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लाल, भगवा या नीला… यूपी की सियासत में रंगों का खेल कितना बड़ा?
UP Politics : यूपी की राजनीति में रंग क्यों हैं इतने महत्वपूर्ण? क्या सच में रंग तय करता है वोट बैंक?
UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव सिर्फ भाषणों, नारों और घोषणापत्रों से नहीं लड़े जाते। यहां राजनीति की एक अपनी रंगीन भाषा भी है। किसी नेता के सिर पर लाल टोपी दिख जाए तो राजनीतिक पहचान का अंदाजा लग जाता है। भगवा गमछा या टोपी दिखाई दे तो दूसरा राजनीतिक खांचा सामने आता है। नीला रंग दिखे तो बहुजन राजनीति की याद आती है। यानी यूपी की सियासत में रंग अब सिर्फ रंग नहीं रह गए हैं। वे राजनीतिक पहचान का शॉर्टकट बन चुके हैं।
लेकिन सवाल है क्या सचमुच रंग वोट बैंक तय करते हैं? जवाब है सीधे तौर पर नहीं। लेकिन रंग वोट बैंक की पहचान और राजनीतिक लामबंदी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
लाल टोपी से नीली पगड़ी तक... रंग कैसे बना सियासी पहचान?
2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान यूपी विधानसभा में यह रंगों की राजनीति खुलकर दिखाई दी। समाजवादी पार्टी के विधायक लाल टोपी में नजर आए तो BJP विधायकों ने भगवा टोपी पहनी। एक मीडिया रिपोर्ट ने उस समय इसे यूपी की राजनीति में राजनीतिक पहचान के एक नए प्रदर्शन के रूप में दर्ज किया था।
लाल रंग समाजवादी राजनीति की सार्वजनिक पहचान से जुड़ चुका है। भगवा BJP की राजनीतिक ब्रांडिंग का प्रमुख हिस्सा है। वहीं BSP की पहचान लंबे समय से नीले रंग से जुड़ी रही है। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में BSP का चुनाव चिन्ह हाथी दर्ज है। यानी रंग और चुनाव चिन्ह मिलकर पार्टी की ऐसी दृश्य पहचान बनाते हैं जिसे मतदाता कुछ सेकंड में पहचान सकता है।
आखिर रंग इतना असरदार क्यों है?
इसका सबसे बड़ा कारण है पहचान। राजनीति में हर पार्टी चाहती है कि उसका संदेश भीड़ में अलग दिखाई दे। कल्पना कीजिए किसी चुनावी रैली में हजारों लोग खड़े हैं। मंच दूर है और भाषण सुनाई नहीं दे रहा। लेकिन अगर हजारों लोगों के सिर पर एक ही रंग की टोपी हो या हाथों में एक ही रंग के झंडे हों, तो राजनीतिक पहचान तुरंत बन जाती है। यही रंग की ताकत है। यह पार्टी को एक visual identity देता है। और चुनावी राजनीति में visual identity सिर्फ रैली तक सीमित नहीं रहती। पोस्टर, झंडे, सोशल मीडिया, प्रचार वाहन, कपड़े, टोपी और मंच की सजावट हर जगह वही रंग दोहराया जाता है।
लेकिन क्या नीला मतलब BSP और लाल मतलब SP?
इतना सरल गणित नहीं है। किसी रंग का इस्तेमाल करने वाला हर व्यक्ति उस पार्टी का मतदाता हो, यह जरूरी नहीं। इसी तरह किसी पार्टी के पारंपरिक समर्थक भी हमेशा उसी रंग के कपड़े पहनें, यह जरूरी नहीं। इसलिए रंग को वोट बैंक का प्रमाण नहीं माना जा सकता। रंग को ज्यादा सही तरीके से समझना हो तो उसे राजनीतिक पहचान का संकेत कहना होगा।
BSP और नीला रंग
बहुजन राजनीति के संदर्भ में नीला रंग विशेष राजनीतिक-सांस्कृतिक अर्थ रखता है। BSP की सार्वजनिक पहचान में नीला लंबे समय से प्रमुख रहा है। इसका संबंध व्यापक रूप से बहुजन आंदोलन और आंबेडकरवादी प्रतीकों से जोड़ा जाता है। यही कारण है कि BSP की रैलियों और कार्यक्रमों में नीला रंग आसानी से दिखाई देता है। लेकिन यहां भी एक बात महत्वपूर्ण है नीला रंग किसी मतदाता के वोट की गारंटी नहीं है। वोट का फैसला राजनीतिक परिस्थितियों, स्थानीय उम्मीदवार, सामाजिक समीकरण और मुद्दों से भी प्रभावित होता है।
SP और लाल रंग
समाजवादी पार्टी की राजनीतिक पहचान में लाल रंग विशेष रूप से दिखाई देता है। लाल टोपी पार्टी की सार्वजनिक पहचान का एक चर्चित प्रतीक बन चुकी है। 2022 में विधानसभा में SP विधायकों की लाल टोपी और BJP विधायकों की भगवा टोपी की तस्वीरें इसी राजनीतिक पहचान की ओर इशारा करती थीं।यहां भी टोपी का रंग पार्टी समर्थक और पार्टी संगठन की पहचान को मजबूत करता है। रंग राजनीति को प्रभावित जरूर करता है इसलिए अखिलेश ने पीडीए को नई हवा देने के लिए अपनी ड्रेस नीली कर दी। लेकिन यह कहना कि लाल रंग यादव वोट या लाल टोपी पूरा SP वोट बैंक, राजनीतिक रूप से बहुत सरलीकरण होगा। सामाजिक आधार और पार्टी की दृश्य पहचान दो अलग चीजें हैं।
BJP और भगवा
BJP की राजनीतिक ब्रांडिंग में भगवा रंग प्रमुख है। पार्टी की सार्वजनिक पहचान में भगवा झंडे, गमछे, टोपी और अन्य प्रचार सामग्री लंबे समय से दिखाई देती रही है। 2022 के यूपी विधानसभा सत्र में BJP विधायकों की भगवा टोपियां भी इसी पहचान का हिस्सा थीं।
यहां भगवा केवल चुनावी रंग नहीं है। भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं में भी इसका व्यापक अर्थ है। इसलिए राजनीतिक इस्तेमाल के संदर्भ में इसका अर्थ पार्टी की विचारधारा और उसके सांस्कृतिक संदेश से भी जुड़ता है। यही वजह है कि BJP के मामले में रंग, प्रतीक और राजनीतिक संदेश एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं।
रंग से वोट बैंक नहीं, 'पहचान बैंक' बनता है
यूपी की राजनीति को समझने के लिए शायद सबसे सही शब्द 'पहचान बैंक' होगा। एक पार्टी का रंग उसके समर्थकों को यह अहसास देता है कि 'हम कौन हैं?' और चुनावी राजनीति में यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण होता है। जब कोई मतदाता किसी पार्टी के रंग, झंडे, टोपी या चुनाव चिन्ह को देखता है तो उसके दिमाग में पार्टी का नाम, नेता और राजनीतिक संदेश एक साथ सक्रिय हो सकते हैं। यानी रंग पहचान को आसान बनाता है।
चुनाव चिन्ह रंग से भी ज्यादा ताकतवर हो सकता है
भारत में चुनावी राजनीति में रंग के साथ-साथ चुनाव चिन्ह की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग राष्ट्रीय और राज्य राजनीतिक दलों को आरक्षित चुनाव चिन्ह देता है। उदाहरण के लिए BSP का चुनाव चिन्ह हाथी और BJP का कमल है। मतदाता के लिए यह पहचान खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि EVM पर उम्मीदवार के नाम के साथ चुनाव चिन्ह भी दिखाई देता है।
यानी राजनीतिक पहचान की पूरी तस्वीर कुछ ऐसी बनती है रंग, चुनाव चिन्ह, नेता, नारा, संगठन और सामाजिक आधार। इन सबके मेल से राजनीतिक ब्रांड बनता है।
फिर रंग को लेकर इतना जोर क्यों?
क्योंकि चुनाव में पहचान जितनी जल्दी बने, उतना राजनीतिक संचार आसान होता है। एक लंबा भाषण हर मतदाता तक नहीं पहुंच सकता। लेकिन एक रंग, एक प्रतीक या एक टोपी सेकंडों में पहचान बना सकती है। इसीलिए राजनीतिक दल अपने रंगों को बार-बार दोहराते हैं। रैली में झंडे उसी रंग के। टोपी उसी रंग की। गमछे उसी रंग के। पोस्टर और मंच उसी रंग की थीम में। सोशल मीडिया ग्राफिक्स भी उसी रंग में। यह लगातार दोहराव पार्टी की ब्रांड रिकॉल को मजबूत करता है।
क्या रंग देखकर वोट का अनुमान लगाया जा सकता है?
नहीं। किसी इलाके में हजारों लोग नीले कपड़े पहने दिखाई दें तो यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि BSP को उतने वोट मिलेंगे। इसी तरह किसी रैली में लाल टोपी की भीड़ देखकर SP का वोट प्रतिशत तय नहीं किया जा सकता। रैली की भीड़ और मतदान व्यवहार एक ही चीज नहीं हैं।
वोट बैंक का वास्तविक आकलन करने के लिए चुनाव परिणाम, वोट प्रतिशत, क्षेत्रवार प्रदर्शन, सामाजिक समूहों के मतदान रुझान, उम्मीदवार और स्थानीय मुद्दों जैसे कई आंकड़ों को देखना पड़ता है।
2027 में रंगों की राजनीति और दिलचस्प क्यों होगी?
2027 के विधानसभा चुनाव में यूपी की राजनीति में पुराने सामाजिक समीकरणों के साथ नए गठजोड़ों की कोशिश भी देखने को मिल सकती है। ऐसे में रंगों की राजनीति सिर्फ पार्टी पहचान तक सीमित नहीं रहेगी। अगर कोई पार्टी दूसरे सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने की कोशिश करती है, तो उसे अपनी पुरानी पहचान के साथ नया संदेश भी देना होगा।
यही वजह है कि चुनाव के दौरान यह देखना दिलचस्प होगा कि किस पार्टी का रंग कितना दिखाई देता है, किस सामाजिक समूह में दिखाई देता है और उस रंग के पीछे राजनीतिक संदेश क्या है। लेकिन अंतिम बात याद रखनी जरूरी है रंग वोट नहीं डालता, मतदाता वोट डालता है।
रंग राजनीतिक पहचान बना सकता है, भावनात्मक जुड़ाव पैदा कर सकता है और संगठन को दृश्य रूप दे सकता है। लेकिन वोट का फैसला केवल रंग से नहीं होता। उत्तर प्रदेश की राजनीति में असली सवाल इसलिए यह नहीं है कि कौन सा रंग किस पार्टी का है? बल्कि यह है कि कौन सा राजनीतिक संदेश, किस सामाजिक समूह तक, किस संगठन के जरिए और किस चुनावी मुद्दे के साथ पहुंच रहा है? यही तय करता है कि रंग सिर्फ झंडे तक रहेगा या चुनावी राजनीति में उसका असर भी दिखाई देगा।


