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बाराबंकी के परिषदीय स्कूलों में पढ़ाई बेपटरी, 320 विद्यालयों में शिक्षकों की कमी
Barabanki News: बाराबंकी के करीब 320 परिषदीय विद्यालयों में शिक्षकों की कमी से पढ़ाई प्रभावित है। हेतमापुर में 420 बच्चों पर सात शिक्षक और हसौर में 108 बच्चों के लिए नियमित शिक्षक नहीं है।
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Barabanki News: जिले के परिषदीय विद्यालयों में छात्र-शिक्षक अनुपात का असंतुलन बच्चों की पढ़ाई पर भारी पड़ रहा है। एक ओर कुछ विद्यालयों में जरूरत से कहीं अधिक शिक्षक तैनात हैं, वहीं दूसरी ओर सैकड़ों बच्चों वाले स्कूल एक या दो शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं। कहीं-कहीं तो नियमित शिक्षक की तैनाती तक नहीं है और दूसरे विद्यालय से शिक्षक संबद्ध कर काम चलाया जा रहा है। जिले में करीब 320 विद्यालयों में शिक्षकों की कमी से शिक्षण व्यवस्था प्रभावित होने की बात सामने आ रही है। सूरतगंज ब्लॉक का जूनियर हाईस्कूल हेतमापुर इसकी गंभीर तस्वीर पेश करता है, जहां लगभग 420 बच्चों की पढ़ाई महज सात शिक्षकों के भरोसे चल रही है। जिला प्रशासन की वेबसाइट पर भी प्राथमिक विद्यालयों में अधिक और कम शिक्षकों वाले विद्यालयों की अलग-अलग सूचियां उपलब्ध हैं, जिससे जिले में शिक्षक तैनाती के असंतुलन की आधिकारिक पुष्टि होती है।
हेतमापुर की स्थिति सामान्य शिक्षक कमी से कहीं अधिक गंभीर है। सरयू नदी में कटान के कारण करीब दो वर्ष पहले सरसंडा के जूनियर हाईस्कूल और प्राथमिक विद्यालय के भवन प्रभावित होकर बह गए थे। इसके बाद वहां पढ़ने वाले क्रमशः 123 और 82 बच्चों को हेतमापुर के विद्यालय से संबद्ध किया गया। बाद में नदी के कटान से रास्ता क्षतिग्रस्त होने के कारण प्राथमिक विद्यालय हतमापुर के करीब 140 बच्चों को भी इसी परिसर में लाना पड़ा। हेतमापुर में पहले से लगभग 147 छात्र-छात्राएं पंजीकृत थे। इस तरह अलग-अलग विद्यालयों के बच्चों को एक ही परिसर में समायोजित किए जाने के बाद यहां पढ़ने वाले बच्चों की संख्या करीब 420 तक पहुंच गई, जबकि उनके लिए उपलब्ध शिक्षकों की संख्या केवल सात है। पांच कमरों के भवन में चार विद्यालयों की व्यवस्था होने से शिक्षक और बच्चों दोनों के लिए शैक्षणिक वातावरण पर दबाव बढ़ गया है।
इस तरह की स्थिति का सीधा असर कक्षाओं के संचालन पर पड़ता है। उच्च प्राथमिक और प्राथमिक स्तर के बच्चों की अलग-अलग कक्षाओं, विषयों और शिक्षण आवश्यकताओं के बीच सात शिक्षकों को 420 बच्चों की जिम्मेदारी संभालनी पड़ रही है। ऐसे विद्यालयों में शिक्षक को एक समय में कई कक्षाओं की जिम्मेदारी निभानी पड़ सकती है। इसका असर बच्चों को मिलने वाले व्यक्तिगत ध्यान, विषयवार पढ़ाई, अभ्यास, मूल्यांकन और कमजोर विद्यार्थियों के लिए अतिरिक्त सहायता पर पड़ता है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित रह जाएं तो सीखने की गुणवत्ता प्रभावित होने का खतरा रहता है।
पूरेडलई ब्लॉक के जूनियर हाईस्कूल हसौर की स्थिति इससे भी चिंताजनक है। यहां 108 छात्र-छात्राएं पंजीकृत हैं, लेकिन नियमित रूप से एक भी शिक्षक तैनात नहीं है। फिलहाल दूसरे विद्यालय के शिक्षक को संबद्ध कर किसी तरह पढ़ाई चलाने की व्यवस्था की गई है। इसी ब्लॉक के रानीमऊ, बेमा किठूली और नसीमपुर के जूनियर हाईस्कूल भी शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। क्सतपुर में तैनात इकलौते शिक्षक को अकादमिक रिसोर्स पर्सन की जिम्मेदारी दिए जाने के बाद वहां की नियमित शिक्षण व्यवस्था भी प्रभावित हुई है। ऐसे मामलों में शिक्षक की गैर-उपलब्धता केवल एक पद खाली होने का मामला नहीं रहती, बल्कि पूरे विद्यालय की कक्षा व्यवस्था प्रभावित हो जाती है।
बाराबंकी में शिक्षक तैनाती का असंतुलन नया नहीं है। 2024 में विभागीय आंकड़ों के आधार पर सामने आया था कि कुछ ब्लॉकों में बच्चों की संख्या के मुकाबले शिक्षकों की तैनाती काफी अधिक थी, जबकि दूसरी ओर कई विद्यालयों में एक या दो शिक्षक ही उपलब्ध थे। बंकी जैसे क्षेत्रों में छात्र संख्या की तुलना में शिक्षक अधिक पाए गए थे, जबकि बनीकोडर जैसे क्षेत्रों में शिक्षकों की भारी कमी दर्ज की गई थी। उस समय विभाग ने अधिक शिक्षक वाले विद्यालयों से जरूरत वाले विद्यालयों में समायोजन की योजना बनाई थी। जिले में 2,600 से अधिक परिषदीय विद्यालय हैं और शिक्षक तैनाती के असंतुलन को दूर करने के लिए लंबे समय से समायोजन की कोशिशें होती रही हैं।
सरप्लस शिक्षकों को जरूरत वाले विद्यालयों में भेजने की प्रक्रिया इस वर्ष भी विवाद और न्यायिक प्रक्रिया से प्रभावित हुई। मई-जून में जारी सूची में 608 शिक्षक सरप्लस पाए गए थे। आपत्तियों और काउंसलिंग की प्रक्रिया के बाद बड़ी संख्या में शिक्षकों ने सूची और समायोजन प्रक्रिया को लेकर हाईकोर्ट का रुख किया। 12 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत की प्रक्रिया के बीच बिना आपत्ति वाले 170 सरप्लस शिक्षकों के समायोजन का रास्ता साफ हुआ है। इन्हें दूसरे जिले या दूर के क्षेत्र में भेजने के बजाय उनके मौजूदा ब्लॉक में ही बंद पड़े और एकल शिक्षक वाले विद्यालयों में समायोजित करने का निर्णय लिया गया है। जहां उसी ब्लॉक में पद उपलब्ध नहीं होगा, वहां नजदीकी ब्लॉक का विकल्प दिया जा सकता है।
यानी मौजूदा स्थिति में यह कहना सही नहीं होगा कि सरप्लस शिक्षकों के समायोजन पर पूरी तरह रोक है। बल्कि न्यायालयी प्रक्रिया के बाद 170 शिक्षकों के समायोजन की व्यवस्था तय की गई है और 15 सितंबर तक उन्हें संबंधित ब्लॉकों के बंद या एकल शिक्षक वाले विद्यालयों में भेजे जाने की बात सामने आई है। बेसिक शिक्षा अधिकारी नवीन कुमार पाठक के अनुसार, शासन से मिले निर्देश के तहत यह प्रक्रिया कराई जा रही है और इसका उद्देश्य बंद व एकल शिक्षक वाले विद्यालयों की व्यवस्था मजबूत करना है।
जिले की समस्या का दूसरा पहलू यह है कि शिक्षक केवल संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि विद्यालय की वास्तविक जरूरत के अनुसार भी उपलब्ध होने चाहिए। किसी विद्यालय में बच्चों की संख्या कम होने पर वहां जरूरत से अधिक शिक्षक रह जाते हैं, जबकि दूरदराज और नदी के कटान से प्रभावित क्षेत्रों में बड़ी संख्या में बच्चों को सीमित शिक्षकों से पढ़ाना पड़ता है। लखनऊ से सटे इलाकों में शिक्षक तैनाती का आकर्षण अधिक होने की शिकायतें पहले भी सामने आती रही हैं। इसके विपरीत सूरतगंज, रामनगर, फतेहपुर और सरयू नदी के किनारे के क्षेत्रों में कम शिक्षक वाले विद्यालयों की समस्या अधिक गंभीर रही है। 2024 में विभागीय रिपोर्टों में भी इसी भौगोलिक असंतुलन को सामने रखा गया था।
सरप्लस शिक्षकों का सही तरीके से समायोजन इस समस्या का तत्काल समाधान दे सकता है, लेकिन केवल तब जब तैनाती वास्तविक छात्र संख्या, विद्यालय के स्तर, विषयों की जरूरत और भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर की जाए। प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों की जरूरत अलग होती है। उच्च प्राथमिक कक्षाओं में विषयवार शिक्षकों की आवश्यकता होती है, जबकि छोटे प्राथमिक विद्यालयों में भी न्यूनतम शिक्षक उपलब्ध होना जरूरी है। इसलिए केवल एक विद्यालय से शिक्षक हटाकर दूसरे विद्यालय में भेज देना पर्याप्त नहीं होगा। यह देखना भी जरूरी है कि जिस विद्यालय से शिक्षक हटाया जा रहा है वहां वास्तव में कितने शिक्षक आवश्यक हैं और जिस विद्यालय में भेजा जा रहा है वहां उनकी आवश्यकता किस स्तर की है।
बाराबंकी जिला प्रशासन की वेबसाइट पर कम और अधिक शिक्षकों वाले प्राथमिक विद्यालयों की सूची उपलब्ध होना इस बात का संकेत है कि समस्या को आंकड़ों के आधार पर पहचाना जा चुका है। अब चुनौती इन आंकड़ों को जमीन पर प्रभावी तैनाती में बदलने की है। प्रदेश स्तर पर भी शिक्षक असंतुलन को दूर करने के लिए सरप्लस शिक्षकों के समायोजन की प्रक्रिया चल रही है। जुलाई 2026 में प्रदेश के 16,986 परिषदीय विद्यालयों में शिक्षक कमी दूर करने के लिए सरप्लस शिक्षकों की तैनाती की तैयारी की रिपोर्ट सामने आई थी। इसी व्यापक प्रक्रिया का असर जिलों में भी दिखाई दे रहा है।
बाराबंकी जैसे बड़े और भौगोलिक रूप से विविध जिले में शिक्षक उपलब्धता को केवल कागजी पदों और नियुक्तियों की संख्या से नहीं मापा जा सकता। असली सवाल यह है कि जिस समय बच्चे कक्षा में पहुंचते हैं, उस समय उनके सामने पर्याप्त शिक्षक मौजूद हैं या नहीं। हेतमापुर में 420 बच्चों के लिए सात शिक्षक और हसौर में 108 बच्चों के लिए नियमित शिक्षक का अभाव इसी अंतर को उजागर करता है। एक ओर शिक्षक संख्या के असंतुलन से कुछ विद्यालयों में संसाधन अपेक्षाकृत अधिक हैं, तो दूसरी ओर शिक्षकविहीन और एकल शिक्षक वाले विद्यालयों में बच्चों की पढ़ाई सीधे प्रभावित हो रही है।
परिषदीय विद्यालयों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे उन परिवारों से आते हैं जिनके लिए सरकारी स्कूल ही उनकी शिक्षा का प्रमुख सहारा हैं। ऐसे में शिक्षक की कमी का असर केवल स्कूल की व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि बच्चों की सीखने की क्षमता और आगे की शिक्षा पर भी पड़ता है। यदि एक शिक्षक को एक साथ कई कक्षाओं और बड़ी संख्या में बच्चों को संभालना पड़े तो व्यक्तिगत मार्गदर्शन, अभ्यास और कमजोर बच्चों पर अतिरिक्त ध्यान देना मुश्किल हो जाता है। इसलिए शिक्षक समायोजन को प्रशासनिक स्थानांतरण की सामान्य प्रक्रिया के बजाय बच्चों के सीखने के अधिकार से जुड़ा विषय मानकर लागू करने की जरूरत है।
बाराबंकी में अब प्राथमिकता साफ है-जहां शिक्षक जरूरत से अधिक हैं, वहां से शिक्षकों को नियमों के अनुसार चिन्हित कर उन विद्यालयों तक पहुंचाया जाए जहां शिक्षक नहीं हैं या एक-दो शिक्षकों से काम चल रहा है। अदालत से जुड़े मामलों का सम्मान करते हुए प्रक्रिया पारदर्शी रखनी होगी और हर विद्यालय की वास्तविक स्थिति का सत्यापन करना होगा। यदि यह समायोजन प्रभावी ढंग से पूरा होता है तो हेतमापुर जैसे विद्यालयों पर पड़ा अतिरिक्त बोझ कम किया जा सकता है और हसौर जैसे शिक्षकविहीन विद्यालयों को स्थायी शिक्षक मिल सकते हैं। फिलहाल बाराबंकी के परिषदीय स्कूलों की तस्वीर यही बताती है कि समस्या शिक्षकों की कुल संख्या से ज्यादा उनके असमान वितरण की है और जब तक इस असंतुलन को दूर नहीं किया जाता, बड़ी संख्या में बच्चों की पढ़ाई इसी तरह व्यवस्था के सहारे चलती रहेगी।


