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Ram Mandir Chadhava Scam: राम मंदिर चढ़ावे का गोलमाल, ट्रस्टियों की भूमिका पर भी सवाल
Ram Mandir Chadhava Scam: राम मंदिर चढ़ावा घोटाले की जांच के बीच ट्रस्ट की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और बैठकों में वित्तीय विवरणों को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।
Ram Mandir News (Social Media).jpg
Ram Mandir Chadhava Scam: अयोध्या के राममंदिर में चढ़ावे के गोलमाल की जांच की आंच भले ही ट्रस्ट के दो सदस्यों चंपत राय और अनिल मिश्र को परेशान कर रही हो पर हकीकत में ट्रस्ट का कोई भी सदस्य इस मुद्दे पर खुद को इस दाग से बेदाग नहीं कह सकता है। ट्रस्ट में कुल 15 सदस्य होते हैं लेकिन अभी इसमें सदस्यों की संख्या सिर्फ 14 है। चंपत राय और अनिल मिश्र के स्थानीय होने के नाते इन पर जांच की आंच सीधी पड़ रही है।
सवाल बहुत हैं
सवाल बहुत से हैं और ट्रस्ट के सभी सदस्यों के सामने हैं। पर परेशान करने वाली बात यह है कि यह सभी सवाल अनुत्तरित हैं। यह घोटाला पकड़ में आने के बाद ट्रस्टियों ने प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं कराई? क्यों मामले को दबाकर लीपापोती करने की कोशिश हुई? राम मंदिर में आने वाले चढ़ावे की प्रक्रिया में बदलाव किसके कहने पर हुआ? ट्रस्ट की बैठकों में चढावे का जिक्र क्यों नहीं हुआ?चढ़ावे से जुड़ी पूरी प्रक्रिया पारदर्शी क्यों नहीं बनाई गई?
ट्रस्टियों की स्थिति
राम मंदिर ट्रस्ट में अभी 14 सदस्य हैं सवालों के दायरे में सिर्फ दो लोगों के नाम है तो क्या ट्रस्ट के बाकी सदस्य नाममात्र के हैं? लेकिन यह सच नहीं कहा जा सकता है। अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि पर जब भी कोई आयोजन होता है ट्रस्ट के सारे सदस्यों के चेहरे मीडिया में देखे जा सकते हैं। ट्रस्ट के तमाम सदस्य अपनी भारी भरकम जिम्मेदारियों के तहत देश, समाजसेवा के साथ तमाम महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों पर रहे। तब इन जैसे नामचीन लोगों से इस तरह के घोटाले की बात नजर में आने से कैसे रह गई। एसआईटी टीम अब तक विशेष आमंत्रित सदस्य गोपाल राव से भी पूछताछ कर चुकी है। रामशंकर यादव टिल्लू, मनीष यादव, केडी तिवारी, राजेश पाठक, लव कुश मिश्र, अनुकल्प मिश्र जैसे सेवादार संदिग्धों में शामिल हैं जिनसे पूछताछ चल रही है।
कहां तक है घोटाले की तह
राम मंदिर में चढ़ावे का घोटाला सामने या घोटाला कितना बड़ा है इसके बारे में कोई बात स्पष्ट नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार कमल दुबे ने सवाल उठाते हुए कहा है कि राम मंदिर में छोटा मोटा घोटाला नहीं है। मंदिर और मंदिर आंदोलन कुछ नेताओं की कमाई का हथियार सालों साल से रहा है। कमल दुबे ने कहा कि विवादित ढांचा गिरने से पहले कानपुर के पी रोड स्थित किसी के आवास पर अशोक सिंघल और ऋतंभरा रुके थे। वही पर पत्रकारों को दोनों नेताओं ने चाय पर बुलाया था।
वरिष्ठ पत्रकार कमल दुबे अपनी फेसबुक पोस्ट में आगे कहते हैं तब मंदिर के लिए देश विदेश से मिल चुके धन का ब्योरा रखते हुए अशोक सिंघल ने बताया था कि मंदिर निर्माण के लिए अब तक बाईस हजार करोड़ की धनराशि आ चुकी है। इतनी बड़ी धन की सुरक्षा के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा था कि इसे कार्पस फंड में रखा गया है। आज के दौर में इस धनराशि की वैल्यू एक लाख करोड़ से भी अधिक होगी। परंतु इस धनराशि का भी कोई अता पता नहीं है। देश विदेश से जुटाये गये एक लाख करोड़ से ज्यादा की धनराशि कहाँ गई? इसका हिसाब देश के सामने रखा जाना चाहिए।
ट्रस्ट की मासूमियत
घोटाले की रिपोर्ट दर्ज न कराये जाने पर मौन राम मंदिर ट्रस्ट के कैंप कार्यालय प्रभारी प्रकाश गुप्ता का मीडिया के सम्मुख कहना है कि ट्रस्ट ने खुद सरकार से मामले की निष्पक्ष जांच कराने का अनुरोध किया था, क्योंकि इस प्रकरण से ट्रस्ट की छवि प्रभावित हो रही थी। कैंप कार्यालय प्रभारी का यह भी कहना है कि ट्रस्ट को इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि कुछ लोग इतनी सफाई से धन की हेराफेरी कर सकते हैं। प्रथम दृष्ट्या संदिग्धों में वही लोग शामिल हैं जो दान पात्र से निकाली गई राशि की गणना में शामिल थे।अचरज की बात यह भी है कि ट्रस्ट को यह भी नहीं पता की राशि ले जाने वाले कौन लोग थे दावा ये है कि ये किसी बैंक के स्थायी कर्मचारी नहीं थे, बल्कि आउटसोर्सिंग व्यवस्था के तहत काम करने वाले लोग थे।
व्यवस्था कैसे बदली क्या प्रक्रिया अपनायी गई
जब पहले मंदिर में आने वाले दान और दान पात्र से प्राप्त धनराशि की गिनती ट्रस्ट परिसर में ही होती थी। जिसमें दान पात्र भर जाने पर उसे खोला जाता था और नोटों को मूल्य के आधार पर अलग-अलग करके गिना जाता था, बैंक के लोग ये पैसा अपने साथ ले जाते थे। फिर बिना उचित लिखा पढ़ी के इस प्रक्रिया में बदलाव कैसे हुआ। व्यवस्था कैसे बदल गई इसका कोई जवाब नहीं है।
घोटाले की जड़ें गहरी हैं
पूरे मामले को देख कर सवाल उठना काफी हद तक उचित लगता है क्योंकि अब यह बातें सामने आ रही हैं कि ट्रस्ट की तरफ से सभी ट्रस्टियों को बैठकों की सूचना समय पर नहीं दी जाती थी। बैठकों में चढ़ावे और दान का पूरा ब्योरा नहीं रखा जाता था। और तीसरे सबसे अहम बात कहां कब कितना पैसा खर्च किया इसका भी कोई आडिट नहीं है। इससे लगता है इस घोटाले की जड़ें गहरी हैं जिसमें ट्रस्टियों का चुप्पी साध जाना भी सवाल खड़े कर रहा है। जबकि सवाल ट्रस्ट की गरिमा को लेकर उठ रहे हैं।


