेड़छाड़ न होने की जांच में मदद करना है। अदालत ने धारा 63(4) की वैधता को भी बरकरार रखा।

इसका सीधा मतलब यह है कि डिजिटल सबूतों के मामले में अब केवल मेरे पास स्क्रीनशॉट है कहना पर्याप्त समझना खतरनाक हो सकता है।

क्या WhatsApp चैट का प्रमाणपत्र जरूरी होता है?

यह इस बात पर निर्भर कर सकता है कि चैट किस रूप में अदालत के सामने पेश की जा रही है और मामले की परिस्थितियां क्या हैं। लेकिन जब WhatsApp चैट की प्रतिलिपि, स्क्रीनशॉट या निकाला गया डिजिटल रिकॉर्ड अदालत में पेश किया जाता है, तो धारा 63 के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है।

इस प्रमाणपत्र का उद्देश्य अदालत को यह जानकारी देना है कि रिकॉर्ड किस उपकरण से आया, उसे किस तरीके से तैयार किया गया और संबंधित डिजिटल रिकॉर्ड की पहचान क्या है। कानूनी व्याख्याओं और हाल के अदालती मामलों में यह बात बार-बार सामने आई है कि बिना जरूरी प्रमाणपत्र के केवल WhatsApp संदेशों के प्रिंट या स्क्रीनशॉट को लेकर आपत्ति उठ सकती है।

इसलिए किसी वास्तविक मुकदमे में यह मान लेना ठीक नहीं होगा कि मोबाइल से लिया गया कोई भी स्क्रीनशॉट बिना किसी औपचारिक प्रक्रिया के अपने आप अंतिम कानूनी सबूत बन जाएगा।

क्या कोई भी नकली WhatsApp Screenshot बनाकर किसी को फंसा सकता है?

कोई व्यक्ति नकली तस्वीर या नकली बातचीत बनाने की कोशिश कर सकता है, लेकिन अदालत केवल तस्वीर देखकर फैसला करने के लिए बाध्य नहीं है।

यही कारण है कि डिजिटल सबूतों की जांच में कई बातें महत्वपूर्ण हो सकती हैं। क्या मूल मोबाइल मौजूद है? क्या पूरी बातचीत उपलब्ध है? क्या संदेश भेजने वाले की पहचान साबित हो सकती है? क्या बातचीत के समय और तारीख की जांच हो सकती है? क्या दूसरी तरफ मौजूद व्यक्ति इस बातचीत से इनकार करता है? क्या डिजिटल रिकॉर्ड में बदलाव के संकेत हैं?

मान लीजिए किसी व्यक्ति ने स्क्रीनशॉट में दूसरे व्यक्ति का नाम डाल दिया। लेकिन अदालत या जांच में पता चलता है कि संबंधित नंबर वास्तव में उस व्यक्ति का नहीं था। ऐसे में केवल नाम दिखाई देना पर्याप्त नहीं होगा।

इसी तरह किसी चैट के बीच के संदेश हटाकर केवल अपने पक्ष के संदेश दिखाना भी मामले की पूरी तस्वीर बदल सकता है।

इसलिए डिजिटल सबूत में संदर्भ भी बहुत महत्वपूर्ण है।

व्हाट्सएप पर नाम दिखाई दे रहा है, क्या इससे पहचान साबित हो जाती है?

व्हाट्सएप में कोई व्यक्ति अपना नाम कुछ भी लिख सकता है। किसी नंबर को मोबाइल में किसी भी नाम से सुरक्षित किया जा सकता है। इसलिए केवल स्क्रीनशॉट में 'राहुल' लिखा दिखाई देने से यह अपने आप साबित नहीं होता कि संदेश वास्तव में उसी व्यक्ति ने भेजा था। अदालत के सामने नंबर, संबंधित व्यक्ति की पहचान और बातचीत की परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण हो सकती हैं।

अगर किसी व्यक्ति के मोबाइल में कोई नंबर 'बॉस' के नाम से सुरक्षित है, तो केवल स्क्रीनशॉट देखकर अदालत यह नहीं मान लेगी कि संदेश वास्तव में उसके कार्यालय के मालिक ने भेजा था। इसीलिए मूल रिकॉर्ड और दूसरे सहायक सबूत महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

क्या व्हाट्सएप चैट से तलाक या पारिवारिक विवाद में मदद मिल सकती है?

व्हाट्सएप बातचीत पारिवारिक मामलों में महत्वपूर्ण हो सकती है। पति-पत्नी के बीच की बातचीत, धमकी, कथित स्वीकारोक्ति, आर्थिक लेनदेन से जुड़ी बातें या किसी विवाद से संबंधित संदेश अदालत के सामने पेश किए जा सकते हैं। लेकिन यहां भी वही नियम लागू होता है। चैट का होना और अदालत में उसका कानूनी रूप से साबित हो जाना, दो अलग बातें हैं।

यदि बातचीत को दूसरे पक्ष चुनौती देता है तो उसकी असलियत, स्रोत और उसे पेश करने के तरीके की जांच महत्वपूर्ण हो सकती है। इसीलिए पारिवारिक विवाद में केवल गुस्से में कुछ स्क्रीनशॉट लेकर मोबाइल बदल देना या पुरानी चैट मिटा देना बाद में समस्या पैदा कर सकता है।

नौकरी और कारोबार में व्हाट्सएप संदेश कितने महत्वपूर्ण हो सकते हैं?

आज बहुत से कारोबारी फैसले व्हाट्सएप पर होते हैं। कोई व्यक्ति लिखता है कि माल भेज दीजिए, भुगतान अगले सप्ताह कर दूंगा। कोई अधिकारी संदेश भेजकर किसी कर्मचारी को निर्देश देता है। दो कंपनियों के लोग कीमत और काम की शर्तों पर बातचीत करते हैं।

ऐसी बातचीत बाद में विवाद का हिस्सा बन सकती है।

लेकिन हर व्हाट्सएप संदेश अपने आप कानूनी समझौता नहीं बन जाता। अदालत यह देखेगी कि बातचीत की प्रकृति क्या थी, किसने क्या स्वीकार किया, क्या पक्षों की मंशा स्पष्ट थी और दूसरे दस्तावेज या परिस्थितियां क्या कहती हैं। फिर भी डिजिटल बातचीत को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आज की दुनिया में बहुत से विवादों की कहानी मोबाइल से शुरू होती है और अदालत तक पहुंचती है।

धमकी या अपराध से जुड़े संदेशों का क्या महत्व है?

अगर किसी व्यक्ति को व्हाट्सएप पर जान से मारने की धमकी मिलती है, ब्लैकमेल किया जाता है, पैसे मांगे जाते हैं या कोई अपराध से जुड़ी जानकारी भेजी जाती है, तो ऐसे संदेश बहुत महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

लेकिन सबसे बड़ी गलती यह हो सकती है कि व्यक्ति केवल स्क्रीनशॉट लेकर बाकी मूल सामग्री मिटा दे।

अगर मामला गंभीर है तो मूल चैट, मोबाइल और अन्य डिजिटल जानकारी को सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण हो सकता है। जरूरत पड़ने पर जांच एजेंसियां या विशेषज्ञ उपकरण की जांच भी कर सकते हैं। गंभीर मामलों में केवल एक तस्वीर पर निर्भर रहने के बजाय मूल रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना ज्यादा समझदारी हो सकती है।

स्क्रीनशॉट लेते समय लोग कौन सी बड़ी गलतियां करते हैं?

सबसे आम गलती होती है पूरी बातचीत के बजाय केवल एक-दो संदेशों का स्क्रीनशॉट लेना। बाद में दूसरा पक्ष कह सकता है कि बातचीत का संदर्भ बदल दिया गया है।

दूसरी गलती होती है स्क्रीनशॉट को काटना, संपादित करना या उस पर कुछ लिख देना। भले ही व्यक्ति ने केवल गोपनीय जानकारी छिपाने के लिए ऐसा किया हो, लेकिन बाद में रिकॉर्ड की असलियत पर सवाल उठ सकता है।

तीसरी गलती है मूल मोबाइल या मूल चैट को मिटा देना। अगर बाद में यह साबित करने की जरूरत पड़े कि स्क्रीनशॉट वास्तव में उसी मोबाइल से लिया गया था, तो परेशानी हो सकती है।

चौथी गलती है चैट को केवल किसी दूसरे व्यक्ति को भेजकर अपने फोन से मिटा देना। दूसरे फोन में मौजूद प्रति की कानूनी स्थिति और मूल स्रोत से जुड़े सवाल अलग हो सकते हैं।

अगर व्हाट्सएप चैट भविष्य में सबूत बन सकती है तो क्या करना चाहिए?

सबसे पहले बातचीत को जल्दबाजी में मिटाना नहीं चाहिए। अगर मामला गंभीर है तो मूल मोबाइल और बातचीत को सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण हो सकता है। केवल एक-दो तस्वीरें लेकर संतुष्ट होने के बजाय पूरी बातचीत और उससे जुड़े संदर्भ को सुरक्षित रखना बेहतर हो सकता है।

चैट को अपने हिसाब से बदलने, काटने या नया रूप देने से बचना चाहिए। अगर किसी संदेश का कानूनी महत्व हो सकता है तो उसके साथ छेड़छाड़ बाद में आपके ही खिलाफ सवाल खड़े कर सकती है।

जरूरत पड़ने पर किसी वकील की सलाह लेकर डिजिटल रिकॉर्ड को कानून के अनुसार सुरक्षित करने और अदालत में पेश करने की प्रक्रिया अपनानी चाहिए। खासकर आपराधिक, संपत्ति, तलाक, कारोबार या बड़ी रकम से जुड़े मामलों में केवल इंटरनेट पर पढ़ी जानकारी के आधार पर सबूत पेश करना जोखिम भरा हो सकता है।

क्या WhatsApp की नीली टिक भी सबूत है?

नीली टिक यह संकेत दे सकती है कि संदेश पढ़ा गया था, लेकिन हर मामले में यह अपने आप अंतिम प्रमाण नहीं है कि सामने वाले व्यक्ति ने संदेश पढ़कर उसकी बात स्वीकार कर ली। संदेश पढ़ना और संदेश की बात मान लेना दो अलग चीजें हैं। इसी तरह केवल यह दिखना कि संदेश भेजा गया था, अपने आप यह साबित नहीं करता कि संदेश भेजने वाले की पहचान, उसका उद्देश्य और संदेश की कानूनी जिम्मेदारी पूरी तरह साबित हो गई।

अदालत आम तौर पर पूरे मामले की परिस्थितियों को देखती है।

क्या व्हाट्सएप चैट हट जाने के बाद मामला खत्म हो जाता है?

अगर किसी मोबाइल से चैट मिटा दी गई है तो इसका मतलब हमेशा यह नहीं कि उसका कोई निशान कहीं नहीं बचा। दूसरे व्यक्ति के मोबाइल में चैट मौजूद हो सकती है। कुछ जानकारी बैकअप या दूसरे डिजिटल स्रोतों में मौजूद हो सकती है। जांच की परिस्थितियों और उपलब्ध सामग्री के आधार पर अलग-अलग संभावनाएं हो सकती हैं।

लेकिन यह मान लेना भी गलत होगा कि हर मिटाई हुई चैट निश्चित रूप से वापस मिल जाएगी। यह तकनीकी और कानूनी परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

इसलिए अगर किसी महत्वपूर्ण विवाद से जुड़ी चैट है तो उसे जानबूझकर मिटाना समझदारी नहीं हो सकती।

डिजिटल सबूतों के मामले में कानून इतना सख्त क्यों है?

इसका कारण बहुत सीधा है। डिजिटल दुनिया में जानकारी बनाना आसान है और बदलना भी आसान हो सकता है। तस्वीर बदली जा सकती है, आवाज बनाई जा सकती है, वीडियो में बदलाव किया जा सकता है और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से नकली सामग्री बनाना पहले से कहीं आसान हो गया है। अगर अदालत केवल स्क्रीनशॉट देखकर फैसला करने लगे तो किसी व्यक्ति को फर्जी सामग्री के आधार पर फंसाया जा सकता है।

इसीलिए कानून रिकॉर्ड की असलियत, स्रोत और उसके साथ छेड़छाड़ की संभावना को लेकर सावधानी बरतता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी धारा 63 से जुड़े मामले में डिजिटल रिकॉर्ड की पहचान और उसकी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए हैश वैल्यू और प्रमाणन की भूमिका को महत्वपूर्ण माना है।

सबसे जरूरी बात क्या है?

WhatsApp चैट अदालत में सबूत बन सकती है। ई-मेल, संदेश, आवाज की रिकॉर्डिंग, वीडियो और दूसरे डिजिटल रिकॉर्ड भी कानूनी मामलों में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। लेकिन “मेरे पास Screenshot है” और “मेरे पास अदालत में साबित किया जा सकने वाला कानूनी सबूत है”, दोनों एक जैसी बातें नहीं हैं।

सिर्फ स्क्रीनशॉट देखकर अदालत हर बार उसे सच मानने के लिए बाध्य नहीं होती। रिकॉर्ड कहां से आया, क्या वह असली है, उसमें बदलाव तो नहीं हुआ, उसे किस उपकरण से निकाला गया और कानून के अनुसार उसे कैसे पेश किया गया, ये सवाल भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

इसलिए अगर आपके पास किसी महत्वपूर्ण मामले से जुड़ी WhatsApp चैट है तो सबसे सुरक्षित सोच यह होनी चाहिए कि उसे केवल तस्वीर के रूप में न देखें। मूल रिकॉर्ड को भी सुरक्षित रखें और जरूरत पड़ने पर कानूनी प्रक्रिया के अनुसार उसे पेश करें।

आज की दुनिया में हमारा मोबाइल केवल बातचीत का साधन नहीं रह गया है। वह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का एक डिजिटल रिकॉर्ड भी बन चुका है। एक साधारण WhatsApp संदेश कभी दोस्त के साथ की बातचीत होता है, कभी कारोबारी समझौते का हिस्सा और कभी किसी मुकदमे का महत्वपूर्ण सबूत।

लेकिन अदालत में सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं होता कि चैट में क्या लिखा है। कई बार उससे भी पहले पूछा जाता है, क्या आप साबित कर सकते हैं कि यह चैट असली है?

नोट: यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है। किसी खास मुकदमे, गिरफ्तारी, तलाक, संपत्ति या आपराधिक मामले में डिजिटल सबूत पेश करने से पहले योग्य वकील की सलाह लेना जरूरी है।

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