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Ayodhya News: साध्वी ऋतंभरा ने अयोध्या में मां भगवती मंदिर पर किया ध्वजारोहण
Ayodhya News: अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र परिसर स्थित मां भगवती मंदिर पर ध्वजारोहण के दौरान साध्वी ऋतंभरा ने महिलाओं को भारतीय संस्कृति और सनातन मूल्यों की रक्षा का संदेश दिया। कार्यक्रम में हजारों महिलाओं की उपस्थिति रही।
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Ayodhya News: श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र परिसर के परकोटे में वायव्य कोण पर बने मां भगवती मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण के बाद साध्वी ऋतंभरा ने कहा कि आज की पीढ़ी को भारत की स्त्री होने का अर्थ बताना होगा। उन्होंने आह्वान किया कि आपकी संतानों को पता होना चाहिए कि माथे के सिंदूर की कीमत क्या होती है। भारत की सभ्यता और संस्कृति की रक्षा का दायित्व घर में रहने वाली देवियों का है। इसे गंभीरता से पालन करें, तभी इस कार्यक्रम की पूर्ण सफलता होगी।
साध्वी ऋतंभरा ने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में कहा—
“जो कील अवध के सीने में
सदियों से पड़ी कसकती थी।
लज्जित थी पीढ़ी-दर-पीढ़ी,
सदियों तक श्राप समझती थी।।
तुमने झटके से खींच उसे,
फेंका सरयू के पानी में।
फिर जग ने देखा एक बार
लहराता ज्वार जवानी में।।
हम केवल नहीं भजनिए हैं,
यह बात उन्हें समझाई है।
हम समर बांकुरे राघव के,
तुमको सौ बार बधाई है।।”
साध्वी ऋतंभरा ने कहा कि हमारे रामलला विराजमान हो गए। हमारी शक्ति की पुनः प्रतिष्ठा हो गई, जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने 500 वर्षों की लंबी यात्रा में पगड़ियां नहीं बांधीं, पदत्राण नहीं पहने। इस युग की देवियों ने अपने दो-दो पुत्ररत्न राम जन्मभूमि को समर्पित किए। सरयू का जल रक्त से लाल किया गया। आज भगवती के मंदिर के आसमान पर उसी समर्पण की ध्वजा लहरा रही है। माताओं के बलिदानों के कारण हमें आज यह दिन देखने को मिला है।उन्होंने कहा कि यहां से जाते समय प्रसाद के रूप में भगवती जगदंबा का सिंदूर लेकर जाना। जब यह प्रसाद घर पहुंचे तो आपकी संतानों को पता होना चाहिए कि माथे के सिंदूर की कीमत क्या होती है।उन्होंने कहा कि हमें स्वतंत्रता और उच्छृंखलता का भेद समझना होगा, क्योंकि शासित होना अनुशासित होना नहीं होता। आप चाहें तो भारत, भारत बना रहेगा। आपने चाहा तो दैत्य हिरण्यकश्यप के घर में प्रह्लाद का जन्म हुआ था, और आपने नहीं चाहा तो ऋषि विश्रवा के घर रावण का जन्म हुआ। अपनी शक्ति को पहचानकर और अपने पुत्र-दायित्व का बोध लेकर यहां से जाएं। मां की ध्वजा जाज्वल्यमान इसी प्रकार फहराती रहे, इसकी गारंटी दुर्गा वाहिनी की दुर्गाएं हैं।
उन्होंने कविता के माध्यम से कहा—
“यूं तो मैंने चाहा था कि घूंघट के पट खोलकर
दो आंखों से मैं भी जग को देखूं,
किन्तु आवरण हटे हैं जितने,
वे मुझको स्वीकार नहीं हैं।
सदियों से मैं पूछ रही हूं—
गौतम ऋषि का श्राप गलत था,
धोबी का आक्षेप गलत था।
मति-अंधों की धर्मसभा में
धर्मधुरंधर भीष्म पितामह का,
नीति-निपुण विदुर का,
सबका वह वैवश्य गलत था।
किन्तु बरसाती नाले-सी उच्छृंखल,
अपने राघव-लवकुश तजकर,
स्वर्णमयी लंका को वरती—
तुम मेरी प्रतिमान नहीं हो,
तुम मेरी प्रतिहारी नहीं हो।
कोई और नाम तुम खोजो,
तुम भारत की नारी नहीं हो।।”
उन्होंने कहा कि भारत की नारी होने के कुछ अर्थ हैं। उसके लिए चिंतन करना होगा कि आंचल की सामर्थ्य कितनी है। आज हमें संकल्प लेना होगा कि हमारी बच्चियां लव जिहाद का शिकार नहीं बनेंगी। इसके लिए प्रत्येक बच्ची को दुर्गा बनाने का संकल्प लेना होगा।उन्होंने यह भी कहा कि जब तक गौमाता के रक्त की एक-एक बूंद धरती माता को व्याकुल कर रही है, तब तक हम चैन से नहीं बैठेंगे। गौमाता की हत्या के कलंक के साथ हम गहरी सांस नहीं ले सकते। तुम्हें फिर कौशल्या, सुनयना, अंजनी और देवकी बनना होगा।
उन्होंने कहा—
“देश से है प्यार तो हर पल ये कहना चाहिए,
मैं रहूं या ना रहूं, भारत ये रहना चाहिए।
सिलसिला ये बाद मेरे यूं ही चलना चाहिए,
मैं रहूं या ना रहूं, भारत ये रहना चाहिए।।”
कार्यक्रम को राष्ट्र सेविका समिति की मीनाक्षी ताई, हरिद्वार से आई महामंडलेश्वर साध्वी मैत्री जी, केंद्रीय पिछड़ा आयोग की राष्ट्रीय अध्यक्ष साध्वी निरंजन ज्योति तथा साध्वी परिषद की महामंत्री साध्वी प्रज्ञा भारती ने भी संबोधित किया।इसके पूर्व श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चंपत राय ने उपस्थित मातृशक्ति को मंदिर और परकोटे का विस्तृत परिचय दिया। उन्होंने कहा कि साध्वी ऋतंभरा जी के साथ वात्सल्य परिवार की लगभग 60 बालिकाएं, माताएं और साध्वियां उपस्थित हैं।उन्होंने बताया कि विश्व हिंदू परिषद के कार्य में सक्रिय दुर्गा वाहिनी की लगभग 250 माता-बहनें भी उपस्थित हैं, जिन्होंने आंदोलन के समय महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और वर्तमान में भी सक्रिय हैं। इसके अतिरिक्त अयोध्या नगर और महानगर के सामाजिक जीवन से जुड़ी विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत 3500 से अधिक माता-बहनें कार्यक्रम में उपस्थित रहीं। उनके अनुसार कार्यक्रम में लगभग 4000 महिलाओं की सहभागिता रही।


