सपा में किसके हाथ टिकट की चाबी? अखिलेश की आजम से मुलाकात में ऐसा क्या हुआ कि सामने डबल चुनौती

UP Election 2027: रामपुर जेल में अखिलेश यादव और आजम खान की मुलाकात के बाद 2027 विधानसभा चुनाव के टिकटों को लेकर सपा में चर्चा तेज हो गई है। जानिए आजम खान की राय, सांसद मोहिब्बुल्लाह नदवी की भूमिका और रामपुर की सियासत के समीकरण।

Snigdha Singh
Published on: 23 Oct 2026 12:54 PM IST (Updated on: 23 Oct 2026 1:19 PM IST)
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UP Election 2027: रामपुर जेल में अखिलेश यादव और आजम खान की मुलाकात ने समाजवादी पार्टी के भीतर एक पुरानी राजनीतिक बहस को फिर चर्चा में ला दिया है। एक तरफ आजम खान हैं, जिनके नाम से दशकों तक रामपुर की राजनीति पहचानी गई। दूसरी तरफ सांसद मोहिब्बुल्लाह नदवी हैं, जिन्हें 2024 में अखिलेश यादव ने आजम खेमे की पसंद से अलग टिकट दिया और वह चुनाव जीत गए। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश ने आजम से उम्मीदवारों पर राय ली है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि रामपुर में टिकटों की राजनीति का केंद्र कौन होगा?

राजनीति में कई बार जो तस्वीर दिखाई देती है, उससे ज्यादा चर्चा उस चेहरे की होती है जो तस्वीर में नहीं होता। रामपुर में अखिलेश यादव के दौरे के बाद कुछ ऐसा ही हुआ। सपा अध्यक्ष जेल में बंद आजम खान से मिले, उनके परिवार के पास पहुंचे और पुराने रिश्तों का हवाला दिया। लेकिन इस पूरे कार्यक्रम में रामपुर के मौजूदा सपा सांसद मोहिब्बुल्लाह नदवी नजर नहीं आए। इतना ही नहीं, अखिलेश के स्वागत में लगे कुछ पोस्टरों और बैनरों में भी सांसद की तस्वीर नहीं दिखाई दी। इससे रामपुर की स्थानीय राजनीति में पुराने मतभेदों की चर्चा फिर शुरू हो गई।

हालांकि सांसद के मीडिया प्रतिनिधि ने साफ किया कि नदवी विदेश में थे और कार्यक्रम अचानक तय होने के कारण शामिल नहीं हो सके। इसलिए उनकी अनुपस्थिति को किसी राजनीतिक विरोध का प्रमाण नहीं माना जा सकता। लेकिन सवाल सिर्फ एक कार्यक्रम में मौजूद रहने या न रहने का नहीं है। असल सवाल यह है कि जिस रामपुर में आजम खान का दशकों पुराना राजनीतिक प्रभाव रहा है, वहां मौजूदा सांसद और पुराने संगठन के बीच तालमेल किस तरह बनेगा?

मुलाकात को बताया भावनात्मक, लेकिन चर्चा चुनावी भी हुई

22 अक्टूबर को अखिलेश यादव रामपुर जिला जेल पहुंचे। यहां उन्होंने आजम खान से करीब एक घंटे बातचीत की।जेल से बाहर आने के बाद अखिलेश ने कहा कि आजम खान के परिवार से उनके परिवार के पुराने रिश्ते हैं। उन्होंने मुलाकात को राजनीतिक लाभ-हानि से अलग एक भावनात्मक मुलाकात बताया। लेकिन इसी दौरान उन्होंने यह भी बताया कि आगामी चुनावों के लिए गठबंधन से जुड़े उम्मीदवारों पर आजम खान से रायशुमारी हुई है।

यही वह बात है जिसने इस मुलाकात के राजनीतिक महत्व को बढ़ा दिया। यदि चर्चा केवल स्वास्थ्य और पारिवारिक संबंधों तक सीमित रहती तो उसका संदर्भ अलग होता। लेकिन उम्मीदवारों के चयन पर बातचीत होने से 2027 की चुनावी तैयारियां भी इस मुलाकात से जुड़ गई हैं। कुछ मीडिया रिपोर्टों में पश्चिमी यूपी के संभावित उम्मीदवारों और आजम की ओर से सुझाए गए नामों की चर्चा है। हालांकि पार्टी ने ऐसी किसी अंतिम सूची की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

2024 में अखिलेश ने आजम की पसंद से अलग दिया था टिकट

रामपुर की वर्तमान राजनीति को समझने के लिए दो साल पीछे लौटना जरूरी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में रामपुर से सपा का उम्मीदवार कौन होगा, इसे लेकर काफी खींचतान सामने आई थी। आजम खान के समर्थक मोहम्मद आसिम राजा के पक्ष में थे। लेकिन अखिलेश यादव ने दिल्ली की संसद मार्ग मस्जिद के इमाम मोहिब्बुल्लाह नदवी को उम्मीदवार बनाया। इस फैसले का स्थानीय स्तर पर विरोध भी हुआ। आजम समर्थकों ने नदवी को बाहरी उम्मीदवार बताते हुए उनकी उम्मीदवारी पर सवाल उठाए थे।

इसके बावजूद मोहिब्बुल्लाह नदवी चुनाव मैदान में उतरे और भाजपा के घनश्याम सिंह लोधी को हराकर सांसद बन गए। इस परिणाम ने रामपुर में एक नई राजनीतिक स्थिति पैदा की। आजम खान की लंबे समय से स्थापित राजनीतिक पहचान अपनी जगह थी, लेकिन अखिलेश यादव की ओर से चुना गया नया चेहरा भी चुनाव जीत चुका था। यहीं से रामपुर की सपा में दो अलग राजनीतिक संदर्भ एक साथ मौजूद दिखाई देने लगे पुराने संगठन का प्रभाव और मौजूदा सांसद की चुनावी पहचान।

सांसद और आजम खान के रिश्तों में तल्खी क्यों आई?

2024 की उम्मीदवार चयन प्रक्रिया के बाद दोनों पक्षों के संबंध सहज नहीं रहे। सांसद मोहिब्बुल्लाह नदवी ने आजम खान के जेल में रहने को लेकर एक टिप्पणी की थी, जिसे आजम समर्थकों ने आपत्तिजनक माना। बाद में आजम खान ने भी उस टिप्पणी पर सार्वजनिक रूप से जवाब दिया। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार दोनों नेताओं के बीच मतभेदों को दूर करने की कोशिशें भी हुईं, लेकिन विवाद पूरी तरह समाप्त होने की पुष्टि नहीं हुई।

अक्टूबर की शुरुआत में सांसद के कैंप कार्यालय पर कांग्रेस नेताओं के साथ गठबंधन को लेकर हुई प्रेसवार्ता में सपा के स्थानीय संगठन के कई प्रमुख पदाधिकारी शामिल नहीं हुए थे। सपा जिलाध्यक्ष अजय सागर ने उस समय कहा था कि प्रेसवार्ता के संबंध में उन्हें पार्टी की ओर से कोई निर्देश नहीं मिला था। इन घटनाओं को स्थानीय स्तर पर अलग-अलग नेताओं के बीच समन्वय की समस्या के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन यह कहना कि रामपुर में सपा औपचारिक रूप से दो गुटों में बंट चुकी है, पार्टी की आधिकारिक स्थिति के बिना जल्दबाजी होगी।

रामपुर में आजम खान का नाम इतना महत्वपूर्ण क्यों?

आजम खान समाजवादी पार्टी के संस्थापक दौर से जुड़े नेताओं में शामिल रहे हैं। वह रामपुर विधानसभा सीट से दस बार विधायक चुने गए और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे। 2019 में वह रामपुर से लोकसभा सांसद बने। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने फिर रामपुर सीट से जीत हासिल की थी। हालांकि कानूनी मामलों, सजा और अयोग्यता के बाद उनकी राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं। रामपुर विधानसभा सीट पर 2022 के उपचुनाव में भाजपा के आकाश सक्सेना ने सपा उम्मीदवार आसिम राजा को हरा दिया।

इस परिणाम से रामपुर विधानसभा सीट पर सपा का लंबे समय से चला आ रहा कब्जा समाप्त हुआ। फिर 2024 में लोकसभा सीट पर सपा की वापसी हुई, लेकिन उम्मीदवार आजम की पसंद के बजाय अखिलेश के फैसले से आया था। इसीलिए रामपुर में आजम खान और मोहिब्बुल्लाह नदवी की राजनीतिक भूमिकाओं की तुलना केवल व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर नहीं की जा सकती। दोनों का राजनीतिक सफर, चुनावी अनुभव और संगठन से संबंध अलग हैं।

रामपुर की पांच विधानसभा सीटों पर क्या है गणित?

रामपुर जिले में पांच विधानसभा सीटें हैं रामपुर, स्वार, चमरौआ, बिलासपुर और मिलक। 2022 के विधानसभा चुनाव में रामपुर से सपा के आजम खान, स्वार से सपा के अब्दुल्ला आजम और चमरौआ से सपा के नसीर अहमद खान जीते थे। वहीं बिलासपुर और मिलक सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की थी। इसके बाद उपचुनावों और कानूनी घटनाक्रम के कारण जिले की विधानसभा राजनीति में बदलाव हुआ।

रामपुर सीट पर भाजपा के आकाश सक्सेना और स्वार सीट पर अपना दल (एस) के शफीक अहमद अंसारी उपचुनाव जीतकर विधायक बने। यानी 2022 के मूल चुनावी परिणाम और अक्टूबर 2026 की विधायक स्थिति एक जैसी नहीं है। 2027 में उम्मीदवार तय करते समय दलों को इन बदलावों के साथ स्थानीय संगठन और गठबंधन की परिस्थितियों पर भी विचार करना होगा।

टिकटों पर किसकी चलेगी, आजम की राय या अखिलेश का फैसला?

रामपुर की राजनीति में यह सबसे बड़ा सवाल बनकर उभर रहा है। 2024 में अखिलेश यादव ने दिखाया था कि लोकसभा उम्मीदवार के मामले में अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व का होगा। अब 2027 से पहले उन्होंने आजम खान से संभावित उम्मीदवारों पर सुझाव मांगे हैं। इसका एक अर्थ यह भी है कि सपा नेतृत्व पुराने अनुभवी नेताओं की राय को उम्मीदवार चयन प्रक्रिया में शामिल रखना चाहता है। लेकिन राय लेना और टिकट देने का अंतिम अधिकार सौंपना दो अलग बातें हैं। पार्टी ने अभी ऐसा कोई ऐलान नहीं किया है कि रामपुर या पश्चिमी यूपी की सीटों के उम्मीदवार आजम खान ही तय करेंगे।

दूसरी ओर, मौजूदा सांसद मोहिब्बुल्लाह नदवी की राजनीतिक भूमिका भी समाप्त नहीं हो जाती। वह रामपुर से निर्वाचित सांसद हैं और उनका अपना राजनीतिक दायित्व है। इसलिए 2027 में महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि उम्मीदवार चयन के दौरान पार्टी पुराने संगठन, मौजूदा जनप्रतिनिधियों और स्थानीय नेताओं के बीच किस तरह समन्वय बनाती है।

कांग्रेस से गठबंधन ने बढ़ाई सीटों की अहमियत

रामपुर की यह राजनीतिक हलचल ऐसे समय में सामने आई है जब 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सपा-कांग्रेस गठबंधन की संभावित सीट साझेदारी भी चर्चा में है। 2024 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों ने साथ चुनाव लड़ा था। लेकिन विधानसभा चुनाव में किन सीटों पर कौन-सा दल उम्मीदवार उतारेगा, इस पर अभी अंतिम समझौता घोषित नहीं हुआ है।

रामपुर और आसपास के क्षेत्रों में यदि गठबंधन के तहत सीटों का बंटवारा होता है, तो स्थानीय दावेदारों की स्थिति भी उसी के अनुसार तय होगी। यही कारण है कि आजम खान से उम्मीदवारों पर हुई चर्चा को सिर्फ रामपुर तक सीमित नहीं देखा जा रहा। हालांकि किसी विशेष सीट या उम्मीदवार के बारे में आधिकारिक घोषणा के बिना अंतिम दावा करना उचित नहीं होगा।

क्या अखिलेश रामपुर में दो राजनीतिक धाराओं को साथ ला पाएंगे?

रामपुर की राजनीति में आजम खान का लंबा अनुभव है और मोहिब्बुल्लाह नदवी के पास 2024 की लोकसभा जीत का जनादेश। अखिलेश यादव के सामने राजनीतिक प्रश्न यह है कि दोनों की भूमिकाओं के बीच संगठनात्मक तालमेल कैसे स्थापित किया जाए। यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि आजम और सांसद के बीच मतभेदों को केवल किसी एक नेता की महत्वाकांक्षा से जोड़ना सही नहीं होगा। उम्मीदवार चयन, पुराने बयान, स्थानीय पदाधिकारियों के रिश्ते और चुनावी रणनीति जैसे कई मुद्दे इसमें शामिल रहे हैं।

सपा नेतृत्व की ओर से सार्वजनिक रूप से एकजुटता पर जोर दिया जाता रहा है। लेकिन स्थानीय स्तर पर उठने वाले सवालों का समाधान केवल बड़े नेताओं की मुलाकात से होगा या इसके लिए संगठनात्मक स्तर पर भी बातचीत करनी पड़ेगी, यह आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा।

अखिलेश की मुलाकात से निकले तीन बड़े सवाल

पहला सवाल यह है कि क्या आजम खान की ओर से सुझाए गए संभावित उम्मीदवारों को 2027 में पार्टी टिकट देगी?

दूसरा, क्या रामपुर के सांसद और आजम समर्थक स्थानीय संगठन के बीच पुराने मतभेदों को दूर करने की कोई औपचारिक पहल होगी?

और तीसरा, यदि कांग्रेस के साथ विधानसभा सीटों का बंटवारा होता है तो रामपुर जिले में पुराने दावेदारों की भूमिका कैसे तय होगी?

इन तीनों सवालों के जवाब अभी सामने नहीं आए हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि 22 अक्टूबर की मुलाकात ने रामपुर की राजनीति में उम्मीदवार चयन और स्थानीय नेतृत्व को लेकर चर्चा तेज कर दी है।

अखिलेश यादव जेल में आजम खान से मिलकर लौट आए हैं। मुलाकात को उन्होंने भावनात्मक बताया, लेकिन बातचीत में चुनावी उम्मीदवारों का मुद्दा भी शामिल था। अब रामपुर में नजर इस बात पर रहेगी कि 2027 की उम्मीदवार सूची में किसे जगह मिलती है और सपा अपने पुराने तथा नए नेतृत्व के बीच कैसा तालमेल बनाती है। क्योंकि रामपुर में सवाल केवल यह नहीं है कि अगला टिकट किसे मिलेगा, बल्कि यह भी है कि टिकट तय करने की प्रक्रिया में किसकी राय को कितना महत्व दिया जाएगा।

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