TRENDING TAGS :
Mayawati News: मायावती के बाद बसपा किसकी? आकाश आनंद vs ईशान आनंद, 2027 का बड़ा सवाल
Mayawati BSP Uttaradhikari: मायावती के बाद बसपा की कमान किसके हाथ होगी? जानिए आकाश आनंद और ईशान आनंद के बीच अंतर, बसपा के उत्तराधिकार की चुनौती, 2027 यूपी चुनाव और संगठन से उभरने वाले नए दलित चेहरे की संभावनाएं।
Mayawati BSP Uttaradhikari | Akash Anand VS Ishaan Anand
Mayawati BSP Uttaradhikari Kaun Hoga: बहुजन समाज पार्टी के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न केवल यह नहीं है कि वह 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कितनी सीटें जीतेगी। उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि मायावती के बाद बसपा का नेतृत्व किसके हाथ में जाएगा और क्या वह व्यक्ति कांशीराम-मायावती द्वारा खड़े किए गए सामाजिक गठबंधन को बचा पाएगा। सितंबर 2026 में आकाश आनंद को एक बार फिर पार्टी से बाहर किये जाने और उनके छोटे भाई ईशान आनंद को संगठन में महत्वपूर्ण दायित्व दिए जाने के बाद यह प्रश्न और गंभीर हो गया है। ईशान को अभी मायावती का उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया गया है, इसलिए उन्हें सीधे आकाश का स्थानापन्न मानना तथ्यात्मक रूप से जल्दबाजी होगी। लेकिन घटनाक्रम इतना महत्वपूर्ण अवश्य है कि अब बसपा के भविष्य को तीन स्तरों पर देखना चाहिए—मायावती का उत्तराधिकारी कौन होगा, पार्टी का संगठन कौन संभालेगा और मतदाताओं को आकर्षित करने वाला जननेता कौन होगा। जरूरी नहीं कि ये तीनों भूमिकाएं अंततः एक ही व्यक्ति के पास जाएं।
कांशीराम से मायावती तक सत्ता का हस्तांतरण परिवार के भीतर नहीं हुआ था
बसपा के वर्तमान उत्तराधिकार संकट को समझने के लिए कांशीराम और मायावती के संबंध को समझना जरूरी है। कांशीराम ने BAMCEF, डीएस-4 और अंततः 1984 में बहुजन समाज पार्टी के माध्यम से जिस राजनीतिक परियोजना को खड़ा किया, उसका मूल आधार परिवार नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन था। मायावती उनकी पुत्री, बहन या रिश्तेदार नहीं थीं। वे दिल्ली में अध्यापिका थीं और कांशीराम ने उनमें नेतृत्व की क्षमता देखकर उन्हें तैयार किया। धीरे-धीरे संगठन, चुनाव, जनसभा और राजनीतिक निर्णय की जिम्मेदारियां मिलीं और अंततः मायावती कांशीराम की निर्विवाद राजनीतिक उत्तराधिकारी बनीं। यही कारण है कि बसपा का नेतृत्व हस्तांतरण भारतीय राजनीति के उन दुर्लभ उदाहरणों में था जिसमें उत्तराधिकारी रक्त-संबंध से नहीं बल्कि राजनीतिक चयन और प्रशिक्षण से आया।
आज बसपा जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां स्थिति बिल्कुल अलग है। मायावती के बाद जिन दो युवा चेहरों की सबसे ज्यादा चर्चा है, आकाश आनंद और ईशान आनंद, दोनों उनके भाई आनंद कुमार के पुत्र हैं। इसलिए भविष्य में यदि इन्हीं में से कोई बसपा का सर्वोच्च नेता बनता है तो पार्टी को यह समझाना पड़ेगा कि कांशीराम की गैर-पारिवारिक उत्तराधिकार परंपरा से यह बदलाव क्यों और कैसे हुआ। विपक्ष भी इसे परिवारवाद के प्रश्न से जोड़ सकता है। यह बसपा के लिए सामान्य राजनीतिक आरोप से अधिक गंभीर प्रश्न होगा क्योंकि कांशीराम की राजनीतिक संस्कृति में संगठन को परिवार से ऊपर रखने पर विशेष जोर था।
लेकिन समस्या केवल उत्तराधिकारी चुनने की नहीं, बसपा को दोबारा खड़ा करने की है
मायावती के सामने आज वह बसपा नहीं है जो उन्हें कांशीराम से मिली थी और न ही वह बसपा है जो 2007 में उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई थी। 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 206 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। इसके बाद पार्टी का चुनावी ग्राफ लगातार नीचे आया। 2012 में सत्ता चली गई, 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी, 2017 के विधानसभा चुनाव में केवल 19 सीटें मिलीं। 2019 में सपा के साथ गठबंधन करके बसपा ने लोकसभा की 10 सीटें अवश्य जीतीं। लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी केवल एक सीट पर सिमट गई। 2024 के लोकसभा चुनाव में फिर उसका खाता नहीं खुला। चुनाव आयोग के परिणामों के अनुसार 2024 में उत्तर प्रदेश में बसपा का मत प्रतिशत लगभग 9.39 प्रतिशत रह गया। इसका अर्थ यह है कि बसपा समाप्त नहीं हुई है—उसके पास अब भी लाखों मतदाता हैं—लेकिन उसका सामाजिक आधार और चुनावी प्रभाव गंभीर रूप से सिकुड़ा है।
इसलिए मायावती का उत्तराधिकारी केवल पार्टी कार्यालय संभालने वाला व्यक्ति नहीं हो सकता। उसे कम-से-कम चार काम करने होंगे—जाटव मतदाताओं के केंद्रीय आधार को बनाए रखना, गैर-जाटव दलितों को वापस जोड़ना, अत्यंत पिछड़े और दूसरे वंचित समुदायों में बसपा का पुराना विस्तार पुनर्जीवित करना और सबसे कठिन काम, उस युवा दलित मतदाता को आकर्षित करना जो मायावती के उभार और 2007 की बसपा सरकार की स्मृति से व्यक्तिगत रूप से जुड़ा ही नहीं है।
यहीं मायावती के उत्तराधिकारी की असली परीक्षा शुरू होती है।
पहला मॉडल
आकाश आनंद इस समय मायावती के बाद बसपा के सबसे अधिक पहचाने जाने वाले युवा नेता रहे हैं। दिसंबर 2023 में मायावती ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित भी किया था। उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक बनाया गया, दूसरे राज्यों में संगठन की जिम्मेदारी मिली और 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें बड़े पैमाने पर प्रचार में उतारा गया। उनकी सभाओं में बसपा की परंपरागत भाषा की तुलना में अधिक आक्रामक स्वर दिखाई दिया। वे भाजपा और सरकार पर सीधे प्रहार करते रहे और बेरोजगारी, शिक्षा, संविधान तथा दलित अधिकार जैसे विषयों पर युवाओं से संवाद बनाने की कोशिश करते दिखाई दिए।
यही आकाश की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी रही है। बसपा को आज जिस चीज की सर्वाधिक कमी है, वह नया जननेता है। मायावती का अपना समर्थक आधार है। लेकिन नई पीढ़ी के बीच पार्टी को ऐसा चेहरा चाहिए जो डिजिटल माध्यम, जनसभा और सीधे राजनीतिक संघर्ष तीनों जगह उपस्थित रहे। आकाश इस दिशा में दूसरे उपलब्ध बसपा नेताओं की तुलना में काफी आगे निकल चुके हैं।
लेकिन आकाश के साथ एक बहुत गंभीर समस्या भी जुड़ी है—मायावती का अस्थिर विश्वास। 2024 में उन्हें उत्तराधिकारी और राष्ट्रीय समन्वयक के पद से हटाया गया, बाद में वापस लिया गया। मार्च 2025 में फिर पदों से हटाकर पार्टी से निष्कासित किया गया और फिर वापसी हुई। मई 2025 में उन्हें मुख्य राष्ट्रीय समन्वयक बनाया गया और सितंबर 2026 में फिर उस पद से हटा दिया गया। पार्टी से बाहर कर दिया गया। मायावती ने इस बार भी राजनीतिक परिपक्वता का प्रश्न उठाया।
इसलिए आकाश के सामने वास्तविक समस्या लोकप्रियता की नहीं बल्कि विश्वसनीय उत्तराधिकार की है। यदि पार्टी का सर्वोच्च नेता बार-बार अपने घोषित उत्तराधिकारी को हटाता और वापस लाता है तो संगठन के भीतर भी यह भ्रम पैदा होता है कि उसके निर्देशों को कितनी स्थायी राजनीतिक शक्ति प्राप्त है।
फिर भी यदि प्रश्न केवल यह हो कि 2027 में बसपा को चुनावी मैदान में तुरंत किस युवा चेहरे से सबसे अधिक लाभ मिल सकता है, तो उपलब्ध विकल्पों में आकाश अभी सबसे आगे दिखाई देते हैं। उन्हें राजनीतिक रूप से तैयार करने में वर्षों लग चुके हैं और उनके पास चुनावी सभाओं, मीडिया तथा संगठन का अनुभव है। ईशान को यह दूरी अभी तय करनी है।
दूसरा मॉडल — ईशान आनंद को धीरे-धीरे आकाश के विकल्प के रूप में तैयार करना
सितंबर 2026 के घटनाक्रम के बाद यह संभावना पहली बार गंभीरता से सामने आई है। ईशान आनंद को मुख्य सेक्टर प्रभारी बनाकर करीब 15 राज्यों के संगठनात्मक काम की समीक्षा से जोड़ा गया है। यह जिम्मेदारी छोटी नहीं है। लेकिन इसका स्वरूप महत्वपूर्ण है—उन्हें सीधे उत्तर प्रदेश में मायावती के बाद नंबर दो नेता घोषित नहीं किया गया। बल्कि संगठन सीखने का रास्ता दिया गया है।
यह मायावती की सोची-समझी रणनीति भी हो सकती है। आकाश को अपेक्षाकृत जल्दी सार्वजनिक राजनीति के अग्रभाग में लाया गया था। ईशान के मामले में मायावती संभवतः उलटा क्रम अपना रही हैं—पहले संगठन, उसके बाद राजनीतिक मंच और अंत में यदि वे सफल होते हैं तो नेतृत्व।
ईशान की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उनके साथ अभी कोई राजनीतिक विवाद नहीं जुड़ा है। वे मायावती के साथ टकराव की किसी कहानी का हिस्सा नहीं रहे, उनका कोई स्वतंत्र राजनीतिक समूह नहीं है और उनके बारे में संगठनात्मक अनुशासन का प्रश्न भी अभी नहीं उठा है। मायावती जैसी अत्यंत केंद्रीकृत नेतृत्व शैली वाली पार्टी में यह बड़ी विशेषता हो सकती है।
लेकिन ईशान की सबसे बड़ी कमजोरी उससे भी बड़ी है—उनकी अभी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान नहीं है। उत्तर प्रदेश के गांव में बसपा समर्थक आकाश आनंद का नाम पहचान सकता है, ईशान के साथ अभी वैसी स्थिति नहीं है। उन्होंने न कोई बड़ा चुनाव लड़ा है, न बड़े पैमाने पर राजनीतिक रैलियों की श्रृंखला की है और न ऐसा कोई सार्वजनिक संघर्ष किया है जिसके कारण दलित युवाओं के बीच उनकी स्वतंत्र छवि बनी हो।
इसलिए ईशान को उत्तराधिकारी बनाना संभव तो है, लेकिन इसके लिए मायावती को उन्हें तेजी से राजनीतिक मैदान में उतारना पड़ेगा। यदि 2026 के अंत या 2027 के प्रारंभ में वे उत्तर प्रदेश में लगातार जिलों का दौरा करने लगें, कैडर सम्मेलन करने लगें और बाद में स्वतंत्र जनसभाएं करने लगें तो यह बड़ा संकेत होगा कि उनका संगठनात्मक प्रशिक्षण उत्तराधिकार परियोजना में बदल रहा है।
तीसरा मॉडल —
मेरे आकलन में यह बसपा के लिए सबसे दिलचस्प और संभवतः सबसे उपयोगी व्यवस्था हो सकती है। भारतीय राजनीति में यह आवश्यक नहीं कि संगठन चलाने वाला और सबसे बड़ा जननेता एक ही व्यक्ति हो। यदि मायावती दोनों भाइयों की अलग-अलग क्षमताओं का इस्तेमाल करें तो आकाश को युवा मतदाताओं, चुनाव प्रचार और सार्वजनिक राजनीतिक संघर्ष की जिम्मेदारी दी जा सकती है, जबकि ईशान संगठन, राज्यों की समीक्षा, पदाधिकारियों और पार्टी संरचना पर काम कर सकते हैं।पर फिलहाल इस चैप्टर्स पर मायावती ने विराम ही लगा दिया है।
इस व्यवस्था का एक बड़ा लाभ होगा। आकाश की बनी हुई राजनीतिक पहचान नष्ट नहीं होगी और ईशान को बिना अनावश्यक प्रतिस्पर्धा के संगठन में विकसित होने का अवसर मिलेगा। मायावती सर्वोच्च निर्णयकर्ता बनी रह सकती हैं और धीरे-धीरे यह देख सकती हैं कि दोनों में किसकी क्षमता किस क्षेत्र में अधिक है।
लेकिन इस मॉडल का खतरा भी बहुत बड़ा है। यदि भविष्य में दोनों भाइयों के आसपास अलग-अलग समूह बनने लगे तो बसपा में दो शक्ति-केंद्र पैदा हो सकते हैं। जिस पार्टी का संगठन दशकों से एक सर्वोच्च नेतृत्व के आदेश पर चलता रहा हो, उसके लिए दो समानांतर उत्तराधिकारियों की स्थिति अस्थिरता पैदा कर सकती है। इसलिए यह व्यवस्था मायावती की उपस्थिति तक चल सकती है, लेकिन उनके बाद नेतृत्व का अंतिम प्रश्न फिर उठेगा।
चौथा और सबसे महत्वपूर्ण मॉडल — परिवार से बाहर किसी जमीनी दलित नेता का उदय
यह संभावना अभी सबसे कम दिखाई देती है, लेकिन बसपा के मूल इतिहास के सबसे निकट यही मॉडल है। कांशीराम ने मायावती को परिवार से नहीं चुना था। यदि मायावती भी किसी ऐसे युवा दलित, पिछड़े या बहुजन नेता को तैयार करें जो दस-पंद्रह वर्षों से संगठन में काम कर रहा हो, जनता में स्वीकार्यता रखता हो और बसपा की वैचारिक राजनीति समझता हो तो यह कांशीराम मॉडल की वास्तविक पुनरावृत्ति होगी।
समस्या यह है कि आज बसपा में ऐसा कोई राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट चेहरा दिखाई नहीं देता।
यही पिछले वर्षों में बसपा की सबसे गंभीर संगठनात्मक कमजोरी भी रही है। पार्टी ने एक मजबूत दूसरी पंक्ति तैयार नहीं की, या जो नेता प्रभावशाली हुए उनमें से अनेक समय के साथ बाहर चले गए। स्वामी प्रसाद मौर्य, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा, राम अचल राजभर, लालजी वर्मा जैसे अनेक प्रभावशाली नाम अलग-अलग समय में बसपा से अलग हुए। इन सभी की राजनीति और परिस्थितियां अलग थीं, इसलिए उन्हें एक ही कारण से जोड़ना उचित नहीं होगा। लेकिन सामूहिक परिणाम यह हुआ कि मायावती के नीचे स्वतंत्र जनाधार वाले नेताओं की परत लगातार कमजोर होती गई।
इसका परिणाम अब उत्तराधिकार के समय दिखाई दे रहा है। पार्टी के पास लाखों मतदाता हैं, पुराना संगठन है, एक विशिष्ट राजनीतिक पहचान है, लेकिन मायावती के बाद स्वाभाविक रूप से स्वीकार किया जाने वाला दूसरा राष्ट्रीय नेता नहीं है।
सतीश चंद्र मिश्र का विकल्प क्यों अलग है
बसपा की राजनीति में Satish Chandra Mishra लंबे समय तक अत्यंत महत्वपूर्ण रहे हैं। विशेषकर 2007 के सामाजिक गठबंधन में ब्राह्मण समाज तक पहुंच बनाने में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही। लेकिन उन्हें मायावती के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में देखना अलग प्रश्न है। बसपा का सर्वोच्च नेतृत्व ऐतिहासिक रूप से दलित राजनीतिक प्रतिनिधित्व और बहुजन आंदोलन की वैचारिक वैधता से जुड़ा हुआ है। इसलिए किसी गैर-दलित नेता को मायावती के बाद बसपा का सर्वोच्च जननेता बनाना पार्टी के मूल सामाजिक आधार के लिए स्वीकार करना कठिन हो सकता है।
उनकी भूमिका नेतृत्व के बजाय रणनीतिक सलाहकार, संगठनात्मक सेतु और सामाजिक गठबंधन निर्माता के रूप में अधिक स्वाभाविक दिखाई देती है। इसलिए वास्तविक उत्तराधिकार की दौड़ में आकाश और ईशान की तुलना उनसे सीधे करना उचित नहीं होगा।
असली चुनौती चंद्रशेखर आजाद हैं
उत्तराधिकार की इस पूरी बहस में चंद्रशेखर आजाद को नजरअंदाज करना बड़ी भूल होगी। बसपा की लड़ाई अब केवल भाजपा और सपा से सीटों की नहीं है। उसके सामने दलित राजनीति के भीतर नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा भी खड़ी हो चुकी है।
चंद्रशेखर आजाद की राजनीति मायावती से अलग प्रकार की है। वे सड़क पर आंदोलन, प्रत्यक्ष संघर्ष, सोशल मीडिया और युवाओं से सीधा संवाद करते हैं। 2024 में नगीना लोकसभा सीट पर उनकी जीत ने उन्हें केवल आंदोलनकारी नहीं रहने दिया, बल्कि निर्वाचित राजनीतिक नेता बना दिया। चुनाव आयोग के परिणाम के अनुसार उन्हें नगीना में 5.12 लाख से अधिक मत मिले और उन्होंने भाजपा प्रत्याशी को डेढ़ लाख से अधिक मतों से हराया।
यही वह जगह है जहां आकाश आनंद की उपयोगिता बसपा के लिए विशेष हो जाती है। चंद्रशेखर की राजनीतिक शैली का मुकाबला ईशान जैसे अभी संगठन सीख रहे नेता से तुरंत नहीं किया जा सकता। इसके लिए ऐसा व्यक्ति चाहिए जो मंच, सोशल मीडिया और युवा दलित राजनीति में सक्रिय हो। आकाश इस भूमिका के ज्यादा करीब हैं।
लेकिन मायावती के सामने कठिन प्रश्न यह है—क्या अब वे आकाश को इतनी स्वतंत्रता देने को तैयार हैं जितनी स्वतंत्रता किसी वास्तविक जननेता को विकसित होने के लिए चाहिए?
बसपा के सामने केवल जाटव मत बचाने का सवाल नहीं
एक और गहरी समस्या है। बसपा की ऐतिहासिक सफलता केवल जाटव मतदाताओं के कारण नहीं बनी थी। कांशीराम और बाद में मायावती ने दलितों के साथ पिछड़ों, मुसलमानों और विभिन्न चरणों में ब्राह्मणों तथा दूसरी जातियों को जोड़कर चुनावी गठबंधन बनाया। 2007 का बहुमत इसी विस्तार का चरम था।
आज यदि बसपा केवल अपने मूल जाटव आधार को बचाने वाली पार्टी बनकर रह जाती है तो उत्तर प्रदेश की प्रथम पंक्ति की सत्ता-प्रतियोगिता में वापस आना बहुत कठिन होगा। अगले नेता को ‘दलित नेता’ से आगे बढ़कर ‘बहुजन गठबंधन का नेता’ बनना होगा।
यहीं आकाश और ईशान दोनों अभी अधूरे हैं। आकाश ने सार्वजनिक पहचान बनाई है, लेकिन अभी यह साबित नहीं किया कि वे गैर-जाटव दलितों, पिछड़ों, मुसलमानों और दूसरी सामाजिक श्रेणियों को जोड़कर नया बसपा गठबंधन बना सकते हैं। ईशान ने तो अभी इस परीक्षा में प्रवेश ही नहीं किया है।
2027 मायावती के उत्तराधिकारी का चुनाव नहीं, उसकी परीक्षा हो सकता है
2027 का विधानसभा चुनाव मायावती के बाद बसपा का अंतिम उत्तराधिकारी तय करने के बजाय संभावित उत्तराधिकारियों की परीक्षा बन सकता है। मायावती स्वयं अभी पार्टी की निर्विवाद नेता हैं। इसलिए तत्काल सत्ता हस्तांतरण की आवश्यकता नहीं है।
लेकिन 2027 तक तीन संकेत बहुत ध्यान से देखने चाहिए।
पहला, आकाश आनंद को दोबारा चुनाव प्रचार में बड़ी जिम्मेदारी मिलती है या नहीं। यदि कुछ महीनों बाद उनकी फिर वापसी होती है तो यह सिद्ध होगा कि मायावती अभी भी उन्हें पूरी तरह छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
दूसरा, ईशान आनंद की जिम्मेदारी संगठन तक सीमित रहती है या उन्हें उत्तर प्रदेश में स्वतंत्र जनसभाएं करने भेजा जाता है। यह सबसे निर्णायक संकेत होगा।
तीसरा, विधानसभा प्रत्याशियों के चयन में दोनों भाइयों की भूमिका क्या रहती है। वास्तविक राजनीतिक शक्ति भाषण से नहीं बल्कि टिकट और संगठनात्मक नियुक्तियों पर प्रभाव से पहचानी जाती है।
यदि आकाश सभाएं कर रहे हों, ईशान संगठन संभाल रहे हों लेकिन उम्मीदवारों पर अंतिम निर्णय केवल मायावती का हो, तो उत्तराधिकार अभी खुला रहेगा। यदि इनमें से किसी एक को टिकट वितरण और संगठनात्मक नियुक्तियों में वास्तविक अधिकार मिलने लगे, तो तस्वीर बदल जाएगी।
मायावती की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल क्या हो सकती है?
सबसे बड़ा खतरा गलत उत्तराधिकारी चुनना भी नहीं है। उससे बड़ा खतरा है उत्तराधिकार को बहुत लंबे समय तक अनिश्चित रखना। उत्तराधिकार को लेकर शह और मात का खेल खेलना।
बार-बार किसी युवा नेता को ऊपर उठाना, फिर हटाना, वापस लाना और फिर हटाना संगठन को यह संदेश देता है कि उसके पास स्थायी अधिकार नहीं है। इससे कार्यकर्ता उसके साथ राजनीतिक भविष्य जोड़ने से हिचकता है। दूसरी ओर अचानक किसी अनुभवहीन व्यक्ति को आगे कर देने पर कार्यकर्ता उसे केवल पारिवारिक नियुक्ति मान सकता है।
मायावती के सामने इसलिए कठिन संतुलन है। उत्तराधिकारी को समय रहते वैधता भी देनी होगी और उसे पार्टी में नीचे से ऊपर तक काम करके अपनी स्वीकार्यता भी अर्जित करनी होगी।
आकाश बनाम ईशान — आज कौन कहां खड़ा है?
सितंबर 2026 की स्थिति में तस्वीर काफी स्पष्ट है। जननेता बनने की संभावना में आकाश आगे हैं। संगठन के वर्तमान भरोसे में ईशान आगे हैं। चुनावी अनुभव में आकाश बहुत आगे हैं। मायावती के साथ विवादरहित संबंध में ईशान आगे हैं। युवाओं से तत्काल संवाद की क्षमता में आकाश आगे हैं। पर इन्हें मायावती फिलहाल ख़ारिज कर चुकी हैं। दीर्घकालीन संगठनात्मक प्रशिक्षण के लिए ईशान के पास अब अवसर है। स्वतंत्र राजनीतिक पहचान आकाश के पास है, ईशान को अभी बनानी है।
इसलिए अभी ईशान को आकाश का उत्तराधिकारी कहना गलत होगा। अधिक सही शब्द है—वैकल्पिक उत्तराधिकार की तैयारी।और यदि आकाश अलग रास्ता चुनते हैं?
यह सबसे संवेदनशील संभावना है। अभी इसका कोई प्रमाण नहीं है कि आकाश नई पार्टी बनाने या किसी दूसरी पार्टी में जाने की तैयारी कर रहे हैं। इसलिए ऐसी बात को तथ्य की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
लेकिन यदि भविष्य में आकाश बसपा से स्थायी रूप से अलग होते हैं तो उनके सामने भी आसान रास्ता नहीं होगा। मायावती के भतीजे के रूप में मिली पहचान और स्वयं का स्वतंत्र सामाजिक जनाधार दो अलग बातें हैं। उन्हें सिद्ध करना होगा कि लोग उन्हें आकाश आनंद के कारण चाहते हैं, केवल बसपा और मायावती के कारण नहीं।
और बसपा के लिए भी ऐसा विभाजन नुकसानदेह होगा, क्योंकि दलित युवाओं के राजनीतिक क्षेत्र में पहले ही चंद्रशेखर आजाद मौजूद हैं। तीसरा युवा दलित राजनीतिक केंद्र बनना बसपा के मूल मतों के और विभाजन का कारण बन सकता है।
मायावती के बाद बसपा का संकट व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था का है
बसपा की वास्तविक समस्या का उत्तर केवल इस सवाल में नहीं मिलेगा कि आकाश या ईशान?
कांशीराम ने संगठन बनाया और संगठन के भीतर मायावती को विकसित किया। मायावती ने उस संगठन को सत्ता तक पहुंचाया, चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं और 2007 में पूर्ण बहुमत हासिल किया। लेकिन अब तीसरी पीढ़ी के सामने चुनौती अलग है। उसे विरासत में तैयार होती हुई पार्टी नहीं, बल्कि सिकुड़ती हुई पार्टी को पुनर्जीवित करने की जिम्मेदारी मिलने वाली है।
इस कसौटी पर देखें तो फिलहाल आकाश आनंद ईशान से अधिक तैयार राजनीतिक नेता हैं, लेकिन मायावती का स्थायी विश्वास अर्जित नहीं कर पाए हैं। ईशान आनंद मायावती के वर्तमान भरोसे और संगठनात्मक प्रशिक्षण में आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन उन्होंने अभी जननेता होने का कोई प्रमाण नहीं दिया है। सतीश चंद्र मिश्र सहयोगी और रणनीतिक भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन बसपा की सामाजिक संरचना को देखते हुए उनके सर्वोच्च उत्तराधिकारी बनने की संभावना स्वाभाविक नहीं लगती। परिवार के बाहर से किसी नए दलित नेता का उदय कांशीराम मॉडल के सबसे करीब होगा, लेकिन फिलहाल ऐसा कोई स्थापित राष्ट्रीय चेहरा दिखाई नहीं देता।
इसलिए बसपा के लिए संभवतः सबसे प्रभावी रास्ता यह हो सकता है कि 2027 तक उत्तराधिकार की अंतिम घोषणा करने के बजाय आकाश और ईशान दोनों को अलग-अलग कसौटियों पर परखा जाए—आकाश को जनता और चुनावी मैदान में, ईशान को संगठन में। फिर परिणाम से तय हो कि नेतृत्व किसमें है।
लेकिन इसमें भी एक शर्त है। उत्तराधिकारी मायावती द्वारा केवल बनाया नहीं जा सकता, उसे बसपा के कार्यकर्ताओं और मतदाताओं द्वारा स्वीकार भी किया जाना चाहिए। कांशीराम ने मायावती को अवसर दिया था, लेकिन मायावती ने स्वयं सड़क, संगठन और चुनाव के लंबे संघर्ष से अपना नेतृत्व स्थापित किया था। यही कसौटी आकाश और ईशान दोनों पर लागू होगी।
और इसी कारण अगले कुछ महीनों में बसपा की सबसे महत्वपूर्ण खबर कोई गठबंधन या बयान नहीं होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि मायावती आकाश को दोबारा मैदान में उतारती हैं या नहीं, और ईशान को संगठन की बंद संरचना से निकालकर पहली बार जनता के बीच स्वतंत्र राजनीतिक परीक्षा के लिए भेजती हैं या नहीं।
यहीं से पता चलेगा कि बसपा में इस समय केवल पद बदले जा रहे हैं, या सचमुच मायावती के बाद की बसपा तैयार की जा रही है।


