ईश्वर को पाने का सरल महीना ‘कार्तिक’ शुरू, ऐसे करें नियमों का पालन

Published by suman Published: October 17, 2016 | 12:18 pm

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लखनऊ: हिंदू पंचाग के अनुसार आठवां मास कार्तिक मास पापों के नाश का मास और मुक्ति का मार्ग दिखाने वाला मास है,जो भगवान विष्णु को अति प्रिय है। कार्तिक मास की शुरुआत के साथ ही धर्म कार्यों परकाष्ठा बढ़ जाती है। पुराणों में भी कार्तिक मास की चर्चा मासोत्तम मासे कार्तिक मास से शुरू होती है। कहा भी गया है कि कार्तिक मास के समान कोई दूसरा मास नहीं है और सतयुग के समान कोई युग नहीं है। वेदों के समान कोई शास्त्र नहीं और गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है। इसी तरह सभी देवताओं में भगवान विष्णु,तीर्थों में बद्रीनारायण को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। इसलिए इस पवित्र मास में इन बातों का ख्याल रखें और क्या करें, क्या ना करें

कार्तिक मास में जो लोग संकल्प लेकर हर दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर किसी तीर्थ स्थान, किसी नदी या तालाब पर जाकर स्नान करते हैं या घर में ही गंगाजल युक्त जल से स्नान करते हुए भगवान का ध्यान करते हैं, उस पर भगवान की कृपा अपार होती है। स्नान के बाद पहले भगवान विष्णु और बाद में सूर्य भगवान को अर्घ्य देना चाहिए,फिर पितरों को याद करना चाहिए।

स्नान के बाद नए और साफ कपड़े पहने और भगवान विष्णु जी का धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प और मौसम के फलों के साथ विधिवत सच्चे मन से पूजन करें, भगवान को मस्तक झुकाकर बारंबार प्रणाम करते हुए किसी भी गलती के लिए क्षमा याचना करें।

कार्तिक मास की कथा स्वयं सुनें और दूसरों को भी सुनाएं। कुछ लोग कार्तिक मास में व्रत करने का भी संकल्प करते हैं और केवल फलाहार पर रहते हैं जबकि कुछ लोग पूरा मास एक समय भोजन करके कार्तिक मास के नियम का पालन करते हैं। इस मास में श्रीमद्भागवत कथा, श्री रामायण, श्रीमद्भगवदगीता, श्री विष्णुसहस्रनाम आदि स्रोत्रों का पाठ करना उत्तम है।

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दीपदान की महिमा अपार
वैसे तो जो हर दिन मंदिर में दीप दान करते हैं उनके घरों में सदा खुशहाली रहती हैं।  परंतु कार्तिक मास में दीपदान की असीम महिमा है। इस मास में वैसे तो किसी भी देव मंदिर में जाकर रात्रि जागरण किया जा सकता है परंतु यदि किसी कारण वश मंदिर में जाना सम्भव न हो तो किसी पीपल और वट वृक्ष के नीचे बैठकर  और तुलसी के पास दीपक जलाकर प्रभु नाम की महिमा का गुणगान कर सकते हैं। इस मास में भूमि पर शयन करना भी उत्तम है।

कार्तिक मास का महत्व
हिंदू धर्म में व्रत विशेष महत्व है। व्रत और तप करने से सभी पापों का नाश तो होता ही है साथ ही ईश्वर की अनुकंपा भी प्राप्त होती है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, जो मनुष्य कार्तिक मास में व्रत र तप करता है, उसे मोक्ष मिलता है।

मासानां कार्तिक: श्रेष्ठो देवानां मधुसूदन।
तीर्थं नारायणाख्यं हि त्रितयं दुर्लभं कलौ।।

(स्कंद पुराण, वै. खं. कां. मा. 1/14)
स्कंद पुराण में लिखे इस श्लोक के अनुसार, भगवान विष्णु एवं विष्णुतीर्थ के समान ही कार्तिक मास भी श्रेष्ठ और दुर्लभ है। एक अन्य श्लोक के अनुसार-

न कार्तिकसमो मासो न कृतेन समं युगम्।
न वेदसदृशं शास्त्रं न तीर्थं गंगा समम्।।
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सिर्फ एक दिन लगाएं तेल
कार्तिक मास में केवल एक बार नरक चतुर्दशी (कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी) के दिन ही शरीर पर तेल लगाना चाहिए। कार्तिक मास में अन्य दिनों में तेल लगाना वर्जित है।

इन चीजों को करें वर्जित
कार्तिक महीने में द्विदलन अर्थात उड़द, मूंग, मसूर, चना, मटर, राई आदि नहीं खाना चाहिए।

ब्रह्मचर्य
कार्तिक मास में ब्रह्मचर्य का पालन अति आवश्यक बताया गया है। इसका पालन नहीं करने पर पति-पत्नी को दोष लगता है और इसके अशुभ फल भी प्राप्त होते हैं.

संयम रखें
व्रती (व्रत करने वाला) को चाहिए कि वह तपस्वियों के समान व्यवहार करें। अर्थात कम बोले, किसी की निंदा या विवाद न करें, मन पर संयम रखें आदि।

पुराण आदि धर्म शास्त्रों में व्रत, जप और तप की दृष्टि से कार्तिक मास (इस बार 28 अक्टूबर, बुधवार से 25 नवंबर, बुधवार तक) का विशेष महत्व बताया गया है। भगवान नारायण ने ब्रह्मा को, ब्रह्मा ने नारद को और नारद ने महाराज पृथु को कार्तिक मास के सर्वगुण संपन्न माहात्मय के संदर्भ में बताया है। कार्तिक मास में कुछ नियम प्रधान माने गए हैं, जिन्हें करने से शुभ फल मिलते हैं और हर मनोकामना पूरी होती है।
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दीपदान
धर्म शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक मास में सबसे प्रमुख काम दीपदान करना बताया गया है। इस महीने में नदी, पोखर, तालाब आदि में दीपदान किया जाता है। इससे पुण्य की प्राप्ति होती है।

तुलसी पूजा
इस महीने में तुलसी पूजन करने तथा सेवन करने का विशेष महत्व बताया गया है। वैसे तो हर मास में तुलसी का सेवन व आराधना करना श्रेयस्कर होता है, लेकिन कार्तिक में तुलसी पूजा का महत्व कई गुना माना गया है।

भूमि पर शयन
भूमि पर सोना कार्तिक मास का तीसरा प्रमुख काम है। भूमि पर सोने से मन में सात्विकता का भाव आता है तथा अन्य विकार भी समाप्त हो जाते हैं।