BSP Leadership Crisis: मायावती के भतीजे आकाश और ईशान में कौन? बसपा के उत्तराधिकार का बड़ा सवाल

BSP Leadership Crisis: 2027 यूपी चुनाव से पहले बसपा में आकाश आनंद और ईशान आनंद की भूमिका क्यों अहम हो गई है?

Yogesh Mishra
Published on: 10 Sept 2026 12:04 PM IST
BSP Leadership Crisis Mayawati Akash Anand vs Ishaan Anand UP Election 2027
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BSP Leadership Crisis Mayawati Akash Anand vs Ishaan Anand UP Election 2027 (Photo - AI)

BSP Leadership Crisis: आकाश आनंद और ईशान आनंद की तुलना केवल दो भाइयों की तुलना नहीं रही। यह वास्तव में इस समय बसपा के भीतर चल रहे नेतृत्व-संकट, मायावती की उत्तराधिकार रणनीति और 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी को समझने की कुंजी है। सितंबर 2026 के घटनाक्रम के बाद तस्वीर यह है कि मायावती ने आकाश आनंद को एक बार फिर मुख्य राष्ट्रीय समन्वयक की जिम्मेदारी से हटा दिया था। और कहा है कि उन्हें अभी अधिक राजनीतिक परिपक्वता की जरूरत है। पर अब तो आकाश आनंद को पार्टी से ही बाहर का रास्ता दिखा दिया । दूसरी ओर छोटे भाई ईशान आनंद को संगठन में औपचारिक जिम्मेदारी देकर लगभग 15 राज्यों के काम की समीक्षा से जोड़ा है। इसलिए यह कहना अभी ठीक नहीं होगा कि मायावती ने ईशान को अपना उत्तराधिकारी बना दिया है। लेकिन इतना जरूर है कि आकाश के समानांतर परिवार के भीतर दूसरी राजनीतिक धारा तैयार हो चुकी है।

आकाश आनंद कौन हैं और उनकी राजनीतिक पूंजी क्या है

आकाश आनंद, बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आनंद कुमार के बड़े बेटे और मायावती के भतीजे हैं। उनकी औपचारिक राजनीतिक यात्रा लगभग एक दशक पुरानी हो चुकी है। 2017 में मायावती ने उन्हें पार्टी कार्यकर्ताओं से परिचित कराया था। उससे पहले वे सहारनपुर में दलित-ठाकुर संघर्ष के बाद मायावती के साथ दिखाई दिए थे। उन्होंने लंदन से प्रबंधन की पढ़ाई की और भारत लौटने के बाद धीरे-धीरे बसपा संगठन में प्रवेश किया। 2019 में उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक बनाया गया और दिसंबर 2023 में मायावती ने उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी भी घोषित किया। यानी आकाश को केवल एक पदाधिकारी नहीं। बल्कि मायावती के बाद बसपा के संभावित चेहरे के रूप में तैयार किया जा रहा था।


आकाश की सबसे बड़ी ताकत यह है कि अब उनकी अपनी राजनीतिक पहचान बन चुकी है। वे केवल ‘मायावती के भतीजे’ नहीं रह गए हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने लगातार सभाएं कीं और उनकी भाषा पारंपरिक बसपा नेतृत्व की तुलना में अधिक आक्रामक दिखाई दी। भाजपा, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता और दलित राजनीति पर वे खुलकर बोलते रहे। अप्रैल 2024 के एक साक्षात्कार में उन्होंने स्वयं को बसपा का ‘संरक्षक’ जैसा व्यक्ति बताया था और कहा था कि उनका काम केवल चुनाव लड़ना नहीं। बल्कि पार्टी को भविष्य के लिए तैयार करना है। उस समय वे 27 वर्ष के थे। बाद के वर्षों में उनकी चुनावी और संगठनात्मक दृश्यता लगातार बढ़ी।

लेकिन यही आक्रामकता उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बनी। 2024 में सीतापुर की सभा में भाजपा सरकार की तुलना तालिबान से करने वाली टिप्पणी के बाद उनके विरुद्ध मामला दर्ज हुआ और मायावती ने उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक तथा उत्तराधिकारी दोनों पदों से हटा दिया। कुछ सप्ताह बाद उन्हें वापस ले लिया गया। मार्च 2025 में फिर उन्हें पदों से हटाकर पार्टी से निष्कासित किया गया। उस समय विवाद में उनके ससुर और पूर्व सांसद अशोक सिद्धार्थ के कथित प्रभाव का प्रश्न भी सामने आया। सार्वजनिक क्षमा मांगने के बाद आकाश की फिर वापसी हुई और उन्हें दोबारा महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई। अब सितंबर 2026 में तीसरी बार मायावती ने उन्हें प्रमुख पद से हटाया तथा बाहर का रास्ता दिखा दिया है। यह उतार-चढ़ाव किसी भी युवा नेता के लिए असाधारण है।

इसलिए आकाश की वर्तमान स्थिति बड़ी विरोधाभासी है। उनके पास पहचान है। लेकिन पद नहीं। पार्टी नहीं। उनके पास राजनीतिक अनुभव है। लेकिन नेतृत्व का स्थायी भरोसा नहीं। उनके पास समर्थकों का एक वर्ग है। लेकिन संगठन पर स्वतंत्र नियंत्रण नहीं।

ईशान आनंद कौन हैं

ईशान आनंद, जिन्हें कुछ जगह ईशु आनंद भी कहा जाता है, आकाश के छोटे भाई हैं। उनकी उम्र लगभग 27 वर्ष बताई गई है। उनकी स्कूली शिक्षा नोएडा में हुई और इसके बाद उन्होंने ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टमिंस्टर से विधि की पढ़ाई की। जनवरी 2025 के आसपास वे पहली बार मायावती के सार्वजनिक राजनीतिक कार्यक्रमों में प्रमुखता से दिखाई देने लगे। उस समय भी यह प्रश्न उठा था कि क्या बसपा परिवार के भीतर एक और युवा चेहरे को तैयार कर रही है।

आकाश के विपरीत ईशान अभी चुनावी राजनीति में लगभग अनपरीक्षित हैं। उन्होंने बड़े पैमाने पर सार्वजनिक सभाएं नहीं की हैं, विधानसभा या लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा है, उनके नाम से कोई स्वतंत्र राजनीतिक अभियान नहीं चला है और न ही अभी कोई स्पष्ट समर्थक समूह दिखाई देता है। यही कारण है कि उनकी सबसे बड़ी ताकत भी उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है—वे लगभग कोरी राजनीतिक स्लेट हैं।


सितंबर 2026 में मायावती ने उन्हें मुख्य सेक्टर प्रभारी की भूमिका दी है। उन्हें उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को छोड़कर करीब 15 राज्यों में पार्टी के संगठनात्मक काम की समीक्षा से जोड़ा गया है और उन्हें अपने पिता आनंद कुमार को रिपोर्ट करना है। महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें सीधे उत्तर प्रदेश की राजनीति या चुनाव प्रचार का केंद्रीय चेहरा नहीं बनाया गया है। इससे संकेत मिलता है कि मायावती अभी पहले उन्हें संगठन सीखने, पदाधिकारियों को समझने और पार्टी संरचना में काम करने का अवसर दे रही हैं।

शिक्षा और पेशेवर पृष्ठभूमि का अंतर

दोनों भाइयों की विदेश में शिक्षा हुई है। लेकिन उनकी पढ़ाई अलग क्षेत्रों की है। आकाश की पृष्ठभूमि प्रबंधन की है। इसलिए संगठन, संचार और राजनीतिक प्रस्तुति की दिशा में उनका इस्तेमाल अधिक स्वाभाविक रहा। ईशान की शिक्षा विधि में हुई है। राजनीति में इसका महत्व कम नहीं है—संविधान, आरक्षण, अनुसूचित जाति कानून, सामाजिक न्याय और संस्थागत राजनीति जैसे विषय बसपा की विचारधारा से सीधे जुड़े हैं। लेकिन किसी विश्वविद्यालय की डिग्री से राजनीतिक नेतृत्व सिद्ध नहीं होता। ईशान के मामले में असली परीक्षा यह होगी कि वे बसपा के जमीनी कार्यकर्ता, बूथ संरचना और दलित समाज के बीच कितना सहज संवाद स्थापित कर पाते हैं।

व्यक्तित्व और राजनीतिक शैली में सबसे बड़ा फर्क

आकाश का व्यक्तित्व राजनीतिक रूप से अधिक बहिर्मुखी दिखाई देता है। वे मंच पर बोलते हैं, विरोधियों को सीधे निशाना बनाते हैं, सोशल मीडिया का प्रयोग करते हैं और युवा मतदाता की भाषा में राजनीति करने की कोशिश करते हैं। उनकी राजनीति में कुछ हद तक टकराव और चुनौती का तत्व है। इसी कारण वे चंद्रशेखर आजाद जैसे युवा दलित नेता से प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता रखने वाले बसपा के कुछ गिने-चुने चेहरों में दिखाई देते हैं। जुलाई 2026 में भी पार्टी उन्हें युवा और पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं के बीच दोबारा उतारने की तैयारी कर रही थी।

ईशान का सार्वजनिक व्यक्तित्व अभी उलटा है। वे कम बोले हैं, उनके विचारों का पर्याप्त सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं है और उन्होंने अभी कोई ऐसी राजनीतिक भाषा विकसित नहीं की है जिससे कहा जा सके कि वे आकाश से अधिक या कम आक्रामक होंगे। उन्हें अभी मायावती की नियंत्रित संगठनात्मक व्यवस्था के भीतर आगे बढ़ाया जा रहा है। इसलिए संभव है कि उन्हें पहले अनुशासित संगठनकर्ता के रूप में तैयार किया जाए और बाद में जननेता बनाने की कोशिश हो।

यहीं मायावती की रणनीति समझ में आती है। आकाश को अपेक्षाकृत तेजी से बड़ा राजनीतिक मंच मिला था। संभव है कि ईशान के मामले में मायावती उसी प्रक्रिया को अधिक धीमे और नियंत्रित तरीके से चलाना चाहती हों।

मायावती का भरोसा—दोनों के बीच निर्णायक अंतर

इस समय सबसे बड़ा अंतर यहीं है। आकाश के साथ मायावती का रिश्ता विश्वास, असहमति, पुनर्वास और फिर असहमति के चक्र में फंस गया है। उन्होंने आकाश को उत्तराधिकारी घोषित किया, हटाया, फिर वापस लिया, फिर निष्कासित किया, फिर वापस लिया और अब एक बार फिर कहा है कि उनमें राजनीतिक परिपक्वता की कमी है। और बाहर कर दिया है। सितंबर 2026 के फैसले के बाद आकाश ने पहले अपने सोशल मीडिया परिचय में स्वयं को ‘बसपा कार्यकर्ता’ और फिर ‘बसपा समर्थक’ लिखा। उन्होंने औपचारिक रूप से बसपा छोड़ने की घोषणा नहीं की थी। लेकिन यह परिवर्तन उनकी मौजूदा दूरी को जरूर दिखाता था।


ईशान के साथ अभी ऐसा कोई विवाद नहीं है। इसलिए मायावती के दृष्टिकोण से फिलहाल ईशान अधिक नियंत्रित और कम जोखिम वाला विकल्प दिखाई पड़ सकते हैं। लेकिन इस बात को ‘मायावती ने आकाश को छोड़कर ईशान को उत्तराधिकारी बना दिया’ कहना अभी तथ्य से आगे जाना होगा।

जनाधार में कौन आगे है

यहां आकाश स्पष्ट रूप से आगे हैं। राजनीति में पहचान स्वयं एक पूंजी होती है। आकाश उत्तर प्रदेश में बसपा कार्यकर्ताओं के बीच जाने-पहचाने नाम हैं। वे कई चुनावी सभाएं कर चुके हैं। उनकी तस्वीर, आवाज और राजनीतिक शैली एक हिस्से के मतदाता तक पहुंच चुकी है।

ईशान के पास फिलहाल यह सब नहीं है। यदि आज बसपा समर्थकों के बीच दोनों नामों पर स्वतंत्र जनमत कराया जाए तो आकाश की पहचान स्वाभाविक रूप से कहीं अधिक होगी। लेकिन पहचान और स्वीकार्यता एक चीज नहीं होती। यह भी संभव है कि लगातार पद से हटाए जाने और वापस लाए जाने की प्रक्रिया ने आकाश के बारे में कार्यकर्ताओं के बीच अनिश्चितता पैदा की हो। हाल की रिपोर्टों में बसपा के संगठन के भीतर बार-बार बदलते नेतृत्व को लेकर बेचैनी की बात भी सामने आई है।

दलित युवाओं में कौन अधिक उपयोगी हो सकता है

यह 2027 के लिए बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न है। बसपा के सामने आज केवल भाजपा और सपा की चुनौती नहीं है। उत्तर प्रदेश में दलित युवाओं के एक हिस्से के बीच चंद्रशेखर आजाद और आजाद समाज पार्टी ने भी जगह बनाई है। ऐसे मतदाता को वापस लाने के लिए बसपा को केवल परंपरागत संगठन पर्याप्त नहीं होगा। उसे ऐसा युवा नेता चाहिए जो आक्रामक ढंग से आरक्षण, संविधान, रोजगार, दलित सम्मान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर बोल सके।

इस कसौटी पर अभी आकाश का प्रमाणित रिकॉर्ड ईशान से मजबूत है। आकाश की भाषा और प्रस्तुति युवा मतदाताओं के लिए मायावती की पारंपरिक शैली से अलग है। यही कारण था कि जुलाई-अगस्त 2026 तक बसपा उन्हें फिर युवा चेहरा बनाकर उतार रही थी। ईशान यह भूमिका निभा सकते हैं या नहीं, इसके लिए अभी कोई पर्याप्त प्रमाण नहीं है।

मायावती के लिए आकाश की समस्या क्या है

आकाश की समस्या क्षमता से ज्यादा नियंत्रण और विश्वसनीयता की दिखाई देती है। मायावती की पूरी राजनीति अत्यंत केंद्रीकृत संगठन पर आधारित रही है। बसपा में समानांतर सत्ता-केंद्र परंपरागत रूप से स्वीकार नहीं किए जाते। आकाश जैसे-जैसे स्वतंत्र पहचान बनाते हैं, उतना ही यह प्रश्न पैदा होता है कि क्या वे केवल मायावती के निर्देश पर चलने वाले संगठनकर्ता रहेंगे या अपनी स्वतंत्र राजनीतिक रेखा विकसित करेंगे।

उनके ससुराल पक्ष के प्रभाव को लेकर पहले जो विवाद हुआ, वह इसी प्रश्न को और संवेदनशील बनाता है। इसलिए मायावती की बार-बार कही गई ‘परिपक्वता’ को केवल भाषण की भाषा तक सीमित करके पढ़ना शायद अधूरा होगा। इसमें राजनीतिक अनुशासन, संगठनात्मक नियंत्रण और परिवार के बाहर किसी स्वतंत्र समूह के बनने की आशंका भी शामिल हो सकती है। हालांकि पार्टी के बाहर से इन अंदरूनी कारणों को निर्णायक तथ्य की तरह नहीं कहा जा सकता।

ईशान का सबसे बड़ा लाभ

ईशान के पास फिलहाल कोई राजनीतिक बोझ नहीं है। न विवादित भाषण, न कोई निष्कासन, न कोई स्वतंत्र गुट, न असफल चुनाव और न मायावती के साथ सार्वजनिक मतभेद। इसलिए मायावती उन्हें अपनी शर्तों और अपने संगठनात्मक ढांचे में विकसित कर सकती हैं।

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। राजनीति में शून्य विवाद का अर्थ कई बार शून्य उपलब्धि भी होता है। ईशान अभी उस अवस्था में हैं जहां उनके बारे में न सकारात्मक राजनीतिक निष्कर्ष निकाला जा सकता है न नकारात्मक।

यदि दोनों को 2027 की दृष्टि से अंक दिए जाएं

यह कोई वैज्ञानिक सर्वेक्षण नहीं। बल्कि उपलब्ध राजनीतिक संकेतों पर आधारित तुलनात्मक आकलन है। सार्वजनिक पहचान में आकाश बहुत आगे हैं। चुनावी अनुभव में आकाश आगे हैं। भाषण और जनसभा क्षमता में भी आकाश के पास प्रमाणित बढ़त है। युवा मतदाताओं को तत्काल आकर्षित करने की संभावना में आकाश आगे हैं। संगठनात्मक विवाद से मुक्त होने में ईशान आगे हैं। मायावती का वर्तमान भरोसा ईशान के पक्ष में दिखाई देता है। नियंत्रित ढंग से संगठन में काम करने की संभाव्यता फिलहाल ईशान के पक्ष में है। स्वतंत्र जनाधार में भले ही आकाश बहुत आगे हों।

इसलिए आज चुनाव हो तो राजनीतिक उपयोगिता में आकाश ईशान से आगे होंगे। लेकिन मायावती के संगठनात्मक विश्वास की कसौटी पर ईशान आगे दिखाई दे रहे हैं।

क्या ईशान आकाश की जगह ले सकते हैं?

तुरंत नहीं। किसी व्यक्ति को संगठनात्मक पद देना और किसी बड़े राजनीतिक चेहरे को प्रतिस्थापित करना अलग बातें हैं। आकाश ने आठ-नौ वर्षों में जो पहचान बनाई है, वह ईशान को कुछ महीनों में नहीं मिल सकती।

लेकिन अगले एक-दो वर्षों में तीन परिस्थितियां यह तस्वीर बदल सकती हैं। यदि ईशान को लगातार राज्यों की जिम्मेदारी मिलती है, वे कार्यकर्ताओं के बीच स्वीकार्य होते हैं और मायावती उन्हें उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रचार में उतारती हैं, तब वे वास्तविक विकल्प बन सकते हैं। यदि दूसरी ओर आकाश और मायावती का संबंध फिर सुधर जाता है, तो आकाश अपनी पहचान के कारण बहुत जल्दी वापस केंद्रीय भूमिका में आ सकते हैं। और तीसरी संभावना यह भी है कि मायावती दोनों भाइयों को अलग-अलग जिम्मेदारियों में रखें—आकाश जनसभा और युवा राजनीति का चेहरा, ईशान संगठन का चेहरा। बसपा के लिए शायद यही सबसे उपयोगी मॉडल भी हो सकता है।

क्या यह केवल आकाश पर दबाव की रणनीति है?

इसे पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। मायावती पहले भी आकाश को हटाकर फिर वापस ला चुकी हैं। सितंबर 2026 की स्थिति तीसरी ऐसी बड़ी घटना है। इसलिए ईशान का उभार दो उद्देश्यों को एक साथ पूरा कर सकता है—बसपा के लिए दूसरा युवा विकल्प तैयार करना और आकाश को यह संदेश देना कि परिवार में उनकी भूमिका अपरिहार्य नहीं है।

लेकिन ईशान को वास्तविक संगठनात्मक जिम्मेदारी मिल चुकी है, इसलिए इसे केवल दबाव की चाल कहना भी उचित नहीं होगा। मायावती वास्तव में उनके राजनीतिक प्रशिक्षण की शुरुआत करती हुई दिखाई देती हैं।

एक बड़ा राजनीतिक विरोधाभास

यहां मायावती स्वयं एक कठिन स्थिति में हैं। सितंबर की बैठक में उन्होंने कांशीराम के उस सिद्धांत का उल्लेख किया कि परिवार और रिश्तेदार पार्टी कार्य में सहयोग कर सकते हैं। लेकिन उन्हें सत्ता और पद का लाभ देने से बचना चाहिए। इसके लगभग साथ ही उनके दूसरे भतीजे को संगठनात्मक जिम्मेदारी मिल रही है। इसलिए आने वाले समय में विपक्ष निश्चित रूप से बसपा से यह प्रश्न पूछ सकता है कि पार्टी में नए नेतृत्व का चयन संगठन से हो रहा है या परिवार से। यह सवाल बसपा के लिए इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि कांशीराम की मूल राजनीति परिवारवाद-विरोधी संगठनात्मक संस्कृति पर टिकी थी।

2027 में बसपा के लिए कौन अधिक उपयोगी?

यदि लक्ष्य केवल संगठन को नियंत्रित रखना है तो ईशान अधिक सुविधाजनक विकल्प हो सकते हैं। यदि लक्ष्य तुरंत चुनावी माहौल बनाना, युवा दलितों के बीच मुकाबला करना और पार्टी को सार्वजनिक चर्चा में वापस लाना है तो आकाश की उपयोगिता इस समय अधिक है।

यही मायावती की दुविधा भी है। उन्हें ऐसा युवा चेहरा चाहिए जो बसपा की उम्रदराज होती नेतृत्व-छवि को बदल सके। लेकिन वह चेहरा इतना स्वतंत्र भी न हो जाए कि संगठन में समानांतर शक्ति-केंद्र बन जाए।

और यही कारण है कि आकाश आनंद राजनीतिक रूप से अधिक तैयार, जबकि ईशान आनंद संगठनात्मक रूप से अधिक सुरक्षित विकल्प दिखाई देते हैं।

सितंबर 2026 की स्थिति में मैं ईशान आनंद को आकाश आनंद का पूर्ण प्रतिस्थापन नहीं मानता। अभी वे संभावित विकल्प हैं, उत्तराधिकारी नहीं। आकाश के राजनीतिक भविष्य को भी समाप्त मानना बहुत जल्दबाजी होगी, क्योंकि मायावती उन्हें पहले भी कई बार हटाकर वापस ला चुकी हैं।

लेकिन इस बार एक बड़ा फर्क है—पहले आकाश को हटाने पर परिवार के भीतर तैयार युवा विकल्प सामने नहीं था, अब ईशान मौजूद हैं। इसलिए इस बार आकाश पर दबाव पहले की तुलना में कहीं अधिक है।

मेरे आकलन में 2027 से पहले देखने वाली सबसे महत्वपूर्ण घटना यह नहीं होगी कि ईशान को अगला कौन-सा पद मिलता है, बल्कि यह होगी कि क्या मायावती उन्हें उत्तर प्रदेश में स्वतंत्र जनसभाएं करने भेजती हैं। जिस दिन ऐसा होता है, उस दिन मानना चाहिए कि बसपा वास्तव में ईशान को आकाश के राजनीतिक विकल्प के रूप में जांच रही है। अभी तक उन्हें मुख्यतः संगठनात्मक जिम्मेदारी दी गई है, इसलिए फैसला खुला हुआ है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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