BSP Politics News: कौन हैं अशोक सिद्धार्थ, जिनके कारण मायावती ने आकाश आनंद को भी BSP से निकाल दिया?

BSP Neta Ashok Siddharth News: अशोक सिद्धार्थ कौन हैं और मायावती से उनका रिश्ता कैसे इतना मजबूत हुआ?

Yogesh Mishra
Published on: 11 Sept 2026 5:15 PM IST
BSP Political Crisis Ashok Siddharth Information Mayawati UP Election 2027
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BSP Political Crisis Ashok Siddharth Information Mayawati UP Election 2027

BSP Neta Ashok Siddharth News: बहुजन समाज पार्टी की राजनीति में शायद ही कोई ऐसा नेता रहा हो जिसकी कहानी इतने नाटकीय ढंग से बदली हो जितनी पूर्व राज्यसभा सदस्य अशोक सिद्धार्थ की। एक समय वह मायावती के इतने विश्वसनीय थे कि सरकारी नौकरी छोड़कर राजनीति में आने वाले इस कार्यकर्ता को मायावती ने पहले उत्तर प्रदेश विधान परिषद पहुंचाया, फिर संगठन में कई राज्यों की जिम्मेदारी दी और अंततः राज्यसभा भेजा। रिश्ता राजनीतिक विश्वास से आगे बढ़ा और पारिवारिक हो गया, मायावती के छोटे भाई आनंद कुमार के बेटे आकाश आनंद की शादी अशोक सिद्धार्थ की बेटी डॉ. प्रज्ञा सिद्धार्थ से हुई। लेकिन यही अशोक सिद्धार्थ अब मायावती की नजर में उस राजनीतिक समस्या के केंद्र में हैं जिसने आकाश आनंद के भविष्य को भी उलझा दिया है। 9 सितंबर 2026 को मायावती ने सार्वजनिक रूप से कहा कि यदि अशोक सिद्धार्थ अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा त्यागकर राजनीति से पूरी तरह संन्यास ले लें तभी आकाश को दोबारा जिम्मेदारी देने पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जा सकता है। अगले ही दिन अशोक ने राजनीति और सामाजिक जीवन से संन्यास की घोषणा कर दी, लेकिन इसके कुछ समय बाद मायावती ने यह कहते हुए आकाश आनंद को बसपा से पूरी तरह बाहर कर दिया कि अशोक का फैसला बहुत देर से आया और आकाश पार्टी से अधिक पारिवारिक रिश्तों के प्रभाव में दिखाई दे रहे हैं।

कायमगंज में जन्म, पढ़ाई और शुरुआती जीवन

राज्यसभा के आधिकारिक परिचय के अनुसार अशोक सिद्धार्थ का जन्म 5 जनवरी 1965 को फर्रुखाबाद जिले के कायमगंज में हुआ था। उनके पिता का नाम गणपत लाल प्रेमी और माता का नाम विटोली देवी दर्ज है। उनके बारे में प्रकाशित कुछ खबरों में जन्मतिथि 5 फरवरी लिखी गई है, लेकिन राज्यसभा का आधिकारिक अभिलेख 5 जनवरी 1965 बताता है, इसलिए इसी को अधिक प्रामाणिक माना जाना चाहिए। उन्होंने इतिहास में एमए किया और झांसी के महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज से ऑप्टोमेट्री का डिप्लोमा प्राप्त किया। उनके 2016 के चुनावी हलफनामे में भी बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से 1990 में एमए और 1987 में मेडिकल कॉलेज झांसी से नेत्र चिकित्सा से संबंधित डिप्लोमा दर्ज है। इसीलिए राजनीतिक हलकों में उन्हें अक्सर ‘डॉ. अशोक सिद्धार्थ’ कहा जाता रहा, हालांकि राज्यसभा के आधिकारिक परिचय में उनका पेशा ऑप्टोमेट्री प्रैक्टिस, रिफ्रैक्शनिस्ट बताया गया है, एमबीबीएस चिकित्सक नहीं।

उनके छात्र जीवन की राजनीतिक गतिविधियों के बारे में सार्वजनिक स्रोत बहुत विस्तृत विवरण नहीं देते, इसलिए यहां तथ्य और बाद की राजनीतिक कथाओं को अलग रखना जरूरी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनके परिवार का बहुजन आंदोलन से पुराना संबंध था। बसपा के सूत्रों के हवाले से प्रकाशित विवरण बताते हैं कि उनके पिता गणपत लाल प्रेमी कांशीराम के संपर्क में थे। अशोक भी पढ़ाई के दौरान बहुजन विचारधारा की तरफ आकर्षित हुए, लेकिन परिवार ने पहले शिक्षा पूरी करने पर जोर दिया। पढ़ाई के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य विभाग में सरकारी सेवा शुरू की और कन्नौज क्षेत्र में ऑप्टोमेट्री/रिफ्रैक्शनिस्ट के रूप में काम किया। यहीं से उनका कर्मचारी संगठन और बहुजन आंदोलन से सक्रिय संबंध मजबूत हुआ। बाद में वह वामसेफ से जुड़े और संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभालने लगे। इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि उनका बाकायदा राजनीतिक उभार छात्र नेता के रूप में नहीं बल्कि शिक्षा, सरकारी सेवा, वामसेफ और फिर बसपा संगठन के रास्ते हुआ।

बूथ के कार्यकर्ता से मायावती के विश्वसनीय नेता तक

अशोक सिद्धार्थ की राजनीतिक यात्रा की खास बात यह है कि वह सीधे संसद या बड़े पद पर नहीं पहुंचे थे। बसपा से जुड़े नेताओं के अनुसार उन्होंने बूथ स्तर से संगठन में काम किया, बाद में विधानसभा, जिला और मंडल स्तर की जिम्मेदारियां संभालीं। सरकारी नौकरी के दौरान वह वामसेफ में सक्रिय थे। 2000 के दशक के शुरुआती वर्षों में वह मायावती की नजर में आए और उन्हें फर्रुखाबाद में वामसेफ का जिला संयोजक बनाया गया। बाद में मायावती ने उनसे सरकारी नौकरी छोड़कर पूर्णकालिक रूप से आंदोलन और पार्टी के लिए काम करने को कहा। विभिन्न स्रोत उनके नौकरी छोड़ने के वर्ष को लेकर कुछ अंतर दिखाते हैं, लेकिन व्यापक रूप से उपलब्ध विवरण के अनुसार 2007 के आसपास उन्होंने स्वास्थ्य विभाग की नौकरी छोड़कर पूरी तरह बसपा की राजनीति अपना ली।

इसके बाद उनका राजनीतिक उत्थान तेजी से हुआ। जनवरी 2009 में वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बनाए गए और जनवरी 2015 तक एमएलसी रहे। जुलाई 2016 में बसपा ने उन्हें उत्तर प्रदेश से राज्यसभा भेजा और उनका कार्यकाल 2022 तक चला। राज्यसभा में वह स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण समिति, रेलवे समिति तथा उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति से जुड़े रहे। पार्टी के भीतर भी उनका महत्व केवल सांसद होने तक सीमित नहीं था। वह विभिन्न मंडलों और क्षेत्रों के प्रभारी, कानपुर-आगरा क्षेत्र के संगठनात्मक जिम्मेदार, राष्ट्रीय सचिव तथा दक्षिण भारत सहित अनेक राज्यों के प्रभारी रहे। कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा आदि में संगठन का काम उन्हें सौंपा जाता रहा। इससे पता चलता है कि मायावती उन्हें केवल चुनावी चेहरा नहीं बल्कि संगठन खड़ा करने वाला भरोसेमंद व्यक्ति मानती थीं।

उनकी पत्नी सुनीता सिद्धार्थ भी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहीं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार वह बसपा शासनकाल में उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग में उपाध्यक्ष रहीं। अशोक और सुनीता के एक बेटा और एक बेटी हैं, जिसकी पुष्टि राज्यसभा के आधिकारिक परिचय में भी होती है। यही बेटी आगे चलकर मायावती परिवार और सिद्धार्थ परिवार को रिश्तेदारी में बांधने वाली कड़ी बनीं।

प्रज्ञा सिद्धार्थ और आकाश आनंद का रिश्ता कैसे तय हुआ?

अशोक सिद्धार्थ की बेटी डॉ. प्रज्ञा सिद्धार्थ ने विदेश में चिकित्सा की पढ़ाई की। समकालीन रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने लंदन से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की थी। दूसरी तरफ मायावती के छोटे भाई आनंद कुमार के बेटे आकाश आनंद ने भी लंदन में पढ़ाई की और एमबीए किया। लेकिन उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टों से ऐसा प्रमाण नहीं मिलता कि दोनों का रिश्ता लंदन में पढ़ाई के दौरान प्रेम संबंध के रूप में शुरू हुआ था। इसके विपरीत, बसपा के वरिष्ठ नेताओं के हवाले से प्रकाशित जानकारी बताती है कि आकाश के पिता आनंद कुमार और अशोक सिद्धार्थ पुराने मित्र और एक-दूसरे के काफी करीब थे। दोनों परिवारों की निकटता ने इस विवाह की जमीन तैयार की। कुछ रिपोर्टों में यहां तक कहा गया कि मायावती ने स्वयं इस रिश्ते को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसलिए उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर इसे दो पहले से निकट राजनीतिक-पारिवारिक परिवारों के बीच तय हुआ विवाह कहना अधिक सुरक्षित है।

आकाश आनंद और प्रज्ञा सिद्धार्थ का विवाह 26 मार्च 2023 को गुरुग्राम में हुआ। विवाह सीमित लेकिन राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मेहमानों की मौजूदगी में हुआ था। मायावती स्वयं समारोह में उपस्थित थीं और विवाह की तस्वीरों में वह नवदंपती के साथ दिखाई दी थीं। उस समय यह रिश्ता अशोक सिद्धार्थ की मायावती परिवार से असाधारण निकटता का प्रमाण माना गया। राजनीतिक भरोसा अब रिश्तेदारी में बदल चुका था, अशोक सिद्धार्थ मायावती के समधी और आकाश आनंद के ससुर बन गए थे।

फिर ऐसा क्या हुआ कि सबसे भरोसेमंद व्यक्ति सबसे बड़ी समस्या बन गया?

इस प्रश्न का उत्तर बसपा की अंदरूनी सत्ता-संरचना में छिपा है। मायावती की घोषित आपत्ति यह है कि अशोक सिद्धार्थ ने पार्टी में गुटबाजी, अनुशासनहीनता और निजी-पारिवारिक हितों को संगठन से ऊपर रखने का काम किया। लेकिन घटनाओं का क्रम देखने पर कहानी कुछ अधिक जटिल दिखाई देती है। जैसे-जैसे आकाश आनंद का पार्टी में कद बढ़ा और उन्हें मायावती का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाने लगा, उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ की स्थिति भी संवेदनशील होती गई। अशोक पहले से संगठन के अनुभवी और अनेक राज्यों में संपर्क रखने वाले नेता थे, अब वह संभावित उत्तराधिकारी के ससुर भी थे। इससे पार्टी के भीतर एक ऐसी शक्ति-संरचना बनने की आशंका पैदा हुई जिसमें आकाश और अशोक को एक ही राजनीतिक धुरी के रूप में देखा जाने लगा।

इस टकराव का पहला बड़ा सार्वजनिक विस्फोट फरवरी 2025 में हुआ। अशोक सिद्धार्थ के बेटे की शादी आगरा में हुई थी। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक मायावती नहीं चाहती थीं कि बसपा के नेता बड़ी संख्या में उस कार्यक्रम में जाएं। लेकिन आकाश आनंद वहां पहुंचे और अनेक बसपा नेता भी विवाह समारोह में शामिल हुए। पार्टी के भीतर इसे एक तरह के शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखे जाने की चर्चा हुई। जबकि मायावती का आधिकारिक आरोप ‘गुटबाजी और पार्टी विरोधी गतिविधियों’ का था। 12 फरवरी 2025 को अशोक सिद्धार्थ और उनके करीबी माने जाने वाले नितिन सिंह को बसपा से निष्कासित कर दिया गया।

अशोक पर कार्रवाई और आकाश पर गिरती गाज

इसके बाद 2 मार्च, 2025 को मायावती ने आकाश आनंद को भी सभी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से हटा दिया और यहां तक कहा कि उनके जीवित रहते अब कोई राजनीतिक उत्तराधिकारी नहीं होगा। इस फैसले के लिए उन्होंने सीधे अशोक सिद्धार्थ को जिम्मेदार ठहराया। मायावती का आरोप था कि अशोक ने पार्टी को गुटों में बांटने की कोशिश की और आकाश के राजनीतिक भविष्य को भी नुकसान पहुंचाया। उन्होंने यह चिंता भी सार्वजनिक रूप से व्यक्त की कि अशोक की बेटी और आकाश की पत्नी प्रज्ञा पर अपने पिता का कितना प्रभाव है और उसके माध्यम से आकाश पर कितना प्रभाव पड़ सकता है। यह असाधारण बयान था, क्योंकि इसके बाद बसपा का संगठनात्मक विवाद सीधे पारिवारिक रिश्तों के क्षेत्र में प्रवेश कर गया।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। अप्रैल 2025 में आकाश आनंद ने सार्वजनिक रूप से मायावती से माफी मांगी, उन्हें अपना एकमात्र राजनीतिक गुरु बताया और धीरे-धीरे उनकी पार्टी में वापसी हो गई। मई में उन्हें फिर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली और अगस्त 2025 तक उन्हें राष्ट्रीय संयोजक जैसे महत्वपूर्ण पद पर पहुंचा दिया गया। उधर अशोक सिद्धार्थ ने भी सितंबर 2025 में सार्वजनिक माफीनामा जारी किया। उन्होंने स्वीकार किया कि पार्टी का काम करते समय उनसे जाने-अनजाने और गलत लोगों के प्रभाव में गलतियां हुईं, भविष्य में पार्टी अनुशासन और मायावती के निर्देश के अनुसार ही काम करने तथा रिश्तेदारी का अनुचित लाभ न उठाने का वादा किया। मायावती ने कुछ घंटों में उनका निष्कासन वापस ले लिया।

वापसी के बाद अशोक को फिर महत्वपूर्ण संगठनात्मक जिम्मेदारियां दी गईं। पहले चार राज्यों और बाद में अलग-अलग पुनर्गठन में अनेक राज्यों का प्रभार मिला। यानी सितंबर 2025 के बाद मायावती ने केवल उन्हें माफ नहीं किया बल्कि दोबारा भरोसा भी किया। यही तथ्य वर्तमान विवाद को महत्वपूर्ण बनाता है, क्योंकि यदि मायावती उन्हें स्थायी खतरा मान चुकी होतीं तो इतनी जल्दी संगठनात्मक जिम्मेदारियां वापस देना स्वाभाविक नहीं था।

अगस्त 2026 में फिर निष्कासन

लेकिन यह समझौता एक वर्ष भी नहीं टिक सका। 2 अगस्त 2026 को मायावती ने अशोक सिद्धार्थ को दोबारा बसपा से निकाल दिया। उनके साथ केंद्रीय समन्वयक रणधीर सिंह बेनीवाल पर भी कार्रवाई हुई। इस बार आरोप अनुशासनहीनता और पार्टी निर्देशों के उल्लंघन का था और मायावती ने संकेत दिया कि अशोक को अब वापस नहीं लिया जाएगा। उस समय अशोक पार्टी के केंद्रीय समन्वयक थे और ओडिशा, पश्चिम बंगाल तथा कर्नाटक जैसे राज्यों की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

इसके लगभग एक महीने बाद 3 सितंबर 2026 को आकाश आनंद को भी राष्ट्रीय संयोजक पद की जिम्मेदारियों से हटा दिया गया। और फिर 9 सितंबर को मायावती ने वह शर्त सार्वजनिक कर दी जिसने पूरे विवाद को असाधारण बना दिया। उन्होंने कहा कि पार्टी ने अशोक सिद्धार्थ को सुधरने के कई मौके दिए, लेकिन उन्होंने बसपा आंदोलन से अधिक निजी और पारिवारिक स्वार्थ को महत्व दिया। मायावती ने कहा कि यदि अशोक अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा त्यागकर राजनीति से पूरी तरह संन्यास ले लें तो आकाश आनंद को फिर जिम्मेदारियां देने पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जा सकता है।

अशोक ने मायावती की शर्त मान ली, फिर भी आकाश बाहर क्यों?

10 सितंबर की सुबह अशोक सिद्धार्थ ने लंबा सार्वजनिक पत्र जारी कर राजनीति ही नहीं बल्कि राजनीतिक और सामाजिक जीवन दोनों से संन्यास की घोषणा कर दी। उन्होंने लिखा कि वह 35 वर्षों से कांशीराम, डॉ. आंबेडकर और बसपा के मिशन में काम करते रहे हैं, मायावती उनकी राजनीतिक गुरु और बड़ी बहन हैं और उन्हीं की वजह से एक साधारण कार्यकर्ता विधान परिषद तथा राज्यसभा तक पहुंचा। उन्होंने अपने ऊपर लगे इस आरोप को पूरी तरह खारिज किया कि वह पार्टी पर कब्जा करना चाहते हैं या आकाश आनंद को गुमराह कर रहे हैं। उनका कहना था कि कई महीनों में आकाश से उनकी मुलाकात भी बहुत कम हुई और आकाश उनके दामाद होने से पहले मायावती के भतीजे हैं। उन्होंने मायावती से यह भी कहा कि उनके संन्यास को आकाश की वापसी से न जोड़ा जाए। अंततः उन्होंने कहा कि यदि उनके सार्वजनिक जीवन में रहने से बहुजन मिशन को नुकसान होता है तो वह उसी क्षण संन्यास लेते हैं।

लेकिन इसके कुछ ही समय बाद घटनाक्रम ने बिल्कुल उलटा मोड़ ले लिया। मायावती ने अशोक के संन्यास को ‘बहुत देर से उठाया गया सही कदम’ बताया और आकाश आनंद को बसपा से पूरी तरह मुक्त करने की घोषणा कर दी। मायावती की नाराजगी का एक उल्लेखनीय कारण यह भी बना कि आकाश ने अशोक के संन्यास से संबंधित उनकी पिछली पोस्ट को दोबारा साझा नहीं किया था, जबकि पहले वह मायावती की पोस्ट साझा करके अपनी निष्ठा प्रदर्शित करते रहे थे। मायावती ने इससे निष्कर्ष निकाला कि आकाश को पार्टी और बहुजन आंदोलन की अपेक्षा रिश्ते-नातों का मोह अधिक है और वह ‘डबल माइंड’ होकर संगठन का हित नहीं कर सकते।

आखिर मायावती अशोक सिद्धार्थ से इतनी नाराज क्यों हैं?

पूरे घटनाक्रम को जोड़कर देखें तो मायावती की घोषित नाराजगी के चार आधार दिखाई देते हैं—गुटबाजी और पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप, संगठन के निर्देशों का कथित उल्लंघन, राजनीतिक महत्वाकांक्षा और निजी-पारिवारिक हित को पार्टी से ऊपर रखने का आरोप तथा आकाश आनंद पर अशोक और उनके परिवार के प्रभाव को लेकर अविश्वास। लेकिन इसके भीतर एक पांचवीं और कहीं अधिक राजनीतिक परत भी दिखाई देती है। अशोक सिद्धार्थ साधारण समधी नहीं हैं। वह बूथ और वामसेफ से निकले, संगठन के विभिन्न स्तरों पर काम किया, विधान परिषद गए, राज्यसभा पहुंचे, अनेक राज्यों का संगठन संभाला और पार्टी में उनका अपना संपर्क तंत्र बना। दूसरी तरफ उनके दामाद आकाश आनंद को मायावती के बाद बसपा के संभावित युवा नेतृत्व के रूप में देखा जाता रहा। इसलिए अनुभवी संगठनकर्ता ससुर और संभावित उत्तराधिकारी दामाद की संयुक्त राजनीतिक धुरी बसपा जैसी अत्यधिक केंद्रीकृत नेतृत्व वाली पार्टी में स्वाभाविक रूप से अत्यंत संवेदनशील हो जाती है। लेकिन यहां सावधानी आवश्यक है—यह परिस्थितियों पर आधारित राजनीतिक विश्लेषण है; अशोक द्वारा मायावती को हटाने, पार्टी पर कब्जा करने या समानांतर संगठन बनाने का कोई सार्वजनिक रूप से सिद्ध प्रमाण उपलब्ध नहीं है। स्वयं अशोक इन आरोपों को राजनीतिक विरोधियों की साजिश बताते हैं।

और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण विरोधाभास है। जिस अशोक सिद्धार्थ को मायावती ने बूथ स्तर से उठाकर विधान परिषद और राज्यसभा तक पहुंचाया, जिन पर इतना विश्वास किया कि अपने भतीजे का विवाह उनकी बेटी से कराया, जिन्हें निष्कासन के बाद माफ करके फिर कई राज्यों की कमान सौंपी, आज उसी व्यक्ति की राजनीतिक उपस्थिति को वह अपने भतीजे के राजनीतिक भविष्य से असंगत मान रही हैं। अशोक ने अंततः संन्यास भी स्वीकार कर लिया, फिर भी विवाद समाप्त नहीं हुआ। उलटे आकाश आनंद को पार्टी से बाहर कर दिया गया। इससे संकेत मिलता है कि समस्या अब केवल अशोक सिद्धार्थ के पद छोड़ने की नहीं रह गई है, बल्कि मायावती और सिद्धार्थ-आकाश परिवार के बीच राजनीतिक विश्वास टूट चुका है। फिलहाल उपलब्ध तथ्यों से सबसे मजबूत निष्कर्ष यही निकलता है।

इस मामले में आज का घटनाक्रम बहुत तेजी से बदल रहा है। इसलिए मैंने पुराने जीवन-वृत्त के लिए राज्यसभा के आधिकारिक अभिलेख और चुनावी हलफनामे को प्राथमिकता दी है, जबकि 2025-26 के अंदरूनी घटनाक्रम में मायावती और अशोक सिद्धार्थ के सार्वजनिक बयानों तथा कई समाचार स्रोतों को मिलाकर तथ्य अलग और राजनीतिक व्याख्या अलग रखी है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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