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Agra News: आगरा में आटे में ‘पत्थर का पाउडर’! 1,800 किलो सेलखड़ी और 1,350 किलो आटा जब्त
Agra News: आगरा के फतेहपुर सीकरी में खाद्य विभाग ने एक इकाई से 1,800 किलो सेलखड़ी और 1,350 किलो आटा जब्त किया। विभाग ने आटे में मिलावट का आरोप लगाया है। चार नमूने जांच के लिए भेजे गए।
Agra News (Image Credit-Social Media)
आगरा। जिस आटे की रोटी परिवार रोज खाता है, उसी आटे में अगर गेहूं के साथ पीसा हुआ पत्थर मिला दिया जाए तो खाद्य मिलावट कितनी खतरनाक सीमा तक पहुंच सकती है, इसका चौंकाने वाला मामला आगरा में सामने आया है। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की टीम ने फतेहपुर सीकरी के जौतना डाबर रोड स्थित एक इकाई पर छापा मारकर करीब 1,800 किलोग्राम सेलखड़ी और 13.5 क्विंटल यानी 1,350 किलोग्राम तैयार आटा जब्त किया है। विभाग का आरोप है कि नरम सफेद पत्थर की तरह दिखने वाली सेलखड़ी को आटे में मिलाकर उसे अधिक चमकदार बनाने और संभवतः वजन बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। मौके से तीन अलग नामों से पैक आटा मिला और पूरे परिसर, मशीनों तथा गोदाम को सील कर दिया गया। चार नमूने प्रयोगशाला जांच के लिए भेजे गए हैं।
मामले का एक और गंभीर पहलू यह है कि जिस फर्म में आटा बनाया जा रहा था, उसके पास उपलब्ध खाद्य लाइसेंस खाद्य तेल के फुटकर व्यापार और मसालों के थोक कारोबार से संबंधित बताया गया है। जांच अधिकारियों के मुताबिक वहां आटा निर्माण की अनुमति नहीं थी। इसलिए मामला केवल कथित मिलावट का नहीं बल्कि लाइसेंस की शर्तों के उल्लंघन और अनधिकृत खाद्य उत्पादन का भी है। विभाग ने लाइसेंस निलंबित कर आगे निरस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही है।
कई दिन रेकी के बाद पड़ा छापा
खाद्य सुरक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार उन्हें इस इकाई में मिलावट की गोपनीय सूचना मिली थी। इसके बाद कुछ दिनों तक गतिविधियों की निगरानी की गई और बुधवार को मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी राजेश कुमार गुप्ता के नेतृत्व में टीम ने छापा मारा। कार्रवाई करीब दस घंटे चली। मौके पर फर्म से जुड़े अमित कुमार उपस्थित मिले। जांच टीम को बड़ी संख्या में ऐसे कट्टे मिले जिनमें सफेद सेलखड़ी पाउडर भरा था। वजन कराने पर इसकी मात्रा करीब 18 क्विंटल निकली। इसके अलावा 13.5 क्विंटल पैक और खुला आटा मिला।
बरामद सेलखड़ी का अनुमानित मूल्य लगभग ₹30,150 और आटे का मूल्य करीब ₹18,900 बताया गया है। केवल कीमत देखने पर यह माल बहुत बड़ा नहीं लगता, लेकिन असली गंभीरता मात्रा और उसके संभावित वितरण में है। लगभग 1.8 टन ऐसा खनिज पदार्थ किसी खाद्य इकाई में किस उद्देश्य से रखा गया था और इससे पहले कितना आटा बनाकर बाजार में भेजा जा चुका था—अब जांच का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही होना चाहिए।
तीन नामों से बाजार में जा रहा था आटा
छापे के दौरान समृद्धि ब्रांड आटा, उत्तम ब्रांड आटा और श्याम भोग चक्की फ्रेश आटा नाम वाले पैकेट मिलने की जानकारी है। विभाग ने तीनों प्रकार के आटे और सेलखड़ी का एक-एक नमूना लेकर कुल चार नमूने जांच के लिए भेजे हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी सावधानी जरूरी है। इन नामों से मिले आटे में सेलखड़ी होने की अंतिम वैधानिक पुष्टि प्रयोगशाला रिपोर्ट से होगी। मौके की परिस्थितियों और प्रारंभिक जांच के आधार पर विभाग ने मिलावट की कार्रवाई की है, लेकिन खाद्य सुरक्षा कानून के तहत आगे मुकदमा और दंड प्रयोगशाला विश्लेषण तथा अन्य साक्ष्यों पर निर्भर करेंगे।इसीलिए “तीनों ब्रांडों का हर पैकेट जहरीला था” जैसा निष्कर्ष अभी नहीं निकाला जाना चाहिए।
सेलखड़ी आखिर होती क्या है?
सेलखड़ी को अलग-अलग क्षेत्रों में सोपस्टोन, स्टीटाइट या टैल्कयुक्त पत्थर भी कहा जाता है। यह बहुत मुलायम खनिज होता है और आसानी से सफेद या हल्के रंग के महीन पाउडर में बदला जा सकता है। इसका उपयोग अनेक औद्योगिक कामों में होता है।लेकिन औद्योगिक खनिज पाउडर को गेहूं के आटे में मिलाकर उसे आटे के रूप में बेचना स्वीकार्य खाद्य उत्पादन नहीं है। FSSAI के मानक के अनुसार आटा मूलतः साफ गेहूं को पीसकर तैयार किया जाने वाला खाद्य पदार्थ है और उसकी गुणवत्ता नमी, ग्लूटेन और राख जैसे निश्चित मानकों से जांची जाती है।
सेलखड़ी जैसे खनिज की मिलावट विशेष रूप से राख और अम्ल-अघुलनशील राख जैसे परीक्षणों में सामने आ सकती है, क्योंकि गेहूं में प्राकृतिक रूप से मौजूद खनिज पदार्थ की सीमा निर्धारित होती है।
क्या सेलखड़ी वास्तव में ‘जहर’ है?
मूल खबर में इसे सीधे “लोगों को जहर बेचना” कहा गया है। समाचार की तीव्रता समझ में आती है, लेकिन वैज्ञानिक रूप से यह भाषा कुछ अधिक कठोर है।हर प्रकार की सेलखड़ी को तत्काल विष या जहर मान लेना सही नहीं होगा। असली खतरा यह है कि खाद्य उपयोग के लिए स्वीकृत न होने वाला औद्योगिक खनिज पदार्थ आटे में मिलाया गया हो, जिसकी शुद्धता, रासायनिक संरचना और उसमें मौजूद अन्य अशुद्धियों का कोई खाद्य सुरक्षा नियंत्रण न हो।इसके लगातार सेवन से पाचन संबंधी समस्या हो सकती है और यदि पाउडर में अवांछित खनिज या धातु अशुद्धियां हों तो जोखिम बढ़ सकता है। लेकिन प्रयोगशाला रिपोर्ट आने से पहले यह कहना कि बरामद पदार्थ निश्चित रूप से जहरीला था या उससे कोई खास बीमारी होना तय था, वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा।
घटिया गेहूं का रंग छिपाने के लिए मिलावट का आरोप
अधिकारियों के अनुसार प्रारंभिक पूछताछ में यह बात सामने आई कि अपेक्षाकृत निम्न गुणवत्ता का गेहूं इस्तेमाल किया जाता था। उससे बनने वाला आटा अपेक्षित सफेद या चमकदार दिखाई नहीं देता था, इसलिए उसमें सेलखड़ी मिलाई जाती थी। विभाग ने यह भी कहा है कि आटा करीब ₹28 प्रति किलो के आसपास बेचा जा रहा था।
यदि यह जांच में पुष्ट होता है तो मिलावट के पीछे केवल वजन बढ़ाने का नहीं बल्कि उपभोक्ता की आंख को धोखा देने का उद्देश्य भी सामने आएगा।यही खाद्य मिलावट के पुराने तरीकों में से एक है—खराब गुणवत्ता वाले मूल पदार्थ की रंग, बनावट या वजन की कमी किसी सस्ते बाहरी पदार्थ से छिपाना।
1 किलो आटे में कितनी सेलखड़ी मिलती थी—अभी पता नहीं
1,800 किलो सेलखड़ी और 1,350 किलो आटा मिलने से यह गणना नहीं की जा सकती कि हर किलो आटे में कितना पत्थर पाउडर मिलाया जा रहा था।संभव है बरामद सेलखड़ी भविष्य में इस्तेमाल के लिए रखी गई हो। संभव है पहले से बनी खेप बाजार में जा चुकी हो। इन प्रश्नों के उत्तर उत्पादन रिकॉर्ड, कच्चा माल खरीद, पैकेजिंग सामग्री, बिक्री बिल और प्रयोगशाला रिपोर्ट से ही मिलेंगे।इसलिए “आटे में 50 प्रतिशत पत्थर” जैसी कोई गणना उपलब्ध आंकड़ों से करना गलत होगा।
उत्तर प्रदेश के बाहर भी आपूर्ति की आशंका
स्थानीय खाद्य अधिकारियों के हवाले से प्रकाशित रिपोर्टों में कहा गया है कि इस इकाई से उत्तर प्रदेश के साथ राजस्थान और मध्य प्रदेश के कुछ जिलों तक माल भेजे जाने की जानकारी प्रारंभिक पूछताछ में सामने आई है। यदि बिक्री रिकॉर्ड से इसकी पुष्टि होती है तो जांच केवल आगरा में मौजूद स्टॉक तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह पता लगाना जरूरी होगा कि पिछले महीनों में कितने किलो आटा तैयार हुआ, किन थोक विक्रेताओं को भेजा गया और क्या बाजार में मौजूद पैकेट वापस मंगाने की आवश्यकता है।यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण उपभोक्ता सुरक्षा पक्ष है।
सिर्फ मिल को सील करना पर्याप्त नहीं
ऐसे मामलों में छापा तत्काल समस्या रोक देता है, लेकिन वास्तविक जांच उसके बाद शुरू होती है।पहला काम प्रयोगशाला से यह निश्चित करना होगा कि आटे में कौन-सा बाहरी खनिज कितनी मात्रा में है। दूसरा, बरामद सेलखड़ी की रासायनिक शुद्धता की जांच होनी चाहिए। तीसरा, पिछले उत्पादन और बिक्री का रिकॉर्ड देखा जाना चाहिए। चौथा, संबंधित तीन नामों से बाजार में उपलब्ध बैचों के नमूने उठाए जाने चाहिए।यदि पूर्व में तैयार मिलावटी आटा बाजार तक पहुंच चुका है तो उसका ट्रेस-बैक और रिकॉल अधिक महत्वपूर्ण होगा।
खाद्य लाइसेंस की व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल
यह तथ्य कि कथित रूप से तेल और मसाले के कारोबार के लाइसेंस वाली इकाई में आटा बनाया जा रहा था, निरीक्षण व्यवस्था पर भी सवाल उठाता है।खाद्य कारोबार का लाइसेंस केवल कागजी औपचारिकता नहीं है। उसमें यह दर्ज होता है कि कारोबारी किस प्रकार का खाद्य पदार्थ बनाता या बेचता है। यदि परिसर में उत्पादन का स्वरूप बदल जाए तो नियामक जानकारी और उचित लाइसेंस आवश्यक होता है।इस मामले में आगे यह भी देखा जाना चाहिए कि यह आटा निर्माण कब से चल रहा था और उससे पहले नियमित निरीक्षण में क्यों नहीं पकड़ा गया।
पैकेट पर FSSAI नंबर देखकर ही पूरी सुरक्षा मान लेना भी गलत
आम उपभोक्ता अक्सर मानता है कि पैकेट पर FSSAI लाइसेंस नंबर छपा है तो खाद्य पदार्थ निश्चित रूप से पूरी तरह सुरक्षित होगा।वास्तव में लाइसेंस का अर्थ यह है कि खाद्य कारोबार नियामक के तहत पंजीकृत या लाइसेंसधारी है। यह हर पैकेट की प्रयोगशाला जांच की गारंटी नहीं है।इसीलिए बाजार निगरानी, औचक नमूने और उत्पादन इकाइयों का निरीक्षण जरूरी रहता है।आगरा का मामला इस फर्क को बहुत स्पष्ट करता है।
घर पर नींबू डालकर मिलावट पहचानने वाला दावा पूरी तरह भरोसेमंद नहीं
कुछ स्थानीय रिपोर्टों में बताया गया है कि आटे में नींबू का रस डालने पर बुलबुले आएं तो मिलावट समझी जा सकती है। ऐसे घरेलू परीक्षण केवल संकेत दे सकते हैं; वे यह सिद्ध नहीं कर सकते कि आटे में सेलखड़ी ही मिली हुई है।बुलबुले किसी कार्बोनेट पदार्थ के कारण आ सकते हैं और आटे के व्यवहार को कई दूसरे घटक भी प्रभावित करते हैं।इसलिए संदेह होने पर सही तरीका है कि पैकेट सुरक्षित रखें, बैच नंबर और बिल संभालें और खाद्य सुरक्षा विभाग से शिकायत करें। अंतिम निष्कर्ष अधिकृत प्रयोगशाला जांच से ही होना चाहिए।
आटा सबसे संवेदनशील खाद्य पदार्थों में क्यों
आटा ऐसा उत्पाद है जो लगभग हर घर में प्रतिदिन खाया जाता है। दूध, तेल, मसाले और मिठाइयों की मिलावट की तरह आटे की मिलावट का प्रभाव भी बहुत व्यापक हो सकता है क्योंकि इसकी खपत एक बार की नहीं बल्कि नियमित होती है।यही कारण है कि FSSAI गेहूं के आटे के लिए नमी और ग्लूटेन सहित विभिन्न गुणवत्ता सीमाएं निर्धारित करता है।
यदि कोई बाहरी खनिज मिलाया जाए तो केवल पोषण घटता नहीं; उपभोक्ता पैसे गेहूं के दे रहा होता है लेकिन उसे वजन का एक हिस्सा अखाद्य पदार्थ के रूप में मिलता है। यानी यह स्वास्थ्य धोखाधड़ी के साथ आर्थिक धोखाधड़ी भी है।
अब चार नमूनों की रिपोर्ट सबसे निर्णायक
फिलहाल विभाग ने समृद्धि, उत्तम और श्याम भोग नाम के आटे तथा बरामद सेलखड़ी के नमूने प्रयोगशाला भेजे हैं। इसलिए अगला निर्णायक तथ्य यही होगा कि रिपोर्ट में वास्तव में कौन-सा पदार्थ और कितनी मात्रा मिलती है। यदि प्रयोगशाला मिलावट की पुष्टि करती है तो खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के तहत मामला आगे बढ़ सकता है। दंड की प्रकृति इस बात पर निर्भर करेगी कि खाद्य पदार्थ असुरक्षित, घटिया, मिथ्या ब्रांड वाला या किसी अन्य कानूनी श्रेणी में पाया जाता है।
आगरा की यह कार्रवाई इसलिए केवल 31.5 क्विंटल माल पकड़े जाने की कहानी नहीं है। बड़ा प्रश्न यह है कि अगर किसी मिल में 1.8 टन पत्थर जैसा पाउडर आटे के बीच रखा मिला, तो उससे पहले कितनी खेप बाजार तक पहुंची और उसे कितने घरों ने गेहूं का आटा समझकर खाया। प्रयोगशाला रिपोर्ट इसका वैज्ञानिक सच बताएगी, लेकिन इस छापे ने खाद्य निगरानी व्यवस्था के सामने एक बहुत गंभीर चेतावनी जरूर रख दी है।


