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कारगिल में दुश्मन के छक्के छुड़ाए, अब राम मंदिर की जिम्मेदारी! पढ़िए CEO जितेंद्र मिश्रा की कहानी
CEO Jitendra Mishra Story: कारगिल युद्ध में अहम भूमिका निभाने वाले एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को राम मंदिर का नया CEO बनाया गया है। जानिए उनके कारगिल मिशन और नई जिम्मेदारी की पूरी कहानी।
Image Source- Social Media
CEO Jitendra Mishra Story: अयोध्या के भव्य राम मंदिर के नए मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ (CEO) के तौर पर जितेंद्र मिश्रा का नाम सामने आते ही हर किसी के मन में एक सवाल उठा कि आखिर यह नया चेहरा कौन है। लेकिन देश की सुरक्षा और एविएशन की दुनिया से जुड़े लोग जितेंद्र मिश्रा को लंबे समय से जानते हैं। वह वही जांबाज अफसर हैं, जिन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध (Kargil War) के दौरान पर्दे के पीछे रहकर एक ऐसा तकनीकी करिश्मा किया था, जिसने जंग की तस्वीर बदलने में बड़ी भूमिका निभाई थी।
कारगिल की ऊंची और पथरीली चोटियों पर उस वक्त तापमान शून्य से नीचे पहुंच चुका था। पाकिस्तानी घुसपैठियों ने भारतीय सीमा में घुसकर टाइगर हिल, तोलोलिंग और मुंथो ढालो जैसी अहम चोटियों पर मजबूत बंकर बना लिए थे। दुश्मन ऊंचाई पर बैठा था, जबकि नीचे से ऊपर की तरफ बढ़ रहे भारतीय सेना के जवानों को सीधी गोलियों और गोलों का सामना करना पड़ रहा था। हालात ऐसे थे कि पारंपरिक बमबारी से इन बंकरों को निशाना बनाना बेहद मुश्किल साबित हो रहा था।
जब कारगिल में मुश्किल हो गए थे हालात
ऐसे नाजुक हालात में भारतीय वायुसेना (Indian Air Force) ने आसमान से मोर्चा संभालने का फैसला किया। इसके साथ ही शुरू हुआ ऑपरेशन सफेद सागर (Operation Safed Sagar)।
उस समय श्रीनगर बेस पर मिग फाइटर जेट उपलब्ध थे, इसलिए ऑपरेशन की शुरुआत उन्हीं विमानों से की गई। लेकिन दुश्मन भी पूरी तैयारी के साथ आया था। शुरुआती दौर में भारतीय वायुसेना को अपने कुछ फाइटर जेट गंवाने पड़े।
इसके बाद रणनीति बदली गई और लेजर गाइडेड बम (Laser Guided Bombs) के इस्तेमाल का फैसला हुआ। उस समय भारतीय वायुसेना के बेड़े में मिराज 2000 (Mirage 2000) सबसे ताकतवर और आधुनिक फाइटर जेट में शामिल था।
मिराज 2000 से सटीक हमला करने की थी योजना
योजना यह थी कि मिराज 2000 से दुश्मन के ठिकानों पर लेजर गाइडेड बम गिराए जाएं। ये बम लेजर बीम के सहारे सीधे टारगेट तक पहुंचते हैं और बेहद सटीक हमला करते हैं।
लेकिन यहीं भारतीय वायुसेना के सामने एक बड़ी तकनीकी समस्या खड़ी हो गई। मिराज 2000 में लेजर गाइडेड बम लगाने का काम अभी पूरा नहीं हुआ था।
ग्वालियर एयर बेस (Gwalior Air Base) पर इस सिस्टम को तैयार करने की कोशिश चल रही थी। समस्या यह थी कि बम और विमान के सिस्टम के बीच सही तालमेल नहीं बैठ पा रहा था। वायुसेना पिछले करीब दो साल से इस सिस्टम पर काम कर रही थी, लेकिन बम के फ्यूज को केबल और विमान के सिस्टम से जोड़ने में लगातार परेशानी आ रही थी।
अब युद्ध शुरू हो चुका था। महीनों या वर्षों का समय नहीं था। हर गुजरते दिन के साथ भारतीय जवानों की जान जा रही थी। ऐसे में इस मुश्किल मिशन को पूरा करने की जिम्मेदारी एक खास टीम को दी गई, जिसके अहम सदस्य स्क्वाड्रन लीडर जितेंद्र मिश्रा थे।
1986 में बने थे फाइटर पायलट
जितेंद्र मिश्रा 6 दिसंबर 1986 को भारतीय वायुसेना में फाइटर पायलट (Fighter Pilot) बने थे। उन्हें हवा में उड़ान भरने की महारत हासिल थी, लेकिन उनकी खासियत सिर्फ पायलटिंग तक सीमित नहीं थी। तकनीकी मामलों की भी उन्हें गहरी समझ थी।
ग्वालियर एयर बेस के हैंगर में दिन और रात का फर्क मिट चुका था। स्क्वाड्रन लीडर जितेंद्र मिश्रा और उनकी टीम लगातार काम कर रही थी। सामने सिर्फ एक लक्ष्य था कि किसी भी तरह मिराज 2000 को लेजर गाइडेड बमों के इस्तेमाल के लिए तैयार किया जाए।
यह काम समय के खिलाफ एक सीधी जंग बन चुका था। इसी बीच एक बड़ा झटका भी लगा। अमेरिका ने भारत की मदद करने से साफ इनकार कर दिया।
इजराइल आया भारत के साथ
जब मुश्किल बढ़ रही थी, उस वक्त इजराइल (Israel) भारत के साथ खड़ा हुआ। इजराइली कंपनी ने एक खास लिटनिंग टारगेटिंग पॉड (Litening Targeting Pod) बनाया था।
यह पॉड एक हाईटेक इलेक्ट्रॉनिक आंख की तरह काम करता था। यह जमीन पर मौजूद टारगेट पर लेजर रोशनी डालकर उसे लॉक कर देता था, जिससे लेजर गाइडेड बम सीधे उसी जगह जाकर गिरता था।
लेकिन अब नई चुनौती सामने थी। इजराइल के लिटनिंग पॉड और लेजर गाइडेड बमों को फ्रांसीसी मिराज 2000 के सिस्टम के साथ जोड़ना था। तीनों की तकनीक अलग थी, सॉफ्टवेयर अलग था और सिस्टम भी अलग तरीके से काम करते थे।
तारों और सर्किट के बीच रात-दिन चला काम
स्क्वाड्रन लीडर जितेंद्र मिश्रा ने इजराइली इंजीनियरों के साथ मिलकर मोर्चा संभाला। ग्वालियर के हैंगर के अंदर तारों के जाल, सर्किट बोर्ड और कंप्यूटर कोड के बीच लगातार काम होने लगा।
यह ऐसा काम था जिसे सामान्य परिस्थितियों में पूरा करने में छह महीने से लेकर एक साल तक का समय लग सकता था। लेकिन युद्ध के दौरान समय की कीमत अलग थी।
जितेंद्र मिश्रा और उनकी टीम ने अपनी काबिलियत और जुनून के दम पर इस काम को रिकॉर्ड सिर्फ 12 दिनों में पूरा कर दिखाया। इसके बाद मिराज 2000 लेजर गाइडेड बम दागने के लिए पूरी तरह तैयार था।
यह भारतीय सैन्य इतिहास (Indian Military History) का पहला ऐसा मौका था जब किसी फाइटर प्लेन को इतनी तेजी से मोडिफाई करके युद्ध के लिए तैयार किया गया था।
24 जून 1999 को हुआ असली इम्तिहान
12 दिनों की अथक मेहनत का असली इम्तिहान 24 जून 1999 को हुआ। सुबह मिराज 2000 विमानों ने ग्वालियर से उड़ान भरी और कारगिल के आसमान में पहुंचे।
नीचे टाइगर हिल और मुंथो ढालो पर पाकिस्तानी सैनिक अपने बंकरों में बैठे थे। उन्हें भरोसा था कि ऊंचाई पर मौजूद इन ठिकानों तक पहुंचना आसान नहीं होगा।
लेकिन तभी स्क्वाड्रन लीडर जितेंद्र मिश्रा की टीम द्वारा तैयार किया गया सिस्टम काम करने लगा। लिटनिंग टारगेटिंग पॉड ने लेजर बीम के जरिए टारगेट को लॉक किया और मिराज 2000 से लेजर गाइडेड बम रिलीज किए गए।
पलक झपकते ही तबाह हुए दुश्मन के ठिकाने
सैकड़ों फीट की ऊंचाई से गिराए गए इन बमों ने सीधे पाकिस्तानी ठिकानों और गोला-बारूद के डिपो को निशाना बनाया। देखते ही देखते दुश्मन के ठिकाने मलबे में बदल गए।
आसमान से हुई इस सटीक बमबारी ने दुश्मन की कमर तोड़ दी। यह भारतीय वायुसेना के इतिहास का पहला ऐसा हमला था, जिसमें युद्ध के दौरान लेजर गाइडेड बमों का इस्तेमाल किया गया था।
इस तकनीकी कामयाबी ने कारगिल युद्ध (Kargil War) का रुख बदलने में अहम भूमिका निभाई। बाद में पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ ने भी माना था कि मिराज 2000 के सटीक हमलों और थल सेना के साथ वायुसेना के तालमेल ने 1999 की जंग का रुख मोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
18 से ज्यादा तरह के फाइटर जेट उड़ाने का अनुभव
कारगिल की इस ऐतिहासिक कामयाबी के बाद जितेंद्र मिश्रा का करियर लगातार आगे बढ़ता गया। उनके पास 3,000 घंटे से ज्यादा उड़ान का अनुभव है और उन्होंने 18 से ज्यादा अलग-अलग तरह के विमानों को उड़ाया है।
आगे चलकर उन्होंने एयरक्राफ्ट एंड सिस्टम्स टेस्टिंग एस्टैब्लिशमेंट (Aircraft and Systems Testing Establishment) में चीफ टेस्ट पायलट के तौर पर सेवाएं दीं। वह फाइटर स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर भी बने।
इसके बाद उन्होंने इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (Integrated Defence Staff) में डिप्टी चीफ जैसे बड़े पद की जिम्मेदारी भी संभाली।
1 जनवरी 2025 को संभाली वेस्टर्न एयर कमांड की कमान
जितेंद्र मिश्रा की असाधारण लीडरशिप और काबिलियत का सिलसिला यहीं नहीं रुका। 1 जनवरी 2025 को उन्होंने एयर मार्शल (Air Marshal) के रूप में भारतीय वायुसेना की बेहद महत्वपूर्ण वेस्टर्न एयर कमांड (Western Air Command) की कमान संभाली।
वेस्टर्न एयर कमांड को पाकिस्तान और चीन से लगी भारत की पश्चिमी सीमाओं की सुरक्षा की रीढ़ माना जाता है।
अब यही अनुभवी पूर्व एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा अयोध्या के भव्य राम मंदिर के नए मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ (CEO) की जिम्मेदारी संभालने जा रहे हैं। कारगिल युद्ध के दौरान 12 दिनों में मिराज 2000 को लेजर गाइडेड बमों के लिए तैयार करने से लेकर वायुसेना के शीर्ष पदों तक पहुंचने का उनका सफर बताता है कि राम मंदिर ट्रस्ट ने जिस अधिकारी को यह बड़ी जिम्मेदारी दी है, उनके पीछे सुरक्षा, तकनीक, नेतृत्व और प्रशासन का लंबा अनुभव मौजूद है।


