इंटरनेट डोमेन में .com, .org, .gov का फर्क किसने तय किया? इनके नियम अलग-अलग क्यों?

.com, .org और .gov जैसे इंटरनेट डोमेन किसने बनाए और इनके नियम अलग क्यों हैं? जानिए ICANN, DNS, .edu, .in और डोमेन रजिस्ट्रेशन की पूरी कहानी आसान भाषा में।

Neel Mani Lal
Published on: 13 Aug 2026 9:43 PM IST
Who Created Domain Names
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Who Created Domain Names

Who Created Domain Names: जब हम किसी वेबसाइट का पता लिखते हैं तो उसके आखिर में लगे कुछ अक्षर बहुत सामान्य लगते हैं—.com, .org, .gov, .edu या .net। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन अक्षरों का फैसला किसने किया? com का मतलब व्यापारिक वेबसाइट और gov का मतलब सरकारी वेबसाइट क्यों है? क्या कोई व्यक्ति या संस्था हर वेबसाइट को देखकर तय करती है कि उसे कौन-सा डोमेन मिलेगा? और क्या कोई भी व्यक्ति .gov या .edu नाम खरीद सकता है? इस कहानी की शुरुआत आज के इंटरनेट से काफी पहले हुई थी। डोमेन नामों की यह व्यवस्था इंटरनेट को व्यवस्थित रखने की कोशिश से पैदा हुई और धीरे-धीरे दुनिया की डिजिटल पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई।

शुरुआत में वेबसाइट के नाम नहीं, नंबर होते थे

आज हम किसी वेबसाइट तक पहुँचने के लिए google.com या newstrack.com जैसा नाम लिखते हैं। लेकिन इंटरनेट के शुरुआती दौर में कंप्यूटर एक-दूसरे की पहचान नाम से नहीं, संख्याओं से करते थे। इन्हें आईपी पता कहा जाता है। समस्या यह थी कि इंसानों के लिए संख्याओं की लंबी श्रृंखला याद रखना मुश्किल है। इसलिए ऐसे नामों की जरूरत महसूस हुई जिन्हें लोग आसानी से याद रख सकें और कंप्यूटर उन्हें संबंधित आईपी पते में बदल सकें। यहीं से डोमेन नाम प्रणाली यानी Domain Name System की जरूरत पैदा हुई।

डोमेन नाम की व्यवस्था किसने बनाई?

डोमेन नाम प्रणाली के विकास में अमेरिकी कंप्यूटर वैज्ञानिक पॉल मॉकापेट्रिस की बड़ी भूमिका रही। उन्होंने 1983 में Domain Name System का प्रस्ताव दिया। इसका उद्देश्य था इंटरनेट पर कंप्यूटरों के संख्यात्मक पतों के बदले ऐसे नाम इस्तेमाल करना जिन्हें इंसान आसानी से याद रख सकें। लेकिन केवल नाम बना देना काफी नहीं था। यह भी तय करना जरूरी था कि इन नामों को कौन संभालेगा, किसे कौन-सा नाम मिलेगा और अलग-अलग प्रकार की संस्थाओं की पहचान कैसे होगी। यहीं से .com, .org, .gov जैसे शीर्ष-स्तरीय डोमेन सामने आए।

.com सबसे पहले आया या .gov?

इन डोमेनों की शुरुआत 1980 के दशक में हुई। शुरुआती इंटरनेट में कुछ प्रमुख शीर्ष-स्तरीय डोमेन बनाए गए:

- .com - व्यावसायिक संस्थाओं के लिए

- .org - संगठनों के लिए

- .net - नेटवर्क से जुड़ी संस्थाओं के लिए

- .edu - शैक्षणिक संस्थानों के लिए

.gov - अमेरिकी सरकार के लिए

.mil - अमेरिकी सैन्य संस्थानों के लिए

इसके साथ देश आधारित डोमेन भी बनाए गए, जैसे भारत के लिए .in, ब्रिटेन के लिए .uk और फ्रांस के लिए .fr।

ध्यान देने वाली बात यह है कि शुरुआत में इंटरनेट आज की तरह आम जनता का मंच नहीं था। इसका बड़ा हिस्सा अमेरिकी सरकारी संस्थानों, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से जुड़ा था। इसलिए शुरुआती डोमेन व्यवस्था भी उसी वातावरण को ध्यान में रखकर बनाई गई थी।

.com का मतलब सिर्फ कंपनी नहीं है

आज .com देखकर हम अक्सर मान लेते हैं कि यह किसी कंपनी की वेबसाइट होगी। लेकिन इसका मूल अर्थ commercial यानी व्यावसायिक था। समय के साथ .com इतना लोकप्रिय हुआ कि इसका इस्तेमाल लगभग हर तरह की वेबसाइट के लिए होने लगा। आज किसी व्यक्ति, संस्था, समाचार वेबसाइट या कंपनी, कोई भी सामान्य तौर पर .com नाम पंजीकृत करा सकता है, बशर्ते वह नाम उपलब्ध हो और पंजीकरण की शर्तें पूरी करता हो। यानी example.com के मालिक का कंपनी होना जरूरी नहीं है। यही कारण है कि आज .com अपने मूल अर्थ से कहीं अधिक एक सामान्य इंटरनेट पहचान बन चुका है।

फिर .org किसके लिए बनाया गया था?

.org का अर्थ organization यानी संगठन था। इसे मुख्य रूप से ऐसे संगठनों के लिए बनाया गया जो व्यावसायिक कंपनियों की श्रेणी में नहीं आते थे। लेकिन आज .org के लिए नियम .gov जैसे कड़े नहीं हैं। इसका इस्तेमाल गैर-लाभकारी संस्थाओं के साथ-साथ कई अन्य संगठनों और समुदायों द्वारा भी किया जाता है। इसलिए केवल .org देखकर यह मान लेना सही नहीं होगा कि वेबसाइट निश्चित रूप से किसी पंजीकृत गैर-लाभकारी संस्था की ही है।

.gov इतना अलग क्यों है?

.gov सामान्य डोमेन की तरह खुले बाजार में उपलब्ध नहीं है। यह अमेरिकी सरकार से जुड़ी संस्थाओं के लिए आरक्षित है। इसका कारण बहुत सीधा है, यदि कोई भी व्यक्ति somegovernment.gov जैसा नाम खरीद सकता, तो सरकारी वेबसाइट और नकली वेबसाइट के बीच भ्रम पैदा करना आसान हो जाता। इसलिए .gov पर नियंत्रण और पंजीकरण के नियम बहुत सख्त रखे गए हैं। अमेरिका में .gov डोमेन का संचालन और पंजीकरण व्यवस्था संघीय सरकार के अधीन है। किसी पात्र सरकारी संस्था को यह साबित करना होता है कि वह वास्तव में अमेरिकी सरकार की अधिकृत इकाई है। यानी .gov केवल वेबसाइट का पता नहीं, पहचान और भरोसे का संकेत भी है।

.edu भी हर शिक्षण संस्थान को नहीं मिलता

इसी तरह .edu का इस्तेमाल देखकर हम समझते हैं कि वेबसाइट किसी शैक्षणिक संस्था से जुड़ी है। लेकिन कोई भी व्यक्ति या सामान्य कंपनी .edu नाम नहीं ले सकती। इसके लिए पात्रता की शर्तें हैं और डोमेन का संचालन एक निर्धारित संस्था के माध्यम से किया जाता है। अमेरिका में .edu मुख्य रूप से पात्र उच्च शिक्षा संस्थानों से जुड़ा है। इसलिए किसी वेबसाइट के अंत में .edu होना उसकी संस्थागत पहचान का महत्वपूर्ण संकेत बन सकता है।

भारत में .gov.in क्यों है?

.gov मूल रूप से अमेरिकी सरकारी व्यवस्था के लिए बनाया गया था। दूसरे देशों ने अपनी सरकारी वेबसाइटों के लिए अलग देश-आधारित व्यवस्थाएँ अपनाईं। भारत में सरकारी वेबसाइटों के लिए .gov.in का इस्तेमाल होता है। उदाहरण के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की अनेक वेबसाइटें .gov.in पर चलती हैं। इसी तरह भारतीय शिक्षण संस्थानों के लिए .ac.in और कुछ अन्य संस्थागत श्रेणियों के लिए अलग डोमेन बनाए गए हैं। इससे पता चलता है कि इंटरनेट पर डोमेन केवल नाम नहीं हैं। वे किसी वेबसाइट की भौगोलिक और संस्थागत पहचान भी बता सकते हैं।

.in, .uk, .fr जैसे डोमेन किसने तय किए?

इनका संबंध देशों से है। इन्हें Country Code Top-Level Domains यानी देश-कोड शीर्ष-स्तरीय डोमेन कहा जाता है। हर देश या क्षेत्र के लिए दो अक्षरों का एक कोड तय किया गया। भारत को .in, जापान को .jp, चीन को .cn और ऑस्ट्रेलिया को .au मिला। यह व्यवस्था ISO 3166 जैसे अंतरराष्ट्रीय देश-कोड मानकों से जुड़ी है और इंटरनेट की डोमेन व्यवस्था में इन कोडों का उपयोग किया गया। इसका फायदा यह हुआ कि किसी वेबसाइट के डोमेन से उसके देश से जुड़ी पहचान का अंदाजा लगाया जा सकता है।

इन सबका नियंत्रण किसके पास है?

यहाँ इंटरनेट की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक आती है—ICANN यानी Internet Corporation for Assigned Names and Numbers। ICANN वैश्विक डोमेन नाम प्रणाली और इंटरनेट के कुछ महत्वपूर्ण विशिष्ट पहचान संसाधनों के समन्वय में बड़ी भूमिका निभाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ICANN दुनिया की हर वेबसाइट खुद पंजीकृत करता है। इसके नीचे अलग-अलग स्तर पर रजिस्ट्रियाँ, रजिस्ट्रार और अन्य संस्थाएँ काम करती हैं। इसे एक बड़े बाजार की तरह समझ सकते हैं। ऊपर से पूरी व्यवस्था के नियम और समन्वय हैं, जबकि नीचे अलग-अलग संस्थाएँ डोमेन का पंजीकरण और प्रबंधन करती हैं।

डोमेन खरीदने और डोमेन तय करने में फर्क है

जब आप किसी वेबसाइट के लिए abc.com खरीदते हैं तो आप वास्तव में उस नाम का स्थायी मालिक हमेशा के लिए नहीं बन जाते। आप उसे एक निश्चित अवधि के लिए पंजीकृत कराते हैं और शुल्क देकर उसका अधिकार बनाए रखते हैं। डोमेन पंजीकरण कंपनियाँ यानी registrars इस प्रक्रिया में आपकी मदद करती हैं। लेकिन हर डोमेन के नियम एक जैसे नहीं होते, abc.com अपेक्षाकृत आसानी से पंजीकृत हो सकता है, जबकि किसी सरकारी या विशेष संस्थागत डोमेन के लिए अलग पात्रता जरूरी हो सकती है।

क्या डोमेन नाम इंटरनेट का पता है?

डोमेन नाम इंसानों के लिए आसान पहचान है। कंप्यूटर को अंततः आईपी पते के आधार पर नेटवर्क पर सही सर्वर तक पहुँचना होता है। जब आप ब्राउजर में example.com लिखते हैं तो आपका उपकरण DNS से पूछता है कि इस नाम के पीछे कौन-सा आईपी पता है। DNS उस नाम को संबंधित आईपी पते से जोड़ने में मदद करता है। इसके बाद आपका उपकरण नेटवर्क के जरिए संबंधित सर्वर से संपर्क करता है। यानी सरल रूप में: डोमेन नाम → DNS → आईपी पता → सर्वर → वेबसाइट - यह पूरी प्रक्रिया इतनी तेज होती है कि उपयोगकर्ता को इसके पीछे की जटिलता दिखाई ही नहीं देती।

एक वेबसाइट के नाम के आखिर में ये अक्षर क्यों जरूरी हैं?

ये जरुरी इसलिए है क्योंकि इंटरनेट पर अरबों डिजिटल संसाधनों के बीच पहचान और संगठन जरूरी है। यदि हर वेबसाइट केवल याद रखने में मुश्किल संख्यात्मक आईपी पते से चलती, तो इंटरनेट का इस्तेमाल बहुत कठिन होता। डोमेन नाम ने इस समस्या को काफी हद तक हल कर दिया। और अलग-अलग श्रेणियों ने इंटरनेट को शुरुआती दौर में व्यवस्थित करने में मदद की—व्यापार के लिए .com, संगठनों के लिए .org, शिक्षा के लिए .edu, सरकार के लिए .gov और नेटवर्क संस्थाओं के लिए .net। हालाँकि समय के साथ इनमें से कई सीमाएँ ढीली या अप्रासंगिक हो गईं।

आज डोमेन की दुनिया पहले से कहीं बड़ी है

शुरुआत में कुछ ही शीर्ष-स्तरीय डोमेन थे। आज सैकड़ों नए शीर्ष-स्तरीय डोमेन मौजूद हैं। अब .shop, .app, .tech, .news, .online जैसे अनेक विकल्प भी उपलब्ध हैं। इससे वेबसाइट के नाम चुनने की संभावनाएँ बढ़ गई हैं, लेकिन मूल विचार वही है—किसी डिजिटल स्थान को इंसानों के लिए याद रखने योग्य नाम देना। सबसे दिलचस्प बात: .com अब अर्थ से ज्यादा पहचान है. जब .com बनाया गया था तो इसका उद्देश्य व्यावसायिक वेबसाइटों की पहचान करना था। लेकिन इंटरनेट के विस्तार के साथ यह अर्थ कमजोर होता गया। आज .com को देखकर जरूरी नहीं कि सामने कंपनी ही हो। इसके उलट .gov, .edu जैसी श्रेणियों में अभी भी पात्रता और संस्थागत पहचान का महत्व अधिक है। यानी इंटरनेट की शुरुआत में डोमेन के आखिरी अक्षर *वेबसाइट की भूमिका बताते थे, लेकिन आज कुछ डोमेन में यह भूमिका कमजोर होकर **ब्रांड और पहचान* में बदल गई है।

इंटरनेट के शुरुआती विकास में अमेरिकी शोध संस्थानों और सरकारी एजेंसियों ने डोमेन व्यवस्था बनाने में भूमिका निभाई। 1980 के दशक में शुरुआती शीर्ष-स्तरीय डोमेन बनाए गए। बाद में इंटरनेट के वैश्विक विस्तार के साथ इनके प्रबंधन के लिए संस्थागत ढाँचा विकसित हुआ और ICANN जैसी संस्थाएँ महत्वपूर्ण बनीं। आज अलग-अलग शीर्ष-स्तरीय डोमेन के अपने संचालक, नीतियाँ और पंजीकरण नियम हैं। इसलिए .com, .org और .gov तीनों केवल तीन अलग-अलग अक्षर नहीं हैं। वे इंटरनेट के तीन अलग-अलग विचारों की विरासत हैं - व्यापार, संगठन और सरकार।

और सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस व्यवस्था की शुरुआत कुछ दर्जन शोधकर्ताओं और संस्थानों के बीच कंप्यूटरों की पहचान आसान बनाने के लिए हुई थी, वही आज अरबों लोगों की डिजिटल पहचान का हिस्सा बन चुकी है।

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