AI क्यों होता जा रहा है सस्ता? चीन ने कैसे बदल दिया पूरी AI इंडस्ट्री का खेल

AI पहले से इतना सस्ता क्यों हो रहा है? जानिए चीन के DeepSeek, OpenAI, Qwen, AI API, हार्डवेयर, इंफरेंस कॉस्ट और बदलती AI अर्थव्यवस्था की पूरी कहानी।

Yogesh Mishra
Published on: 6 Aug 2026 6:30 PM IST
AI क्यों होता जा रहा है सस्ता? चीन ने कैसे बदल दिया पूरी AI इंडस्ट्री का खेल
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AI Getting Cheaper: कभी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को भविष्य की महंगी तकनीक माना जाता था। माना जाता था कि यह केवल बड़ी टेक कंपनियों, बहुराष्ट्रीय उद्योगों और अरबों डॉलर खर्च करने वाली प्रयोगशालाओं तक सीमित रहेगी। लेकिन केवल कुछ वर्षों में तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। आज ChatGPT, Gemini, Claude, DeepSeek और Qwen जैसे AI मॉडल करोड़ों नहीं, बल्कि अरबों लोगों के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। छात्र होमवर्क कर रहे हैं, पत्रकार खबरें तैयार कर रहे हैं, डॉक्टर मेडिकल रिपोर्ट पढ़ रहे हैं, प्रोग्रामर कोड लिख रहे हैं और छोटे कारोबारी विज्ञापन तैयार कर रहे हैं - सब AI की मदद से।

दिलचस्प बात यह है कि जितनी तेजी से एआई का इस्तेमाल बढ़ रहा है, उतनी ही तेजी से इसकी कीमत घट रही है। सामान्य अर्थशास्त्र कहता है कि जब किसी उत्पाद की मांग बढ़ती है तो उसकी कीमत भी बढ़ती है। लेकिन एआई इस नियम को चुनौती देता दिखाई दे रहा है। कुछ एआई मॉडलों की एपीआई (API) कीमतें एक साल के भीतर 80 प्रतिशत तक कम हो गई हैं। दूसरी ओर ChatGPT के यूजर्स की संख्या लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है और ओपन एआई (OpenAI) का दावा है कि उसके मॉडल अब एक अरब से अधिक एक्टिव यूजर्स तक पहुंच चुके हैं।

आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या एआई बनाना सस्ता हो गया है? क्या चीन की कंपनियों ने इस बाजार का गणित बदल दिया है? और इसका असर भारत सहित पूरी दुनिया पर क्या पड़ेगा? इन सवालों के जवाब एआई की बदलती अर्थव्यवस्था में छिपे हैं।

एआई बनाना और एआई चलाना, दोनों अलग-अलग बातें हैं

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि AI की लागत दो हिस्सों में बंटी होती है। पहला है मॉडल को तैयार करना, जिसे ट्रेनिंग कहा जाता है। दूसरा है तैयार मॉडल से हर बार उत्तर प्राप्त करना, जिसे इंफरेंस कहा जाता है।

किसी अत्याधुनिक AI मॉडल को प्रशिक्षित करने में आज भी अरबों डॉलर खर्च हो सकते हैं। हजारों हाई-एंड AI चिप, विशाल डेटा सेंटर, भारी बिजली, महीनों की कंप्यूटिंग और दुनिया के सर्वश्रेष्ठ शोधकर्ताओं की जरूरत पड़ती है। यह प्रक्रिया बेहद महंगी है।

लेकिन एक बार मॉडल तैयार हो जाने के बाद जब कोई उपयोगकर्ता ChatGPT से सवाल पूछता है, तो मॉडल दोबारा प्रशिक्षित नहीं होता। वह केवल पहले से सीखी हुई जानकारी का उपयोग करके उत्तर देता है। यही इंफरेंस है। असल में कीमतों में जो भारी गिरावट दिखाई दे रही है, वह मॉडल बनाने की नहीं, बल्कि मॉडल चलाने की लागत में आई है। यही कारण है कि कंपनियां कम कीमत पर अधिक AI सेवाएं देने में सक्षम हो रही हैं।

हार्डवेयर की क्रांति ने बदल दिया पूरा गणित


AI की कीमत घटाने में सबसे बड़ी भूमिका नई पीढ़ी के हार्डवेयर ने निभाई है। कुछ वर्ष पहले जिस सर्वर पर सीमित संख्या में उपयोगकर्ताओं को सेवा दी जा सकती थी, आज वही क्षमता कई गुना बढ़ चुकी है। नई AI चिप्स अधिक तेज हैं, कम बिजली खर्च करती हैं और एक साथ हजारों अनुरोध संभाल सकती हैं। इसके साथ हाई-बैंडविड्थ मेमोरी, तेज इंटरकनेक्ट, बेहतर कंपाइलर और अधिक कुशल सर्वर डिजाइन ने प्रति उत्तर लागत को लगातार कम किया है। यानी पहले जिस कंप्यूटिंग शक्ति से सौ लोगों को सेवा मिलती थी, आज उसी निवेश से कई गुना अधिक उपयोगकर्ता सेवा प्राप्त कर सकते हैं। यही स्केल की अर्थव्यवस्था है, जिसने AI को सस्ता बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है।

असली क्रांति एल्गोरिद्म में आई

AI उद्योग में पहले माना जाता था कि जितना बड़ा मॉडल होगा, उतना अधिक बुद्धिमान होगा। इसलिए कंपनियां लगातार अधिक पैरामीटर, अधिक डेटा और अधिक कंप्यूटिंग जोड़ती रहीं। लेकिन बाद में शोधकर्ताओं ने पाया कि केवल मॉडल का आकार बढ़ाना ही समाधान नहीं है। अधिक बुद्धिमत्ता कम संसाधनों से भी हासिल की जा सकती है। यहीं से Mixture of Experts (MoE), Quantization, Distillation, Pruning, Prompt Caching और Speculative Decoding जैसी तकनीकों का महत्व बढ़ा। इन तकनीकों का उद्देश्य एक ही है - कम कंप्यूटिंग से वही परिणाम प्राप्त करना।

यदि हर प्रश्न पर पूरा मॉडल चलाने के बजाय केवल जरूरी हिस्सा सक्रिय किया जाए, यदि बड़े मॉडल की जगह छोटे लेकिन प्रशिक्षित मॉडल काम कर दें, यदि बार-बार आने वाले डेटा को दोबारा प्रोसेस न करना पड़े, तो लागत अपने आप कम हो जाती है। यही वजह है कि AI की गुणवत्ता लगातार बेहतर हो रही है, जबकि प्रति प्रश्न लागत घटती जा रही है।

चैटजीपीटी के एक अरब यूजर्स


एआई इंडस्ट्री में यूजर्स की संख्या केवल लोकप्रियता नहीं बताती, बल्कि लागत भी तय करती है। जब किसी सेवा के कुछ लाख उपयोगकर्ता होते हैं, तब सर्वर का पूरा उपयोग नहीं हो पाता। कई मशीनें खाली रहती हैं। लेकिन जब वही सेवा करोड़ों और फिर अरबों लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने लगे, तो डेटा सेंटर लगातार व्यस्त रहते हैं। सर्वर का बेहतर उपयोग होता है और प्रति उपयोगकर्ता लागत घट जाती है। इसे अर्थशास्त्र में Economies of Scale कहा जाता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि हर नया यूजर लगभग मुफ्त हो जाता है। लंबी बातचीत, जटिल शोध, वीडियो निर्माण और एजेंट आधारित कार्य आज भी भारी कंप्यूटिंग मांगते हैं। लेकिन कुल मिलाकर बड़ा उपयोगकर्ता आधार कंपनियों को लागत कम करने का अवसर देता है।

API सस्ती हुई है, ChatGPT की सदस्यता नहीं

80 प्रतिशत कीमत घटने की खबर सुनकर कई लोगों को लगता है कि ChatGPT Plus जैसी सेवाएं भी इतनी ही सस्ती हो गई होंगी। लेकिन असलियत अलग है। API वह सेवा है जिसका उपयोग डेवलपर अपने ऐप बनाने के लिए करते हैं। वे प्रति टोकन भुगतान करते हैं। दूसरी ओर सामान्य उपभोक्ता मासिक सदस्यता खरीदता है, जिसमें केवल AI मॉडल ही नहीं बल्कि ऐप, सुरक्षा, स्टोरेज, फाइल प्रोसेसिंग, वॉयस, इमेज और अन्य सुविधाएं भी शामिल होती हैं। इसलिए API सस्ती होने का मतलब यह नहीं कि मासिक सदस्यता भी उसी अनुपात में सस्ती हो जाएगी। अक्सर कंपनियां कीमत स्थिर रखकर उसी शुल्क में अधिक सुविधाएं देना पसंद करती हैं।

चीन ने कैसे बदल दिया पूरा AI बाजार?

AI की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सबसे बड़ा बदलाव चीन की कंपनियों ने किया है। कुछ वर्ष पहले तक यह माना जाता था कि अत्याधुनिक AI केवल अमेरिकी कंपनियां ही बना सकती हैं। लेकिन DeepSeek ने यह धारणा तोड़ दी। DeepSeek-V3 और R1 जैसे मॉडलों ने दिखाया कि अपेक्षाकृत कम लागत पर भी अत्यंत सक्षम AI बनाया जा सकता है। बाद में DeepSeek ने API कीमतों में भारी कटौती की और उसके V4-Flash मॉडल को दुनिया के सबसे सस्ते अत्याधुनिक मॉडलों में गिना जाने लगा। इसके बाद Alibaba के Qwen, Moonshot AI के Kimi और कई अन्य चीनी मॉडलों ने भी कीमतों की होड़ शुरू कर दी। परिणाम यह हुआ कि अमेरिकी कंपनियों पर भी अपनी कीमतें कम करने का दबाव बढ़ गया।

चीन की सफलता केवल कम लागत वाले मॉडल बनाने तक सीमित नहीं है। इसकी असली कहानी उस इंजीनियरिंग सोच की है, जिसने सीमित संसाधनों को अवसर में बदल दिया। अमेरिका ने उन्नत AI चिप्स के निर्यात पर कई प्रतिबंध लगाए। इसका सीधा असर चीनी कंपनियों पर पड़ा क्योंकि उन्हें नवीनतम GPU और हाई-एंड हार्डवेयर तक वैसी पहुंच नहीं मिली जैसी अमेरिकी कंपनियों को थी। सामान्य परिस्थितियों में यह किसी भी उद्योग के लिए बड़ा झटका होता, लेकिन चीन ने इसका अलग समाधान निकाला।

चीनी शोधकर्ताओं ने अधिक शक्तिशाली हार्डवेयर खरीदने के बजाय उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने पर ध्यान दिया। उन्होंने मॉडल आर्किटेक्चर, मेमोरी मैनेजमेंट, कम-परिशुद्धता कंप्यूटिंग और अधिक कुशल एल्गोरिद्म विकसित किए। इसका परिणाम यह हुआ कि कम कंप्यूटिंग शक्ति के बावजूद वे ऐसे मॉडल तैयार करने लगे जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने लगे। यही वजह है कि आज AI उद्योग में दक्षता स्वयं एक नई प्रतिस्पर्धा बन चुकी है। पहले कंपनियां यह बताती थीं कि उनका मॉडल कितना बड़ा है। अब वे यह बताती हैं कि वही काम कितनी कम लागत में किया जा सकता है।

ओपन-वेट मॉडल ने क्यों बदल दिए बाजार के नियम?

AI उद्योग में आज सबसे अधिक चर्चा ‘ओपन सोर्स’ और ‘ओपन-वेट’ मॉडल की हो रही है। हालांकि दोनों एक जैसी चीजें नहीं हैं। कई कंपनियां अपने मॉडल के प्रशिक्षित वेट (Weights) डाउनलोड करने की सुविधा देती हैं, लेकिन पूरा प्रशिक्षण डेटा और विकास प्रक्रिया सार्वजनिक नहीं करतीं। इन्हें तकनीकी रूप से ओपन-वेट मॉडल कहा जाता है। DeepSeek, Alibaba का Qwen, Moonshot AI का Kimi और कई अन्य चीनी मॉडल इसी श्रेणी में आते हैं।

इन मॉडलों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि कोई भी कंपनी उन्हें अपने सर्वर पर स्थापित कर सकती है। उसे हर प्रश्न के लिए किसी विदेशी API पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। इससे लागत कम होती है, डेटा पर नियंत्रण बढ़ता है और स्थानीय जरूरतों के अनुसार मॉडल को बदला भी जा सकता है। यही कारण है कि बंद (Closed) AI मॉडल बेचने वाली कंपनियों के लिए अब कीमतें ऊंची बनाए रखना पहले जितना आसान नहीं रह गया है। ग्राहक के पास विकल्प मौजूद हैं और यही प्रतिस्पर्धा पूरे उद्योग को सस्ता बना रही है।

क्या अमेरिका AI की दौड़ हार रहा है?

यह कहना जल्दबाजी होगी कि चीन ने AI की लड़ाई जीत ली है। आज भी अत्याधुनिक AI चिप्स, विशाल क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर, दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालय, सबसे बड़ा डेवलपर इकोसिस्टम और अरबों डॉलर का निवेश अमेरिका के पास है। OpenAI, Anthropic, Google DeepMind, Microsoft और Meta जैसी कंपनियां अभी भी AI अनुसंधान में अग्रणी हैं। दूसरी ओर चीन ने लागत, दक्षता, ओपन-वेट मॉडल और बड़े घरेलू बाजार के आधार पर अलग बढ़त बनाई है।

यानी भविष्य संभवतः ऐसा नहीं होगा जहां केवल एक देश AI का नेतृत्व करे। अधिक संभावना यह है कि अमेरिका सबसे शक्तिशाली मॉडल बनाए, चीन सबसे किफायती मॉडल विकसित करे और दूसरे देश विशेष क्षेत्रों में अपनी विशेषज्ञता विकसित करें। यही बहुध्रुवीय AI अर्थव्यवस्था का संकेत है।

AI की शुरुआती दौड़ में लक्ष्य सबसे बड़ा मॉडल बनाना था। लेकिन अब उद्योग यह समझ चुका है कि हर समस्या के लिए विशाल मॉडल की जरूरत नहीं होती। यदि किसी उपयोगकर्ता को केवल ईमेल लिखना है, भाषा सुधारनी है, दस्तावेज का सार बनाना है या ग्राहक सेवा से जुड़ा सामान्य उत्तर चाहिए, तो इसके लिए अत्यधिक शक्तिशाली मॉडल चलाना संसाधनों की बर्बादी है। यही वजह है कि छोटे लेकिन अत्यधिक प्रशिक्षित मॉडल तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।

इनकी एक और विशेषता है कि इन्हें केवल डेटा सेंटर में ही नहीं बल्कि स्मार्टफोन, लैपटॉप और अन्य व्यक्तिगत उपकरणों पर भी चलाया जा सकता है। इसे ऑन-डिवाइस AI कहा जाता है। जब AI सीधे मोबाइल फोन पर चलेगा, तब हर छोटे कार्य के लिए इंटरनेट या क्लाउड सर्वर की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे लागत और प्रतिक्रिया समय दोनों कम होंगे।

आने वाले वर्षों में AI का सबसे बड़ा बदलाव मॉडल राउटिंग हो सकता है। आज उपयोगकर्ता स्वयं मॉडल चुनता है। लेकिन भविष्य में यह काम AI प्रणाली खुद करेगी। यदि आपका प्रश्न आसान है, तो उसे कम लागत वाले छोटे मॉडल के पास भेजा जाएगा। यदि जटिल गणित, वैज्ञानिक शोध या गहरा तर्क चाहिए, तो वही अनुरोध शक्तिशाली फ्रंटियर मॉडल तक पहुंचेगा। यदि चित्र बनाना है, तो विशेष विजुअल मॉडल सक्रिय होगा। यदि चिकित्सा या कानूनी जानकारी चाहिए, तो अधिक नियंत्रित और सुरक्षित मॉडल का उपयोग किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया से औसत लागत काफी कम हो जाएगी, जबकि उपयोगकर्ता को अनुभव लगभग एक जैसा मिलेगा।

क्या AI वास्तव में मुफ्त हो जाएगी?


उत्तर है : आंशिक रूप से हां। सामान्य टेक्स्ट लिखना, अनुवाद करना, छोटे प्रश्नों के उत्तर देना और रोजमर्रा के अधिकांश AI कार्य आने वाले वर्षों में लगभग मुफ्त या बेहद सस्ते हो सकते हैं। लेकिन अत्याधुनिक वैज्ञानिक मॉडल, घंटों तक चलने वाले AI एजेंट, जटिल वीडियो निर्माण, विशाल डेटा विश्लेषण और उद्योग-स्तरीय सेवाएं अभी भी महंगी रहेंगी। इतिहास बताता है कि तकनीक सस्ती होते ही लोग उसका अधिक उपयोग करने लगते हैं। जब टेक्स्ट सस्ता हुआ तो लोगों ने वीडियो बनाना शुरू कर दिया। जब वीडियो सस्ता होगा तो लोग AI एजेंटों से पूरे व्यवसाय चलवाने की कोशिश करेंगे। यानी AI की प्रति इकाई लागत कम होगी, लेकिन कुल AI खर्च बढ़ता भी रह सकता है।

शिक्षा, पत्रकारिता और छोटे कारोबार सबसे पहले बदलेंगे

AI की घटती कीमत का सबसे बड़ा लाभ उन क्षेत्रों को मिलेगा जहां ज्ञान सबसे बड़ी पूंजी है। शिक्षा में प्रत्येक विद्यार्थी को निजी शिक्षक जैसा सहयोग मिल सकेगा। स्थानीय भाषाओं में पढ़ाई, कठिन विषयों की व्याख्या, शोध पत्रों का अनुवाद और परीक्षा की तैयारी पहले से कहीं आसान हो जाएगी।

पत्रकारिता में AI शोध, ट्रांसक्रिप्शन, अनुवाद और डेटा विश्लेषण को तेज करेगी। छोटे मीडिया संस्थान भी वे तकनीकें इस्तेमाल कर सकेंगे जो पहले केवल बड़े संस्थानों तक सीमित थीं। लेकिन इसी के साथ झूठी सामग्री, डीपफेक और बिना सत्यापन वाले लेखों की बाढ़ भी बढ़ सकती है। ऐसे में विश्वसनीय रिपोर्टिंग और मौलिक पत्रकारिता का महत्व पहले से कहीं अधिक होगा।

छोटे व्यवसाय भी AI की मदद से ग्राहक सेवा, मार्केटिंग, वेबसाइट निर्माण, अनुवाद और डेटा विश्लेषण जैसे काम कम लागत में कर पाएंगे। इससे प्रतिस्पर्धा का स्तर बदलेगा और डिजिटल क्षमता छोटे उद्यमों तक पहुंचेगी।

भारत के लिए यह अवसर भी है और चेतावनी भी

भारत दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल बाजार बनने की दिशा में बढ़ रहा है। यहां भाषाई विविधता बहुत अधिक है और बड़ी आबादी अभी भी कम लागत वाली तकनीक पर निर्भर है। यदि AI की लागत लगातार घटती है, तो भारतीय स्टार्टअप शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, बैंकिंग और सरकारी सेवाओं के लिए स्थानीय भाषाओं में अत्यंत उपयोगी समाधान तैयार कर सकते हैं।

लेकिन केवल विदेशी AI मॉडल इस्तेमाल करना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को अपने भाषा मॉडल, डेटा सेंटर, कंप्यूटिंग क्षमता, चिप डिजाइन और AI अनुसंधान में भी निवेश करना होगा। अन्यथा तकनीक सस्ती तो होगी, लेकिन निर्भरता बढ़ती जाएगी। भारत के सामने यही सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती है।

AI जितनी सस्ती होगी, उसके खतरे भी उतनी तेजी से बढ़ेंगे

AI की कम कीमत केवल अवसर नहीं लाती, जोखिम भी बढ़ाती है। यदि कोई व्यक्ति कुछ मिनटों में हजारों फर्जी ईमेल, डीपफेक वीडियो, नकली तस्वीरें और स्थानीय भाषा में फिशिंग संदेश तैयार कर सकता है, तो साइबर अपराध की लागत भी घट जाती है। यानी जिस तरह अच्छी तकनीक आम लोगों तक पहुंचेगी, उसी तरह उसका दुरुपयोग करने वाले लोगों तक भी।

इसलिए आने वाले वर्षों में AI नियमन, डिजिटल पहचान, साइबर सुरक्षा और तथ्य जांच की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होगी। केवल AI बनाना पर्याप्त नहीं होगा, उसका जिम्मेदार उपयोग सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी होगा।

AI कंपनियां आखिर कमाई कैसे करेंगी?

यदि AI लगातार सस्ती होती जाएगी तो कंपनियां मुनाफा कहां से कमाएंगी? विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में केवल मॉडल बेचकर कमाई करना कठिन होगा। कमाई का असली स्रोत AI के ऊपर बनने वाली सेवाएं होंगी, जैसे कॉरपोरेट सुरक्षा, उद्योग-विशेष समाधान, AI एजेंट, क्लाउड प्लेटफॉर्म, कार्यप्रवाह (Workflow), विशेष डेटा, विज्ञापन और एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर। जिस तरह इंटरनेट स्वयं लगभग मुफ्त है लेकिन उसके ऊपर Google, Amazon और Apple जैसी कंपनियों ने विशाल कारोबार खड़ा किया, उसी तरह AI की मूल बुद्धिमत्ता सस्ती हो सकती है, लेकिन उसके उपयोग के तरीके ही भविष्य का सबसे बड़ा व्यवसाय बनेंगे।

संभव है कि आने वाले दशक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता सबसे सस्ती तकनीकों में से एक बन जाए। लेकिन उसी समय इंसानी विवेक, मौलिकता, नैतिक निर्णय और भरोसेमंद जानकारी दुनिया की सबसे मूल्यवान संपत्ति बन जाए। यही AI क्रांति का सबसे बड़ा और शायद सबसे गहरा आर्थिक एवं सामाजिक परिवर्तन होगा।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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